आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201
श्लोक 202 से 208 क्षत्रिय धर्म और भरत का वैभव
समंजसत्व से राजा शिष्टों का पालन और दुष्टों का निग्रह करता है। दुष्ट हिंसा से पाप करते, शिष्ट क्षमा-संतोष से धर्म धारण करते हैं। भरत ने क्षत्रियों को वृषभदेव के मार्ग में नियुक्त कर आचार का उपदेश दिया। राजा इस धर्म को स्वीकार कर प्रसन्न हुए और योग-क्षेम में प्रवृत्त रहे। वर्णाश्रम धर्मोत्सव करते हुए संतोषी बने। भरत का क्षत्रिय और तीर्थक्षत्रिय चरित्र गौतम गणधर ने श्रेणिक के लिए निरूपित किया। वृषभदेव की भक्ति करने वाले भरत का समय सुखमय व्यतीत हुआ। वे जिनपूजा, याचक संतुष्टि, और समुद्रांत पृथ्वी का पालन करते हुए दश भोगों का उपभोग करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 202 to 208
श्लोक ( Shlok ) 202
गुणेनैतेन शिष्टानां पालनं न्यायजीविनाम् । दुष्टानां निग्रहं चैव नृपः कुर्यात् कृतागसाम् ॥२०२॥
इस समंजसत्व गुणसे ही राजाको न्यायपूर्वक आजीविका करनेवाले शिष्ट पुरुषोंका पालन और अपराध करनेवाले दुष्ट पुरुषोंका निग्रह करना चाहिये ।।२०२॥
Through this very virtue of equanimity, the king ought to protect the noble and virtuous—those who earn their livelihood justly—and restrain the wicked who engage in transgressions.202
श्लोक ( Shlok ) 203
दुष्टा हिसादिदोषेषु निरताः पापकारिणः । शिष्टास्तु क्षान्तिशौचादिगुणैर्धर्मपरा नराः ॥२०३॥
जो पुरुष हिंसा आदि दोषोंमें तत्पर रहकर पाप करते हैं वे दुष्ट कहलाते हैं और जो क्षमा, संतोष आदि गुणोंके द्वारा धर्म धारण करनमें तत्पर रहते हैं वे शिष्ट कहलाते हैं ।॥ २०३॥
Those who engage in sinful acts, being ever inclined toward violence and other vices, are deemed wicked; while those who, endowed with virtues such as forgiveness and contentment, remain steadfast in the observance of righteousness—they alone are called the noble.203
श्लोक ( Shlok ) 204
इत्थं मनुः सकलचक्रभृदादिराजः तान् क्षत्रियान् नियमयन् पथि सुप्रणीते” ।उच्चावचैर्गुरुमतैरुचितैर्वचोभिः शास्ति स्म वृत्तमखिलं पृथिवीश्वराणाम् ॥२०४॥
इस प्रकार सोलहवें मनु तथा समस्त चक्रवतियोंमें प्रथम राजा महाराज भरतने उन क्षत्रियोंको भगवत्प्रणीत मार्गमें नियुक्त करते हुए, अपने पिता श्री वृषभदेवको इष्ट ऊंचे नीचे योग्य वचनोंसे राजाओंके समस्त आचारका उपदेश दिया ।।२०४।।
Thus, the sixteenth Manu and foremost among all the universal monarchs, the illustrious King Bharata, instructing the kṣatriyas in the sacred path ordained by the Blessed Lord, imparted unto his revered father, Śrī Vṛṣabhadeva, the complete code of conduct for kingship through words most fitting—exalted, humble, and worthy. 204
श्लोक ( Shlok ) 205
इत्युच्चै र्भरतेशिनानुकथितं सर्वीयमुर्वीश्वराः क्षात्रं धर्ममनुप्रवद्य मुदिताः स्वां वृत्तिमन्वैयरुः । योगक्षेमपथेषु तेषु” सहिताः सर्वे च वर्णाश्रमाः । स्वे स्वे वर्त्मनि सुस्थिता धृतिमधुर्धर्मोत्सवैः प्रत्यहम् ।।२०५।।
इस प्रकार भरतेश्वरने जिसका अच्छी तरह प्रतिपादन किया है ऐसे सबका हित करनेवाले, क्षत्रियोंके उत्कृष्ट धर्मको स्वीकार कर सब राजा लोग प्रसन्न हो अपने अपने आचरणोंका पालन करने लगे और उन राजाओंके योग (नवीन वस्तुकी प्राप्ति) तथा क्षेम (प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा) में प्रवृत्त रहनेपर अपना हित चाहनेवाले सब वर्णाश्रमोंके लोग अपने अपने मार्गमें स्थिर रहकर प्रतिदिन धर्मोत्सव करते हुए संतोष धारण करने लगे ।।२०५।।
Thus, having received with delight the noble dharma of the kṣatriyas—so lucidly expounded by the sovereign Bharateśvara and beneficial to all—the assembled kings wholeheartedly embraced their respective duties. As those rulers engaged themselves diligently in yoga (the acquisition of new attainments) and kṣema (the preservation of what was attained), all people of the various castes and stages of life, seeking their own true welfare, stood firm upon their respective paths, daily rejoicing in sacred festivals of righteousness and abiding in deep contentment.205
श्लोक ( Shlok ) 206
जातिक्षत्रियवत्तमर्जिततरं रत्नत्रयाविष्कृतं तीर्थक्षत्रियवृत्तमप्यनुजगौ यच्चक्रिणामग्रणीः ।तत्सर्व मगधाधिपाय भगवान् वाचस्पतिर्गौतमो ‘व्याचख्या वखिलार्थतत्त्वविषयां जैनीं श्रुति. ख्यापयन् ॥ २०६॥
