आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
पूर्वभव में राजा अकम्पन का भाई रहा विचित्रांगद देव सौधर्म स्वर्ग से सुलोचना का स्वयंवर देखने आया। उसने राजा की आज्ञा से नगर के समीप सर्वतोभद्र राजभवन बनाया, जो मंगलद्रव्यों, विवाह मंडप और रत्न-सुवर्ण से सुशोभित था। इसके चारों ओर स्वयंवर महाभवन बनाया गया, जिसमें चार दरवाजे, गोपुर, रत्न-तोरण, सुवर्ण-कलश और नीलमणि-जड़ित धरातल था। यह भवन भोग-उपभोग की वस्तुओं से परिपूर्ण और पुण्य के प्रभाव से निर्मित था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 202 to 213
श्लोक ( Shlok ) 202 – 203
अत्रैकेषां निसुष्टार्थान्’ मितार्थानपरान् प्रति । परेषां ‘प्राभृतान्तःस्थपत्रान् शासनहारिणः ॥२०२॥स दानमानैः सम्पूज्य निवेद्यैतत्प्रयोजनम् । समानेतुं महीपालाद् सर्व दिक्कं समादिशत् ॥२०३।।
कितने ही राजाओंके पास निसृष्टार्थ अर्थात् स्वयं विचारकर कार्य करनेवाले दूत भेजे, कितनों हीके पास मितार्थ अर्थात् कहे हुए परिमित समाचार सुनानेवाले दूत भेजे और कितनों हीके पास उपहारके भीतर रखे हुए पत्रको ले जानेवाले दूत भेजे। इस प्रकार दान और सन्मानके द्वारा पूजित कर तथा स्वयंवर का प्रयोजन बतलाकर राजाने भूपालोंको बुलाने के लिये सभी दिशाओंमें अपने दूत भेजे ॥२०२-२०३॥
To some monarchs he dispatched emissaries endowed with independent discretion, able to act according to their own judgment; to others, he sent envoys bearing measured messages, delivering only what was expressly instructed; and to yet others, he sent messengers who carried letters discreetly enclosed within gifts. Thus, through acts of generosity and honor, and by declaring the purpose of the svayamvara, the king sent his ambassadors to every quarter of the realm, inviting the noble sovereigns from all directions. ॥202–203॥
श्लोक ( Shlok ) 204 – 205
ज्ञात्वा तदाशु तद्बन्धुर्विचित्राङ्गदसंज्ञकः । सौधर्मकल्पादागत्य देवोऽवधिविलोचनः ॥२०४।॥अकम्पनमहाराजमालोक्य वयमागताः । सुलोचनायाः पुण्यायाः स्वयंवरमवेक्षितुम् ॥२०५।।
यह सब समाचार जानकर अवधिज्ञानरूपी नेत्रोंको धारण करनेवाला विचित्रांगद नामका देव जो कि पूर्वभवमें राजा अकम्पनका भाई था सौधर्म स्वर्गसे आया और अकम्पन महाराजके दर्शन कर कहने लगा कि मैं पुण्यवती सुलोचनाका स्वयंवर देखनेके लिये आया हूँ ॥२०४-२०५।।
Having come to know all these tidings, the celestial being named Vichitrāngada—endowed with the divine eye of Avadhi-jñāna, and who in a former birth had been the brother of King Akampana—descended from the Saudharma heaven. Approaching King Akampana, he said: “I have come to witness the svayamvara of the virtuous and fair Sulochanā.” ॥204–205॥
श्लोक ( Shlok ) 206 – 207
इत्युक्त्वोपपुरे योग्ये रम्ये राजाभिसम्मतः । ब्रह्मस्थानोत्तरे भागे प्रधीरे वरवास्तुनि ॥२०६॥ प्राङ्मुखं सर्वतोभद्रं मङ्गलद्रव्यसम्भृतम् । विवाहमण्डपोपेतं प्रासादं बहुभूमिकम् ॥२०७॥
ऐसा कहकर उसने राजाकी आज्ञानुसार नगरके समीप ब्रह्मस्थान से उत्तरदिशाकी ओर अत्यन्त शान्त, उत्कृष्ट, योग्य और रमणीय स्थानमें एक सर्वतोभद्र नाम का राजभवन बनाया जिसका मुख पूर्व दिशाकी ओर था, जो मङ्गलद्रव्योंसे भरा हुआ था, विवाहमण्डपसे सहित था तथा कई खण्डका था ।।२०६-२०७।।
