आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151
हाथियों का विश्राम और बंधन
सरोवरों में क्रीड़ा के बाद हाथी वृक्षों के पास विश्राम करते, पर बंधन स्थान का ज्ञान नहीं रखते। महावत उन्हें जल पिलाने का प्रयास करते, पर मदोन्मत्त हाथी न तो जल पीते, न भोजन करते। कुछ हिंसक हाथियों को बंधन में रखा जाता, जबकि अहिंसक मुक्त रहते। ऊँचे वृक्षों में बंधे हाथी सुखपूर्वक विश्राम करते, और हथिनियाँ बच्चों के साथ क्रीड़ा करती थीं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
वयं जात्येव मातङ्गा” मदेनोद्दीपिताः पुनः । कुतस्त्या शुद्धिरस्माकमित्यात्तं नु रजो गजैः ॥१४२।
प्रथम तो हम लोग जातिसे ही मातंग अर्थात् चाण्डाल हैं (पक्षमें-हाथी हैं) और फिर मद अर्थात् मदिरासे (पक्षमें – गण्डस्थलसे बहते हुए तरल पदार्थसे) उत्तेजित हो रहे हैं इसलिये हम लोगोंकी शुद्धि अर्थात् पवित्रता (पक्षमें-निर्मलता) कहांसे रह सकती है ऐसा समझकर ही मानो हाथियोंने अपने ऊपर धूल डाल ली थी ॥ १४२॥
“To begin with, we are Matangas by birth—that is, Chāṇḍālas, the lowest of castes (even as elephants belong to the Matanga species); and further, we are inflamed by intoxication—that is, by wine (even as elephants are roused by the streaming ichor from their temples). Realizing thus that there can be no question of our purity or sanctity (just as clarity cannot remain), it is as though the elephants themselves cast dust upon their own bodies.” (Verse 142)
श्लोक ( Shlok ) 143
इत्थं सरस्सु रुचिरं प्रविहृत्य नागाः सन्तापमन्त” रुदितं प्रशमय्य तोयैः । तीरद्रुमानुपययुः किमपि प्रतोषाद् बन्धं तु तत्र नियतं न विदाम्बभूवुः ॥१४३॥
इस प्रकार वे हाथी बहुत देर तक सरोवरोंमें क्रीड़ा कर और अन्तरङ्गमें उत्पन्न हुए संताप को जलसे शान्त कर किनारेके वृक्षों के समीप आ गये थे, यद्यपि वहां उनके बाँधने का स्थान नियत था तथापि क्रीड़ा से उत्पन्न हुए अतिशय संतोषसे उन्हें उसका कुछ भी ज्ञान नहीं था ॥ १४३।।
“Thus, after long sporting in the lotus-laden lakes and cooling the inner heat that had arisen within them through the touch of water, the elephants came to the banks near the trees. Though a spot had been fixed there for their tethering, yet, overwhelmed with the deep delight born of their play, they remained utterly unaware of it.” (Verse 143)
श्लोक ( Shlok ) 144
हृत्वा सरोऽम्बु करिणो निजदानवारि संवर्धितं ‘विनिमयादनृणाश्च सन्तः ।तद्वीचिहस्तजनितप्रतिरोधशङ्का व्यासङ्गिनो नु सरसः प्रसभं निरीयुः ॥१४४।।
हाथियोंने तालाबोंका जो पानी पिया था उसे मानों अपना बदला चुकाने के लिये ही अपने मदरूपी जल से बढ़ा दिया था, इस प्रकार प्यास रहित हो सुखकी साँस लेते हुए वे हाथी, ‘ये तालाब अपनी लहरेंरूपी हाथोंसे’ कहीं हमें रोक न लें’ ऐसी आशंका कर तालाबोंसे शीघ्र ही बाहर निकल आये थे ।।१४४।।
“As though to repay the favour of the lakes whose waters they had drunk, the elephants augmented them with their own ichor-like fluid. Now free from thirst and breathing the breath of contentment, they hastened out of the waters—fearing lest the lakes, with wave-like hands, might strive to detain them.” (Verse 144)
श्लोक ( Shlok ) 145
आधोरणा मदमषीमलिनान् करीन्द्रान् निर्णेक्तु मम्बु सरसामवगाहयन्तः । शेकुन केवलमपामुपयोगमात्रं “तीरस्थिताननु नयैस्तदचीकरन्त ।।१४५।।
