Summary of Uttar Puran Parv 58 by Acharya Gunabhadra
इस पर्व में वासुपूज्य भगवान, द्विपृष्ठ नारायण, अचल बलभद्र तथा तारक प्रतिनारायण के चरित्र का वर्णन किया गया है।
उत्तरपुराण पर्व 58 संक्षिप्त सारांश:
प्रारम्भ में पद्मोत्तर नामक धर्मात्मा राजा का वर्णन है, जिसने युगन्धर जिनराज के उपदेश से संसार की असारता को समझकर वैराग्य धारण किया और दीक्षा लेकर तप किया। उसी पुण्य के प्रभाव से वह महाशुक्र स्वर्ग में इन्द्र हुआ और वहाँ से च्युत होकर चम्पा नगरी में राजा वसुपूज्य और रानी जयावती के यहाँ वासुपूज्य भगवान के रूप में अवतीर्ण हुए। देवों ने उनका जन्माभिषेक किया और वे आगे चलकर महान तप, वैराग्य और केवलज्ञान को प्राप्त कर बारहवें तीर्थंकर बने। उन्होंने विशाल संघ सहित धर्मप्रभावना की और अंत में मोक्ष प्राप्त किया।
इसके बाद सुषेण राजा, विन्ध्यशक्ति और गुणमंजरी की कथा आती है। गुणमंजरी को लेकर हुए अपमान और युद्ध में सुषेण पराजित हुआ। बाद में उसने धर्म ग्रहण किया, किन्तु भीतर के वैरभाव के कारण स्वर्ग में जन्म लिया। दूसरी ओर वायुरथ राजा ने भी तप करके उच्च देवगति प्राप्त की। यही दोनों जीव आगे चलकर द्विपृष्ठ नारायण और अचल बलभद्र के रूप में जन्मे। दोनों भाई अत्यन्त पराक्रमी, गुणवान और परस्पर प्रेमयुक्त थे।
पूर्वभव का विन्ध्यशक्ति बाद में तारक प्रतिनारायण बना। वह अत्यन्त क्रूर और अहंकारी था। उसने द्विपृष्ठ और अचल की उन्नति से ईर्ष्या कर उन्हें अपमानित करने के लिए दूत भेजा और युद्ध छेड़ दिया। युद्ध में तारक का चक्र उलटा द्विपृष्ठ के अधीन हो गया और उसी चक्र से तारक मारा गया। इसके बाद द्विपृष्ठ तीन खण्डों का स्वामी नारायण बना और अचल बलभद्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
अन्त में दोनों भाइयों का भिन्न परिणाम बताया गया है। द्विपृष्ठ नारायण भोग और परिग्रह में आसक्त रहने के कारण मृत्यु के बाद सातवें नरक में गया, जबकि अचल बलभद्र ने वैराग्य लेकर संयम धारण किया और मोक्ष प्राप्त किया। पर्व का निष्कर्ष यह है कि कर्मों के अनुसार ही जीव की गति होती है; इसलिए मनुष्य को पाप त्यागकर पुण्य, संयम और धर्म का आश्रय लेना चाहिए।
श्लोक 1 से 11 — पद्मोत्तर राजा का वैराग्य और दीक्षा
वासुपूज्य भगवान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वे इन्द्रों द्वारा पूजित तथा समस्त जीवों को पवित्र करने वाले हैं। पुष्करार्ध द्वीप के वत्सकावती देश के रत्नपुर नगर में पद्मोत्तर नामक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। उसकी कीर्ति, दया, नीति, दानशीलता और जिनभक्ति सर्वत्र प्रसिद्ध थी।
एक दिन मनोहर पर्वत पर विराजमान युगन्धर जिनराज के दर्शन एवं उपदेश सुनकर उसके भीतर संसार, शरीर और भोगों के प्रति गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसने लक्ष्मी, जीवन और शरीर की असारता का चिंतन किया तथा संसाररूपी दुःख-सागर से पार होने का निश्चय किया। अंततः उसने राज्य अपने पुत्र धनमित्र को सौंपकर अनेक राजाओं सहित दीक्षा धारण कर ली।
