आदिपुराण भाग – 2 पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 128
ग्रामों और गंगा की ओर प्रस्थान
भरत ने गांवों के मुखिया, बगीचे, और लताओं से सजे ग्राम देखे। गांववासी घी, दही, और फल भेंट करते थे। सेना के साथ भरत गंगा नदी के समीप पहुंचे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 26 – Shlok 122 to 128
श्लोक ( Shlok ) 122
सोऽपश्यन्निगमोपान्ते पथः संश्यानकर्दमान् । प्रव्यक्तगोखुरक्षोदस्थपुटानतिसङ्कटान् ॥१२२॥
जो स्पष्ट दिखनेवाले गायोंके खुरोंके चिह्नोंसे ऊंचे नीचे हो रहे हैं और जो अत्यन्त सकड़े हैं ऐसे कुछ कुछ कीचड़से भरे हुए गांवके समीपवर्ती मार्गोको भी भरत महाराज देखते जाते थे ।।१२२।।
“Bharata Maharaj kept observing the nearby village paths, which were uneven due to the clearly visible hoof marks of cows, extremely narrow, and in some places filled with mud.” (Verse 122)
श्लोक ( Shlok ) 123
निगमान् परितोऽपश्यद् ग्राममुख्यान् महाबलान्। पयस्विनो जनेः सेव्यान् महारामतरूनपि ॥१२३॥
उन्होंने ग्रामों के चारों ओर खड़े हुए महाबलवान् गांवके मुखिया लोगोंको देखा था तथा पक्षी तिर्यञ्च और मनुष्यों के द्वारा सेवा करने योग्य बड़े बड़े बगीचोंके वृक्ष भी देखे थे ॥ १२३॥
“He had seen the mighty village chiefs standing around the villages, as well as the large trees in the great orchards that were to be served and cared for by birds, animals, and humans.” (Verse 123)
श्लोक ( Shlok ) 124
ग्रामान् कुक्कुटसम्पात्यान् सोऽत्यगाद् वृतिभिर्वृ तान् । कोशात कीलतापुष्पस्थगिताभिरितोऽमुतः ॥ १२४॥
जो जहां तहां लौकी अथवा तुरई की लताओं के फूलोंसे ढकी हुई वाड़ियोंसे घिरे हुए हैं और जिनपर एकसे दूसरेपर मुर्गा भी उड़कर जा सकता है ऐसे गावोंको वे दूरसे ही छोड़ते जाते थे ।। १२४।।
“He would pass by from a distance those villages which were surrounded by gardens, covered here and there with the flowering vines of bottle gourds or ridge gourds, and where even a rooster could fly from one house to another due to the close proximity.” (Verse 124)
श्लोक ( Shlok ) 125
“कुटीपरिसरेष्वस्य धृतिरासीत् प्रपश्यतः । फलपुष्पानता वल्लीः प्रसवाढ्या सतीरपि ॥१२५॥
झोपड़ियों के समीपम फल और फूलोंसे झुकी हुई फूलों सहित उत्तम लताओं को देखते हुए महाराज भरतको बड़ा आनन्द आ रहा था ।। १२५।।
“Seeing the excellent flowering creepers, laden with fruits and flowers, near the huts, King Bharata felt great joy.” (Verse 125)
श्लोक ( Shlok ) 126
योषितो निष्कमालाभिर्वलयैश्च विभूषिताः । पश्यतोऽस्य मनो जह्र र्ग्रामीणाः संश्रिता वृतीः । १२६।
जो सुवर्णकी मालाओं और कड़ोंसे अलंकृत हैं तथा वाड़ियोंकी ओटमें खड़ी हुई हैं ऐसी गांवोंकी स्त्रियां भो देखनेवाले भरतका मन हरण कर रही थीं ।॥१२६।।
“The village women, adorned with golden necklaces and bangles, standing partially hidden behind the garden groves, were captivating the heart of the observing Bharata.”(Verse 126)
श्लोक ( Shlok ) 127
हैयङ्गवीनकलशैर्द ध्नामपि निहित्रकैः। ग्रामेषु फलभेदैश्च तमद्राक्षुर्महत्तराः ॥१२७।।
गांवोंके बड़े बड़े लोग घीके घड़, दही के पात्र और अनेक प्रकारके फल भेंट कर उनके दर्शन करते थे ।।१२७।।
“The prominent villagers would come to see him, offering pots of ghee, vessels of curd, and various kinds of fruits as gifts.”
(Verse 127)
श्लोक ( Shlok ) 128
ततो विदूरमुल्लङ्घय सोऽध्वानं पृतनावृतः । गङ्गामुपासदद् वीरः प्रयाणैः “कतिधैरपि ॥ १२८॥
तदनन्तर धीरवीर भरत सेनासहित कितनी ही मंजिलों द्वारा लम्बा मार्ग तय कर गङ्गा नदी के समीप जा पहुंचे ।।१२८।।
“Then, the wise and valiant Bharata, along with his army, traveled a long path through many stages and finally reached the banks of the Ganga River.”(Verse 128)
श्लोक 129 से 147
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 |
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121