आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 |
श्लोक 32 से 46 पुराण की पूर्णता और प्रभाव
रचना को गुरुओं के मार्गदर्शन में शुद्ध करने की अपेक्षा की गई है। यह पुराण धर्मरूपी रत्न है, जिसे पंडित ग्रहण करेंगे। यह रचना सुंदरी स्त्री के समान रस, अलंकार और विचित्र शब्दों से युक्त है, जो सभी के मनोरथ पूर्ण करती है। यह पापों को नष्ट करती है, पुण्य को बढ़ाती है, और युगों तक स्थिर रहेगी। इसकी सिद्धि में गुरु जिनसेनाचार्य का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 32 to 46
श्लोक ( Shlok ) 32
प्रवृत्तेयं कृतिः कृत्वा गुरून् पूर्वकवीश्वरान् । भाविनोद्यतनाश्चास्या विदध्युः शुद्ध्यनुग्रहम् ॥३२॥
पहले के कवीश्वरोंको गुरु मानकर ही यह रचना की गई है इसलिये जो कवि आज विद्यमान हैं अथवा आगे होंगे वे सब इसे शुद्ध करनेकी कृपा करें ।।३२।।
This composition has been crafted in reverent submission to the exalted poets of the past, regarding them as my Gurus. Therefore, may all poets—those living today and those yet to come—bestow their grace by refining and perfecting it. ॥32॥
श्लोक ( Shlok ) 33
मतिर्में केवलं सूते कृति राज्ञीव तत्सुताम् । धियस्तां वर्तयिष्यन्ति धात्रीकल्पाः कवीशिनाम् ॥३३॥
जिस प्रकार रानी किसी उत्तम कन्याको केवल उत्पन्न करती है उसका पालन पोषण धाय करती है उसी प्रकार मेरी बुद्धि इस रचनाको केवल उत्पन्न कर रही है इसका पालन पोषण धायके समान कवीश्वरों की बुद्धि ही करेगी ॥३३॥
Just as a queen may give birth to a noble daughter, but it is the nurse who tends and nurtures her—so too does my intellect merely give rise to this composition, while the discerning wisdom of the great poets shall rear and refine it, as a devoted nursemaid would. ॥33॥
श्लोक ( Shlok ) 34
इदं बुधा ग्रहीष्यन्ति मा गृहीषुः पृथग्जनाः । किमतौल्यानि रत्नानि ‘क्रीणन्त्यकृतपुण्यकाः ॥३४॥
मेरे इस काव्यको पण्डितजन ही ग्रहण करेंगे अन्य मूर्ख लोग भले ही ग्रहण न करें क्योंकि जिन्होंने पुण्य नहीं किया है ऐसे दरिद्र पुरुष क्या अमूल्य रत्नोंको खरीद सकते हैं ? अर्थात् नहीं ।॥ ३४।॥
Only the wise shall receive this poetry of mine; let the foolish turn away if they so choose—for how may the impoverished, who have earned no merit, hope to possess priceless gems? Indeed, they cannot. ॥34॥
श्लोक ( Shlok ) 35
हृदि धर्ममहारत्नमागमाम्भोधिसम्भवम् । कौस्तुभादधिकं मत्वा दधातु पुरुषोत्तमः ॥३५॥
पुरुषोत्तम (नारायण अथवा उत्तम मनुष्य) आगमरूपी समुद्रसे उत्पन्न हुए इस धर्मरूपी महारत्नको कौस्तुभ मणिसे भी अधिक मानकर अपने हृदयमें धारण करें । ॥३५।।
Let the noblest of men—be they Nārāyaṇa himself or the loftiest of mortals—cherish this supreme jewel of Dharma, born of the ocean-like scriptures, esteeming it even above the radiant Kaustubha gem, and enshrine it within their hearts. ॥35॥
श्लोक ( Shlok ) 36
श्रोत्रपात्राञ्जलिं कृत्वा पीत्वा धर्मरसायनम् । अजरामरतां प्राप्तुम् उपयुन्ध्वमिदं बुधाः ॥३६॥
पण्डितजन कामरूपी पात्रकी अंजलि बना इस धर्मरूपी रसायनको पीकर अजर अमरपना प्राप्त करनेके लिये उद्यम करें ॥३६॥
Let the wise, forming with the vessel of desire a sacred offering of their hands, drink deeply of this elixir of Dharma, striving thereby to attain the blessed state of agelessness and immortality. ॥36॥
श्लोक ( Shlok ) 37
नूनं पुण्यं पुराणाब्धेर्मध्यमध्यासितं मया । तत्सुभाषितरत्नानि सञ्चितानीति निश्चितिः ॥३७॥