Having spoken thus, and in accordance with the king’s command, he constructed a royal palace named Sarvatobhadra near the city, to the north of the sacred Brahmasthāna. It was raised in an exceedingly serene, splendid, auspicious, and delightful spot. The edifice faced the east, was adorned with all auspicious materials, included a magnificent wedding pavilion, and rose in many stately tiers. ॥206–207॥
श्लोक ( Shlok ) 208 – 213
चित्रप्रतो लीप्राकारपरिकर्मगृहावृतम् । भास्वरं मणिभर्माभ्यां विधाय विधिवत् सुधीः ॥२०८॥ तं परीत्य विशुद्धोरु सुविभक्तमहीतलम् । चतुरस्रं चतुर्दारशालगोपुरसंयुतम् ॥२०९llरत्नतोरणसङ्कीर्ण केतुमालाविलासितम् । हटत्कूटाग्रनिर्भासि भर्मकुम्भाभिशोभितम् ॥२१०॥स्थूलनीलोत्पलाबद्धस्फुरद्दीप्तिधरातलम् । विचित्रनेत्र विस्तीर्णवितानाति विराजितम् ॥२११॥भोगोपभोगयोग्योरुसर्व वस्तुसमाचितम् । यथास्थानगता शेषरत्नकाञ्चननिर्मितम् ॥२१२॥मुदा निष्पादयामास स्वयंवरमहागृहम् । न साधयन्ति केऽभीष्टं पुंसां शुभविपाकतः ॥२१३॥
वह राजभवन अनेक प्रकार की गलियों, कोटों तथा शृङ्गार करनेके घरोंसे घिरा हुआ था, देदीप्यमान था और मणियों तथा सुवर्णसे बना हुआ था। इस प्रकार उस बुद्धिमान् देवने विधिपूर्वक राजभवनकी रचना कर उसके चारों ओर स्वयंवरका महाभवन बनाया था जो कि विशुद्ध था, बड़ा था, जिसका पृथ्वीभाग अलग अलग विभागोंमें विभक्त था, जो चौकोर था, जिसमें चार दरवाजे थे, जो कोट तथा गोपुरद्वारोंसे सुशोभित था, रत्नोंके तोरणोंसे मिली हुई पताकाओंकी पंक्तियोंसे शोभायमान हो रहा था, देदीप्यमान शिखरोंके अग्रभागपर चमकते हुए सुवर्णके कलशोंसे अलंकृत था, जिसका धरातल बड़े बड़े नीलमणियोंसे जड़ा हुआ होनेके कारण जगमगा रहा था, जो नेत्र जातिके वस्त्रोंसे बने हुए बड़े बड़े चंदोवोंसे सुशोभित था, भोग उपभोगके योग्य समस्त बड़ी बड़ी वस्तुओंसे भरा हुआ था और योग्य स्थानपर लगाये हुए सब प्रकारके रत्नों तथा सुवर्णसे बना हुआ था। इस प्रकारका स्वयंवरका यह महाभवन उस देव ने बड़ी प्रसन्नतासे बनाया था सो ठीक ही है क्योंकि पुण्योदयसे पुरुषोंके अभीष्ट अर्थको कौन कौन सिद्ध नहीं करते हैं अर्थात् सभी करते हैं ॥२०८-२१३॥
That royal palace stood encircled by many kinds of lanes, fortifications, and chambers of adornment. Radiant in its splendor, it was fashioned of lustrous jewels and pure gold. In due form, the wise celestial being then erected around it the grand hall for the svayamvara—a structure of surpassing purity and vast dimensions. Its ground was artfully divided into distinct sections; it was quadrangular in shape, with four grand gateways, beautified by battlements and stately archways. Rows of fluttering banners interlaced with jeweled arches enhanced its charm; its resplendent pinnacles bore gleaming golden urns at their peaks.
The very floor sparkled with the inlay of great sapphires, while above, immense canopies woven from the finest netrajāti fabric lent further grace. It was filled with all manner of grand objects fit for enjoyment and delight, and was constructed entirely of gold and gems, each placed in its most befitting place.
Such was the majestic svayamvara hall that the celestial, in his joy, brought into being—and rightly so; for when the tide of merit rises, what cherished goal do men fail to attain? Indeed, all is made possible by the power of accumulated virtue. ॥208–213॥
श्लोक 214 से 221
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
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