आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232
श्लोक 233 से 241 जयकुमार और विद्याधरों का युद्ध
जयकुमार के बाणों ने अष्टचन्द्र विद्याधरों को घेरा, जिन्हें उन्होंने विद्या बल से रोका। सुनमि ने शत्रुओं पर बाणों की वर्षा की, लेकिन मेघप्रभ ने जयकुमार की आज्ञा से सुनमि के विद्यामयी बाणों को नष्ट कर उसे परास्त किया। जयकुमार की सेना ने अर्ककीर्ति के पक्ष को रोका, और उसका पराक्रम बढ़ता गया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 233 to 241
श्लोक ( Shlok ) 233
छिनैश्चक्रेण शूराणां शिरोऽम्भोजैर्विकासिभिः । ‘रणाङ्गणोऽर्चितो बाभात् नृत्त्यै जयजयश्रियः ॥ २३३॥
चक्र नामक शस्त्रसे कटे हुए शूरवीरोंके प्रफुल्लित मुखरूपी कमलोंसे भरी हुई वह युद्धकी भूमि ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो जयकुमारकी विजयलक्ष्मीके नृत्योंसे ही सुशोभित हो रही हो ॥ २३३॥
he battlefield, strewn with the severed heads Of valiant warriors—cleft by the discus in war—Their faces radiant like blooming lotuses even in death,Gleamed with a strange and solemn beauty,As though adorned by the very dance Of Jayakumāra’s goddess of victory.233
श्लोक ( Shlok ) 234 – 235
स्वामिसम्मानदानादिमहोप “कृतिनिर्भराः । प्राप्याधमर्णतां प्राणैः सेवां सम्पाद्य सेवकाः ॥२३४।॥स्वप्राणव्ययसन्तुष्टैस्तद्भूभृद्भिः स्वभूभृतः । लब्धपूजान् विधायान्ये धन्या “नैर्ऋण्यमागमन् ।।
स्वामीके द्वारा पाये हुए आदर सत्कार आदि बड़े बड़े उपकारोंसे दबे हुए कितने ही सेवक लोग अपने प्राणों द्वारा स्वामीकी सेवाकर ऊऋण अवस्थाको प्राप्त हुए थे और कितने ही धन्य सेवक, अपने अपने प्राण देकर संतुष्ट हुए शत्रु राजाओंसे अपने स्वामियोंकी पूजा-प्रतिष्ठा कराकर कर्ज रहित हुए थे । भावार्थ-कितने ही सेवक लड़ते लड़ते मर गये थे और कितने ही शत्रुओंको मारकर कृतार्थ हुए थे ।।२३४-२३५।।
Countless loyal servants, weighed down by the immense kindness,Honour, and favour bestowed upon them by their lord, Rendered themselves free of debt— By offering up their very lives in devoted service.
And many were those blessed retainers, Who, laying down their lives in battle, Secured the glory and honour of their masters By vanquishing enemy kings— And thus, through valour and sacrifice, Made full repayment of their sacred obligation. —For some died fighting, and others lived to triumph,
But both were fulfilled in the debt of loyalty.234 – 235
श्लोक ( Shlok ) 236
जयमुक्ता द्रुतं पेतुरविमुक्तजयाः शराः । अष्टचन्द्रान् प्रति प्रोच्चैः “प्रदीप्योल्कोपमाः समम् ॥२३६॥
जिन्होंने विजय प्राप्त करना छोड़ा नहीं है और जो अपनी बड़ी भारी कान्तिसे उल्काके समान जान पड़ते हैं ऐसे जयकुमारके छोड़े हुए बाण अष्टचन्द्र विद्याधरोंके पास बहुत शीघ्र एक साथ पड़ रहे थे ।। २३६॥
Relentless in his pursuit of victory,And radiant in his splendour like a blazing meteor,Jayakumāra loosed his arrows— And lo! they fell upon Aṣṭacandra and the Vidyādharas All at once, with terrifying swiftness,
Like a sudden storm of shooting stars, Scorching the heavens as they struck their mark.236
श्लोक ( Shlok ) 237
जयप्रहितशस्त्राली तैर्निषिद्धा च विद्यया । ज्वलन्ती परितश्चन्द्रान् परिवेषाकृतिर्बभौ ॥२३७॥
