आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31
प्रकृति और गंगा की शोभा
भौंरे कमल के पराग से पीले होकर कामरूपी अग्नि के स्फुलिंग समान हैं। स्थल कमल शरद् लक्ष्मी के तंबू प्रतीत होते हैं। हंस कमल को स्थल समझकर पानी में डूब जाता है, मृणाल को मक्खन समझकर बच्चों को देता है, और चकवी को न देखकर करुण स्वर में रोता है। गंगा के किनारे सप्तपर्ण वृक्ष चंदोवा की शोभा धारण करते हैं। गंगा की लहरों से उठा पवन थकान हरता है और वनों को हिलाता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
मार्ग “बहुविधान् देशान् सरितः पर्वतानपि । “वनधीन् वनदुर्गाणि खनीरप्यत्यगात् प्रभुः ॥२२॥
धनवान् महाराज भरत मार्ग में पड़ते हुए अनेक देश, नदियां, पर्वत, वन, किले और खान आदि सबको उल्लंघन करते हुए आगे चले जा रहे थे ।। २२॥
“The wealthy King Bharat continued on his journey, crossing many lands, rivers, mountains, forests, forts, and mines along the way.” (Verse 22)
श्लोक ( Shlok ) 23
अगोष्पदेष्वरण्येषु दृशं व्यापारयन् विभुः । भूमिच्छिद्रपिधानाय क्षणं यत्नमिवातनोत् ॥२३॥
गाय आदि जानवरों के संचार से रहित वनों में दृष्टि डालते हुए भरतेश्वर ऐसे जान पड़ते थे मानो पृथिवी के छिद्रों राजा जिसे दण्ड रत्न प्राप्त होता है यह देश उसीका होता है इस निश्चयसे आकर महाराज को ढकने के लिये क्षणभर प्रयत्न ही कर रहे हों ।॥ २३॥
As King Bharata gazed into the forests untouched by the movement of cows and other animals, he appeared like a sovereign inspecting the very pores of the Earth. It was as if Nature herself, convinced that this land rightfully belonged to the king who possessed the jewel of justice, was making a fleeting effort to conceal herself from him.” (Verse 23)
श्लोक ( Shlok ) 24
पथि प्रणेमुरागत्य सम्भ्रान्ता मण्डलाधिपाः । दण्डोपनतवृत्तस्य विषयोऽयमिति प्रभुम् ॥२४॥
मार्ग में घबड़ाये हुए अनेक मण्डलेश्वर राजा भरत को प्रणाम कर रहे थे ।। २४।।
“Along the way, many anxious regional kings bowed in reverence to King Bharata.” (Verse 24)
श्लोक ( Shlok ) 25
स चक्रं धेहि राजेन्द्र सधुरं प्राज सारथे। सञ्जल्प इति नास्यासीद् अयत्नावनतद्विषः ।॥२५॥
मार्ग में महाराज भरतेश्वर के समस्त शत्रु बिना प्रयत्न के ही नम्रीभूत होते जाते थे इसलिये उन्हें कभी यह शब्द नहीं कहने पड़ते थे कि हे राजेन्द्र, आप चक्ररत्न धारण कीजिये और हे सारथे, तुम रथ चलाओ ।॥२५॥
On the path, all the enemies of King Bharteshwar would submit without any effort, and so he never had to utter the words: ‘O King, wield the discus of sovereignty!’ or ‘O charioteer, drive the chariot!’” ॥25॥
श्लोक ( Shlok ) 26
प्रतियोद्ध मशक्तास्तं “प्रथनेषु जिगीषवः । तत्पदं प्रणतिव्याजात् समौलिभिरताडयन् ॥२६॥
जीतने की इच्छा करने वाले अन्य कितने ही राजा लोग युद्धमें भरतेश्वर से लड़ने के लिये समर्थ नहीं हो सके थे इसलिये नमस्कार के बहाने अपने मुकुटों से ही उनके पैरों की ताड़ना कर रहे थे ॥ २६॥
“Many other kings who desired victory were not capable of facing Bharteshwar in battle; thus, under the pretense of offering respect, they ended up striking his feet with their crowns.” ॥26॥
श्लोक ( Shlok ) 27
“विभुत्वमरिचक्रेषु भूपरागानु रञ्जनम् । स्वचक्र इव सोऽधत्त महतां चित्रमीहितम् ॥२७॥
