आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 सुलोचना की शारीरिक शोभा
सुलोचना की जंघाएँ संतुलित थीं, और नितम्ब कामदेव की वेदी जैसे थे। उसका मध्य भाग त्रिवली से बंधा था, और नाभि से रोमराजि घास की तरह थी। उसके स्तन स्याद्वाद की तरह विरुद्ध धर्म धारण करते थे। भुजाएँ लक्ष्मी को आलिंगन करती थीं, और कंठ जयकुमार के हाथों से सुशोभित था। कपोल दर्पण जैसे थे, और ओठ बिम्बी फल से भी श्रेष्ठ थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
न स्थूले न कृशे नर्जू न वक्रे न च सङ्कटे’। विकटे न च तज्जङ्घे शोभाऽन्यैवैनयोरसौं ।॥१४२॥
उसकी दोनों जंघाएं न स्थूल थीं, न कृश थीं, न सीधी थीं, न टेढ़ी थीं, न मिली हुई थीं और न दूर दूर ही थीं। उसकी दोनों जंघाओंकी शोभा निराली ही थी ॥१४२॥
Her thighs were neither too full nor too slender, neither too straight nor curved, neither closely joined nor set too far apart—they possessed a grace that defied all comparison. The beauty of her thighs was of a rare and singular charm, unlike any ever beheld.142
श्लोक ( Shlok ) 143
काञ्चीस्थानं तदालोच्येवोरू स्थूले सुसङ्गते । कायगर्भगृहद्वारस्तम्भयष्ट्याकृती कृते ॥१४३॥
उसके करधनी पहननेके स्थान-नितम्बस्थलको देखकर ही मानो स्थूल, परस्परमें मिले हुए और कामदेवके गर्भगृह सम्बन्धी दरवाजेसे खंभोंकी लकड़ीके समान दोनों ऊरु बनाये गये थे ।। १४३॥
Beholding the region of her hips, where the girdle gracefully rested, one might well imagine that her thighs had been fashioned like twin pillars—broad, closely set, and sculpted as though for the doorway of Kāma’s inner sanctum, wrought from the choicest wood by the hand of divine artistry.143
श्लोक ( Shlok ) 144
वेदिकेव मनोजस्य शिरो वा स्मरदन्तिनः । सानुर्वाऽनङ्गशैलस्य शुशुभेऽस्याः कटीतटम् ॥१४४।।
उसका नितम्ब प्रदेश ऐसा अच्छा जान पड़ता था मानो कामदेवकी वेदी ही हो अथवा कामदेवरूपी हाथीका शिर ही हो अथवा कामदेवरूपी पर्वत का शिखर ही हो ।॥१४४।।
The region of her hips appeared so exquisite, it seemed as though it were the very altar of Kāma, or perchance the noble head of the god of love in elephantine form, or even the resplendent summit of a mountain that was none other than Kāma himself.144
श्लोक ( Shlok ) 145
कृत्वा कृशं भृशं मध्यं बद्धं भङ्गभयादिव । रज्जुभिस्तिसृमिर्धात्रा वलिभिर्गाढमाबभौ ।।१४५।।
उसका मध्यभाग ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो विधाताने उसे पहले तो अत्यन्त कुश बनाया हो और फिर टूट जानेके भयसे त्रिवलीरूपी तीन रस्सियोंसे मजबूत बांध दिया हो ।।१४५॥
Her waist was so gracefully slender, it seemed as though the Creator had first shaped it with utmost delicacy, and then—fearing it might break—had bound it securely with three folds, like cords, known as the trivalī, to preserve its fragile beauty.145
श्लोक ( Shlok ) 146
नाभिकूपप्रवृत्तास्या रसमार्गसमुद्गता । श्यामा शाड्वलमालेव रोमराजिर्व्य राजत ॥१४६॥
नाभिरूपी कुएंसे निकली हुई उसकी रोमराजि ऐसी अच्छी सुशोभित हो रही थी मानो जलमार्गसे निकली हुई हरी हरी छोटी घासकी पऊवित ही हो ।।१४६।।
The delicate line of fine hair emerging from her navel—like a slender stream—appeared most enchanting, as though it were a tender garland of fresh green blades of grass sprouting from a sacred wellspring of water.146
श्लोक ( Shlok ) 147
