विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
स स्नेहाद्रामदत्तायाः सिंहचन्द्रः सुतोऽभवत् । पूर्णचन्द्रोऽनुजस्तस्य भूपतेस्तावतिप्रियौ ॥ १९२ ॥
वह भद्रमित्र मरकर स्नेहके कारण रानी रामदत्ताके सिंहचन्द्र नामका पुत्र हुआ तथा पूर्णचन्द्र उसका छोटा भाई हुआ। ये दोनों ही पुत्र राजाको अत्यन्त प्रिय थे ।।१९२॥
Upon his death, Bhadramitra—due to his previous attachments—was reborn as the son of Queen Ramadatta, named Simhachandra. He also had a younger brother named Purnachandra. Both these sons were extremely dear to the King. [192]
श्लोक ( Shlok ) 193
भाण्डागारावलोकार्थ कदाचिन्नृपतिं गतम् । दशति स्म निजक्रोधाञ्चक्षुः श्रुतिरगन्धनः ॥ १९३ ॥
किसी समय राजा सिंहसेन अपना भाण्डागार देखनेके लिए गये थे वहाँ सत्यघोषके जीव अगन्धन नामक सर्पने उसे स्वकीय क्रोधसे डस लिया ॥ १९३ ॥
At one time, King Singhsen went to inspect his treasury; there, the serpent named Agandhana—who was the soul of Satyaghosha—bit him out of personal vengeance. [193]
श्लोक ( Shlok ) 194
तदा गरुडदण्डेन सर्पानाहूय मन्त्रतः । निर्दोषोऽमुं प्रविश्या म निर्गतः शुद्धिमाप्नुयात् ॥ १९४ ॥
उस गरुड़दण्ड नामक गारुड़ीने मन्त्रसे सब सर्पाको बुलाकर कहा कि तुम लोगोंमें जो निर्दोष हो यह अग्निमें प्रवेश कर बाहर निकले और शुद्धता प्राप्त करे ।। १९४ ।।
The snake-charmer named Garudadanda, summoning all the serpents through the power of mantras, commanded: “Whosoever among you is innocent, let him enter this fire, emerge from it, and thus prove his purity.” [194]
श्लोक ( Shlok ) 195
अन्यथा निग्रहीष्यामीत्युक्ता विषधराः परे । जलाशयादिवाक्लेशानिर्यान्ति स्म हुताशनात् ॥ १९५ ॥
अन्यथा प्रवृत्ति करने पर मैं दण्डित करूँगा। इस प्रकार कहने पर अगन्धनको छोड़ वाकी सब सर्प उस अग्निसे क्लेशके बिना ही इस तरह बाहर निकल आये जिस तरह कि मानो किसी जलाशयसे ही बाहर निकल आये हों ।। १९५ ।।
“Otherwise, I shall punish whoever acts contrary to this.” Upon saying this, all the serpents except Agandhana emerged from the fire without any suffering, as easily as if they were stepping out of a pool of water. [195]
श्लोक ( Shlok ) 196
अगन्धनस्तु तद्वह्नौ भस्मितः कोपमानवान् । कालकाख्ये वने जज्ञे सलोभश्चमरो मृगः ॥ १९६ ॥
परन्तु अगन्धन क्रोध और मानसे भरा था अतः उस अग्निमें जल गया और मरकर कालक नामक वनमें लोभ सहित चमरी जातिका मृग हुआ ॥ १९६ ॥
But Agandhana, filled with intense pride and anger, perished in that fire and was reborn in the Kalaka forest as a greedy Chamar deer. [196]
श्लोक ( Shlok ) 197
सिंहसेनोऽपि कालान्ते सामजः सल्लकीवने । सम्भूयाशनिघोषाख्यां समवाप मदोद्धुरः ॥ १९७ ॥
राजा सिंहसेन भी आयुके अन्तमें मरकर सल्लकी वनमें अशनिघोष नामका मदोन्मत्त हाथी हुआ ॥ १९७ ॥
At the end of his life span, King Singhsen also passed away and was reborn in the Sallaki forest as a maddened elephant named Ashanighosha. [197]
श्लोक ( Shlok ) 198
सिंहचन्द्रोऽभवद्राजा यौवराज्येऽजनीतरः । भुन्जानयोस्तयोर्लक्ष्मी काले क्षण इवायति ॥ १९८ ॥
इधर सिंहचन्द्र राजा हुआ और पूर्णचन्द्र युवराज बना। राज्यलक्ष्मीका उपभोग करते हुए उन दोनोंका बहुत भारी समय जब एक क्षणके समान बीत गया ॥ १९८ ॥
Meanwhile, Simhachandra became the King and Purnachandra was appointed as the Crown Prince. As they enjoyed the prosperity and splendor of the kingdom, a vast period of time passed for them as swiftly as a single moment. [198]
श्लोक ( Shlok ) 199
कदाचित्सिहसेनोपरतवार्ताश्रुतेरिते । द्रष्टुं दान्तहिरण्यादिमती संयमसंयुते ॥ १९९ ॥
तब एक दिन राजा सिंहसेनकी मृत्युके समाचार सुननेसे दान्तमति और हिरण्यमति नामकी संयम धारण करनेवाली आर्यिकाएँ रानी रामदत्ताके पास आईं ॥ १९९ ॥
Then one day, upon hearing the news of King Singhsen’s death, the ascetic nuns Dantmati and Hiranyamati, who practiced great self-restraint, came to visit Queen Ramadatta. [199]
श्लोक ( Shlok ) 200 – 201
समीपे रामदत्तापि तयोः संयममाददौ । तच्छोकात्सिहचन्द्रोऽपि पूर्णचन्द्रयतिं श्रितः ॥ २०० ॥श्रुत्वा धर्ममिदं जन्म यदि याति वृथा नृणाम् । कुतः पुनरिहोत्पत्तिर्धान्तिरेवेति चिन्तयन् ॥ २०१ ॥
रामदत्ताने भी उन दोनोंके समीप संयम धारण कर लिया। इस शोकसे राजा सिंहचन्द्र पूर्णचन्द्र नामक मुनिराजके पास गया और धर्मोपदेश सुनकर यह विचार करने लगा कि यदि यह मनुष्य-जन्म व्यर्थ चला जाता है तो फिर इसमें उत्पत्ति किस प्रकार हो सकती है, इसमें उत्पत्ति होनेकी आशा रखना भ्रम मात्र है अथवा नाना योनियों में भटकना ही बाकी रह जाता है ।। २००-२०१ ।।
Ramadatta also accepted the vows of self-restraint (Sanyam) in their presence. Overcome with grief, King Simhachandra approached a Muniraj named Purnachandra. After listening to the religious discourse, he began to reflect: “If this human birth is allowed to go to waste, how can one hope to attain it again? To expect rebirth in this form is a mere delusion; otherwise, nothing remains but to wander endlessly through various other life forms.” [200–201]
श्लोक 202 से 211
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