आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 192 अक्षरम्लेच्छों का स्वरूप
अक्षरम्लेच्छ वेद पढ़कर आजीविका करते और अधर्म से ठगते हैं। अज्ञान से अहंकार और पापसूत्रों से वे म्लेच्छ कहलाते हैं। हिंसा, मांसभक्षण, धनहरण, और धूर्तता उनका आचार है। नीच द्विज हिंसा को वेदों से प्ररूपित करते हैं, अतः सामान्य या निकृष्ट माने जाते हैं। केवल अर्हंत भक्त द्विज मान्य हैं। वे स्वयं को तारक या लोकसम्मत कहें, तो उनकी विशेषता सिद्ध नहीं, क्योंकि वे व्रतरहित और दयाहीन हैं। राजा को उन्हें म्लेच्छ समान मानकर कर वसूल करना चाहिए। जैनधर्मी द्विज ही पूज्य हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 182 to 192
श्लोक ( Shlok ) 182
तान्प्राहुरक्षरम्लेच्छा येऽमी वेदोपजीविनः।अधर्माक्षरसम्पाठेर्लोकव्यामोहकारिणः ॥१८२॥
जो वेद पढ़कर अपनी आजीविका करते हैं और अधर्म करनेवाले अक्षरोंके पाठसे लोगोंको ठगा करते हैं उन्हें अक्षरम्लेच्छ कहते हैं ।॥१८२॥
Those who make their livelihood by reciting the Vedas yet engage in unrighteous conduct,deceiving the people through corrupt recitations of sacred syllables—such men are called Akshara-Mlecchas.182
श्लोक ( Shlok ) 183
यतोऽक्षरकृतं गर्वमविद्याबलतस्तके’ । वहन्त्यतोऽक्षरम्लेच्छाः पापसूत्रोपजीविनः ॥१८३॥
चूंकि वे अज्ञानके बलसे अक्षरों द्वारा उत्पन्न हुए अहंकारको धारण करते हैं इसलिये पापसूत्रोंसे आजीविका करनेवाले वे अक्षरम्लेच्छ कहलाते हैं ॥१८३॥
Since, through the power of ignorance, they cling to the pride born of mere syllables,therefore, those who sustain themselves by sinful recitations are rightly called Akshara-Mlecchas. 183
श्लोक ( Shlok ) 184
म्लेच्छाचारो हि हिंसायां रतिर्मांसाशनेऽपि च । बलात्परस्वहरणं निर्द्धूर्तत्वमिति स्मृतम् ॥१८४।॥
हिंसा और मांस खाने में प्रेम करना, बलपूर्वक दूसरेका धन हरण करना और धूर्तता करना (स्वेच्छा-चार करना) यही म्लेच्छोंका आचार माना गया है ॥१८४।।
Delighting in violence and the consumption of flesh,seizing others’ wealth by force, and indulging in deceit and lawlessness—such are the ways deemed characteristic of the Mlecchas.184
श्लोक ( Shlok ) 185 – 186
सोऽस्त्यमीषां च यद्वेदशास्त्रार्थमधमद्विजाः । तादृशं बहुमन्यन्ते जातिवादावलेपतः ॥१८५॥प्रजासामान्यतै वैषां मता वा स्यान्निष्कृष्टता । ततो न मान्यताऽस्त्येषां द्विजा मान्याः स्युरार्हताः ।।१८६॥
चूंकि यह सब आचरण इनमें हैं और जातिके अभिमानसे ये नीच द्विज हिंसा आदिको प्ररूपित करनेवाले वेद शास्त्रके अर्थ-को बहुत कुछ मानते हैं इसलिये इन्हें सामान्य प्रजाके समान ही मानना चाहिये अथवा उससे भी कुछ निकृष्ट मानना चाहिये । इन सब कारणोंसे इनकी कुछ भी मान्यता नहीं रह जाती है, जो द्विज अरहन्त भगवान्के भक्त हैं वही मान्य गिने जाते हैं ॥ १८५-१८६॥
Since all such conduct abides in them, and intoxicated by pride of birth, these ignoble Dwijas misinterpret and uphold violence and other evils under the guise of Vedic scripture—therefore, they should be regarded as equal to, or even lower than, the common folk.For these reasons, they are worthy of no reverence.Only those Dwijas who are devoted to the Blessed Lord Arhant are deemed truly worthy of honour.185 – 186
श्लोक ( Shlok ) 187 – 192