श्लोक 12 से 22 — महाशुक्र इन्द्र से वासुपूज्य भगवान के जन्म तक
दीक्षा के बाद पद्मोत्तर मुनि ने ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। मृत्यु के पश्चात् वे महाशुक्र स्वर्ग में इन्द्र हुए, जहाँ उन्होंने दिव्य सुखों का उपभोग किया। काल पूर्ण होने पर उनका जीव भरत क्षेत्र के चम्पा नगर में जन्म लेने हेतु अवतीर्ण हुआ।
चम्पा के राजा वसुपूज्य और रानी जयावती के यहाँ रानी ने शुभ स्वप्न देखे और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान का जन्म हुआ। देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया, उनका नाम “वासुपूज्य” रखा और महान उत्सव मनाया।
श्लोक 23 से 32 — वासुपूज्य भगवान का कुमारकाल और वैराग्य
वासुपूज्य भगवान का जन्म श्रेयान्सनाथ भगवान के तीर्थ के बहुत काल बाद हुआ। उनका शरीर कुङ्कुम के समान लाल कान्तिवाला, सत्तर धनुष ऊँचा तथा बहत्तर लाख वर्ष की आयु वाला था। वे गुणों के भण्डार थे और उनकी बुद्धि से समस्त सद्गुणों को श्रेष्ठ अभिव्यक्ति मिली।
अठारह लाख वर्ष के कुमारकाल के पश्चात् भगवान ने संसार की वास्तविकता का चिंतन किया। उन्होंने समझा कि विषयासक्ति जीव को कर्मबंधन में डालती है और वही दुःखमय संसार का कारण बनती है। शरीर, भोग और इन्द्रिय-सुख सब नश्वर हैं; अतः मोक्ष ही सर्वोत्तम मार्ग है — इस प्रकार उनके भीतर गहन वैराग्य उत्पन्न हुआ।
श्लोक 33 से 41 — दीक्षा और केवलज्ञान की तैयारी
भगवान के वैराग्य भाव को देखकर लौकान्तिक देवों ने आकर उनकी स्तुति की और दीक्षा-कल्याणक सम्पन्न किया। वासुपूज्य भगवान देवों द्वारा उठाई गई पालकी में बैठकर मनोहर उद्यान पहुँचे और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को विशाखा नक्षत्र में सामायिक चारित्र सहित दीक्षा धारण की। उसी समय उन्हें मनःपर्यय ज्ञान भी प्राप्त हुआ।
उनके साथ ६७६ राजाओं ने भी दीक्षा ली। अगले दिन सुन्दर नामक राजा ने उन्हें आहार दिया और पंचाश्चर्य प्रकट हुए। एक वर्ष की साधना के बाद भगवान पुनः उसी वन में लौटे और कठोर तप में स्थित हुए।
श्लोक 42 से 53 — केवलज्ञान, धर्मप्रभावना और निर्वाण
कदम्ब वृक्ष के नीचे उपवासपूर्वक ध्यान करते हुए वासुपूज्य भगवान ने माघ शुक्ल द्वितीया को चार घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया। देवों ने आकर उनकी पूजा की। उनके विशाल संघ में हजारों मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा अनेक ऋद्धिधारी साधु सम्मिलित थे।
भगवान ने समस्त आर्यक्षेत्रों में विहार कर धर्म की वर्षा की और अनगिनत जीवों को सद्मार्ग प्रदान किया। आयु के अंतिम समय में वे मन्द्रागिरि के मनोहर उद्यान में पहुँचे और भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को चौरानवे मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया।
