विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 14 to 21
श्लोक ( Shlok ) 14 – 15
सुरलोकादिर्म लोकमिन्द्रेऽस्मिन्नागमिष्यति । क्षेत्रेऽत्र पुरि काम्पिल्ये पुरुदेवान्वयो नृपः ॥ १४ ॥कृतवर्मा महादेवी जयश्यामाऽस्य विश्रुता । देवेन्द्रकृतपूजार्हा वसुधारादिवस्तुभिः ॥ १५ ॥
वह इन्द्र जब स्वर्ग लोकसे चयकर इस पृथिवी लोक पर आनेवाला हुआ तब इसी भरत-क्षेत्रके काम्पिल्य नगरमें भगवान् ऋषभदेवका वंशज कृतवर्मा नामका राजा राज्य करता था। जय-श्यामा उसकी प्रसिद्ध महादेवी थी। इन्द्रादि देवोंने रत्नवृष्टि आदिके द्वारा जयश्यामाकी पूजा की। ॥ १४-१५ ।।
“When that Indra was ready to depart from the celestial world to be born on this Earth, there ruled a King named Kritavarma in the city of Kampilya within this Bharata-kshetra. He was a descendant of Lord Rishabhadev. His famous Queen Consort was Jayashyama. The celestial gods, led by Indra, performed the worship of Queen Jayashyama through the ‘Rain of Gems’ and other auspicious ceremonies.” [14-15]
श्लोक ( Shlok ) 16 – 17
शुचौ कृष्णदशम्यन्तरजन्यामुत्तरादिमे । ऋक्षे भाद्रपदे दृष्ट्वा स्वमान् षोडश सत्फलान् ॥ १६ ॥तदानीमेव हस्तीन्द्रं विशन्तं वक्त्रवारिजे’ । व्यलोकिष्ट फलान्येषामवबुध्य महीपतेः ॥ १७ ॥
उसने ज्येष्ठकृष्णा दशमीके दिन रात्रिके पिछले भागमें उत्तराभाद्रपद नक्षत्रके रहते हुए सोलह स्वप्न देखे, उसी समय अपने मुख-क्रमलमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा, और राजासे इन सबका फल ज्ञात किया ।। १६-१७ ।।
On the tenth day of the dark half of the month of Jyeshtha, during the final watch of the night and under the Uttarabhadrapada lunar mansion (Nakshatra), she beheld sixteen dreams. At that very moment, she saw an elephant entering her lotus-like mouth; subsequently, she sought to learn the significance of all these signs from the King. [16-17]
श्लोक ( Shlok ) 18
ततः स्वविष्टराकम्पान्निवेदिततदुत्सवैः । सुरैः स्वर्गात्समायातैराप कल्याणमादिमम् ॥ १८ ॥
उसी समय अपने आसनोंके कम्पनसे जिन्हें गर्भकल्याणककी सूचना हो गई है ऐसे देवोंने स्वर्गसे आकर प्रथम-गर्भकल्याणक किया ।॥ १८ ॥
At that very moment, the celestial beings—having been alerted to the Garbha-kalyanaka (the auspicious occasion of conception) by the trembling of their thrones—descended from the heavens and celebrated the first Garbha-kalyanaka ceremony. [18]
श्लोक ( Shlok ) 19
वर्द्धमानेन गर्भेण तेनावर्द्धत सम्मदः । हृदये बन्धुवर्गस्य दुर्गतस्य धनेन वा ॥ १९ ॥
जिस प्रकार बढ़ते हुए धनसे किसी दरिद्र मनुष्यके हृदयमें हर्षकी वृद्धि होने लगती है उसी-प्रकार रानी जयश्यामाके बढ़ते हुए गर्भसे बन्धुजनोंके हृदयमें हर्षकी वृद्धि होने लगी थी ॥ १९ ॥
Just as the heart of a poor man overflows with joy as his wealth increases, the hearts of the kinsmen were filled with ever-growing delight as Queen Jayashyama’s pregnancy progressed. [19]
श्लोक ( Shlok ) 20
प्रमोदाय सुतस्येह सामान्यस्यापि सम्भवः । किमुच्यते पुनः सूतेः प्रागानम्रसुरेशिनः ॥ २० ॥
इस संसारमें साधारणसे साधारण पुत्रका जन्म भी हर्षका कारण है तब जिसके जन्मके पूर्व ही इन्द्र लोग नम्रीभूत हो गये हों उस पुत्रके जन्मकी बात ही क्या कहना है ? ।। २० ।।
In this world, the birth of even the most ordinary son is a cause for celebration; what then can be said of the birth of a son before whom even the Indras bowed in reverence long before his arrival? [20]
श्लोक ( Shlok ) 21
माघशुक्लचतुर्थ्यां सा तमहिर्बुध्रयोगतः । त्रिबोधं त्रिजगन्नाथं प्रासूत विमलप्रभम् ॥ २१ ॥
माघशुक्ल चतुर्थी के दिन (ख० ग० प्रतिके पाठकी अपेक्षा चतुर्दशीके दिन) अहिर्बुघ्न योगमें रानी जयश्यामाने तीन ज्ञानके धारी, तीन जगत्के स्वामी तथा निर्मल प्रभाके धारक भगवान्को जन्म दिया ।। २१ ।।
On the fourth day of the bright half of the month of Magha (alternatively the fourteenth day, according to certain manuscripts), under the Ahirbudhnya (Uttarabhadrapada) constellation, Queen Jayashyama gave birth to the Lord—the possessor of triple-knowledge, the Sovereign of the three worlds, and the bearer of stainless radiance. [21]
श्लोक 22 से 31
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