मुझे यह निश्चय है कि मैंने अवश्य ही इस पुराणरूपी समुद्रके पवित्र मध्यभागमें अधिष्ठान किया है और उससे सुभाषित-रूपी रत्नोंका संचय किया है ।।३७।।
Of this I am certain—that I have indeed taken my stand in the sacred heart of this Purāṇa-ocean, and from its depths have gathered a treasury of jewels in the form of noble and well-spoken verses. ॥37॥
श्लोक ( Shlok ) 38
सुदूरपारगम्भीरमिति नात्र भयं मम । पुरोगा गुरवः सन्ति प्रष्ठाः सर्वत्र दुर्लभाः ॥३८॥
यह पुराणरूपी समुद्र अत्यन्त गंभीर है, इसका किनारा बहुत दूर है इस विषयका मुझे कुछ भी भय नहीं है क्योंकि सब जगह दुर्लभ और सबमें श्रेष्ठ गुरु जिनसेनाचार्य मेरे आगे हैं ।॥ ३८॥
This ocean of the Purāṇa is unfathomably deep, and its farthest shore lies far beyond sight—yet I fear it not, for ever before me stands the rarest and most exalted of guides, my Guru, the venerable Jinaseṇācārya. ॥38॥
श्लोक ( Shlok ) 39
पुराणस्यास्य संसिद्धिर्नाम्ना स्वेनैव सूचिता । निर्वक्ष्याम्यत्र नो वेत्ति ततो नास्म्यहमाकुलः । ३९॥
इस पुराणकी सिद्धि अपने महापुराण इस नामसे ही सूचित है इसलिये मैं इसे कह सकूंगा अथवा इसमें निर्वाह पा सकूँगा या नहीं इसकी मुझे कुछ भी आकुलता नहीं है ।॥३९॥
The very name Mahāpurāṇa proclaims the glory and fulfillment of this sacred text; hence, whether I am able to articulate it fully or sustain its grandeur, I remain untroubled—for its accomplishment is already declared in its name. ॥39॥
श्लोक ( Shlok ) 40
पुराणं मार्गमासाद्य जिनसेनानुगा ध्रुवम् । भवाब्धेः पारमिच्छन्ति पुराणस्य किमुच्यते ।।४०ll
जिनसेनाचार्य के अनुगामी शिष्य प्रशस्त मार्गका आलम्बन कर अवश्य ही संसाररूपी समुद्रसे पार होनेकी इच्छा करते हैं फिर इस पुराणके पार होनेकी बात तो कहना ही क्या है ? भावार्थ-जिनसेनाचार्य के द्वारा बतलाये हुए मार्गका अनुसरण करनेसे जब संसाररूपी समुद्रका पार भी प्राप्त किया जा सकता है तब पुराणका पार (अन्त) प्राप्त करना क्या कठिन है ? ॥४०॥
The disciples who walk in the footsteps of Āchārya Jinaseṇa, holding fast to the noble path he revealed, surely aspire to cross even the boundless ocean of saṃsāra—then what need is there to speak of crossing this Purāṇa? Indeed, when his path leads beyond the world itself, how can this sacred text remain unconquered? ॥40॥
श्लोक ( Shlok ) 41
अर्थो मनसि जिह्वाग्रे शब्दः सालङ्कृति’ स्तयोः । अतः पुराणसंसिद्धेर्नास्ति कालविलम्बनम् ॥४१॥
अर्थ मनमें हैं, शब्द जिह्वाके अग्रभागपर हैं और उन दोनोंके अलंकार प्रसिद्ध हैं ही अतः इस पुराणकी सिद्धि (पूति) होनेमें समयका विलम्ब नहीं है अर्थात् इसकी रचना शीघ्र ही पूर्ण होगी ॥४१॥
The meanings dwell firmly within the mind, the words rest ready upon the tip of the tongue, and the ornaments of both—thought and speech—are already well known. Thus, there shall be no delay in the fruition of this Purāṇa; indeed, its completion is near at hand. ॥41॥
श्लोक ( Shlok ) 42
आकरेष्विव रत्नानामूहानां नाशये क्षयः । विचित्रालङ्कृतीः कर्तु दौर्गत्यं किं कवेः कृतीः ॥४२॥
जिस प्रकार खानिमें रत्नोंकी कमी नहीं हे उसी प्रकार जिसके मनमें तर्क अथवा पदार्थोंकी कमी नहीं है फिर भला जिसमें अनेक प्रकारके अलंकार हैं ऐसे काव्यके बनानेवाले कविको दरिद्रता किस बात की है ? ॥४२॥
Just as a mine knows no dearth of gems, so too one whose mind is rich in logic and substance lacks nothing. Then tell me—what poverty can ever touch the poet who crafts his verse adorned with manifold ornaments of expression? ॥42॥