श्लोक 54 से 61— वासुपूज्य भगवान की महिमा और द्विपृष्ठ नारायण का प्रारम्भिक वर्णन
निर्वाण के बाद देवों ने भगवान की भव्य पूजा की। ग्रन्थ में बताया गया है कि जैसे राजा को छह नीतियों से विजय मिलती है, वैसे ही मोक्षाभिलाषी को अनन्त गुणों से सिद्धि प्राप्त होती है। भगवान ने सप्तभंगी नय द्वारा पदार्थों का यथार्थ स्वरूप प्रतिपादित किया तथा आन्तरिक और बाह्य परिग्रह के त्याग का उपदेश दिया।
पूर्वभव में पद्मोत्तर राजा और महाशुक्र इन्द्र रहे वही जीव आगे चलकर वासुपूज्य भगवान बने। वे बालब्रह्मचारी रहकर राज्य करने वाले अद्वितीय तीर्थंकर थे। इसके बाद उनके तीर्थ में उत्पन्न द्विपृष्ठ नारायण का वर्णन आरम्भ होता है, जो तीन खण्डों का स्वामी और द्वितीय अर्धचक्री नारायण था। उसके पूर्वजन्मों के चरित्र को संसार से वैराग्य उत्पन्न करने वाला बताया गया है।
श्लोक 62 से 71— गुणमंजरी के कारण उत्पन्न वैर और युद्ध की भूमिका
कनकपुर के राजा सुषेण की नृत्यांगना गुणमंजरी अत्यन्त रूपवती, कलाओं में निपुण और दूसरी सरस्वती के समान मानी जाती थी। उसकी प्रसिद्धि सुनकर विन्ध्यपुर के राजा विन्ध्यशक्ति उसके प्रति आसक्त हो गया। उसने सुषेण के पास दूत भेजकर गुणमंजरी को कुछ समय के लिए भेजने का आग्रह किया।
दूत के असम्मानजनक शब्द सुनकर सुषेण अत्यन्त क्रोधित हो गया और उसने दूत का अपमान कर उसे लौटा दिया। जब यह समाचार विन्ध्यशक्ति को मिला तो वह भी क्रोध से भर उठा और मंत्रियों के साथ गुप्त योजना बनाकर युद्ध की तैयारी करने लगा।
श्लोक 72 से 81 — सुषेण का पराभव, वैराग्य और स्वर्गगमन
विन्ध्यशक्ति ने युद्ध में सुषेण को पराजित कर गुणमंजरी को बलपूर्वक छीन लिया। इस अपमान से सुषेण का मन टूट गया और वह अत्यन्त दुःखी रहने लगा। बाद में उसने विरक्त होकर सुव्रत जिनेन्द्र से धर्मोपदेश सुना और समझा कि यह सब पूर्वकृत पापों का फल है।
उसने दीक्षा धारण कर कठोर तप किया, किन्तु भीतर शत्रु के प्रति क्रोध बना रहने से निदानबन्ध सहित मृत्यु को प्राप्त हुआ और प्राणत स्वर्ग में देव हुआ। दूसरी ओर महापुर के राजा वायुरथ ने भी सुव्रत जिनेन्द्र से धर्म सुनकर राज्य त्याग दिया और तप द्वारा उसी स्वर्ग में उच्च देवपद प्राप्त किया।
श्लोक 82 से 91 — द्विपृष्ठ नारायण और अचल बलभद्र का जन्म
स्वर्ग से च्युत होकर वायुरथ का जीव द्वारावती के राजा ब्रह्म और रानी सुभद्रा के यहाँ अचल बलभद्र के रूप में उत्पन्न हुआ। उसी प्रकार सुषेण का जीव राजा ब्रह्म की दूसरी रानी उषा के यहाँ द्विपृष्ठ नारायण के रूप में जन्मा।
दोनों भाई अत्यन्त तेजस्वी, शास्त्रज्ञ और परस्पर प्रेमयुक्त थे। उनका आपसी स्नेह गंगा-यमुना के संगम के समान प्रतीत होता था। वे बिना भेदभाव के पृथ्वी का उपभोग करते थे और अपनी ऊँचाई, बल तथा सौन्दर्य से कैलास और अञ्जनगिरि के समान शोभायमान लगते थे।
श्लोक 92 से 101 तारक प्रतिनारायण का उदय और शत्रुता
