आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51 वृषभदेव का व्याख्यान और ब्राह्मण सृष्टि का दोष
भरत के प्रश्न पर वृषभदेव ने सभा को संतुष्ट करते हुए व्याख्यान दिया। उन्होंने भरत की ब्राह्मण सृष्टि की प्रशंसा की, परंतु दोष बताया कि कृतयुग में ये सदाचार का पालन करेंगे, किंतु पंचम काल में जातिवाद के अभिमान से भ्रष्ट होकर मिथ्या शास्त्रों से लोगों को मोहित करेंगे। ये हिंसा, मधु, और मांस का भोजन करेंगे, अहिंसारूप धर्म को दूषित कर हिंसक वेदों को पुष्ट करेंगे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
इति तत्फलविज्ञाननिपुणोऽप्यवधित्विषा । सभाजनप्रबोधार्थं पप्रच्छ निधिराट् जिनम् ॥४२॥
यद्यपि निधियोंके अधिपति महाराज भरत अपने अवधिज्ञानके द्वारा उन स्वप्नोंका फल जानने में निपुण थे तथापि सभाके लोगोंको समझानेके लिये उन्होंने भगवान् से इस प्रकार पूछा था ।।४२।।
Though Maharaja Bharata, lord of treasures, was fully capable—through his divine Avadhi-jñāna—of discerning the meaning of those dreams, yet, for the sake of instructing the assembled multitude, he thus inquired of the Lord.42
श्लोक ( Shlok ) 43
“तत्प्रश्नावसितावित्यं व्याचष्टे स्म जगद्गुरुः । वचनामृतसंसेकैः प्रीणयन्निखिलं सदः ॥४३॥
भरतका प्रश्न समाप्त होनेपर जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव अपने वचनरूपी अमृतके सिंचनसे समस्त सभाको संतुष्ट करते हुए इस प्रकार व्याख्यान करने लगे ॥४३॥
When Bharata’s question had been spoken, the World-Teacher, Lord Ṛṣabhadeva, began to expound—his words flowing like nectar to nourish all who were gathered—thus bringing delight and contentment to the entire assembly.43
श्लोक ( Shlok ) 44
भगवद्दिव्यवागर्थ शुश्रूषावहितं तदा । ध्यानोपगमिवाभू त्तत्सदश्चित्रगतं नु वा ॥४४॥
उस समय भगवान्की दिव्य ध्वनिके अर्थको सुननेकी इच्छा से सावधान हुई वह सभा ऐसी जान पड़ती थी मानो ध्यानमें मग्न हो रही हो अथवा चित्रकी बनी हुई हो ॥४४॥
At that moment, as the divine voice of the Lord began to resound, the entire assembly, eager to grasp its meaning, appeared as though immersed in deep meditation—or as if it were a painting, perfectly still and utterly absorbed. 44
श्लोक ( Shlok ) 45
साधु वत्स कृतं साधु धार्मिकद्विजपूजनम् । किन्तु दोषानुषङ गोऽत्र कोऽप्यस्ति स निशम्यताम् ॥४५॥
वे कहने लगे कि हे वत्स, तूने जो धर्मात्मा द्विजोंकी पूजा की है सो बहुत अच्छा किया है परन्तु इसमें कुछ दोष है उसे तू सुन ॥ ४५॥
Then the Lord began to speak: “O noble son, the worship you have offered to the virtuous dvijas is indeed praiseworthy. Yet, therein lies a certain flaw—listen well and understand.”45
श्लोक ( Shlok ) 46
आयुष्मन् भवता सृष्टा य एते गृहमेघिनः । ते तावदुचिताचारा यावत्कृत युगस्थितिः ॥४६॥
हे आयुष्मन्, तूने जो गृहस्थोंकी रचना की है सो जबतक कृतयुग अर्थात् चतुर्थकालकी स्थिति रहेगी तबतक तो ये उचित आचारका पालन करते रहेंगे परन्तु जब कलियुग निकट आ जायगा तब ये जातिवादके अभिमानसे सदाचारसे भ्रष्ट होकर समीचीन मोक्ष-मार्गके विरोधी बन जावेंगे ।।४६।।
“O noble one, the order of householders you have established shall indeed uphold right conduct for as long as the Age of Righteousness—this fourth era—prevails. But when the Kaliyuga draws near, they shall become corrupted by pride in caste, fall away from noble conduct, and turn antagonistic to the true path of liberation.”46
श्लोक ( Shlok ) 47
ततः कलियुगेऽभ्यर्णे जातिवादाबलेपतः। भ्रष्टाचाराः प्रपत्स्यन्ते सन्मार्गप्रत्यनीकताम् ॥४७॥
पंचम कालमें ये लोग, हम सब लोगोंमें बड़े हैं, इस प्रकार जातिके मदसे युक्त होकर केवल धनकी आशासे खोटे खोटे शास्त्रोंके द्वारा लोगोंको मोहित करते रहेंगे ॥४७॥
“In the fifth age, these very people—deemed superior among us all—will, intoxicated by caste pride and driven solely by greed for wealth, continue to beguile others with spurious scriptures.” 47
श्लोक ( Shlok ) 48
तेऽमी जातिमदाविष्टा वयं लोकाधिका इति । “पुरा दुरागमैर्लोकं मोहयन्ति धनाशया ॥४८॥
सत्कारके लाभसे जिनका गर्व बढ़ रहा है और जो मिथ्या मदसे उद्धत हो रहे हैं ऐसे ये ब्राह्मण लोग स्वयं मिथ्या शास्त्रोंको बना बनाकर लोगोंको ठगा करेंगे ॥४८॥
“Emboldened by the honors they receive and swollen with false pride, these Brāhmaṇas will craft counterfeit scriptures themselves, thereby deceiving the people.” 48
श्लोक ( Shlok ) 49 –50
सत्कारलाभसंवृद्धगर्वा मिथ्यामदोद्धताः । जनान् प्रतारयिष्यन्ति ” स्वयमुत्पाद्य. दुःश्रुतीः ॥४९॥त इसे कालपर्यन्ते विक्रियां प्राप्य दुर्दृशः । धर्मद्रुहो भविष्यन्ति पापोपहतचेतनाः ॥५०॥
जिनकी चेतना पापसे दूषित हो रही है ऐसे ये मिथ्यादृष्टि लोग इतने समय तक विकारभावको प्राप्त होकर धर्मके द्रोही बन जायेंगे ।॥५०॥
“Their consciousness tainted by sin, these deluded ones will, for a long time, succumb to corrupt dispositions and become traitors to Dharma.” 49 –50
श्लोक ( Shlok ) 51
सत्वोपवातनिरता मधुमांसाशनप्रियाः । प्रवृत्तिलक्षणं धर्म घोषयिष्यन्त्यधार्मिकाः ॥५१।।
जो प्राणियोंकी हिंसा करनेमें तत्पर हैं तथा मधु और मांसका भोजन जिन्हें प्रिय है ऐसे ये अधर्मी ब्राह्मण हिंसारूप धर्मकी घोषणा करेंगे ।।५१।।
“These unrighteous Brāhmaṇas, quick to commit violence against living beings and fond of consuming honey and meat, will proclaim a doctrine rooted in violence.”51
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
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