श्लोक 1 से 12 क्षत्रिय धर्म का उपदेश
भरत, सभामध्ये सिंहासन पर बैठकर, राजाओं को क्षात्रधर्म का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि भगवान् वृषभदेव ने क्षत्रियों को दुखी प्रजा की रक्षा के लिए नियुक्त किया है। क्षत्रियों का धर्म पांच प्रकार का है: कुलपालन, बुद्धिपालन, आत्मरक्षा, प्रजारक्षा, और समंजसपना। कुलपालन में कुलाम्नाय और योग्य आचरण की रक्षा शामिल है। वृषभदेव ने सर्वप्रथम क्षत्रिय वर्ण की सृष्टि की, जो रत्नत्रय की आराधना और सोलह भावनाओं के चिंतन से सर्वार्थसिद्धि से अवतरित हुए। कर्मभूमि में दो प्रकार की प्रजा होती है: रक्षा योग्य और रक्षक। रक्षक प्रजा की वंशपरंपरा ही क्षत्रिय कहलाती है, जो अनादिकाल से चली आ रही है।
श्लोक 13 से 21 क्षत्रिय न्याय और वंशरक्षा
क्षत्रियों का न्याय धर्म का उल्लंघन किए बिना धन कमाना, रक्षा करना, बढ़ाना, और योग्य पात्र को दान देना है। यह जैन धर्म के अनुसार उत्तम न्याय है। रत्नत्रय के प्रताप से क्षत्रिय अयोनिज कहलाते हैं। बड़े वंशों के राजा लोकोत्तम पुरुष हैं, जो धर्ममार्ग में स्वयं और अन्य को स्थिर रखते हैं। उन्हें अन्य मतों के शेषाक्षत आदि ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे महत्त्व का नाश और विघ्न उत्पन्न होते हैं। अन्य मतों के प्रति श्रद्धा से कुल की हीनता और राजा का नाश संभव है।
श्लोक 22 से 31 जैन धर्म की श्रेष्ठता
राजाओं को अन्य मतों के शेषाक्षत, आशीर्वाद, और शांतिवचन त्यागने चाहिए, अन्यथा कुल की हीनता होती है। जैन राजा अर्हंतदेव के शेषाक्षत ग्रहण कर सकते हैं, क्योंकि इससे पापक्षय होता है। रत्नत्रय के कारण वृषभदेव के वंशज और राजा एक गोत्र के भाई-बंधु हैं, अतः जिनेंद्रदेव के शेषाक्षत ग्रहण करना उचित है। मुनियों के शेषाक्षत भी ग्रहण योग्य हैं, क्योंकि दीक्षा लेने वाला सम्यक्चारित्री क्षत्रिय ही माना जाता है। अन्य मतों के लोग क्षत्रियों को शेषाक्षत देने के अधिकारी नहीं हैं। कुलरक्षा के लिए सावधानी आवश्यक है, अन्यथा झूठे पुराणों से ठगे जाने का भय है।
श्लोक 32 से 41 बुद्धिपालन और तत्त्वज्ञान
बुद्धिपालन अविद्या (मिथ्याज्ञान) का नाश करने से होता है। अर्हंतदेव का कहा ही तत्त्व है, जो ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, और अंतराय कर्मों का क्षय कर चुके हैं। राजविद्या और धर्मशास्त्र का परिज्ञान बुद्धि को दृढ़ करता है। तीर्थंकर और वृषभदेव के चारित्र में स्थिर राजा महादेव कहलाते हैं, उनकी पत्नियां महादेवी। अन्य मतों के दावे (जैसे स्वयं को महादेव या तारक मानना) सारहीन हैं, क्योंकि केवल जिनेंद्रदेव का मार्ग ही संसार से तारता है।
श्लोक 42 से 51 अर्हंतदेव की आप्तता
अर्हंतदेव राग-द्वेष से रहित, वाणी, आत्मा, और भाग्य के अतिशय से युक्त आप्त हैं। उनकी दिव्य वाणी सभ को संतुष्ट करती है, अनंत ज्ञान-दर्शन-सुख-बल उनका आत्म अतिशय है, और आठ प्रातिहार्य, समवसरण, बारह सभाएं उनके भाग्य का अतिशय हैं। अन्य मतों में ऐसा पुरुष नहीं, अतः अर्हंतदेव ही आप्त हैं। क्षत्रियों को अनाप्त मतों से वंश को पृथक् रखकर बुद्धि की रक्षा करनी चाहिए, जिससे अखंड पृथ्वी की रक्षा संभव है। तीन उदाहरण (पुरुष, बेड़ी, संसारी जीव) इस स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।
