आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102
श्लोक 103 से 111 स्त्रियों की निंदा
जयकुमार ने कहा कि स्त्रियाँ धर्म और काम से धन खरीदती हैं, उनमें विष भरा है, और उनके सत्याभास नमस्कार बुद्धिमानों को ठगते हैं। उनकी प्रसन्नता भयंकर है, और वे मायाचारी हैं। गुण स्त्रियों में स्थिर नहीं रहते, और दोष उनकी उत्पत्ति हैं। वे निर्गुण को गुणी मान लेती हैं, और उनके चंचल स्वभाव के कारण शास्त्रों में उनका मोक्ष नहीं माना गया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 103 to 111
श्लोक ( Shlok ) 103
धर्मः कामश्च “सञ्चेयो वित्तेनायं तु सत्पथः। क्रीणन्त्यर्थ स्त्रियस्ताभ्यां धिक् तासां वृद्धगृध्नुताम्० ll१०३ ll
धनके द्वारा धर्म और काम का संचय करना चाहिये यह तो समीचीन मार्ग है परन्तु स्त्रियां धर्म और काम से धन खरीदती हैं अतः उनकी इस बढ़ी हुई लोलुपताको धिक्कार हो ।॥ १०३॥
To amass righteousness and desire through wealth is indeed the proper course.But women, alas, seek to purchase wealth by bartering away virtue and love—Shame be upon this ever-growing greed of theirs!॥103॥
श्लोक ( Shlok ) 104
वृश्चिकस्य विषं पश्चात् पन्नगस्य विषं पुरः । योषितां दूषितेच्छानां विश्वतो विषमं विषम् ॥१०४।
विष बिच्छूके पीछे (पूंछपर) और साँपके आगे (मुँहमें) रहता है परन्तु जिनकी इच्छाएं दुष्ट हैं ऐसी स्त्रियोंके सभी ओर विषम विष भरा रहता है ।। १०४।।
The scorpion bears its venom in the tail,The serpent holds it in its fangs;But women of wicked desire—Ah! such as these are steeped in fatal poison on every side.॥104॥
श्लोक ( Shlok ) 105
सत्याभासैर्नतैः स्त्रीणां वञ्चिता ये न धीधनाः । दुःश्रुतीनामिवैताभ्यो मुक्तास्ते मुक्तिवल्लभाः ।। १०५॥
खोटी श्रुतियोंके समान इन स्त्रियोंके सत्याभास (ऊपरसे सत्य दिखनेवाले परन्तु वास्तवमें झूठे) नमस्कारोंसे जो बुद्धिमान् नहीं ठगे जाते हैं-इनसे बचे रहते हैं वे ही मुक्तिरूपी स्त्रीके वल्लभ होते हैं। भावार्थ जिस प्रकार कुशास्त्रोंसे न ठगाये जाकर उनसे सदा बचे रहने वाले पुरुष मुक्त होते हैं उसी प्रकार इन स्त्रियोंके हावभाव आदिसे न ठगाये जाकर उनसे बचे रहनेवाले-दूर रहनेवाले पुरुष ही मुक्त होते हैं ।॥ १०५ ॥
As the wise are not beguiled by heretical scriptures,So too are they not deceived by the feigned reverence—The semblance of sincerity—in these women.Only they who remain untouched by such delusionsAre worthy of union with the Lady called Liberation.For just as freedom is gained by shunning false doctrines,So is it attained by turning away from the wiles of such women.॥105॥
श्लोक ( Shlok ) 106
तासां किमुच्यते कोपः प्रसादोऽपि भयङ्करः । हन्त्यधीकान् प्रविश्यान्तरगाधसरितां यथा ॥१०६।।
जिन स्त्रियोंकी प्रसन्नता ही भयंकर है उनके क्रोधका क्या कहना है। जिस प्रकार गहरी नदियोंकी निर्मलता मूर्ख लोगोंको भीतर प्रविष्ट कर मार देती है उसी प्रकार स्त्रियोंकी प्रसन्नता भी मूर्ख पुरुषोंको अपने अधीन कर नष्ट कर देती है ॥१०६।।
When the joy of women itself is perilous,What, then, must be said of their wrath?Just as the limpid surface of a deep river Lures the foolish to their doom within,So too does the seeming delight of women Enslave the witless and lead them to ruin.॥106॥
