अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 |श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
English translation of Uttar Puran parv 60- shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
तौ तदोदयिनौ श्रुत्वा नारदादसहिष्णुकः । तव मे प्रेषय प्रार्थ्यगजरत्नादिकं करम् ॥ ७२ ॥
नारदसे उस असहिष्णुने उन बलभद्र और नारायणका वैभव सुनकर उसके पास खबर भेजी कि तुम मेरे लिए हाथी तथा रत्न आदि कर स्वरूप भेजो ॥ ७२ ॥
“Upon hearing of the immense grandeur and majesty of Balabhadra and Narayana from Narada, that intolerant king (Madhusudana) sent a message to them, demanding: ‘Send me your excellent elephants, precious jewels, and other treasures.’ || 72 ||”
श्लोक ( Shlok ) 73
तदाकर्णनकालान्तवातोद्भूतमनोऽम्बुधिः । युगान्तान्तकदुः प्रेक्ष्यश्चुक्रोध पुरुषोत्तमः ॥ ७३ ॥
उसकी खबर सुनकर पुरुषोत्तमका मनरूपी समुद्र ऐसा क्षुभित हो गया मानो प्रलय-कालकी वायुसे ही क्षुभित हो उठा हो, वह प्रलय कालके यमराजके समान दुष्प्रेक्ष्य हो गया और अत्यन्त क्रोध करने लगा ।। ७३ ।।
“Upon hearing his message, the ocean of Purushottama’s mind became as agitated as if it were lashed by the fierce winds of cosmic destruction (Pralaya-kala); he became dreadful to behold, resembling Yama (the God of Death) at the time of cosmic annihilation, and grew intensely furious. || 73 ||”
श्लोक ( Shlok ) 74
सुप्रभोऽपि प्रभाजालं विकिरन् दिक्षु चक्षुषोः । ज्वालावलिमिव क्रोधपावकाचिस्तताशयः ॥ ७४ ॥
बलभद्र सुप्रभ भी दिशाओंमें अपने नेत्रोंकी लाल-लाल कान्तिको इस प्रकार बिखेरने लगा मानो क्रोधरूपी अग्निकी ज्वालाओंके समूहको ही बिखेर रहा हो ।॥ ७४ ॥
“Balabhadra Suprabha, too, began to cast the deep-red radiance of his eyes in all directions, as if he were scattering the very flames of the fire of his wrath. || 74 ||”
श्लोक ( Shlok ) 75
न ज्ञातः कः करो नाम किं करो येन भुज्यते । तं दास्यामः स्फुरत्खङ्ग शिरसाऽसौ प्रतीच्छतु ॥ ७५ ॥
वह कहने लगा – ‘मैं नहीं जानता कि कर क्या कहलाता है? क्या हाथ को कर कहते हैं? जिससे कि खाय जाता है। अच्छा तो मैं जिसमें तलवार चमक रही है ऐसा कर – हाथ दूँगा वह सिरसे उसे स्वीकार करे ।। ७५ ।।
“He began to say—’I do not know what a tax (Kara) means! Is a hand called Kara?—that with which one eats? Very well, then I shall give him a Kara (hand) in which a flashing sword gleams; let him accept it with his head!’ || 75 ||”
श्लोक ( Shlok ) 76
एतु गृह्णातु को दोष इत्याविष्कृततेजसौ । उभाववोचतामुच्चैर्नारदं परुषोक्तिभिः ॥ ७६ ॥
वह आवे और कर ले जावे इसमें क्या हानि है?’ इस प्रकार तेज प्रकट करनेवाले दोनों भाइयोंने कटुक शब्दोंके द्वारा नारदको उच्च स्वरसे उत्तर दिया ॥ ७६ ॥
“‘Let him come and take the tax (Kara) himself, what harm is there in that?’ In this manner, displaying their intense majesty and power, both brothers answered Narada in a loud voice with sharp, biting words. || 76 ||”