भिन्नौ युक्तौ मृदूस्तब्धौ उष्णौ सन्तापहारिणौ । स्तनौ विरुद्धधर्माणौ स्याद्वा दस्थितिमूहतुः ॥१४७।।
उसके स्तन भिन्न भिन्न होकर भी (स्थूल होनेके कारण) एक दूसरेसे मिले हुए थे, कोमल होकर भी (उन्नत होनेके कारण) कठोर थे, और उष्ण होकर भी (आह्लादजनक होनेके कारण) संतापको दूर करनेवाले थे, इस प्रकार विरुद्ध धर्मोको धारण करनेवाले उसके दोनों स्तन स्याद्वादकी स्थितिको धारण कर रहे थे ।।१४७।।
Her breasts, though distinct, appeared as one—so full they touched; though tender, they seemed firm by their proud rise; though warm, they dispelled all affliction by their soothing delight. Thus did her twin breasts embody the essence of Syādvāda—the doctrine of conditional predication—gracefully upholding seemingly contradictory qualities in perfect harmony.147
श्लोक ( Shlok ) 148
सहवक्षोनिवासिन्या समाश्लिष्य जयः श्रिया । स्वीकृतो यदि चेत्ताभ्यां वर्ण्येते तद्भुजो कथम् ॥१४८॥
चूँकि उसकी दोनों भुजाओंने वक्षः-स्थलपर निवास करनेवाली लक्ष्मीके साथ आलिङ्गन कर जयकुमारको स्वीकृत किया है इसलिये उनका वर्णन भला कैसे किया जा सकता है ? ॥१४८॥
Since those two arms had embraced Jayakumāra—accepting him with the very goddess of fortune who dwelt upon her bosom—how then may their glory ever be fully described? Verily, they transcended the reach of mere words. 148
श्लोक ( Shlok ) 149
वीरलक्ष्मीपरिष्वक्तजयदक्षिणबाहुना । सवामेन परिष्वक्त स्तत्कण्ठस्तस्य कोपमा ॥१४९॥
उसका कंठ वीर लक्ष्मीसे सुशोभित जयकुमारके दांये और बांये दोनों हाथोंसे आलिंगनको प्राप्त हुआ था अतः उसकी उपमा क्या हो सकती है। भावार्थ-उसकी उपमा किसके साथ दी जा सकती है ? अर्थात् किसीके साथ नहीं-वह अनुपभ था ॥ १४९॥
Her neck, adorned by the embrace of the valiant Jayakumāra—whose arms bore the splendour of heroism and fortune—had been encircled on both sides in loving clasp. What simile, then, could dare to capture its beauty? Truly, it was beyond all comparison—anupama, peerless and without equal.149
श्लोक ( Shlok ) 150
निःकृपौ पेशलौ श्लक्ष्णौ तत्कपोलो विलेसतुः। कान्तौ कलभदन्ताभौ जयवक्त्राब्ज दर्पणौ ॥१५०॥
हाथीके बच्चेके दांतकी आभाको धारण करनेवाले उसके निष्कृप, कोमल और चिकने दोनों कपोल ऐसे अच्छे जान पड़ते थे मानो जयकुमारका मुख-कमल देखनेके लिये सुन्दर दर्पण ही हों ।॥१५०।।
Her cheeks—smooth, tender, and radiant with the lustre of a young elephant’s ivory—appeared so exquisitely beautiful, they seemed as though they were fashioned as flawless mirrors, created solely for the beholding of Jayakumāra’s lotus-like face.150
श्लोक ( Shlok ) 151
वटबिम्बप्रवालादिनोपमेयमपीष्यते” । अधरस्यातिदूरत्वाद् वर्णाकाररसादिभिः ॥१५१॥
वटकी कोंपल, बिम्बी फल और मूंगा आदि पदार्थ, वर्ण, आकार और रस आदिमें ओंठोंसे बहुत दूर हैं अर्थात् उसके ओठोंके समान न तो इनका वर्ण है, न आकार है और न रस ही है इसलिये ही उसके ओठोंको इनमेंसे किसीकी भी उपमा नहीं दी जा सकती थी ।।१५१।।
The tender bud of the banyan, the bimbī fruit, and coral—though famed for their hue, form, and taste—fell far short of her lips in every regard. Neither their colour matched hers, nor their shape, nor their sweetness. Thus, her lips admitted no comparison with any of them, for none could equal their exquisite charm. 151
श्लोक 152 से 161
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