श्लोक ( Shlok ) 107
“जालकैरिन्द्रजालेन वञ्च्या ग्राम्या हि मायया ।। ताभिः सेन्द्रो ‘गुरुर्वच्यस्त’ न्मायामातरः स्त्रियः ll१०७ ll
इन्द्रजाल करनेवाले अपने इन्द्रजाल अथवा मायासे मूर्ख ग्रामीण पुरुषों को ही ठगा करते हैं परन्तु स्त्रियाँ इन्द्र सहित बृहस्पतिको भी ठग लेती हैं इसलिये स्त्रियाँ माया-चारकी माताएँ कही जाती हैं ।॥१०७।।
Those who weave enchantments beguile but simple village folk With their spells and illusions—mere tricks of deception;But women—aye, they ensnare even Indra and Brihaspati alike!Therefore are they called the very mothers of artifice and guile.॥107॥
श्लोक ( Shlok ) 108
ताः श्रयन्ते गुणान्नेव नाशभीत्या यदि श्रिताः। तिष्ठन्ति न चिरं प्रान्ते नश्यन्त्यपि च ते स्थिताः ॥१०८।।
प्रथम तो गुण स्त्रियोंका आश्रय लेते ही नहीं हैं यदि कदाचित् आश्रयके अभावमें अपना नाश होनेके भयसे आश्रय लेते भी हैं तो अधिक समय तक नहीं ठहरते और कदाचित् कुछ समयके लिये ठहर भी जाते हैं तो अन्तमें अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं ।॥१०८।।
In truth, virtues seek not the refuge of women at all;And if, perchance, for fear of perishing in absence of shelter,They do take fleeting refuge—They abide not long.And even if they linger for a time,In the end, they surely perish.॥108॥
श्लोक ( Shlok ) 109
दोषाः किं तन्मयास्तासु दोषाणां कि समुद्भवः । तासां दोषेभ्य इत्यत्र न कस्यापि विनिश्चयः ॥ १०९।।
दोषोंका तो पूछना ही क्या है? वे तो स्त्रीस्वरूप ही हैं अथवा दोषोंकी उत्पत्ति स्त्रियोंमें है अथवा दोषोंसे स्त्रियोंकी उत्पत्ति होती है इस बातका निश्चय इस संसार में किसीको भी नहीं हुआ है ॥१०९॥
What need is there to speak of faults?—For woman herself seems naught but their very form!Whether vices dwell within women,Or women are born of vice,Or vice itself springs forth from them—This mystery none in the world has yet resolved.॥109॥
श्लोक ( Shlok ) 110
निर्गुणान् गुणिनो मन्तु गुणिनः खलु निर्गु णान् । “नाशकत् परमात्माऽपि मन्यन्ते ता हि हेलया ।।११०॥
निर्गुणोंको गुणी और गुणियोंको निर्गुण माननेके लिये परमात्मा भी समर्थ नहीं है परन्तु स्त्रियाँ ऐसा अनायास ही मान लेती हैं ।॥११०।।
To deem the unworthy as noble,And the noble as devoid of worth—Even the Supreme cannot so misjudge.Yet women, alas, embrace such notions With effortless ease.॥110॥
श्लोक ( Shlok ) 111
मोक्षो गुणमयो नित्यो दोषमय्यः स्त्रियश्चलाः। तासां नेच्छन्ति निर्वाणमत एवाप्तसूक्तिषु ॥१११॥
मोक्ष गुण स्वरूप और नित्य है परन्तु स्त्रियाँ दोषस्वरूप और चंचल हैं मानो इसीलिये अरहन्तदेवके शास्त्रोंमें उनका मोक्ष होना नहीं माना गया है ॥ १११ ॥
Liberation is the very essence of virtue—eternal, unwavering, and pure;But women are of the nature of fault—fickle, restless, and impure.Perhaps for this reason, indeed,The scriptures of the Arhats proclaim That liberation is not deemed attainable by them.॥111॥
श्लोक 112 से 121
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
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आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102
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