श्लोक 52 से 62 संसारी और मुक्त जीव
संसारी जीव इंद्रियजनित ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सुख, और सुंदरता को शरीर में अनुभव करता है, परंतु मुक्त जीव अतींद्रिय गुणों से परम सुख का अनुभव करता है। संसारी जीव अल्पज्ञानी होने से शास्त्रज्ञान के लिए अन्य का आश्रय लेता है, सीमित दर्शन और वीर्य के कारण उत्कंठित रहता है, और इंद्रियजनित सुख-सुंदरता के लिए पराधीन है। शरीर की रक्षा में व्याकुल रहता है और तप करने पर भी शरीर को साधन मानकर स्वीकार करता है, पर नष्ट होने पर नया शरीर चाहता है।
श्लोक 63 से 71 अतींद्रिय गुणों की श्रेष्ठता
अतींद्रिय ज्ञान वाला पुरुष शास्त्राश्रित नहीं, बल्कि स्वयं सबको उपदेश देता है। अतींद्रिय दर्शन वाला अपूर्व पदार्थ देखने की इच्छा नहीं करता, क्योंकि वह सब कुछ देखता है। अनंतवीर्य वाला स्वयं कृतकृत्य हो सिद्धालय पहुंचता है। अतींद्रिय सुख वाला भोगों से उत्कंठित नहीं, अतींद्रिय सुंदरता वाला स्नानादि की इच्छा नहीं करता, और अतींद्रिय आत्मरूप शरीर वाला आहारादि की अपेक्षा नहीं करता। ऐसे गुणों वाला आप्त है, अन्य अनाप्त।
श्लोक 72 से 81 मुक्त जीव की स्वतंत्रता
जो जीव जन्म, जरा, और मरण से मुक्त है, वह तप या अन्य आवास की इच्छा नहीं करता। वह समस्त दोषों से रहित, गुणों से युक्त, परमात्मा और उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप है, वही परमेष्ठी कहलाता है। कामरूपी होना (इच्छानुसार अवतार लेना) आप्त का लक्षण नहीं, क्योंकि कामरूपी रागयुक्त और अकृतकृत्य होता है। जैसे बेड़ी में बंधा जीव इष्ट स्थान तक नहीं पहुंच सकता, वैसे ही कर्मबद्ध जीव स्वतंत्र नहीं। कर्ममुक्त जीव स्वतंत्रता प्राप्त करता है। संसारी जीव की परतंत्रता के वर्णन से मुक्त जीव की स्वतंत्रता स्पष्ट होती है।
श्लोक 82 से 91 संसारी जीव की परतंत्रता
संसारी जीव कर्मबन्धन के कारण परतंत्र है। सुख-दुख की वेदनाओं से चंचलता, ऋद्धियों के क्षय से नश्वरता, ताड़ना से बाध्यता, और इंद्रियजनित ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सुख के क्षयशील होने से अंतसहितता उत्पन्न होती है। कर्मों से मलिनता, शरीर की छेद्यता-भेद्यता, बुढ़ापा, मृत्यु, गर्भवास, और शरीर का परिमित होना इसका प्रमेयपना है। क्रोध से क्षोभ और योनियों में भ्रमण इसकी विविधता है।
श्लोक 92 से 101 संसारी और मुक्त जीव का अंतर
संसारी जीव चार गतियों में भटकता है, और इसके गुण परिवर्तनशील हैं, जो असिद्धता है। कर्मरूपी रज से युक्त संसारी जीव के सुख-दुख, बल, और शरीर बदलते रहते हैं, जबकि मुक्त जीव के अविनाशी भाव आत्मस्वरूप, अचंचलता, अक्षयपना, अव्याबाधपना, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य, अनंतसुख, नीरजसपना, और निर्मलपना हैं। कोई अन्य पुरुष स्वभाव से निर्मल और सिद्ध नहीं।
श्लोक 102 से 111 मुक्त जीव के गुण
मुक्त जीव का कर्ममल नष्ट होने से अच्छेद्यपना, अभेद्यपना, अक्षरता, और अप्रमेयपना है। यह गर्भवास, गुरुता-लघुता से मुक्त, अक्षोभ्य, अविलीन, और परम हद वाला है। तीनों लोकों के शिखर पर इसका लोकाग्रवास और समस्त पुरुषार्थों की पूर्णता इसकी परमसिद्धता है। ऐसे कृतकृत्य जीव को परद्रव्यों की आवश्यकता नहीं। संसारी जीव का उदाहरण व्यतिरेक से परमात्मा को सिद्ध करता है। आप्त के मत में बुद्धि लगाने वाला क्षत्रिय श्रेष्ठ है।
