सम्पूर्ण द्वादशांग श्रुतवाणी में पद संख्या का विवरण
जैन दर्शन में श्रुतज्ञान को ज्ञान का एक विशाल सागर माना गया है। तीर्थंकर भगवान की दिव्यध्वनि के माध्यम से जो ज्ञान प्रसारित हुआ, उसे गणधरों ने द्वादशांग (12 अंगों) में संकलित किया। क्या आप जानते हैं कि इन शास्त्रों में पदों (Verses/Steps) की संख्या कितनी है?
१. प्रथम ११ अंगों का पद विवरण (१ से ११ अंग)
आचारांग से लेकर विपाक सूत्र तक, पहले ग्यारह अंगों में कुल ४,१५,०२,००० पद समाहित हैं। इनका विवरण नीचे दी गई तालिका में देख सकते हैं:
| क्रम | अंग का नाम | पद संख्या |
| १ | आचारांग | १८,००० |
| २ | सूत्रकृतांग | ३६,००० |
| ३ | स्थानांग | ४२,००० |
| ४ | समवायांग | १,६४,००० |
| ५ | व्याख्या प्रज्ञप्तयांग | २,२८,००० |
| ६ | ज्ञात धर्म कथांग | ५,५६,००० |
| ७ | उपासकाध्ययनांग | ११,७०,००० |
| ८ | अन्तःकृद्दशांग | २३,२८,००० |
| ९ | अनुत्तरोपादिक दशांक | ६२,४४,००० |
| १० | प्रश्न व्याकरण | ६३,१६,००० |
| ११ | विपाक सूत्र | १,८४,०००,०० |
| कुल | १ से ११ अंग | ४,१५,०२,००० |

२. १२वें अंग (दृष्टिवाद) की विशालता
जैन श्रुत में १२वां अंग ‘दृष्टिवाद’ सबसे विशाल है। अकेले इस अंग में १,०८,६८,५६,००५ पद हैं। इसके प्रमुख भेदों का विवरण इस प्रकार है:
- परिक्रम (५ भेदों में): १,८१,०५,००० पद
- सूत्र: ५,००० पद
- प्रथमानुयोग: ५,००० पद
- पूर्वगत (१४ पूर्व): ९५,५०,००,००५ पद
- चुलिका (५ भेदों में): १०,४६,४६,००० पद
विशेष नोट: १२वें अंग की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह संपूर्ण द्वादशांग का लगभग ९६% हिस्सा कवर करता है।
३. सम्पूर्ण द्वादशांगवाणी का सारांश
जब हम सभी अंगों को जोड़ते हैं, तो वह संख्या आती है जिसे श्रुत के ज्ञाता ‘एक सौ बारह करोड़, तिरासी लाख, अट्ठावन हजार, पाँच’ कहते हैं।
| विवरण | पद संख्या |
| ११ अंगों की कुल पद संख्या | ४,१५,०२,००० |
| मात्र १२वें अंग (दृष्टिवाद) की संख्या | १,०८,६८,५६,००५ |
| सम्पूर्ण द्वादशांग की कुल पद संख्या | १,१२,८३,५८,००५ |
निष्कर्ष
यह आंकड़े मात्र संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि उस अथाह ज्ञान का प्रमाण हैं जो हमारे आचार्यों ने संरक्षित किया था। १,१२,८३,५८,००५ पदों की यह श्रुतवाणी आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। यद्यपि काल दोष के कारण आज इसका पूर्ण रूप उपलब्ध नहीं है, लेकिन उपलब्ध अंश भी हमें सत्य के मार्ग पर ले जाने के लिए पर्याप्त हैं।
क्या आप जानते थे?
दृष्टिवाद अंग का ज्ञान वर्तमान में लुप्त प्राय माना जाता है, लेकिन इसके ‘पूर्वों’ का कुछ सार अन्य ग्रंथों (जैसे षट्खण्डागम) में आज भी सुरक्षित है।
ज्ञान का यह दीप जलता रहे, जिनवाणी माता की जय!