आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |
श्लोक 62 से 71 स्वप्नों का फल (भाग 1)
वृषभदेव ने स्वप्नों का फल बताया: (1) तेईस सिंह: महावीर स्वामी को छोड़कर अन्य तीर्थंकरों के समय दुष्ट नय नहीं होंगे। (2) सिंह का बच्चा और हरिण: महावीर के तीर्थ में परिग्रही कुलिंगी होंगे। (3) भारवाहक घोड़ा: पंचम काल में साधु तप के गुणों को धारण नहीं कर पाएंगे। (4) सूखे पत्ते खाने वाले बकरे: मनुष्य सदाचार छोड़ दुराचारी होंगे। (5) हाथी पर वानर: प्राचीन क्षत्रिय वंश नष्ट होकर नीच कुलवाले शासक बनेंगे। (6) कौवों से त्रस्त उलूक: लोग जैन मुनियों को छोड़ अन्य मतों के साधुओं का अनुसरण करेंगे। (7) आनंदित भूत: लोग व्यंतरों को देव मानकर पूजेंगे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
कल्याणाङ्गस्त्वमेकान्ताद् देवताधिष्ठितश्च यत्। न मिथ्या तदिमे स्वप्नाः फलमेषां निबोध मे । ॥६२॥
हे कल्याणरूप, चूँकि तू अवश्य ही देवताओंसे अधिष्ठित है इसलिये तेरे ये स्वप्न मिथ्या नहीं हैं। तू इनका फल मुझसे समझ ।। ६२ ।।
“O noble one, since thou art surely graced and upheld by the gods, these dreams of thine are not false. Therefore, hearken unto me, and learn from me their true import.” 62
श्लोक ( Shlok ) 63 – 64
दृष्टाः स्वप्ने मृगाषीशा ये त्रयोविंशतिप्रभाः । निस्सपत्नां विहृत्येमां क्ष्मां क्ष्माभृत्कूटमाश्रिताः ॥६३॥ तत्फलं सन्मति मुक्त्वा शेषतीर्थकरोदय । दुर्नयानामनुभूतिख्यापनं लक्ष्यतां स्फुटम् ॥६४॥
तूने जो स्वप्नमें इस पृथ्वीपर अकेले विहार कर पर्वतकी शिखरपर चढ़ हुए तेईस सिंह देखे हैं उसका स्पष्ट फल यही समझ कि श्रीमहावीर स्वामीको छोड़कर शेष तेईस तीर्थङ्करोंके समयमें दुष्ट नयोंकी उत्पत्ति नहीं होगी। इस स्वप्नका फल यही बत-लाता है ।॥६३-६४।।
“The twenty-three lions you saw roaming alone upon the mountain’s peak signify this clear outcome: except for Lord Mahāvīra, during the times of the other twenty-three Tīrthaṅkaras, no wicked heresies shall arise. Such is the meaning revealed by this dream.”63 – 64
श्लोक ( Shlok ) 65
पुनरेकाकिनः सिंहपोतस्यान्वक् मृगेक्षणात् । भवेयुः सन्मतेस्तीर्थे सानुषङगाः कुलिङ्गिनः ॥६५॥
तदनन्तर दूसरे स्वप्नमें अकेले सिंहके बच्चे के पीछे चलते हुए हरिणोंका समूह देखनेसे यह प्रकट होता है कि श्री महावीर स्वामीके तीर्थमें परिग्रहको धारण करनेवाले बहुतसे कुलिङ्गी हो जावेंगे ॥ ६५॥
“Thereafter, the dream of a herd of deer following a lone lion’s cub reveals that in the Tirtha of Lord Mahāvīra, many Kuliṅgas will adopt possessions.”65
श्लोक ( Shlok ) 66
करीन्द्रभार निर्भु ग्नपुष्टस्याश्वस्य वीक्षणात् । कृत्स्नान् तपोगुणान्वोढुं नालं दुष्षमसाधवः ॥६६॥
बड़े हाथीके उठाने योग्य बोझसे जिसकी पीठ झुक गई है ऐसे घोड़े के देखनेसे यह मालूम होता है कि पंचम कालके साधु तपश्चरणके समस्त गुणोंको धारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकेंगे ॥ ६६।।
