आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 मुक्त जीव के गुण
मुक्त जीव का कर्ममल नष्ट होने से अच्छेद्यपना, अभेद्यपना, अक्षरता, और अप्रमेयपना है। यह गर्भवास, गुरुता-लघुता से मुक्त, अक्षोभ्य, अविलीन, और परम हद वाला है। तीनों लोकों के शिखर पर इसका लोकाग्रवास और समस्त पुरुषार्थों की पूर्णता इसकी परमसिद्धता है। ऐसे कृतकृत्य जीव को परद्रव्यों की आवश्यकता नहीं। संसारी जीव का उदाहरण व्यतिरेक से परमात्मा को सिद्ध करता है। आप्त के मत में बुद्धि लगाने वाला क्षत्रिय श्रेष्ठ है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
योऽस्य जीवघनाकारपरिणामो मलक्षयात् । तदच्छेयत्वभाम्नातम भेद्यत्वं च तत्कृतम् ॥१०२॥
कर्मरूपी मलके नाश होनेसे जो जीवके प्रदेशोंका घनाकार परिणमन होता है वही इसका अच्छेद्यपना है और उसी कर्मरूपी मलके नाश होनेसे इसके अभेद्यपना माना जाता है ॥१०२॥
“The transformation of the soul’s regions into a compact form due to the destruction of karma-related impurities is called its indivisibility, and due to the same destruction of karma-related impurities, it is considered impenetrable.”102
श्लोक ( Shlok ) 103
अक्षरत्वं च मुक्तस्य क्षरणाभावतो मतम् । अप्रमेयत्वमात्मोत्थैर्गुणैरुद्धैरमेयता ॥१०३।।
मुवत जीवकाकभी क्षरण अर्थात् विनाश नहीं होता इसलिये इसमें अक्षरता अर्थात् अविनाशीपन है और आत्मासे उत्पन्न हुए श्रेष्ठ युगोंसे इसका प्रमाण नहीं किया जा सकता इसलिये इसमें अप्रमेय-पना है ।।१०३।।
“The liberated soul never undergoes decay or destruction, hence it possesses imperishability, and its nature cannot be proven by the finest eons arising from the soul, hence it is immeasurable.”103
श्लोक ( Shlok ) 104
बहिरन्तर्मलापायादगर्भवसतिर्मता । कर्मनोकर्मविश्लेषात् स्यादगौरवलाघवम् ॥१०४।।
बहिरंग और अन्तरंग मलका नाश हो जानेसे इसका गर्भावास नहीं माना जाता है और कर्म तथा नोकर्मका नाश हो जानेसे इसमें गुरुता और लघुता भी नहीं होती है ।।१०४।।
“Due to the destruction of external and internal impurities, it is not considered to have gestation, and due to the destruction of karma and non-karma, it possesses neither heaviness nor lightness.”) 104
श्लोक ( Shlok ) 105
तादवस्थ्यं गुणैरुद्धः अक्षोभ्यत्वमतो भवेत् ।अविलीनत्वमात्मीयैर्गुणैरप्यवपृक्तता’ ।।१०५॥
यह आत्मासे उत्पन्न हुए प्रशंसनीय गुणोंसे अपने स्वरूपमें अवस्थित रहता है इसलिये इसमें अक्षोभ्यपना है और आत्माके गुणोंसे कभी पृथक् नहीं होता इसलिये अविलीनपना है ॥१०५।।
It remains present in its form due to the praiseworthy qualities emanating from the soul, hence it has indestructibility and is never separated from the qualities of the soul, hence it is indestructible.105
श्लोक ( Shlok ) 106
प्राग्देहाकारमूतित्वं यदस्याहेयमक्षरम् । साऽभीष्टा परमा काष्ठा योगरूपत्वमात्मनः ॥१०६॥
जो कभी न छूटने योग्य और कभी न नष्ट होने योग्य पहले के शरीरके आकार इसकी मूर्ति रहती है वही इसकी परम हद्द है और वही इसकी योगरूपता है ॥१०६॥
The form of the previous body which is infallible and indestructible and which remains its idol is its ultimate limit and that is its yogic form. ॥106॥
श्लोक ( Shlok ) 107
लोकाग्रवासस्त्रं लोक्यशिखरे शाश्वतो स्थितिः । अशेषपुरुषार्थानां निष्ठा परमसिद्धता ॥१०७।।
तीनों लोकोंके शिखरपर जो इसकी सदा रहनेवाली स्थिति है वही इसका लोकाग्रवास गुण है और जो समस्त पुरुषार्थोंकी पूर्णता है वही इसकी परमसिद्धता है ।॥ १०७॥
Its eternal position at the peak of the three worlds is its Lokagravas quality and the perfection of all efforts is its ultimate perfection. ॥107॥
श्लोक ( Shlok ) 108
यः समग्रैर्गुणैरेभिर्ज्ञानादिभिरलङ्कृतः । किं तस्य कृतकृत्यस्य परद्रव्योपसर्पणैः ॥१०८॥
इस प्रकार जो इन ज्ञान आदि समस्त गुणोंसे अलंकृत है उस कृतकृत्य हुए मुक्त जीवको अन्य द्रव्योंकी प्राप्तिसे क्या प्रयोजन है ? अर्थात् कुछ नहीं ।॥१०८।।
In this way, what is the use of acquiring other material things for the liberated soul who is adorned with all these qualities like knowledge etc.? That is, nothing. ॥108॥
श्लोक ( Shlok ) 109
एष संसारिदृष्टान्तो व्यतिरेकेण साधयेत् । परमात्मानमात्मानं प्रभुमप्रतिशासनम् ॥१०९।।
यह संसारी जीवका दृष्टान्त व्यतिरेक रूपसे आत्मा को, जिसपर किसीका शासन नहीं है और जो प्रभुरूप है ऐसा परमात्मा सिद्ध करता है। भावार्थ-इस संसारी जीवके उदाहरणसे यह सिद्ध होता है कि यह आत्मा ही परमात्मा हो जाता है ।।१०९।।
This example of a worldly being proves that the soul is not ruled by anyone and is the form of God. Meaning- This example of a worldly being proves that the soul itself becomes God. 109
श्लोक ( Shlok ) 110
त्रिभिनिदर्शनै रेभिराविप्कृतमहोदयः । स आप्तस्तन्मते धीरैराधेया मतिरात्मनः ॥११०॥
इस प्रकार इन तीन उदाहरणोंसे जिसका महोदय प्रकट हो रहा है वही आप्त है, उसी आप्तके मतमें धीरवीर पुरुषोंको अपनी बुद्धि लगानी चाहिये ।।११०।।
Thus, the one whose authority is evident from these three examples is the expert, and the patient and brave men should apply their intellect to the opinion of that expert. 110.
श्लोक ( Shlok ) 111
एवं हि क्षत्रियश्रेष्ठो भवेद् दृष्टपरम्परः । मतान्तरेषु दौःस्थित्यं भावयनुपपत्तिभिः ॥१११॥
इस तरह जिसने सब परम्परा देख ली है, और जो अन्य मतोंमें युक्तियोंसे दुष्टताका चिन्तवन करता है वही सब क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ कहलाता है ।।१११॥
In this way, the one who has seen all the traditions, and who contemplates on evil with the help of logic in other beliefs, he is called the best among all Kshatriyas. 111.
श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
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