आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242
श्लोक 233 से 242 राजाओं का स्वागत और उत्सव
तीनों समुद्रों के बीच के राजा बनारस आए। राजा अकम्पन ने कुछ राजाओं की स्वयं और कुछ की हेमांगद आदि के माध्यम से अगवानी की। सुलोचना के कारण वाराणसी अयोध्या को लज्जित करती थी, क्योंकि कन्या-रत्न सर्वश्रेष्ठ था। राजा ने अर्ककीर्ति आदि को स्वयंवर शाला में ठहराया, जिनेंद्रदेव की पूजा की, और दीन-अनाथों को दान देकर उत्सव की तैयारी की। यह सब पूर्वार्जित धर्म का फल था, जिससे उनकी लक्ष्मी क्षयरहित और पृथ्वी उपभोग्य बनी।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 243 to 251
श्लोक ( Shlok ) 243
एवं विहिततत्पूजः प्रकृतार्थ प्रचक्रमे । प्रारम्भाः सिद्धिमायान्ति पूज्यपूजा पुरस्सराः ॥२४३॥
इस प्रकार उसने जिनेन्द्रदेवकी पूजाकर अपना प्रकृत कार्य प्रारम्भ किया सो ठीक ही है क्योंकि पूज्य पुरुषोंकी पूजा पूर्वक किये हुए कार्य अवश्य ही सफलताको प्राप्त होते हैं ।॥ २४३॥
Thus did he begin his noble endeavor only after worshipping the venerable Lord Jina—and rightly so; for deeds commenced with the reverent adoration of the worthy are assuredly crowned with success. ॥243॥
श्लोक ( Shlok ) 244
आस्फालिता तदा भेरी विवाहोत्सवशंसिनी । व्याप्नोत् प्रमोदः प्राक् चेतः पश्चात् कर्णेषु तद्ध्वनिः ।।
उसी समय विवाह-के उत्सवको सूचित करनेवाली भेरी बज उठी सो पहले सबके चित्तमें आनन्द छा गया और पीछे भेरीकी आवाज कानों में व्याप्त हुई ।। २४४।।
At that very moment, the bherī drum—herald of the nuptial celebration—resounded through the air. So great was its auspiciousness that joy first surged in the hearts of all, and only afterward did its echo reach their ears. ॥244॥
श्लोक ( Shlok ) 245 – 246
पुष्पोपहारिभू भागानृत्यत्केतुनमस्तला । निर्जिताब्धिमहात्सूर्यध्वानाध्मातदिगन्तरा ॥२४५।।विशोधितमहावीथिदेशा प्रोद् बद्धतोरणा । पुनर्नवसुधाक्षोदधवलीकृतसौधिका ॥२४६।
उस समय वहां पृथिवीपर जहां तहां फूलों के उपहार पड़े हुए थे, आकाशमें पताकाएं नृत्य कर रही थीं, समुहकी गर्जनाको जीतनेवाले बड़े बड़े नगाड़ोंसे दिशाएं शब्दायमान हो रही थीं, वहांकी बड़ी बड़ी गलियां शुद्ध की गई थीं उनमें तोरण बांधे गये थे और बड़े बड़े महल नये चूनाके चूर्णसे पुनः सफेद किये गये थे ।।२४५-२४६।।
At that time, the earth was strewn here and there with offerings of flowers; in the heavens above, banners danced joyously upon the breeze. The mighty kettledrums roared louder than the thunder of assembled hosts, resounding across the quarters. The great streets had been purified, adorned with festal arches and garlands, while towering palaces stood renewed—freshly whitened with fine lime-dust, gleaming in pristine splendor. ॥245–246॥
श्लोक ( Shlok ) 247 – 251
रञ्जिताञ्जनसन्नेत्रा मालाभारिशिरोरुहा। संस्कृतभ्रलतोपेता सविशेषललाटिका ॥२४७॥”मणिकुण्डलभारेण प्रलम्बश्रवणोज्ज्वला । सचित्रकरविन्यस्त “पत्रचित्रकपोलिका ॥२४८॥ताम्बूलरससंसर्गाद् द्विगुणारुणिताधरा । मुक्ताभरणभाभारभासिबन्धुरकण्ठिका ॥२४९।।सचन्दनरसस्फारहारवक्षः कुचाञ्चिता” । महामणिमयूखा “तिभास्वद्ज भुजलतातता ॥२५०।।रशनारज्जुविभ्राजिसुविशालकटीतटी । मणिनपुरनिर्घोषर्भात्सताब्जक्रमाब्जिका ॥२५१॥
वहांकी स्त्रियोंके उत्तम नेत्र कज्जलसे रंगे हुए थे, शिरके केश मालाओंको धारण कर रहे थे, भौंहरूपी लताएं संस्कार की हुई थीं, उनके ललाटपर सुन्दर तिलक लगा हुआ था, उज्ज्वल कर्ण मणियोंके बने हुए कुण्डलों के भारसे कुछ कुछ नीचेकी ओर झुक रहे थे, कपोलोंपर हाथसे बनाई हुई पत्ररचनाके चित्र बने हुए थे, पानके रसके संबन्धसे उनके ओठोंकी लाली दूनी हो गई थी, उनके कण्ठ मोतियोंके आभूषणोंकी कान्तिके भारसे बहुत ही सुशोभित हो रहे थे, उनका वक्षःस्थल चन्दनका लेप, बड़ा हार और स्तनोंसे शोभायमान हो रहा था, उनकी भुजा-रूपी लताएं बड़े बड़े मणियोंकी किरणोंसे देदीप्यमान हो रही थीं, उनका विशाल नितम्बस्थल करधनीरूपी रज्जुसे सुशोभित हो रहा था, और उनके चरणकमल मणिमयी नूपुरोंकी झनकार से कमलोंका तिरस्कार कर रहे थे ।।२४७-२५१।।
There, the noble women appeared as though living embodiments of beauty itself. Their exquisite eyes were darkened with kohl, and their hair was adorned with garlands of fragrant blossoms. The creeper-like brows were artfully shaped, and their foreheads bore lovely auspicious marks. Their ears, burdened slightly by radiant gem-studded earrings, bent delicately under their weight. Upon their cheeks were hand-drawn floral designs, while the juice of betel leaves had deepened the natural redness of their lips.
Their necks, adorned with lustrous pearl necklaces, shone with graceful charm. Their bosoms, smeared with sandalwood paste and adorned with grand garlands, gleamed resplendently. Their arm-like creepers sparkled with the rays of large, dazzling jewels. The broad expanse of their hips was made yet more graceful by gem-studded girdles, and their lotus-like feet, ringing with melodious anklets of precious stones, seemed to put the very lotus to shame. ॥247–251॥
श्लोक 252 से 264
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242
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