पूर्वजन्म का विन्ध्यशक्ति अनेक जन्मों तक संसार में भटकने के बाद भोगवर्धन नगर के राजा श्रीधर के पुत्र तारक प्रतिनारायण के रूप में जन्मा। वह अत्यन्त पराक्रमी और क्रूर स्वभाव का था। उसके भय से अनेक राजा और विद्याधर उसके अधीन हो गये थे।
तारक अपनी शक्ति और अहंकार के कारण द्विपृष्ठ और अचल की उन्नति सहन नहीं कर सका। उसने सोचा कि ये दोनों उसके अधीन नहीं हैं और भविष्य में उसके लिए संकट बन सकते हैं। इसलिए उसने किसी दोष का बहाना बनाकर उन्हें नष्ट करने का निश्चय किया।
श्लोक 102 से 111 — दूत का अपमान और युद्ध का प्रारम्भ
तारक प्रतिनारायण ने कलहप्रिय दूत को भेजकर दोनों भाइयों से उनका प्रसिद्ध गन्धहस्ती माँगा और धमकी दी कि यदि हाथी नहीं भेजा गया तो युद्ध करके उन्हें मार डालेगा।
यह अपमानजनक संदेश सुनकर अचल बलभद्र ने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया कि तारक स्वयं सेना सहित आए, तब उसे हाथी और अन्य वस्तुएँ भी मिलेंगी। दूत ने लौटकर यह बात तारक को बताई, जिससे वह क्रोधाग्नि में जल उठा। बिना उचित विचार किए वह विशाल सेना लेकर दोनों भाइयों के नगर पर चढ़ आया और चारों ओर से घेरा डाल दिया।
श्लोक 112 से 121 — तारक का वध, दिग्विजय और दोनों भाइयों का भिन्न परिणाम
अचल बलभद्र ने पर्वत के समान स्थिर रहकर शत्रु सेना को रोक लिया और द्विपृष्ठ नारायण ने महान पराक्रम से युद्ध किया। अंत में तारक ने अपना चक्र फेंका, परन्तु वह द्विपृष्ठ की प्रदक्षिणा करके उसकी दाहिनी भुजा पर स्थिर हो गया। उसी चक्र से द्विपृष्ठ ने तारक का वध कर दिया।
द्विपृष्ठ तीन खण्डों का स्वामी और सात रत्नों से सम्पन्न नारायण बना, जबकि अचल बलभद्र को चार रत्न प्राप्त हुए। दोनों ने दिग्विजय कर वासुपूज्य भगवान को नमस्कार किया।
किन्तु अंत में दोनों का परिणाम भिन्न हुआ। द्विपृष्ठ ने भोगों और परिग्रह में आसक्त होकर मृत्यु के बाद सातवें नरक में जन्म लिया, जबकि अचल ने भाई के वियोग से वैराग्य प्राप्त कर संयम धारण किया और मोक्ष को प्राप्त हुआ। इस प्रसंग से बताया गया है कि समान वैभव प्राप्त होने पर भी पुण्य और पाप के भिन्न परिणाम जीव को ऊर्ध्वगति या अधोगति की ओर ले जाते हैं।
श्लोक 122 से 124— तीनों महापुरुषों के पूर्वभव और निष्कर्ष
द्विपृष्ठ नारायण पूर्वजन्म में सुषेण राजा था, फिर स्वर्ग में देव हुआ, उसके बाद तीन खण्डों का स्वामी नारायण बना और अंत में पापकर्मों के कारण सातवें नरक में गया।
अचल बलभद्र पूर्वजन्म में वायुरथ राजा था, फिर स्वर्ग में देव हुआ, उसके बाद अचल बलभद्र बना और अंततः मोक्ष प्राप्त कर त्रिभुवन द्वारा पूजित हुआ।
तारक प्रतिनारायण पूर्वभव में विन्ध्यशक्ति राजा था। बाद में तारक प्रतिनारायण बना और द्विपृष्ठ के हाथों मारा जाकर महापाप के कारण नरक में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार यह सम्पूर्ण चरित्र कर्मों के उदय और उनके फल का गम्भीर उपदेश प्रदान करता है।
पर्व 59
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