श्लोक 112 से 121 आत्मरक्षा और धर्म
क्षत्रिय को अन्य मतों से बुद्धि हटाकर समीचीन मार्ग में लगानी चाहिए। आत्मरक्षा इस लोक और परलोक के अपायों से बचाव है। परलोक की रक्षा धर्म से होती है, जो आपत्तियों का प्रतिकार, मनचाहा फल, कल्याण, और आनंद देता है। राज्य में शत्रुता, खेद, पाप, और शंका के कारण सुख नहीं। बुद्धिमान को अपथ्य राज्य का त्याग और तप ग्रहण करना चाहिए।
श्लोक 122 से 131 सल्लेखना और त्याग
निमित्तज्ञानी क्षत्रिय को अंत समय में सल्लेखना धारण करनी चाहिए। त्याग परम धर्म, तप, कीर्ति, और ऐश्वर्य का साधन है। पवित्र स्थान में पूजा, शरीर, आहार, और राजचिह्नों का त्याग करना चाहिए। परीषह विजय से इष्टसिद्धि होती है। अनुप्रेक्षाओं के चिंतन से चित्त समाधान होता है। सम्यक्त्व का चिंतन और मिथ्यात्व का त्याग करना चाहिए। रत्नत्रय ग्रहण और परिग्रह त्याग कर, पंचपरमेष्ठी स्मरण करते हुए प्राणत्याग करने से शुभ गति या मोक्ष प्राप्त होता है।
श्लोक 132 से 141 प्रजारक्षा
आत्मरक्षा न करने वाला क्षत्रिय अपमृत्यु से दुखदायी संसार में पड़ता है। बुद्धिमान क्षत्रिय को दोनों लोकों में आत्मरक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिए। प्रजारक्षा राजा का मौलिक गुण है। जैसे ग्वालिया आलस्यरहित होकर गायों की रक्षा करता है, वैसे ही राजा को प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। अपराधी प्रजा को अंगछेदन जैसे कठोर दंड न देकर, अनुरूप दंड से नियंत्रित करना चाहिए।
श्लोक 142 से 151 प्रजा और सेवकों की रक्षा
कठोर दंड देने वाला राजा प्रजा को उद्विग्न करता है, जिससे प्रजा और मंत्री उससे विमुख हो जाते हैं। जैसे ग्वालिया मुख्य गायों की रक्षा कर समृद्ध होता है, वैसे ही राजा मुख्य वर्ग की रक्षा कर अपने और अन्य राज्यों में पुष्टि प्राप्त करता है। श्रेष्ठ राजा अपने बल से समुद्रांत पृथ्वी को सहज जीत लेता है। जैसे ग्वालिया घायल गाय के पैर को जोड़ता और उपद्रवों का प्रतिकार करता है, वैसे ही राजा को घायल योद्धा की वैद्य द्वारा रक्षा और स्वस्थ होने पर उत्तम आजीविका देनी चाहिए। युद्ध में मृत भृत्य के पुत्र या भाई को उसके पद पर नियुक्त करना चाहिए।
श्लोक 152 से 162 सेवकों का संतोष
जैसे ग्वालिया गायों को कीड़े से बचाने के लिए औषधि देता है, वैसे ही राजा को दरिद्र या खिन्न सेवक का चित्त संतुष्ट करना चाहिए, अन्यथा सेवक विरक्त हो जाएगा। दरिद्रता को घाव के कीड़े समान मानकर त्वरित प्रतिकार करना चाहिए। सेवकों को सम्मान से संतोष मिलता है, जो धन से नहीं मिलता। जैसे ग्वालिया बलशाली बैल को पुष्ट करता है, वैसे ही राजा को उत्तम योद्धा को आजीविका और सम्मान देना चाहिए। पराक्रमी वीर को संतुष्ट रखने से भृत्य अनुरक्त रहते हैं। जैसे ग्वालिया पशुओं को उपद्रवहीन वन में चराता है, वैसे ही राजा को सेवकों को सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए।
श्लोक 163 से 171 प्रजा और सेवकों की सुरक्षा