श्लोक ( Shlok ) 77
ततस्तदवगम्यायात् संक्रुद्धो मधुसूदनः । हन्तुं तौ तौ च हन्तुं तं रोषादगमतां प्रति ॥ ७७ ॥
तदनन्तर यह समाचार सुनकर मधुसूदन बहुत ही कुपित हुआ और उन दोनों भाइयोंको मारनेके लिए चला तथा वे दोनों भाई भी क्रोधसे उसे मारनेके लिए चले ॥ ७७ ॥
“Thereafter, upon hearing this news, Madhusudana became intensely furious and set out to slay both the brothers; and those two brothers, driven by wrath, also advanced to slay him. || 77 ||”
श्लोक ( Shlok ) 78
सेनयोरुभयोरासीत्संग्रामः संहरन्निव । सर्वानहँस्तदारिस्तं चक्रेण पुरुषोत्तमः ॥ ७८ ॥
दोनों सेनाओंका ऐसा संग्राम हुआ मानो सबका संहार ही करना चाहता हो । शत्रु- मधुसूदनने परुषोत्तमके ऊपर चक्र चलाया परन्तु वह चक्र पुरुषोत्तमका कुछ नहीं बिगाड़ सका। अन्तमें पुरुषोत्तमने उसी चक्रसे मधुसूदनको मार डाला ॥ ७८ ॥
“A fierce battle ensued between the two armies, looking as though it wished to annihilate everything in existence. The enemy, Madhusudana, hurled his cosmic discus (Chakra) at Purushottama, but that discus could cause no harm whatsoever to Purushottama. In the end, Purushottama slew Madhusudana with that very same discus. || 78 ||”
श्लोक ( Shlok ) 79
त्रिखण्डाधिपतित्वं तौ चतुर्थों रामकेशवौ । ज्योतिर्लोकाधिनाथत्वमन्वभूतामिवेन्द्विनौ ॥ ७९ ॥
दोनों भाई चौथे बलभद्र और नारायण हुए तथा तीन खण्डके आधिपत्यका इस प्रकार अनुभव करने लगे जिस प्रकार कि सूर्य और चन्द्रमा ज्योतिर्लोकके आधिपत्यका अनुभव करते हैं ।। ७९ ।।
“Both brothers became the fourth Balabhadra and Narayana (of the current cosmic cycle), and they began to enjoy the sovereignty over the three realms (Khandas) of the world, just as the sun and the moon enjoy supreme dominion over the luminous celestial sphere (Jyotirloka). || 79 ||”
श्लोक ( Shlok ) 80
केशवो जीवितान्तेऽगादवधिस्थानमायुषाम्” । सुप्रभस्तद्वियोगोत्थशोकानलसमन्वितः ॥ ८० ॥
आयुके अन्तमें पुरुषोत्तम नारायण छठवें नरक गया और सुप्रभ बलभद्र उसके वियोगसे उत्पन्न शोकरूपी अग्निसे बहुत ही संतप्त हुआ ॥ ८० ॥
“At the end of his lifespan, Purushottama Narayana descended to the sixth hell; and Suprabha Balabhadra was intensely tormented by the fire of grief born of his separation from him. || 80 ||”
श्लोक ( Shlok ) 81
प्रबोधितः प्रसन्नात्मा सोमप्रभजिनेशिना । दीक्षित्वा श्रेणिमारुह्य स मोक्षमगमत्सुधीः ॥ ८१ ॥
सोमप्रभ जिनेन्द्रने उसे समझाया जिससे प्रसन्नचित्त होकर उसने दीक्षा ले ली औरअन्तमें क्षपक श्रेणीपर आरूढ़ होकर उस बुद्धिमान् ने मोक्ष प्राप्त कर लिया ।॥ ८१ ॥
“Somaprabha Jinendra enlightened him, hearing which his heart became filled with joy, and he accepted initiation (Deeksha). Ultimately, ascending the Kshapaka Shreni (the ladder of spiritual destruction of karma), that wise soul attained liberation (Moksha). || 81 ||”
श्लोक 82 से 85
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