वयं निस्तारका देवब्राह्मणा लोकसम्मताः । धान्यभागमतो राजे न दद्म इति चेन्मतम॥ १८७॥ वैशिष्टयं किङ्कृतं शेषवर्णेभ्यो भवतामिह । न जातिमात्राद् वैशिष्ट्यं जातिभेदाप्रतीतितः ॥ १८८॥गुणतोऽपि न वैशिष्टयमस्ति वो नामधारकाः । व्रतिनो ब्राह्मणा जैना येत एव गुणाधिकाः ॥१८९।॥निर्व्रता निर्नमस्कारा निर्घृणाः पशुघातिनः । म्लेच्छाचारपरा यूयं न स्थाने धार्मिका द्विजाः ॥१९०॥तस्मादन्ते कुरु म्लेच्छा इव तेऽमी महीभुजाम् । प्रजासामान्यधान्यांशदानाद्यैरविशेषिताः ॥१९१॥किमत्र बहुनोक्तेन जैनान्मुक्त्वा द्विजोत्तमान् । नान्ये मान्या नरेन्द्राणां प्रजासामान्यजीविकाः ।॥१९२॥
“हम ही लोगोंको संसार-सागरसे तारनेवाले हैं, हम ही देव-ब्राह्मण हैं और हम ही लोकसम्मत हैं अर्थात् सभी लोग हम ही को मानते हैं इसलिये हम राजाको धान्यका उचित अंश नहीं देते” इस प्रकार यदि वे द्विज कहें तो उनसे पूछना चाहिये कि आप लोगोंमें अन्य वर्णवालोंसे विशेषता क्यों है ? कदाचित् यह कहो कि हम जातिकी अपेक्षा विशिष्ट हैं तो आपका यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि जातिकी अपेक्षा विशिष्टता अनुभवमें नहीं आती है, कदाचित् यह कहो कि गुणकी अपेक्षा विशिष्टता है सो यह भी ठीक नहीं है क्योंकि आप लोग केवल नामके धारण करनेवाले हो, जो व्रतोंको धारण करनेवाले जैन ब्राह्मण हैं वे ही गुणोंसे अधिक हैं। आप लोग व्रतरहित, नमस्कार करनेके अयोग्य, दयाहीन, पशुओंका घात करनेवाले और म्लेच्छों-के आचरण करने में तत्पर हो इसलिये आप लोग धर्मात्मा द्विज नहीं हो सकते। इन सब कारणों से राजाओंको चाहिये कि वे इन द्विजोंको म्लेच्छोंके समान समझें और उनसे सामान्य प्रजाकी तरह ही धान्यका योग्य अंश ग्रहण करें। अथवा इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है ? जैनधर्मको धारण करनेवाले उत्तम द्विजोंको छोड़कर प्रजाके समान आजीविका करनेवाले अन्य द्विज राजाओंके पूज्य नहीं हैं ।॥१८७-१९२॥
“If we are the very ones who liberate beings from the ocean of worldly existence, if we alone are the gods and the true Brāhmaṇas, and if we alone are revered by all, then why should we yield any rightful share of grain to the king?” — If such is the claim of the Dwijas, then they must be asked: “What distinction do you possess above others of different castes?”Should they respond, “We are superior by virtue of birth,” then such a claim holds no ground, for superiority by birth is not found validated in experience.And should they contend, “We are superior by virtue of qualities,” then that too is untrue — for your qualities exist in name alone.Only those Brāhmaṇas who have embraced the vows of the Jain path are truly adorned with virtue.You, however, being devoid of vows, unworthy even of salutation, bereft of compassion, destroyers of living beings, and adherents of Mleccha conduct — you cannot be deemed righteous Dwijas.For all these reasons, kings ought to regard such Dwijas as no better than Mlecchas, and collect from them, as from common subjects, the rightful portion of grain.But what further need is there to speak on this?Excepting the noble Dwijas who follow the Jain faith, those other Dwijas who pursue livelihood like the masses are not to be deemed worthy of reverence by kings.187 – 192
श्लोक 193 से 201
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181
Download PDF