चोर, डाकू, या अन्य राजाओं से सेवकों की रक्षा के लिए राजा को उनकी आजीविका नष्ट करनी चाहिए। जैसे ग्वालिया नवजात बछड़े की देखभाल करता है, वैसे ही राजा को नए सेवकों को सम्मान और आजीविका देनी चाहिए। जैसे ग्वालिया गुणी पशुओं की परीक्षा कर खरीदता है, वैसे ही राजा को उच्चकुलीन सेवकों का चयन करना चाहिए। सेवकों को योग्य कार्यों में लगाना चाहिए, और उनके संग्रह में बलवान जामिनदार नियुक्त करना चाहिए।
श्लोक 172 से 181 कृषि और धन संग्रह
जैसे ग्वालिया आलस्यरहित होकर गायों को उपयुक्त स्थान पर चराता और दूध प्राप्त करता है, वैसे ही राजा को ग्रामों में खेती करवानी चाहिए। देश में भली-भांति खेती करवाकर न्यायपूर्ण धान्य संग्रह करना चाहिए, जिससे भंडार समृद्ध, बल बढ़े, और देश पुष्ट हो। प्रजा को दुख देने वाले अक्षरम्लेच्छों को कुलशुद्धि द्वारा आधीन करना चाहिए। सत्कार से वे उपद्रव नहीं करते, अन्यथा उपद्रव करते रहते हैं। सामान्य प्रजा की तरह उनसे कर लेना चाहिए।
श्लोक 182 से 192 अक्षरम्लेच्छों का स्वरूप
अक्षरम्लेच्छ वेद पढ़कर आजीविका करते और अधर्म से ठगते हैं। अज्ञान से अहंकार और पापसूत्रों से वे म्लेच्छ कहलाते हैं। हिंसा, मांसभक्षण, धनहरण, और धूर्तता उनका आचार है। नीच द्विज हिंसा को वेदों से प्ररूपित करते हैं, अतः सामान्य या निकृष्ट माने जाते हैं। केवल अर्हंत भक्त द्विज मान्य हैं। वे स्वयं को तारक या लोकसम्मत कहें, तो उनकी विशेषता सिद्ध नहीं, क्योंकि वे व्रतरहित और दयाहीन हैं। राजा को उन्हें म्लेच्छ समान मानकर कर वसूल करना चाहिए। जैनधर्मी द्विज ही पूज्य हैं।
श्लोक 193 से 201 प्रजापालन और समंजसत्व
जैसे ग्वालिया गोधन को व्याघ्र और चोरों से बचाता है, वैसे ही राजा को प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। बलवान राजा के आने पर भेंट देकर संधि करनी चाहिए, क्योंकि युद्ध हानिकारक है। ग्वालिया दृष्टांत स्वीकार कर राजा को नीतिपूर्वक प्रजापालन करना चाहिए। प्रजापालन के बाद समंजसत्व गुण कहा गया, जिसमें राजा चित्त समाधान कर दुष्टों का निग्रह और शिष्टों का पालन करता है। निष्पक्ष, मध्यस्थ, और समान दृष्टि वाला राजा समंजस कहलाता है।
श्लोक 202 से 208 क्षत्रिय धर्म और भरत का वैभव
समंजसत्व से राजा शिष्टों का पालन और दुष्टों का निग्रह करता है। दुष्ट हिंसा से पाप करते, शिष्ट क्षमा-संतोष से धर्म धारण करते हैं। भरत ने क्षत्रियों को वृषभदेव के मार्ग में नियुक्त कर आचार का उपदेश दिया। राजा इस धर्म को स्वीकार कर प्रसन्न हुए और योग-क्षेम में प्रवृत्त रहे। वर्णाश्रम धर्मोत्सव करते हुए संतोषी बने। भरत का क्षत्रिय और तीर्थक्षत्रिय चरित्र गौतम गणधर ने श्रेणिक के लिए निरूपित किया। वृषभदेव की भक्ति करने वाले भरत का समय सुखमय व्यतीत हुआ। वे जिनपूजा, याचक संतुष्टि, और समुद्रांत पृथ्वी का पालन करते हुए दश भोगों का उपभोग करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 1 to 12
श्लोक ( Shlok ) 1
मध्येसभमथान्येद्युर्निविष्टो हरिविष्टरे । क्षात्रं वृत्तमुपादिक्षत्संहितान् पार्थिवान् प्रति ॥१॥
अथानन्तर-किसी एक दिन सभाके बीचमें सिंहासनपर बैठे हुए भरत इकट्ठे हुए राजाओंके प्रति क्षात्रधर्मका उपदेश देने लगे ।।१।।