चक्रवतियों में अग्रेसर महाराज भरतने जो अत्यन्त उत्कृष्ट जातिक्षत्रियोंका चरित्र तथा रत्नत्रय से प्रकट हुआ तीर्थक्षत्रियोंका चरित्र कहा था वह सब, समस्त पदार्थोंके स्वरूपको विषय करने-वाले जैन शास्त्रोंको प्रकट करते हुए वाचस्पति (श्रुतकेवली) भगवान् गौतम गणधरने मगध देशके अधिपति श्रेणिकके लिये निरूपण किया ॥ २०६॥
The exalted Emperor Bharata, foremost among the universal monarchs, had once proclaimed the noble conduct befitting the high-born warrior race, as well as the sacred discipline of the tīrtha-kṣatriyas—those illumined by the Triple Jewels. This entire doctrine, revealing the true nature of all realities and manifesting the essence of the Jain scriptures, was later expounded by the venerable Lord Gautama Gaṇadhara, master of speech and knower of the scriptures (śrutakevalī), for the benefit of King Śreṇika, the sovereign of the land of Magadha.206
श्लोक ( Shlok ) 207
वन्दारोर्भरताधिपस्य जगतां भर्तुः क्रमौ वेधसः तस्यानुस्मरतो गुणान् प्रणमतस्तं देवमाद्यं जिनम् ।तस्यैवोपचितिं सुरासुरगुरोर्भक्त्या मुहुस्तन्वतः कालोऽनल्पतरः सुखाद् व्यतिगतो’ नित्योत्सवैः सम्भृतः ॥२०७।।
तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् वृषभदेवके चरणोंकी वन्दना करनेवाले, उन्हीं परब्रह्मके गुणोंका स्मरण करनेवाले, उन्हीं प्रथम जिनेन्द्रदेवको नमस्कार करनेवाले और सुर तथा असुरोंके गुरु उन्हीं भगवान् वृषभदेवकी भक्तिपूर्वक बार बार पूजा करनेवाले भरतेश्वरका निरन्तर होनेवाले उत्सवोंसे भरा हुआ भारी समय सुखसे व्यतीत हो गया ।॥२०७॥
The illustrious Emperor Bharata—who ceaselessly adored the feet of Lord Ṛṣabhadeva, the Sovereign of the three worlds; who ever recalled the virtues of that very Supreme Being; who offered reverent salutations unto the First Jina; and who, along with the hosts of celestials and asuras, repeatedly performed worship with deep devotion unto that divine Lord—passed his days in serene joy, amidst grand and unbroken festivals, in honor of the Blessed Ṛṣabhadeva. 207
श्लोक ( Shlok ) 208
जैनीमिज्यां वितन्वन्नियतमनुदिनं प्रीणयन्नर्थि सार्थ शश्वद्विश्वम्भरेशेरवनिधृतलसन्मौलिभिः सेव्यमानः ।क्ष्मां कृत्स्नामापयोधेरपि च हिमवतः पालयश्निस्सपत्नां रम्यैः स्वेच्छाविनोदैर्निरविश दधिराङ् भोगसारं दशाङ्गम् ।।२०८।।
जो नियमित रूपसे प्रतिदिन जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करता है, जो प्रतिदिन याचकोंके समूहको संतुष्ट करता है, पृथिवीपर झुके हुए मुकुटों से सुशोभित होनेवाले राजा लोग जिसकी निरन्तर सेवा करते हैं और जो हिमवान् पर्वतसे लेकर समुद्रपर्यन्तकी शत्रुरहित समस्त पृथिवीका पालन करता है ऐसा वह सम्राट् भरत अपनी इच्छानुसार क्रीड़ाओंके द्वारा दश प्रकारके उत्तम भोगोंका उपभोग करता था ।॥२०८॥
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहा-पुराणसङग्रहे भरत राजवर्णाश्रमस्थितिप्रति-पादनं नाम द्विचत्वारिंशसमं पर्व ॥४२॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके हिन्दी भाषानुवादमें भरतराजकी वर्णाश्रमकी रीतिका प्रतिपादन करनेवाला बयालीसवां पर्व समाप्त हुआ ॥४२॥
Thus ends the forty-second canto, which expounds the righteous conduct of varṇa and āśrama as observed by King Bharata, in the Hindi translation of the Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Mahāpurāṇa-saṅgraha, composed by the revered Ācārya Jinaseṇa.
He who daily worshipped the Blessed Lord Jina with unwavering devotion, who each day gladdened multitudes of supplicants, whose constant service was sought by monarchs adorned with crowns bowed in homage upon the earth, and who ruled unopposed the entire expanse of the earth from the snowy heights of Himavān to the ocean’s edge—such was the sovereign Emperor Bharata. In accordance with his will, he delighted in tenfold supreme pleasures, indulging in noble enjoyments as a master of sovereign sport.208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन
पर्व 43 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201
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