“The sight of a horse burdened heavily enough to bow beneath the weight of a great elephant’s load indicates that in the Fifth Era, monks will be unable to fully uphold all the virtues of ascetic practice.”66
श्लोक ( Shlok ) 67
मूलोत्तरगुणेष्वात्त सङ्गराः केचनालसाः । भक्ष्यन्ते मूलतः केचित्तेष् यास्यन्ति मन्दताम् ॥६७॥
कोई मूलगुण और उत्तरगुणोंके पालन करनेकी प्रतिज्ञा लेकर उनके पालन करनेमें आलसी हो जायेंगे, कोई उन्हें मूलसे ही भंग कर देंगे और कोई उनमें मन्दता या उदासीनताको प्राप्त हो जायेंगे ॥ ६७।।
“Some will take vows to observe the fundamental virtues and their subsidiary qualities, yet grow lazy in their practice; others will break them outright from the root; and still others will become sluggish or indifferent toward them.”67
श्लोक ( Shlok ) 68
निध्यानादजयूथस्य शुष्कपत्रोपयोगिनः । यान्त्यसद्वृत्ततां त्यक्तसदाचाराः पुरा नराः ॥६८॥
सूखे पत्ते खानेवाले बकरोंका समूह देखनेसे यह मालूम होता है कि आगामी कालमें मनुष्य सदाचारको छोड़कर दुराचारी हो जायेंगे ॥ ६८।।
“The sight of a herd of goats feeding on dry leaves signifies that in the coming age, humans will forsake virtuous conduct and become morally corrupt.” 68
श्लोक ( Shlok ) 69
करीन्द्रकन्धरारूढशाखामृगविलोकनात् । आदिक्षत्रान्वयोच्छित्तौ क्ष्मां ‘पास्यन्त्यकुलीनकाः ॥६९॥
गजेन्द्र के कंधेपर चढ़ हुए वानरोंके देखनेसे जान पड़ता है कि आगे चलकर प्राचीन क्षत्रिय वंश नष्ट हो जायेंगे और नीच कुलवाले पृथ्वीका पालन करेंगे ।।६९।।
“The vision of monkeys perched upon the shoulder of an elephant-king foretells that in the future, the ancient Kshatriya lineage will perish, and low-born families will come to rule the earth.”69
श्लोक ( Shlok ) 70
काकैरुलूक सम्बाधदर्शनाद्धर्मकाम्यया । मुक्त्वा जैनान्मुनीनन्यमतस्थानन्वियुर्जनाः ॥७०॥
कौवोंके द्वारा उलूकको त्रास दिया जाना देखनेसे प्रकट होता है कि मनुष्य धर्मकी इच्छासे जैनमुनियों-को छोड़कर अन्य मतके साधुओंके समीप जायेंगे ।।७०।।
“The sight of crows harassing an owl reveals that people, in their yearning for religion, will forsake Jain monks and turn towards ascetics of other faiths.”70
श्लोक ( Shlok ) 71
प्रनृत्यतां प्रभूतानां भूतानामीक्षणात् प्रजाः । मजेयुर्नामकर्माद्यैर्व्यन्तरान् देवतास्थया ॥७१॥
नाचते हुए बहुतसे भूतोंके देखनेसे मालूम होता है कि प्रजाके लोग नामकर्म आदि कारणोंसे व्यन्तरोंको देव समझकर उनकी उपासना करने लगेंगे ॥७१॥
“The vision of many dancing ghosts indicates that the people, due to rituals like name-calling and other causes, will mistake spirits for deities and begin worshipping them.”71
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |
Download PDF








