आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311
श्लोक 312 से 321 जयकुमार का गुण-वर्णन
कंचुकी ने जयकुमार को सोमप्रभ का पुत्र, कुलदीपक, और भाइयों से युक्त बताया। उसका रूप वर्णनातीत था। उसने मेघकुमार को जीतकर सिंहनाद किया, जिसके लिए भरत ने उसे वीरपट्ट और मेघस्वर नाम दिया। वह गुणवान, आदरणीयों का संग करता था। उसका दोष केवल चार प्रियाएँ—श्री, कीर्ति, वीरलक्ष्मी, सरस्वती—थीं। वह सुलोचना को जीतने के लिए अधीर था, कामदेव को सहायक बनाकर। उसकी कीर्ति और प्रभा सूर्य-चंद्रमा को निस्तेज करती थी। उसकी प्रीति सुलोचना में फलीभूत होगी।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 312 to 321
श्लोक ( Shlok ) 312
जित्वा मेघकुभाराख्यानुत्तरे भरते सुरान् । सिंहनादः कृतोऽनेन जिततन्मेघनिस्स्वनः ॥३१२॥
इसने उत्तर भरतक्षेत्रमें मेघ-कुमार नामके देवोंको जीतकर उन देवोंके कृत्रिम बादलोंकी गर्जनाको जीतनेवाला सिंहनाद किया था ॥३१२।।
In the northern region of Bharata, he vanquished the celestial beings known as the Megha-Kumaras, and thereupon let forth a lion’s roar that overpowered even the thunderous rumble of their conjured clouds. ॥312॥
श्लोक ( Shlok ) 313
वीरपट्टं ‘प्रवध्यास्य स्वभुजाभ्यां समुद्धतम् । न्यधायि निधिनाथेन हृष्ट्वा मेघस्वराभिधा ॥३१३॥
उस समय निधियोंके स्वामी महाराज भरतने हर्षित होकर अपनी भुजाओं द्वारा धारण किया जानेवाला वीरपट्ट इसे बांधा था और मेघस्वर इसका नाम रक्खा था ॥३१३॥
At that time, Emperor Bharata—the lord of countless treasures—joyfully fastened upon him the hero’s girdle, meant to be borne by mighty arms, and bestowed upon him the name Meghasvara, “He of the Thunderous Voice.” ॥313॥
श्लोक ( Shlok ) 314
आत्मसम्यग्गुणैर्युक्तः समेतश्चाभिगामिकैः। प्रज्ञोत्साहविशेषैश्च ततोऽयमुदितोदितः ॥३१४॥
यह आत्माके समीचीन गुणोंसे युक्त है तथा आदरणीय उत्तम पुरुषोंके साथ सदा संगति रखता है इसलिये बुद्धि और विशेष विशेष उत्साहोंके द्वारा यह श्रेष्ठोंमें भी श्रेष्ठ गिना जाता है ।।३१४।।
Endowed with virtues befitting the soul, and ever in the company of venerable and noble men, he is esteemed as foremost even among the foremost—by reason of his wisdom and his resolute, exceptional fervour. ॥314॥
श्लोक ( Shlok ) 315
चित्रं जगत्त्रयस्यास्य गुणाः संरज्य साम्प्रतम् । व्यावृताः सर्वभावेन तव भावानुरञ्जने ॥३१५॥
यह भी आश्चर्यकी बात है कि इसके गुण तीनों लोकोंको प्रसन्नकर अब तेरे अन्तःकरणको अनुरक्त करनेके लिये पूर्ण रूपसे लौटे हैं। भावार्थ इसने अपने गुणोंसे तीनों लोकोंके जीवोंको प्रसन्न किया है और अब तुझे भी प्रसन्न करना चाहतें हैं ॥३१५॥
It is indeed a marvel that his virtues, having already gladdened the hearts of beings across the three worlds, now return in full measure to win the affection of thy innermost heart.