Then, on a certain day, as King Bharata sat upon the throne in the midst of the royal assembly, he began to expound the noble code of kṣātra-dharma — the warrior’s righteous duty — to the assembled monarchs. ॥1॥
श्लोक ( Shlok ) 2
श्रूयतां भो महात्मानः सर्वे क्षत्रियपुङ्गवाः । क्षतत्राणे नियुक्ताः स्थ’ यूयमाद्येन वेधसा ॥२॥
वे कहने लगे कि हे समस्त क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ महात्माओ, आप लोगोंको आदिब्रह्मा भगवान् वृषभदेवने दुःखी प्रजाकी रक्षा करनेमें नियुक्त किया है ॥२॥
He said, “O noble-souled ones, foremost among all Kshatriyas! The Primeval Brahmā, Lord Ṛṣabha, has appointed you to the sacred task of protecting the afflicted masses.” ॥2॥
श्लोक ( Shlok ) 3
तत्त्राणे च नियुक्तानां वृत्तं वः पञ्चधोदितम् । तन्निशम्य यथाम्नायं प्रवर्तध्वं प्रजाहिते ॥३॥
दुःखी प्रजाकी रक्षा करनेमें नियुक्त हुए आप लोगोंका धर्म पाँच प्रकारका कहा है उसे सुनकर तुम लोग शास्त्र के अनुसार प्रजाका हित करने में प्रवृत्त होओ ॥३॥
You, who have been entrusted with the protection of the suffering populace, have a fivefold duty — such is the ordinance of Dharma. Hear it now, and thereafter, act for the welfare of your subjects in accordance with the sacred scriptures. ॥3॥
श्लोक ( Shlok ) 4
तच्चेदं कुलमत्यात्मप्रजानामनुपालनम् । समञ्जसत्वं चेत्येवमुद्दिष्टं पञ्चभेदभाक् ॥४॥
वह तुम्हारा धर्म कुलका पालन करना, बुद्धिका पालन करना, अपनी रक्षा करना, प्रजाकी रक्षा करना और समंजसपना इस प्रकार पांच भेदवाला कहा गया है ।।४।।
That duty of yours is declared to be fivefold: upholding the honour of your lineage, heeding wise counsel, safeguarding your own self, protecting the people, and maintaining harmony. Such is the righteous path enjoined upon you. ॥4॥
श्लोक ( Shlok ) 5
कुलानुपालन तत्र कुलाम्नायानुरक्षणम् । कुलोचितसमाचारपरिरक्षणलक्षणम् ॥५॥
उनमें से अपने कुलाम्नायकी रक्षा करना और कुलके योग्य आचरणकी रक्षा करना कुल-पालन कहलाता है ।।५।।
Among these, the protection of one’s noble lineage and the preservation of conduct befitting that lineage is known as upholding the honour of the house (kulapālana). ॥5॥
श्लोक ( Shlok ) 6
क्षत्रियाणां कुलाम्नायः कीदृशश्चेन्निशम्यताम् ।आद्येन वेधसा सृष्टः सर्गोऽयं क्षत्रपूर्वकः ॥६॥
अब क्षत्रियोंका कुलाम्नाय कैसा है ? सो सुनिये । आदिब्रह्मा भगवान् वृषभदेवने क्षत्रपूर्वक ही इस सृष्टिकी रचना की है अर्थात् सबसे पहले क्षत्रियवर्णकी रचना की है ॥ ६॥
Now, what is the sacred tradition (kulāmnāya) of the Kshatriyas? Hearken to this: the Primeval Brahmā, Lord Ṛṣabha, brought forth this creation beginning with the Kshatriyas — indeed, it was the warrior order that He first established at the dawn of the cosmos. ॥6॥
श्लोक ( Shlok ) 7 – 8
स चैष भारतं वर्षमवतीर्णो दिवोऽग्रतः । पुरा भवे समाराध्य रत्नत्रितयमूर्जितम् ॥७॥ द्विरष्टौ भावनास्तत्र तीर्थकृत्त्वोपपादिनीः । भावयित्वा शुभोदर्का द्युलोकाग्रमधिष्ठितः ॥८॥
