विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 243 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 292 to 301
श्लोक ( Shlok ) 292 – 294
एवं कर्मवशाजन्तुः संसारे परिवर्तते । पिता पुत्रः सुतो माता माता भ्राता स च स्वसा ॥ २९२ ॥स्वसा नप्ता भवेत्का वा बन्धुसम्बन्धसंस्थितिः । कस्य को नापकर्ताऽत्र नोपकर्ता च कस्य कः ॥ २९३ ॥ तस्माद्वैरानुबन्धेन मा कृथाः पापबन्धनम् । मुञ्च वैरं महानाग! विद्युइंष्टश्च मुच्यताम् ॥ २९४ ॥
इस प्रकार कर्मके वश होकर यह जीव परिवर्तन करता रहता है। पिता पुत्र हो जाता है, पुत्र माता हो जाता है, माता भाई हो जाती है, भाई बहन हो जाता है और बहन नाती हो जाती है सो ठीक ही है क्योंकि इस संसारमें बन्धु-जनोंके सम्बन्धकी स्थिरता ही क्या है ? इस संसारमें किसने किसका अपकार नहीं किया और किसने किसका उपकार नहीं किया ? इसलिए वैर बाँधकर पापका बन्ध मत करो। हे नागराज है धरणेन्द्र ! वैर छोड़ो और विद्युदुदंष्ट्रको भी छोड़ दो ॥ २९२-२९४ ॥
In this manner, being subservient to Karma, the soul continues to wander through the cycles of rebirth. A father becomes a son, a son becomes a mother, a mother becomes a brother, a brother becomes a sister, and a sister becomes a grandson. This is only natural, for what stability can there truly be in the relationships of kin within this world?
In this cycle of existence, who has not harmed another, and who has not helped another? Therefore, do not bind yourself to sin by harboring animosity. O Nagaraja, O Dharanindra! Relinquish your enmity and release Vidyudanshtra as well. [292–294]
श्लोक ( Shlok ) 295
इति तद्देववाक्सौधवृष्ट्या सन्तर्पितोऽहिराट् । देवाहं त्वत्प्रसादेन सद्धर्म श्रद्दधे स्म भोः ॥ २९५ ॥
इस प्रकार उस देवके वचनरूप अमृतकी वर्षासे धरणेन्द्र बहुत ही संतुष्ट हुआ। वह कहने लगा कि हे देव ! तुम्हारे प्रसादसे आज मैं समीचीन धर्मका श्रद्धान करता हूँ ।। २९५ ।।
In this way, Dharanindra felt immensely satisfied by the shower of the deity’s nectar-like words. He began to say, “O Divine One! By your grace, I now possess true faith in the Righteous Path (Samyak Dharma).” [295]
श्लोक ( Shlok ) 296
किन्तु विद्याबलादेष विद्य इंष्ट्रोऽधमाचरत् । तस्मादस्यान्वयस्यैव महाविद्यां छिनम्यहम् ॥ २९६ ॥
किन्तु इस विद्युदंष्ट्रने जो यह पापका आचरण किया है वह विद्याके बलसे ही किया है इसलिए मैं इसकी तथा इसके वंशकी महाविद्याको छीन लेता हूँ’ यह कहा ।। २९६ ।।
“However, since Vidyudanshtra has committed this sinful act through the power of his magical arts (Vidya), I shall seize the Great Science (Mahavidya) belonging to him and his lineage.” This is what he declared. [296]
श्लोक ( Shlok ) 297
इत्याहैतद्वचः श्रुत्वा देवो मदनुरोधतः । त्वया नैतद्विधातव्यमित्याख्यत्फणिनां पतिम् ॥ २९७ ॥
उसके वचन सुनकर वह देव धरणेन्द्रसे फिर कहने लगा कि आपको स्वयं नहीं तो मेरे अनुरोधसे ही ऐसा नहीं करना चाहिये ।। २९७ ॥
Hearing those words, the deity spoke to Dharanindra once more: “Even if you do not feel so inclined yourself, you should refrain from doing this, if only for the sake of my request.” [297]
श्लोक ( Shlok ) 298 – 299
सोऽपि यद्येवमेतस्य वंशानां मासिधन् महा । विद्याः पुंसां स्त्रियः सन्जयन्तभट्टारकान्तिके ॥ २९८ ॥साधयन्त्वन्यथा दर्पादिमे दुष्टाः कुचेष्टिताः । भविष्यतां च साधूनां पापाः कुर्वन्त्युपद्रवम् ॥ २९९ ॥
धरणेन्द्रने भी उस देवके वचन सुनकर कहा कि यदि ऐसा है तो इसके वंशके पुरुषोंको महाविद्याएँ सिद्ध नहीं होंगी परन्तु इस वंशकी स्त्रियाँ संजयन्त स्वामीके समीप महाविद्याओंको सिद्ध कर सकती हैं। यदि इन अपराधियों को इतना भी दण्ड नहीं दिया जावेगा तो ये दुष्ट अहंकारसे खोटी चेष्टाएँ करने लगेंगे तथा आगे होने वाले मुनियों पर भी ऐसा उपद्रव करेंगे ॥ २९८-२९९ ॥
Upon hearing the deity’s words, Dharanindra replied: “If that is the case, then the men of his lineage shall not be able to master the Great Sciences (Mahavidyas). However, the women of this lineage may master them in the presence of Lord Sanjayanta. If these offenders are not given at least this much punishment, then, out of sheer arrogance, these wicked beings will continue their evil ways and will cause similar afflictions to future sages as well.” [298-299]
श्लोक ( Shlok ) 300
एषोऽपि पर्वतो विद्याधरड्रीक्रीडितः परः । ड्रीमन्नामेत्युदीर्यास्मिन् भ्रातृप्रतिनिधिं व्यधात् ॥ ३०० ॥
इस घटनासे इस पर्वत परके विद्याधर अत्यन्त लज्जित हुए थे इसलिए इसका नाम ‘ह्रीमान्’ पर्वत है ऐसा कहकर उसने उस पर्वत पर अपने भाई संजयन्त मुनिकी प्रतिमा बनवाई ॥ ३०० ॥
“Because the Vidyadharas of this mountain were deeply ashamed by this incident, it is known as Mount Hriman (the Mountain of Shame).” Having said this, he had an image of his brother, the sage Sanjayanta, installed upon that mountain. [300]
श्लोक ( Shlok ) 301
विद्युइंष्ट’ च सामोक्तैर्धर्मन्यायानुयायिभिः । कृत्वा ‘प्रशान्तकालुष्यं देवं चाभ्यर्च्य यातवान् ॥३०१॥
धर्म और न्यायके अनुसार कहे हुए शान्त वचनोंसे विद्युदंष्ट्रको कालुष्यरहित किया और उस देवकी पूजा कर अपने स्थान पर चला गया।।३०१।।
Through calm words spoken in accordance with righteousness (Dharma) and justice (Nyaya), he cleansed Vidyudanshtra of his impurities. Then, after offering worship to the deity, he departed for his own abode. [301]
श्लोक 302 से 312
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 100
श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 124
विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |