आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41
राजाओं का सम्मान और क्षेत्रों की विजय
भरत प्रणाम करने वाले राजाओं को फल देकर अनुग्रह करते हैं और विभिन्न भाव-भंगिमाओं से उन्हें प्रसन्न करते हैं। वे नम्रीभूत राजाओं को संतुष्ट और विरोधियों को संतप्त करते हैं। अंग, वंग, कलिंग, मगध आदि देशों के राजा रत्न और हाथी भेंटकर उनकी कृपा पाते हैं। सेनापति बिना परिश्रम के कुरु, अवंती, काशी आदि देशों को वश में करता है और अन्य क्षेत्रों में भरत की आज्ञा स्थापित करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
प्रतिप्रयाणमभ्येत्य “प्राणंसिपुरमुं नृपाः । प्राणरक्षामिवास्याज्ञां वहन्तः स्वेषु मूर्धसु ॥३२॥
प्राणों की रक्षा के समान भरत की आज्ञा को अपने मस्तक पर धारण करते हुए अनेक राजा लोग प्रत्येक पड़ाव पर आकर उन्हें प्रणाम करते थे ॥ ३२॥
“Just as they would cherish the preservation of their own lives, numerous kings, bearing Bharata’s command as a sacred duty, would approach and bow to him at each stopping point on their journey.” (Verse 32)
श्लोक ( Shlok ) 33
प्रणतानभुजग्राह सातिरेकैः फलैः प्रभुः । किमु कल्पतरोः सेवास्त्यफलाल्पफलापि वा ॥३३॥
प्रणाम करने वाले राजाओं को महाराज भरत ने बहुत अधिक फल देकर अनुगृहीत किया था सो ठीक ही है क्योंकि कल्पवृक्षकी सेवा क्या कभी फलरहित अथवा थोड़ा फल देनेवाली हुई है ? ।। ३३ ।।
“Emperor Bharata, in turn, graciously rewarded the kings who paid their respects with abundant blessings, and this was only fitting, for has the service of the divine Kalpavriksha ever been devoid of fruit, or given but a meager harvest?” (Verse 33)
श्लोक ( Shlok ) 34
सम्प्रेक्षितैः स्मितेहसिः सविश्रम्भैश्च जल्पितैः। सम्म्राट् सम्भावयामास नृपान् सम्माननैरपि ॥३४॥
सम्राट् भरतने कितने ही राजाओं की ओर देखकर, कितने ही राजाओंकी ओर मुसकराकर, कितने ही राजाओं की ओर हंसकर, कितने ही राजाओंके साथ विश्वासपूर्वक वार्तालाप कर, और कितने ही राजाओं का सन्मान कर उन्हें प्रसन्न किया था ।। ३४।।
“Emperor Bharata, with a gracious gaze upon many kings, a warm smile for others, a joyful laugh with some, trusted conversations with yet more, and by honoring others, brought delight to all.” (Verse 34)
श्लोक ( Shlok ) 35
स्मितैः प्रसादं सञ्जल्पैर्विस्रम्भं हसितैर्मुदम् । प्रेक्षितैरनुरागं च व्यनक्ति स्म नृपेषु सः ॥३५।।
उन्होंने कितने ही राजाओंपर मुसकराकर अपनी प्रसन्नता प्रकट की थी, कितने ही राजाओंपर वार्तालाप कर अपना विश्वास प्रकट किया था, कितने ही राजाओंपर हंसकर अपना हर्ष प्रकट किया था और कितने ही राजाओंपर प्रेमपूर्ण दृष्टि डालकर अपना प्रेम प्रकट किया था ।। ३५।।
“He manifested his joy by smiling upon many kings, demonstrated his trust through heartfelt conversations with others, expressed his delight by laughing with some, and conveyed his deep affection by casting tender, loving glances upon yet others.” (Verse 35)
श्लोक ( Shlok ) 36
अताप्सींत प्रणतानेष समताप्सीद् विरोधिनः । शमप्रतापौ क्ष्मां जतुः पार्थिवस्योचितौ गुणौ ॥३६॥
उन्होंने नम्रीभूत राजाओंको संतुष्ट किया था और विरोधी राजाओंको अच्छी तरहसे संतप्त किया था सो ठीक ही है क्योंकि पृथिवीको जीतनेके लिये शान्ति और प्रताप ये दो ही राजाओंके योग्य गुण माने गये हैं ।॥३६॥
“He brought satisfaction to the humbled kings and dealt with the opposing ones in a manner that brought them to distress, and this was right, for peace and valor are the two virtues considered paramount for a king seeking to conquer the earth.” (Verse 36)
श्लोक ( Shlok ) 37
प्रसन्नया द्दशैवास्य प्रसादः प्रणते रिपौ । भ्रूभङ्गेणास्फुटत् कोपः सत्यं बहुनटो नृपः ॥३७॥
राजा भरत नमस्कार करनेवाले पुरुषपर अपनी प्रसन्न दृष्टिसे प्रसन्नता प्रकट करते थे और साथ ही शत्रुके ऊपर भौंह टेढ़ी कर क्रोध प्रकट करते जाते थे इसलिये यह उक्ति सच मालूम होती है कि राजा लोग नट तुल्य होते हैं ।॥ ३७॥
“King Bharata would reveal his pleasure by bestowing a gracious gaze upon those who paid him homage, while, at the same time, displaying his wrath by furrowing his brow at his enemies. Hence, the saying holds true that kings are akin to actors.” (Verse 37)
श्लोक ( Shlok ) 38
‘अङ्गान्मणिभिरत्यङ्गैर्वङ्गांस्तुङ्गैर्मतङ्गजैः । तैश्च तैश्च कलिङ्गेशान् सोऽभ्यनन्ददुपानतान् । ३८।
उत्तम उत्तम मणियोंको भेंट कर नमस्कार करते हुए अंग देशके राजाओंपर, ऊंचे ऊंचे हाथियोंको भेंट कर नमस्कार करते हुए वंग देशके राजाओं पर और मणि तथा हाथी दोनोंको भेंट कर नमस्कार करते हुए कलिंग देशके राजाओंपर वह भरत बहुत ही प्रसन्न हुए थे ।॥ ३८॥
“With great joy, King Bharata offered the finest gems as gifts and paid his respects to the kings of Anga, presented towering elephants and bowed to the rulers of Vanga, and bestowed both jewels and elephants in homage to the kings of Kalinga, all while displaying his deep pleasure.” (Verse 38)
श्लोक ( Shlok ) 39
मागधायितमेवास्य स्फुटं मागधिकैर्नृपैः । कीर्तयद्भिर्गुणानुच्चैः प्रसादमभिलाषुकैः ॥३९॥
भरतेश्वर के प्रसाद की इच्छा करनेवाले मगध देश के राजा उनके उत्कृष्ट गुण गा रहे थे इसलिये वे ठीक मागध अर्थात् बन्दीजनों के समान जान पड़ते थे ॥३९॥
“The kings of Magadha, desiring the grace of Bharateshvara, were singing the praises of his exalted virtues. Thus, they appeared to be, in essence, like prisoners of Magadha.” (Verse 39)
श्लोक ( Shlok ) 40
कुरूनवन्तीन् पाञ्चालान् काशींश्च सह कोसलैः । वैदर्भानप्यनायासादा चकर्ष” चमूपतिः ॥४०॥
भरत महाराज के सेनापति ने कुरु, अवंती, पांचाल, काशी, कोशल और वैदर्भ देशों के राजाओंको बिना किसी परिश्रम के अपनी ओर खींच लिया था अर्थात् अपने वश कर लिया था ।।४०।।
“The commander of King Bharata’s army effortlessly brought the kings of Kuru, Avanti, Panchala, Kashi, Kosala, and Vidarbha under his sway, without any exertion, and made them his own.” (Verse 40)
श्लोक ( Shlok ) 41
व्रजन् मद्रांश्च कच्छांश्च चेदीन् वत्सान् ससुह्यकान् । पुण्ड्रानोण्ड्रांश्च गौडांश्च मतमश्रावयद् विभोः ।४१।
मद्र, कच्छ, चेदि, वत्स, सुह्य, पुण्ड्र, औण्ड्र और गौड़ देशोंमें जा जा कर सेनापति ने सब जगह भरत महाराज की आज्ञा सुनाई थी ॥४१॥
“The commander, traveling through the lands of Madra, Kachcha, Chedi, Vatsa, Suhya, Pundra, Audra, and Gauda, proclaimed the command of King Bharata everywhere.” (Verse 41)
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31