जिन्होंने पहले भवमें अतिशय श्रेष्ठ रत्नत्रयकी आराधना कर तथा तीर्थकर पद प्राप्त करानेवाली और शुभ फल देनेवाली सोलह भावनाओंका चिन्तवनकर स्वर्गलोकके सबसे ऊपर अर्थात् सर्वार्थसिद्धिमें निवास किया था वे ही भगवान् सर्वार्थसिद्धिसे आकर इस भारतवर्षमें अवतीर्ण हुए हैं ।॥७-८॥
They who, in their former existence, had devoutly worshipped the supreme Ratnatraya—Right Faith, Right Knowledge, and Right Conduct—and had contemplated the sixteen noble reflections that lead to the attainment of the Tīrthaṅkara state and bear auspicious fruits, such exalted beings, having dwelt in Sarvārthasiddhi, the highest celestial realm of heaven, have now descended into this land of Bhāratavarṣa. ॥7–8॥
श्लोक ( Shlok ) 9
तेनास्मिन् भारते वर्ष धर्मतीर्थप्रवर्तने। ततः कृतावतारेण क्षात्रसर्गः प्रवर्तितः ॥९॥
जिसमें धर्मतीथ की प्रवृत्ति करनी है ऐसे इस भारतवर्षमें सर्वार्थसिद्धिसे अवतार लेकर उन्होंने क्षत्रियोंकी सृष्टि प्रवृत्त की है ।।९।।
Having descended from Sarvārthasiddhi into this sacred land of Bhāratavarṣa, where the wheel of Dharma is set in motion, He initiated the creation of the Kshatriya order, that they might uphold righteousness and establish the holy path. ॥9॥
श्लोक ( Shlok ) 10
तत्कथं कर्मभूमित्वाद द्यत्वे द्वितयी प्रजा । कर्तव्या “रक्षणीयेका प्रजान्या रक्षणोद्यता ॥१०॥
वह क्षत्रियोंकी सृष्टि किस प्रकार प्रवृत्त हुई थी ? इसका समाधान यह है कि आज कर्मभूमि होनेसे प्रजा दो प्रकारकी पाई जाती है। उनमें एक प्रजा तो वह है जिसकी रक्षा करनी चाहिये और दूसरी वह है जो रक्षा करने में तत्पर है ।।१०।।
How, then, was the creation of the Kshatriyas brought about? The answer is this: Since this land is now a karmabhūmi—a realm of action—two kinds of people are found here. Of these, one class comprises those who are to be protected, and the other, those who are ever ready to offer that protection. ॥10॥
श्लोक ( Shlok ) 11 –12
रक्षणाभ्युद्यता येऽत्र क्षत्रियाः स्युस्तदन्वयाः । सोऽन्वयोऽनादिसन्तत्या बीजवृक्षवदिप्यते ॥११॥विशेषतस्तु तत्सर्गः क्षेत्रकालव्यपेक्षया । तेषां समुचिताचारः प्रजार्थे न्यायवृत्तिता ॥१२॥
जो प्रजा रक्षा करनेमें तत्पर है उसीकी वंशपरम्पराको क्षत्रिय कहते हैं यद्यपि यह वंशं अनादिकालकी संततिसे बीज वृक्षके समान अनादि कालका है तथापि विशेषता इतनी है कि क्षेत्र और कालकी अपेक्षासे उसकी सृष्टि होती है। तथा प्रजाके लिये न्यायपूर्वक वृत्ति रखना ही उनका योग्य आचरण है ।।११-१२।
The lineage of those who are ever ready to protect others is known as the Kshatriya lineage. Though this line, like the eternal cycle of seed and tree, is without a beginning and has continued from time immemorial, yet its manifestation arises in accordance with time and region. Moreover, the righteous conduct prescribed for them is this: to uphold a just livelihood for the sake of the people. ॥11–12॥
श्लोक 13 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
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