आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161
मागधदेव का समर्पण और भरत के प्रति नम्रता
मागधदेव ने देवों के वचनों से प्रबोध प्राप्त कर चक्रवर्ती भरत की महिमा स्वीकारी। उनके मन में भय, आशंका, और प्रबोध उत्पन्न हुआ। क्रोध शांत होने पर उन्होंने भरत को प्रथम चक्रवर्ती, वृषभदेव के पुत्र, और पूज्य माना। वे आकाश-मार्ग से भरत के पास पहुँचे, बाण अर्पित कर नमस्कार किया, और स्वयं को उनका सेवक स्वीकार करने की प्रार्थना की। उन्होंने अपने अपराध की क्षमा माँगी और भरत के चरणों की सेवा से पवित्र होने की बात कही।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
इति तद्वचनात्किञ्चित् प्रबुद्ध इव तत्क्षणम् । अज्ञातमेवमेतत्स्यादित्यसौ प्रत्यपद्यत ॥१५२॥
इस प्रकार उन देवों के वचनों से जिसे उसी समय कुछ कुछ बोध उत्पन्न हुआ है ऐसे उस मागध देवने मुझे यह हाल मालूम नहीं था यह कहते हुए उनके वचन स्वीकार कर लिये ।। १५२॥
“Thus, through the words of those gods, a slight understanding arose within me at that very moment. The Magadha deity, saying, ‘I was unaware of this,’ accepted their words.” (152)
श्लोक ( Shlok ) 153
सप्तम्भ्रममिवास्याभूच्चित्तं किञ्चित्ससाध्वसम् । साशङ्कमिव सोद्वेगं प्रबुद्धमिव च क्षणम् ॥१५३॥
उस समय उसके चित्त में कुछ घबड़ाहट, कुछ भय, कुछ आशंका, कुछ उद्वेग और कुछ प्रबोध-सा उत्पन्न हो रहा था ।।१५३।।
“At that time, a certain restlessness, some fear, some doubt, some agitation, and a hint of awakening were arising in his mind.” (153)
श्लोक ( Shlok ) 154
ततः प्रसेदुषी तस्य नचिरादेव” शेमुषी । पूर्वापरं व्यलोकिष्ट कोपापायात् प्रशेमुषी ॥१५४।॥
तदनन्तर थोड़ी ही देरमें निर्मल हुई और क्रोध के नष्ट हो जाने से शान्त हुई उसकी बुद्धि ने आगे पीछे का सब हाल देख लिया ।। १५४।।
“Shortly thereafter, as his mind became clear and calm with the cessation of anger, his intellect perceived everything — past and future.” (154)
श्लोक ( Shlok ) 155
सोऽयं चक्रभृतामाद्यो भरतोऽलङ्घयशासनः। प्रतीक्ष्यः सर्वथास्माभिरनुनेयश्च सादरम् ॥१५५।।
यह वही चक्रवर्तीयों में पहला चक्रवर्ती भरत है जिसकी कि आज्ञाका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता, हम लोगों को हरएक प्रकार से इसकी पूजा करनी चाहिये और आदर सहित इसकी आज्ञा माननी चाहिये ।। १५५।।
“This is the very first Chakravarti, Bharata, whose command none can disobey. We must worship him in every way and honor his commands with utmost respect.” (155)
श्लोक ( Shlok ) 156
चक्रित्वं चरमाङ्गत्वं पुत्रत्वं च जगद्गुरोः । इत्यस्य पूज्यमेकैकं किं पुनस्तत्समुच्चितम् ॥१५६॥
यह चक्रवर्ती है, चरमशरीरी है और जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव का पुत्र है, इन तीनों में से एक एक गुण ही पूज्य होता है फिर जिसमें तीनोंका समुदाय है उसकी तो बात ही क्या कहनी है ? ।।१५६।।
“He is a Chakravarti, an embodied being, and the son of the World Teacher, Lord Ṛṣabhadeva. Even one of these qualities alone is worthy of reverence — what more can be said of one who embodies all three?” (156)
श्लोक ( Shlok ) 157
इति निश्चित्य “सम्भान्तैरनुयातः सुरोत्तमैः । सहसा चक्रिणं द्रष्टुमुच्चचाल स मागधः ॥१५७॥
इस प्रकार निश्चय कर वह मागध देव शीघ्र ही चक्रवर्तीको देखनेके लिये आकाश-मार्गसे चला, उस समय संभूमको प्राप्त हुए अनेक अच्छे अच्छे देव उसके पीछे पीछे जा रहे थे ॥१५७।।
“Thus deciding, the Magadha deity swiftly set out by the aerial path to see the Chakravarti. At that time, many splendid gods who had assembled there followed behind him.” (157)
श्लोक ( Shlok ) 158
खमुन्मणितिरीटांशुरचितेन्द्रशरासनम् । क्षणेनोल्लङ्घय सम्प्रापत् तं देशं यत्र चक्रभूत् ।।१५८।।
देदीप्यमान मणियों से जड़े हुए मुकुट को किरणों से जिसमें इन्द्रधनुष बन रहा है ऐसे आकाश को क्षण भरमें उल्लंघन कर वह मागध देव जहां चक्रवर्ती था उस स्थान पर जा पहुंचा ।।१५८॥
“Wearing a crown studded with radiant jewels, from which beams of light formed a rainbow, the Magadha deity crossed the sky in an instant and reached the place where the Chakravarti was.” (158)
श्लोक ( Shlok ) 159
पुरोधाय शरं रत्नपटले सुनिवेशितम् । मागधः प्रभुमानंसीदार्य स्वीकुरु मामिति ॥१५९॥
रत्न के पिटारे में रक्खे हुए बाणको सामने रखकर मागध देव ने भरत के लिये नमस्कार किया और कहा कि हे आर्य, मुझे स्वीकार कीजिये अपना ही समझिये ॥१५९॥
“Placing before him the arrows kept in a casket of jewels, the Magadha deity bowed to Bharata and said, ‘O noble one, please accept me as your own.'” (159)
श्लोक ( Shlok ) 160
चक्रोत्पत्तिक्षणे भद्र यन्नायामोऽनभिज्ञकाः। महान्तमपराधं नस्त्वं क्षमस्वार्थितो मुहुः ॥१६०।।
हे भद्र, हम अज्ञानी लोग चक्र उत्पन्न होने के समय ही नहीं आये सो आप हमारे इस भारी अपराधको क्षमा कर दीजिये, हम बार बार प्रार्थना करते हैं ।। १६०।।
“O noble one, we, being ignorant, did not come at the time of the chakra’s manifestation. Therefore, kindly forgive us for this great offense; we humbly pray to you again and again.” (160)
श्लोक ( Shlok ) 161
युष्मत्पादरजःस्पर्शाद् वार्धिरेव न केवलम् । पूता वयमपि श्रीमन् त्वत्पादाम्बुजसेवया ॥१६१॥
हे श्रीमन्, आपके चरणों की धूलि के स्पर्शसे केवल यह समुद्र ही पवित्र नहीं हुआ है किन्तु आपके चरणकमलों की सेवा करने से हम लोग भी पवित्र हो गये हैं ।॥ १६१ ॥
“O illustrious one, not only has the ocean been sanctified by the touch of the dust from your feet, but by serving your lotus feet, we too have been purified.” (161)
श्लोक 162 से 171
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151