मदरूपी स्याहीसे मलिन हुए हाथियोंको निर्मल करनेके लिये तालाबोंके जलमें प्रवेश कराते हुए महावत जब उन्हें जलके भीतर प्रविष्ट नहीं करा सके तब उन्होंने केवल जल ही पिलाना चाहा परन्तु बहुत कुछ अनुनय विनय करनेपर भी वे किनारे पर खड़े हुए उन हाथियों को केवल जल भी पिलानेके लिये समर्थ नहीं हो सके थे। भावार्थ मदोन्मत्त हाथी न तो पानी में ही घुसे थे और न उन्होंने पानी ही पिया था ।। १४५॥
“When the mahouts sought to purify the elephants—stained as they were by the inky fluid of ichor—by leading them into the clear waters of the lake, they found themselves unable to bring the beasts within. Then, hoping at least to offer them a drink, they made many a plea and entreaty; yet even this proved futile, for the elephants, standing obstinately upon the bank, would neither enter the water nor consent to drink it.” (Verse 145)
श्लोक ( Shlok ) 146
स्वैरं नवाम्बु परिपीतमयत्नलभ्यतीरद्रुमेषु न कृतः कवलग्रहोऽपि । छायास्वलम्भि न तु विश्रमणं प्रभिन्नैः स्तम्बेरमैर्बत मदः खलु नात्मनीनः ॥१४६॥
मदोन्मत्त हाथियोंने न तो अपने इच्छा-नुसार बिना यत्नके प्राप्त हुआ पानी ही पिया था, न किनारेके वृक्षोंसे कुछ तोड़कर खाया ही था, और न वृक्षोंकी छायामें कुछ विश्राम ही प्राप्त किया था, खेद है कि यह मद कभी भी आत्मा का भला करनेवाला नहीं है ।। १४६ ।।
“The elephants, maddened with ichor, neither drank the water that lay before them—offered without effort—nor plucked and ate anything from the trees at the bank, nor even took rest beneath their cooling shade. Alas, such intoxication never leads to the welfare of the soul.” (Verse 146)
श्लोक ( Shlok ) 147
नाध्वा द्रुतं गुरुतरैरपि नातियातो युद्धेषु जातु न किमप्यपराद्धमेभिः । भारक्षभाश्च करिणः सविशेषमेव बद्धास्तथाप्यनिभृता’ इति दिक्चलत्वम् ॥१४७।।
इन हाथियोंने शरीर भारी होनेसे शीघ्र ही मार्ग तय नहीं किया यह बात नहीं है अर्थात् इन्होंने भारी होनेपर भी शीघ्र ही मार्ग तय किया है, इन्होंने युद्धमें भी कभी अपराध नहीं किया है और ये भार ढोनेके लिये भी सबसे अधिक समर्थ हैं फिर भी केवल चंचल होनेसे इन्हें बद्ध होना पड़ा है इसलिये इस चंचलताको ही धिक्कार हो ।।१४७।।
“It is not that these elephants were slow in their progress due to the heaviness of their bodies—indeed, despite their weight, they moved swiftly along the path. Never have they faltered in battle, and in bearing burdens, they surpass all others. Yet, merely due to their restlessness, they were made to be bound. Therefore, let this fickleness alone be cursed.” (Verse 147)
श्लोक ( Shlok ) 148
बध्नीथ नः किमिति हन्त विनापराधाज् जानीत भोः प्रतिफलत्यचिरादिदं वः । इत्युच्चलत्सृणि विधूय शिरांसि बन्धे वैरं नु यन्तृषु गजाः स्म विभावयन्ति ॥ १४८ ॥ ॥
तुम लोग इस प्रकार बिना अपराधके हम लोगोंको क्यों बांध रहे हो ? तुम्हारा यह कार्य तुम्हें शीघ्र ही इसका बदला देगा यह तुम खूब समझ लो इस प्रकार बांधने के कारण महावतों में जो वैर था उसे वे हाथी अंकुश को ऊपर उछालकर मस्तक हिलाते हुए स्पष्ट रूपसे जतला रहे थे ।।१४८।।
“Why are you binding us in this manner without any fault of ours? Know this well — your deed shall soon bring its own retribution.”
