आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 संसारी जीव की परतंत्रता
संसारी जीव कर्मबन्धन के कारण परतंत्र है। सुख-दुख की वेदनाओं से चंचलता, ऋद्धियों के क्षय से नश्वरता, ताड़ना से बाध्यता, और इंद्रियजनित ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सुख के क्षयशील होने से अंतसहितता उत्पन्न होती है। कर्मों से मलिनता, शरीर की छेद्यता-भेद्यता, बुढ़ापा, मृत्यु, गर्भवास, और शरीर का परिमित होना इसका प्रमेयपना है। क्रोध से क्षोभ और योनियों में भ्रमण इसकी विविधता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
तद्यथा संसृतौ देही न स्वतन्त्रः कथञ्चन । कर्मबन्धवशीभावाज्जीवत्यन्याश्रितश्च यत् ॥८२॥
आगे इसी उदाहरणको स्पष्ट करते हैं-संसारमें यह जीव किसी प्रकार स्वतन्त्र नहीं है क्योंकि कर्मबन्धनके वश होनेसे यह जीव अन्यके आश्रित होकर जीवित रहता है ।॥८२॥
Let us now further elucidate this example—the soul, in the worldly realm, is in no manner free, for being subjugated by the bondage of karma, it lives ever dependent upon others. ॥82॥
श्लोक ( Shlok ) 83
ततः परप्रधानत्वमस्यैनत् प्रतिपादितम् ।। स्याच्चलत्वं च पुंसोऽस्य वेदनासहनादिभिः ॥८३॥
यह संसारी जीवकी परतन्त्रता बतलाई, इसी प्रकार सुख-दुःख आदिकी वेदनाओंके सहनेसे इस पुरुषमें चंचलता भी होती है ।॥८३॥
Thus has the bondage-bound soul’s dependence been declared; likewise, by enduring the sensations of pleasure and pain, this being becomes restless and unsteady. ॥83॥
श्लोक ( Shlok ) 84
वेदनाव्याकुलीभावश्चलत्वमिति लक्ष्यताम्। क्षयवत्त्वं च देवादिभवे लब्धर्द्धिसंक्षयात् ॥८४॥
सुख-दुःख आदिकी वेदनाओंसे जो व्याकुलता उत्पन्न होती है उसे चञ्चलता समझना चाहिये और देव आदिकी पर्याथमें प्राप्त हुई ऋद्धियोंका जो क्षय होता है उससे इस जीवके क्षयपना (नश्वरता) जानना चाहिये ।॥८४॥
The restlessness that arises due to the pains of happiness, sorrow etc. should be considered as fickleness and the decay of the life (impermanence) of this living being should be understood from the decay of the Riddhis obtained in the worship of God etc. ॥84॥
श्लोक ( Shlok ) 85
बाध्यत्वं ताडनानिष्टवचनप्राप्तिरस्य वै। अन्तवच्चास्य” विज्ञानमक्षबोधः परिक्षयी ॥८५॥
इस जीवको जो ताड़ना तथा अनिष्ट वचनोंकी प्राप्ति होती है वही इसकी बाध्यता है और इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाला ज्ञान क्षय होनेवाला है इसलिये वह अन्तसहित हे ।।८५।।
The chastisement and evil words that this living being receives are its only compulsion, and the knowledge generated by the senses is perishable, therefore it is inherent in the soul. 85.
श्लोक ( Shlok ) 86
अन्तवद्दर्शनं चास्य स्यादेन्द्रियकदर्शनम् । वीर्य च तद्विधं तस्य शरीरबलमल्पकम् ॥८६॥
इसका दर्शन भी इन्द्रियोंसे उत्पन्न होता है इसलिये वह भी अन्तसहित है और इसका वीर्य भी वैसा ही है अर्थात् अन्तसंहित है क्योंकि इसके शरीरका बल अत्यन्त अल्प है ।।८६।॥
The perception of this too arises from the senses, and hence it is also endowed with interiority. Its seminal essence is likewise internal, for the strength of its body is exceedingly feeble.86
श्लोक ( Shlok ) 87
स्यादस्य सुखमप्येवम्प्रायमिन्द्रियगोचरम् । रजस्वलत्वमप्यस्य स्यात्कर्माशैः कलङ्कनम् ॥८७॥
इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाला इसका सुख भी प्रायः ऐसा ही है तथा कर्मोंके अंशोंसे जो कलंकित हो रहा है वही इसका मैलापन है ।।८७।।
Its pleasure arising from the senses is also generally like this, and the taint which is being caused by the parts of karmas is its impurity. 87.
श्लोक ( Shlok ) 88
भवेत् कर्ममलावेशादत एव मलीमसः । छेद्यत्वं चास्य गात्राणां द्विधाभावेन खण्डनम् ॥८८॥
कर्मरूपी मलके सम्बन्धसे मलिन भी है और शरीरके दो दो टुकड़े होनेसे इसमें छेद्यत्व अर्थात् छिन्नभिन्न होनेकी शक्ति भी है ।॥८८॥
It is also dirty due to the impurities in the form of karma and due to the body being divided into two parts, it also has the power of being divided into pieces.॥88॥
श्लोक ( Shlok ) 89
मुद्गराद्यभिघातेन भेद्यत्वं स्याद् विदारणम् । जरावत्त्वं वयोहानिः प्राणत्यागो मृतिर्मता ॥८९॥
मुद्गर आदिके प्रहारसे इसका शरीर विदीर्ण हो जाता हे इसलिये इसमें भेद्यत्व भी है, जो इसकी अवस्था कम होती जाती है वही इसका बुढापा है, और जो प्राणोंका परित्याग होता है वह इसकी मृत्यु है ।॥८९॥
Its body gets torn by blows of mace etc., hence it is vulnerable, the decreasing of its age is its old age, and the giving up of life is its death. ॥89॥
श्लोक ( Shlok ) 90
प्रमेयत्वं परिच्छिन्नदेहमात्रावरुद्धता । गर्भवासोऽर्भकत्वेन जनन्युदरदुःस्थितिः ॥९०॥
यह जो परिमित शरीरमें एका रहता है वह इसका प्रमेयपना है और जो बालक होकर माताके पेटमें दुःखसे रहता है वह इसका गर्भवास है ।॥९०॥
“That which resides alone in this finite body is its sentience, and that which, as a child, resides in the mother’s womb with suffering is its gestation.”90
श्लोक ( Shlok ) 91
अथवा कर्मनोकर्मगर्भेऽस्य परिवर्तनम् । गर्भवासो विलीनत्वं स्याद् देहान्तरसङ्क्रमः ॥९१॥
अथवा कर्म नोकर्मरूपी गर्भमें जो इसका परिवर्तन होता रहता है वह इसका गर्भावास है और एक शरीरसे दूसरे शरीर में जो संक्रमण करना है वह विलीनता है ।।९१।।
“Alternatively, the transformation that occurs in the womb-like form of action and inaction is its gestation, and the transition from one body to another is its dissolution.”91
श्लोक 92 से 101
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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