—For he has, through his noble qualities, brought joy to all creation—and now, those very virtues seek to win thee as well. ॥315॥
श्लोक ( Shlok ) 316
अयमेकोऽस्ति दोषोऽस्य चतस्रः सन्ति योषितः । श्रीः कीर्तिर्वीरलक्ष्मीश्च वाग्देवी चातिवल्लभाः ॥३१६॥
यदि इसमें दोष है तो यही एक, कि इसके निम्नलिखित चार स्त्रियां हैं, श्री, कीर्ति, वीरलक्ष्मी और सरस्वती । ये चारों ही स्त्रियां इसे अत्यन्त प्रिय हैं ।॥ ३१६॥
If there be any fault in him, it is but this—that he is already wedded to four consorts: Śrī (Fortune), Kīrti (Fame), Vīralakṣmī (Valour), and Sarasvatī (Wisdom). And all four are deeply devoted to him. ॥316॥
श्लोक ( Shlok ) 317
जितमेघकुमारोऽयमेकः प्राक् त्वज्जयेऽधुना । च्युतधैर्य इवालक्ष्ये” “यत्सहायीकृतः स्मरः ॥३१७॥
जिसने पहले अकेले ही मेघकुमारको जीत लिया था ऐसा यह जयकुमार इस समय तुझे जीतनेके लिये धैर्यरहित सा हो रहा है अर्थात् ऐसा जान पड़ता है मानो इसका धैर्य छूट रहा हो यही कारण है अब इसने कामदेवको अपना सहायक बनाया है ॥ ३१७॥
He who once vanquished the mighty Meghakumāra single-handedly now appears bereft of composure as he strives to win thee—so much so, that it seems his steadfast courage has faltered. And thus, he has now taken Kāma himself as an ally. ॥317॥
श्लोक ( Shlok ) 318
बलिनोर्युवयोर्मध्ये वर्तमानो जिगीषतोः । द्वेषीभावं समापन्नः षाड्गुण्यनिपुणः स्मरः ॥३१८॥
एक दूसरेको जीतनेकी इच्छा करनेवाले तुम दोनों बलवानोंके बीचमें पड़ा हुआ यह संधि विग्रह आदि छहों गुणोंमें निपुण कामदेव द्वैधी-भावको प्राप्त हो रहा है अर्थात् कभी उसका आश्रय लेतां है और कभी तेरा ॥ ३१८।।
Between you two mighty ones—each desiring to conquer the other—stands Kāma, master of the six diplomatic virtues: alliance, war, peace, division, defiance, and conciliation. Yet now, caught in this duality, he wavers—at times siding with him, at times with thee. ॥318॥
श्लोक ( Shlok ) 319
कीर्तिः कुवलयाह्लादी पद्माह्लादीप्रभाऽस्य हि। सूर्याचन्द्रमसौ तस्मादनेन हतशक्तिकौ ॥३१९॥
इसकी कीर्ति,तो कुवलय अर्थात् रात्रिमें खिलनेवाले कमलोंको (पक्षमें मही मण्डलको) आनन्दित करती है और प्रभा पद्म अर्थात् दिनमें खिलनेवाले कमलोंको (पक्षमें पद्मा-लक्ष्मीको) विकसित करती है इसलिये इसने सूर्य और चन्द्रमा दोनोंको शक्तिरहित कर दिया है ।।३१९।।
His fame delights the night-blooming lilies—kuvalayas—that is, the earth itself; and his radiance unfolds the day-blooming lotuses—padmas—that is, Padmā, the goddess Lakṣmī. Thus has he rendered both sun and moon powerless, for his glory surpasses the splendour of each. ॥319॥
श्लोक ( Shlok ) 320 – 321
कीर्तिबर्हिश्चरा लक्ष्मीरतिवृद्धा सरस्वती । जीर्णेतरापि शान्तेवर लक्ष्यते क्षतविद्विषः ॥३२०॥ततस्त्वयि वयोरूपशीलादिगुणभाज्यलम् । प्रीतिर्लतेव दृक्पुष्पा प्रवृद्धास्य फलिष्यति ॥३२१॥
समस्त शत्रुओं को नष्ट करनेवाले इस जयकुमारकी कीति तो सदा बाहर रहती है लक्ष्मी अत्यन्त वृद्ध है, सरस्वती जीर्ण है और वीर लक्ष्मी शान्त सी दिखती है इसलिये दृष्टिरूपी पुष्पोंसे युक्त और खूब बढ़ी हुई इसकी प्रीतिरूपी लता वय, रूप, शील आदि गुणोंसे सहित तुझमें ही अच्छी तरह फलीभूत होगी । भावार्थ-३१६ वें श्लोकमें बतलाया था कि इसके चार प्रिय स्त्रियां हैं कीति, लक्ष्मी, सरस्वती और वीरलक्ष्मी परन्तु उनसे तुझे सपत्नीजन्य दुःखका अनुभव नहीं करना पड़ेगा । क्योंकि कीति नामकी स्त्री तो सदा बाहर ही घूमती रहती है-अन्तःपुरमें उसका प्रवेश नहीं हो पाता (पक्षमें उसकी कीर्ति समस्त संसारमें फैली हुई है), लक्ष्मी अत्यन्त वृद्ध है-वृद्धावस्था युक्त है (पक्षमें बढ़ी हुई है), सरस्वती भी जीर्ण अर्थात् वृद्धावस्थाके कारण शिथिल शरीर हो रही है (पक्षमें परिपक्व हैं) इसलिये इन तीनोंपर उसका खास प्रेम नहीं रहता । अब रह जाती है वीरलक्ष्मी, यद्यपि वह तरुण है और सदा उसके पास रहती है परन्तु अत्यन्त शान्त है-शुङ्गार आदिकी ओर उसका आकर्षण नहीं है (पक्षमें क्षमायुक्त शूर वीरता है), इसलिये इन चारोंसे राजाकी प्रीति हटकर तुझपर ही आरूढ़ होगी वयोंकि तू वय, रूप, शील आदि गुणोंसे सहित है ॥ ३२०-३२१॥
The fame of this Prince Jaya—destroyer of all foes—ever dwells outside, far and wide. Lakṣmī is aged, Sarasvatī worn with years, and Vīralakṣmī, though ever near, is serene and passionless. Therefore, his creeper-like love—adorned with the blossoms of his gaze and flourishing in abundance—shall truly bear fruit in thee alone, who art endowed with youth, beauty, virtue, and all noble qualities.
(Subtextual Meaning):
Though his four beloveds are said to be Fame, Fortune, Wisdom, and Valour—thou needst not fear the sorrow of rivalry. Fame forever roams the world and enters not the inner chambers (his renown pervades all realms); Lakṣmī is aged (symbolising mature wealth); Sarasvatī too is weakened with time (a metaphor for ripened wisdom); and though Vīralakṣmī remains by his side, she is calm, untouched by desire (for valour is ever tempered with grace). Thus, his heart, drawn away from these, shall ascend solely unto thee. ॥320–321॥
श्लोक 322 से 331
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311
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