आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 शास्त्रों में निपुणता
भरत अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, हस्तितंत्र, और अश्वतंत्र में निपुण थे, जिससे लोग उन्हें इन शास्त्रों के कर्ता मानते थे। आयुर्वेद में उनकी प्रशंसा मूर्तिमान आयुर्वेद के रूप में होती थी। वे व्याकरण, शब्दालंकार, और छंदशास्त्र में कुशल थे। निमित्त, शकुन, और ज्योतिष शास्त्र उनके मतानुसार थे। वे इन शास्त्रों के अधिष्ठाता और मान्य थे। उनकी स्वाभाविक बुद्धि के कारण सभी विद्याओं में प्रगति थी। शास्त्रज्ञान में वे दर्पण समान थे, जिससे विद्वान संशयमुक्त होते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
आप्तोपज्ञेषु तत्त्वेषु कांश्चित् संजातसंशयान् । ततोऽपाकृत्य संशीतेस्तत्तत्त्ववं निरणीनयत् ॥१४२॥
भगवान् अरहन्तदेवके कहे हुए तत्त्वोंमें जिन किन्हीं को संदेह उत्पन्न होता था उन्हें वे उस संदेहसे हटाकर तत्त्वोंका यथार्थ निर्णय कराते थे ।।१४२।।
Whenever doubts arose concerning any of the principles taught by the Lord Arhantdeva, he would dispel those doubts and guide them to the true understanding of those truths. ॥142॥
श्लोक ( Shlok ) 143
तथाऽसावर्य शास्त्रार्थे” कामनीतौ च पुष्कलम् । प्रावीण्यं प्रथयामास यथात्र न परः कृती ॥१४३॥
इसी प्रकार वे अर्थशास्त्र के अर्थ में और कामशास्त्रमें अपना पूर्ण चातुर्य इस तरह प्रकट करते थे कि फिर इस संसारमें उनके समान दूसरा चतुर नहीं रह जाता था ।।१४३।।
In like manner, he displayed his complete mastery in the sciences of Artha (statecraft) and Kāma (desire and polity) with such skill that none in the world could rival his wisdom. ॥143॥
श्लोक ( Shlok ) 144
“हस्तितन्त्रेऽश्वतन्त्रे च दृष्ट्वा स्वातन्त्र्यमीशितुः । मूलतन्त्रस्य कर्ताऽयमित्यास्था तद्विदामभूत् ।। १४४।।
हस्तितन्त्र और अश्वतन्त्र में महाराज भरतकी स्वतन्त्रता देखकर उन शास्त्रों के जाननेवाले लोगों को यही विश्वास हो जाता था कि इन सबके मूल शास्त्रोंके कर्ता यही हैं ।। १४४।।
Observing King Bharata’s mastery and independence in the arts of handling the hand-reins (hastitantra) and the horse-reins (ashvatantra), the scholars of these disciplines were convinced that he was indeed the originator of these very sciences. ॥144॥
श्लोक ( Shlok ) 145
“आयुर्वेदे स दीर्घात्रुरायुर्वेदो न् मूर्तिमान्। इति लोको निरारेकं श्लाघते स्म निधीशिनम् ।।१४५।।
आयुर्वेद के विषयमें तो सब लोग निधियों के स्वामी भरतकी बिना किसी शंकाके यही प्रशंसा करते थे कि यह दीर्घायु क्या मूर्तिमान् आयुर्वेद ही है अर्थात् आयुर्वेदने ही क्या भरतका शरीर धारण किया है ।।१४५।।
Regarding the science of Ayurveda, all acknowledged without doubt that Bharata, the lord of treasures, was itself the very embodiment of longevity—that is to say, Ayurveda had, as it were, assumed the form of Bharata’s own body. ॥145॥
श्लोक ( Shlok ) 146
सोऽधीती पदविद्यायां स कृती वागलङ्कृतौ । स छन्दसां प्रतिच्छन्द इत्यासीत् सम्मतः सताम् ॥ १४६॥