With these bindings, the enmity that burned between the mahouts was plainly manifest, as the elephants flung their goads aloft and shook their heads with fierce defiance. (148)
श्लोक ( Shlok ) 149
आघातुको द्विरदिनः सविशेषमेव गात्रापरान्तकर वालधिषु न्ययोजि । बन्धेन सिन्धुरवरास्त्वितरे तथा नो गाढीभवत्यविरतान्न परत्र बन्धः ।।१४९।।
जो हाथी जीवोंका घात करनेवाले थे वे शरीरके आगे पीछे तथा सूंड़ और पूंछ आदि सब जगह बन्धनोंसे युक्त किये गये थे और जो हाथी किसीका घात नहीं करते थे वे बन्धनसे युक्त नहीं किये गये थे इससे यह सिद्ध होता है कि जो अविरत अर्थात् हिंसा आदि पापोंके त्यागसे रहित हैं उन्हीं के कर्मबन्धन सुदृढ़ रूपसे होता है और जो विरत अर्थात् हिंसा आदि नापों के त्यागसे सहित हैं उनके कर्मका बन्ध नहीं होता ॥ १४९॥
The elephants that were prone to harming living beings were bound firmly — at the front and rear of their bodies, their trunks, tails, and all other parts. But those that caused no harm to any creature were left unbound.
From this, it is clear: those who are avirat — who have not renounced sins such as violence — are tightly bound by the fetters of karma, while those who are virat — who have renounced such sinful acts — remain free from the bondage of karma. (149)
श्लोक ( Shlok ) 150
आलानिता वनतरुष्वतिमात्रमुच्चस्कन्धेषु सिन्धुरवराश्च ‘तथोच्चकैर्यत् । तन्नूनमाश्रयणमिष्टमुदात्तमेव सन्धारणाय महतामहतात्मसारम् ।।१५०।।
जिनके स्कन्ध बहुत ऊंचे गये हैं ऐसे वनके वृक्षोंमें ही सेनाके ऊँचे ऊँचे हाथी बांधे गये थे सो ठीक ही है क्योंकि महा-पुरुषोंको धारण करने के लिये जिसकी स्वशक्ति नष्ट नहीं हुई है ऐसा बहुत बड़ा ही आश्रय चाहिये ।।१५०।।
The tall elephants of the army were tethered only to those forest trees whose trunks rose high into the sky — and rightly so;
for to bear the weight of maha-purushas — great beings — one requires a mighty support, whose own inherent strength remains undiminished. (150)
श्लोक ( Shlok ) 151
इत्थं नियन्तृभिरनेकथवृन्दमुच्चैरा लानितं तरुषु सामि निमीलिताक्षम् । तस्थौ मुखं विचतुरेण कृताङ्गहार” लीलोपयुक्तकवलं स्फुटकर्णतालम् ॥१५१॥
Thus bound by the mahouts to tall trees, the herd of elephants stood at ease, half their eyes gently closed in contentment.
They swayed their massive bodies, took up mouthfuls of fodder with playful grace, and flapped their ears in quiet delight. (151)
श्लोक 152 से 161
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