श्लोक ( Shlok ) 43
विचित्रपदविन्यासा रसिका सर्वसुन्दरा । कृतिः सालङ्कृतिर्न स्यात् कस्येयं कामसिद्धये ॥४३॥
मेरी यह रचना अत्यन्त सुन्दरी स्त्रीके समान है क्योंकि जिस प्रकार सुन्दर स्त्री विचित्र पदन्यासा अर्थात् अनेक प्रकारसे चरण रखनेवाली होती है उसी प्रकार यह रचना भी विचित्र पदन्यासा अर्थात् अनेक प्रकारके सुबन्त तिङन्त रूप पद रखनेवाली है, जिस प्रकार सुन्दर स्त्री रसिका अर्थात् रसीली होती है उसी प्रकार यह रचना भी रसिका अर्थात् अनेक रसोंसे भरी हुई है, और जिस प्रकार सुन्दर स्त्री सालंकारा अर्थात् कटक कुण्डल आदि आभूषणोंसे सहित होती है उसी प्रकार यह रचना भी सालंकारा अर्थात् उपमा रूपक आदि अलंकारोंसे सहित है। इस प्रकार मेरी यह रचना सुन्दरी स्त्रीके समान भला किसके मनोरथकी सिद्धिके लिये न होगी ? भावार्थ-इसके पढ़नेसे सबके मनोरथ पूर्ण होंगे ॥४३॥
This composition of mine is like a most exquisite lady. Just as such a lady walks with graceful and varied steps, so too does this work tread with a multitude of finely wrought grammatical forms. As she is endowed with charm and flavor, so is this text replete with the richness of poetic rasa. And as she is adorned with ornaments—armlets, earrings, and the like—so too is this work embellished with similes, metaphors, and manifold literary adornments.
Tell me, then—what desire of the devout shall not be fulfilled by so graceful a creation? Surely, the reading of this work shall bring the fulfillment of all noble aspirations. ॥43॥
श्लोक ( Shlok ) 44
सञ्चितस्यैनसो हन्त्री नियन्त्री चागमिष्यतः। आमन्त्रिणी च पुण्यानां ध्यातव्येयं कृतिः शुभा ॥४४॥
यह शुभ रचना पहले के संचित पापोंको नष्ट करनेवाली है, आनेवाले पापोंको रोकनेवाली है और पुण्योंको बुलानेवाली है इसलिये इसका सदा ध्यान करते रहना चाहिये ॥४४॥
This auspicious composition is the destroyer of sins amassed in the past, the barrier to sins yet to come, and the summoner of meritorious deeds. Therefore, it is most fitting that one should ever dwell upon it in mindful contemplation. ॥44॥
श्लोक ( Shlok ) 45
संस्कृतानां हिते ‘प्रीतिः प्राकृतानां प्रियं प्रियम् । एतद्धितं प्रियं चातः सर्वान् सन्तोषयत्यलम् ।।४५।।
उत्तम मनुष्योंकी हितमें प्रीति होती है और साधारण मनुष्योंको जो इष्ट है वही प्रिय होता है, यह पुराण हितरूप भी है और प्रिय भी है अतः सभी-को अच्छी तरह सन्तुष्ट करता है ॥४५॥
The noble delight in that which is truly beneficial, while ordinary men hold dear that which merely pleases them. Yet this Purāṇa is both—wholesome in essence and pleasing in form—thus it brings deep contentment to all alike. ॥45॥
श्लोक ( Shlok ) 46
इवं निष्पन्नमेवान्न स्थितमेवायुगान्तरम् । इत्याविर्भावितोत्साहः प्रस्तुवे प्रस्तुतां कथाम् ॥४६॥इति पीठिका ।
यह तैयार हुआ पुराण अवश्य ही इस संसारमें युगान्तर तक स्थिर रहेगा इस प्रकार जिसे उत्साह प्रकट हुआ है ऐसा मैं अब प्रकृत कथाका प्रारम्भ करता हूँ ।॥४६।। (इस प्रकार पीठिका समाप्त हुई ।)
This Purāṇa, now complete, shall assuredly endure in this world for ages to come. With this firm resolve and awakened enthusiasm, I now commence the narration of the principal tale. ॥46॥
(Thus ends the Preface.)
श्लोक 47 से 69
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आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 |
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