इसी प्रकार सज्जन लोग यह भी मानते थे कि वे व्याकरण-विद्यामें कुशल हैं, शब्दालंकारमें निपुण हैं, और छन्दशास्त्र के प्रतिविम्ब हैं ।॥१४६॥
Similarly, the virtuous held the belief that he was proficient in the science of grammar, skilled in the art of poetic embellishment, and a living reflection of the discipline of prosody. ॥146॥
श्लोक ( Shlok ) 147
तदुपज्ञं निमित्तानि शाकुनं तदुपक्रमम् । तत्सर्गो ज्योतिषां ज्ञानं तन्मतं तेन तत्त्रयम् ॥१४७।।
निमित्तशास्त्र सबसे पहले उन्हीं के बनाये हुए हैं, शकुनशास्त्र उन्हीं के कहे हुए हैं और ज्योतिष शास्त्रका ज्ञान उन्हीं की सृष्टि है इसलिये उक्त तीनों शास्त्र उन्हींके मत हैं ऐसा समझना चाहिये ।।१४७।।
The science of omens (Nimittaśāstra) was first established by him; the science of portents (Śakunashāstra) originates from his teachings; and the knowledge of astrology (Jyotiṣaśāstra) is his creation—therefore, these three sciences are rightly understood to reflect his doctrines. ॥147॥
श्लोक ( Shlok ) 148
स निमित्तं’ निमित्तानां तन्त्रे मन्त्रे सशाकुने । दैवज्ञाने परं दैवमित्य भूत्संमतोऽधिकम् ॥१४८।।
वे निमित्त शास्त्रों के निमित्त हैं, और तन्त्र, मन्त्र, शकुन तथा ज्योतिष शास्त्रमें उत्तम अधिष्ठाता देव हैं इस प्रकार सब लोगोंमें अधिक मान्यताको प्राप्त हुए थे ॥ १४८ ॥
He is the very cause behind the science of omens; and in the disciplines of Tantra, Mantra, Shakuna, and Astrology, he is the supreme master deity—thus, among all people, he attained the highest reverence. ॥148॥
श्लोक ( Shlok ) 149
तत्सम्भूतौ समुद्भूतमभूत् पुरुषलक्षणम् । उदाहरणमन्यत्र लक्षितं येन तत्तनोः ॥१४९।।
महाराज भरतके उत्पन्न होनेपर पुरुषके सब लक्षण उत्पन्न हुए थे इसलिये दूसरी जगह उनके शरीरके उदाहरण ही देखे जाते थे ॥१४९॥
At the birth of King Bharata, all the marks of a great man manifested; hence, elsewhere, only examples drawn from his very person were seen. ॥149॥
श्लोक ( Shlok ) 150
अन्येष्वपि कलाशास्त्रसङ्ग्रहेषु कृतागमाः । तमेवादर्श मालोक्य संशयांशाद् व्यरंसिषुः ॥१५०।।
शास्त्रोंके जाननेवाले पुरुष ऊपर कहे हुए शास्त्रोंके सिवाय अन्य कलाशास्त्रोंके संग्रहमें भी भरतको ही दर्पणके समान देखकर संशयके अंशोंसे विरत होते थे अर्थात् अपने अपने संशय दूर करते थे ॥१५०।।
Scholars, beyond the aforementioned disciplines, regarded Bharata as a mirror reflecting all other collections of the arts; thus, they freed themselves from doubts and resolved their uncertainties by looking to him as their guide. ॥150॥
श्लोक ( Shlok ) 151
येनास्य सहजा प्रज्ञा पूर्वजन्मानुषङ्गिणी । तेनैषा विश्वविद्यासु जाता परिणतिः परा ॥१५१॥
चूंकि उनकी स्वाभाविक बुद्धि पूर्वजन्मसे संपर्क रखनेवाली थी इसलिये ही उनकी समस्त विद्याओंमें उत्तम प्रगति हुई थी ।।१५१।।
Since his innate intellect was connected to his past lives, he achieved exceptional progress in all his fields of knowledge. ॥151॥
श्लोक 152 से 158
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
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