जयकुमारके द्वारा छोड़ी हुई शस्त्रोंकी पंक्तियों को उन विद्याधरोंने अपने विद्या बलसे रोक दिया था। इसलिये वे उन के चारों ओर जलती हुई खड़ी थीं और ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो चन्द्रमाओंके चारों ओर गोल परिधि ही लग रही हो ॥२३७॥
The volleys of weapons loosed by Jayakumāra Were arrested mid-air by the Vidyādharas,Shielded by the might of their mystic arts. Thus, the blazing shafts stood encircling them,Suspended like a ring of fire— So resplendent, they seemed as though a radiant aureole Had formed around full moons, Girdling them with a halo of celestial flame.237
श्लोक ( Shlok ) 238
विश्वविद्याधराधीशमा दिराजात्मजस्तदा । द्विषो निःशेषयाशेषानित्याह सुनमिं रुषा ॥२३८।।
उसी समय आदि सम्म्राट्-भरतके पुत्र अर्ककीतिने बड़े क्रोधसे सब विद्याधरोंके अधिपति सुनमिसे कहा कि तुम समस्त शत्रुओंको नष्ट करो ॥ २३८ ॥
Then, in that very moment, A blazing wrath flared within Arkakīrti— Son of the prime sovereign, Emperor Bharata. With thunder in his voice, he turned to Sunami, Lord of all the Vidyādharas, and cried: “Annihilate the enemy—let none be spared!”238
श्लोक ( Shlok ) 239
सोऽपि सर्वैः खगैः सार्द्ध निर्द्धतारातिविक्रमः । वह्निवृष्टिमिवाकाशे ववर्ष शरसन्ततिम् ॥२३९॥
और शत्रुओंके पराक्रमको नष्ट करनेवाला सुनमिकुमार भी अग्नि वर्षाके समान आकाशमें बाणोंके समूहकीवर्षा करने लगा ॥२३९॥
And then, Sunamikumāra—The slayer of enemy prowess—Rose into the sky,And from the firmament he unleashed A torrential rain of arrows, Blazing like a storm of fire— As though the heavens themselves
Had begun to rain flames upon the earth.239
श्लोक ( Shlok ) 240
भीकराः किङ्कराकारा’ रुवन्तो रुद्धदिङ्मुखाः । कांस्कान् शृणाम नेतीव सुतीक्ष्णाः ‘शरवोऽपतन् ॥
जो अत्यन्त भयंकर हैं, किंकरोंके समान काम करनेवाले हैं, वेगके कारण शब्द कर रहे हैं और जिन्होंने सब दिशाएं रोक ली हैं ऐसे वे तीक्ष्ण बाण हम किस किसको नष्ट नहीं करें ? अर्थात् सभीको नष्ट करें यही सोचकर मानो सब सेना पर पड़ रहेथे ॥२४०।।
Fierce beyond reckoning, Swift as death’s own messengers, These razor-sharp arrows roared through the air with thunderous speed, So thick and relentless, they seemed to seal off every direction. And as though pondering— “Whom shall we not destroy?”— They descended upon the entire army With indiscriminate wrath, Slaying all in their path without pause or pity.240
श्लोक ( Shlok ) 241
“मेघप्रभो जयादेशादिभेन्द्रं वा मृगाधिपः । आक्रम्य विक्रमी शस्त्रः “ररौत्सीत्तं’ विहायसि ॥२४१॥
जिस प्रकार सिंह हाथीपर आक्रमण करता है उसी प्रकार खूब पराक्रमी मेघप्रभ नामके विद्याधर ने जयकुमारकी आज्ञासे उस सुनमिपर आक्रमण कर उसे शस्त्रोंके द्वारा आकाशमें ही रोक लिया ॥२४१॥
Even as a lion springs upon an elephant, So did Meghaprabha—the mighty Vidyādhara, Gallant and resolute—Assail Sunami in mid-air, Obeying the command of Jayakumāra. With a storm of weapons he struck, And halted the foe amidst the skies, As though the heavens themselves had borne witness
To a sovereign’s will and a warrior’s wrath.241
श्लोक 242 से 251
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232