महाराज भरत जिस प्रकार अपने राज्य में विभुत्व अर्थात् ऐश्वर्य धारण करते थे उसी प्रकार शत्रुओंके राज्यों में भी विभुत्व अर्थात् पृथिवीका अभाव धारण करते थे- उनकी भूमि छीन लेते थे, (विगत भूर्येषां तेषां भावः विभुत्वम्) और जिस प्रकार अपने राज्य में भूप-रागानुरंजन अर्थात् राजाओं के प्रेमपूर्ण अनुरागको धारण करते थे उसी प्रकार शत्रुओं के राज्यों में भी भू-परागा-नुरंजन अर्थात् पृथिवीकी धूलिसे अनुरंजन धारण करते थे, शत्रुओं को धूलि में मिला देते थे, सो ठीक ही है, क्योंकि महापुरुषों की चेष्टाएं आश्चर्य करनेवाली होती ही हैं ।॥ २७।।
“Just as King Bharat held dominion and prosperity within his own kingdom, he likewise established dominion in the lands of his enemies—by rendering their kingdoms barren, seizing their lands (for their ‘sovereignty’ became the absence of land). And just as he won the affectionate loyalty of rulers in his own realm, he brought about ‘affection through dust’ in the realms of his enemies—reducing them to dust. Indeed, such deeds are only natural for great souls, whose actions are always astonishing.” ॥27॥
श्लोक ( Shlok ) 28
सन्ध्यादिविषये नास्य समकक्षों हि पार्थिवः । षाड्गुष्यमत एवास्मिन् चरितार्थ मभूत् प्रभौ ॥२८॥
संधि आदि गुणों के विषयमें कोई भी राजा महाराज भरत के बराबर नहीं था इसलिये सन्धि आदि छहों गुण उन्हीं में चरितार्थ हुए थे। भावार्थ कोई भी राजा इनके विरुद्ध नहीं था इसलिये इन्हें किसीसे सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और आश्रय नहीं करने पड़ते थे ।।२८।।
“In matters of diplomacy and the six royal policies, no king could equal Maharaj Bharat. Thus, all six strategies—treaty, war, march, halt, dual policy, and alliance—found their fulfillment in him alone. The essence is that no king stood in opposition to him, and so he had no need to resort to treaty, conflict, expedition, encampment, duplicity, or seeking allies.” ॥28॥
श्लोक ( Shlok ) 29
प्रतिराष्ट्रमुपानीतप्राभृतान् विषयाधिपान्। सम्भावयन् प्रसादेन सोऽत्यगाद् विषयान् बहून् ॥२९।।
प्रत्येक देश में भेंट लेकर आये हुए वहां के राजाओंका बड़ी प्रसन्नतासे आदर-सत्कार करते हुए महाराज भरत बहुत से देशों को उल्लंघन कर आगे बढ़ते जाते थे ॥ २९॥
“Graciously receiving tributes and being warmly welcomed by the kings of each land, Maharaj Bharat continued advancing, crossing over many kingdoms along the way.” ॥29॥
श्लोक ( Shlok ) 30
नास्त्रे व्यापारितो हस्तो मौर्वी धनुषि नापिता । केवलं प्रभुशक्त्यैव प्राची दिग्विजिताऽमुना ॥३०।
भरतेश्वरने न तो कभी तलवार पर अपना हाथ लगाया था और न कभी डोरी ही धनुषपर चढ़ाई थी । उन्होंने केवल अपनी प्रभुत्वशक्ति से ही पूर्व दिशाको जीत लिया था ।। ३० ।।
“Bharteshwar never laid his hand on a sword, nor did he ever string a bow. He conquered the eastern direction solely through the power of his sovereignty.” ॥30॥
श्लोक ( Shlok ) 31
गोकुलानामुपान्तेषु सोऽपश्यद् युववल्लवान्” । वनवल्लीभिराबद्धजूटकान् गोऽभिरक्षिणः ॥३१॥
उन्होंने गोकुलों के समीप ही गायों की रक्षा करनेवाले तथा वन की लताओं से जिन्होंने अपने शिर के बालों का जुडा बांध रखा है ऐसे तरुण ग्वाला देखे ॥ ३१॥
“Near Gokul, he saw young cowherds guarding the cows, their hair tied in knots with forest creepers.” ॥31॥
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21