आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |
श्लोक 22 से 31
शरद् ऋतु की प्राकृतिक सौंदर्यता
शरद् ऋतु में नदियों के किनारे स्वच्छ हो गए, सरोवर कमलों से और खेत नीलोत्पलों से सुशोभित थे। हंस और सारस पक्षियों के मधुर शब्द तालाबों को और आकर्षक बनाते थे। शरद् ऋतु लक्ष्मी रूपी स्त्री के समान थी, जिसके नेत्र नीलोत्पल और मुख कमल थे। पके चावल के खेत हल्दी से स्नान किए हुए से प्रतीत होते थे। हंसों को शरद् की शोभा से हर्ष और मयूरों को दुख हुआ, जो शुद्ध और अशुद्ध स्वभाव को दर्शाता है। बंधूक पुष्पों ने वनों की शोभा बढ़ाई।
English translation of Ādi purāṇa parv 26 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
विकासं बन्धुजीवेषु शरदाविर्भवन्त्यधात् । सतीव सुप्रसन्नाशा विपङ्का विशदाम्बरा ॥२२॥
जिस प्रकार निर्मल अन्तःकरणवाली, पापरहित और स्वच्छ वस्त्र धारण करनेवाली कोई सती स्त्री घरसे बाहिर प्रकट हो अपने बन्धुजनोंके विषयमें विकास अर्थात् प्रेमको धारण करती है उसी प्रकार शुद्ध दिशाओंको धारण करनेवाली कीचड़-रहित और स्वच्छ आकाशवाली शरऋतुने भी प्रकट होकर बन्धुजीव अर्थात् दुपहरिया के फूलोंपर विकास धारण किया था उन्हें विकसित किया था। तात्पर्य यह है कि उस समय दिशाएं निर्मल थीं, कीचड़ सूख गया था, आकाश निर्मल था और वनोंमें दुपहरियाके फूल खिले हुए थे ।।२२।।
Just as a virtuous woman, with a pure heart, free from sin, and dressed in clean garments, comes out of her house and expresses affection and love for her family members, in the same way, the autumn season—adorned with pure directions, a clear sky free from mud and impurities—also appeared and showed affection toward her loved ones, namely the duphariya (midday) flowers, causing them to bloom.
The essence is that during that time, the directions were clear, the mud had dried up, the sky was spotless, and the duphariya flowers were blooming in the forests. ||22||
श्लोक ( Shlok ) 23
हंसस्वनानकाकाशकणिशोज्ज्वलचामरा । पुण्डरीकातपत्रासीद्दिग्जयोत्थे व सा शरत् ॥२३॥
उस समय जो हंसोंके शब्द हो रहे थे वे नगाड़ोंके समान जान पड़ते थे, बनोंमें काशके फूल फूल रहे थे वे उज्ज्वल चमरोंके समान मालूम होते थे, और तालाबोंमें कमल खिल रहे थे वे छत्रके समान सुशोभित हो रहे थे तथा इन सबसे वह शरऋतु ऐसी जान पड़ती थी मानो उसे दिग्विजय करनेकी इच्छा ही उत्पन्न हुई हो ॥२३॥
At that time, the sounds made by the swans resembled the beating of war drums; the blooming kāśa (saccharum) flowers in the forests appeared like bright royal fans (chamaras); and the lotuses blooming in the ponds looked as if they were beautiful parasols (royal umbrellas).
All of this made the autumn season seem as though it had arisen with the very desire to go on a conquest of all directions. ||23||
श्लोक ( Shlok ) 24
दिशां प्रसाधनायाधाद् वाणासन “परिच्छदम् । शरत्कालो “जिगीषोर्हि श्लाघ्यो बाणासनग्रहः ॥२४॥
उस शरऋतुने दिशाओं को प्रसाधन अर्थात् अलंकृत करनेके लिये वाणासन अर्थात् बाण और आसन जातिके पुष्पों का समूह धारण किया था सो ठीक ही है क्योंकि शत्रुओंको प्रसाधन अर्थात् वश करनेके लिये जिगीषु राजाको वाणासन अर्थात् धनुषका ग्रहण करना प्रशंसनीय ही है ।। २४।।
That autumn season had adorned itself with clusters of vāṇāsana flowers (a type of fragrant and beautiful blossoms) to decorate the directions, which is indeed fitting—because just as a conquering king, desiring victory over his enemies, rightfully takes up his vāṇāsana (bow and seat), in the same way, the season had taken up those flowers as its adornment for its conquests. ||24||
श्लोक ( Shlok ) 25
घनावली कृशा पाण्डुः रासीदाशा विमुञ्चती । घनागमवियोगोत्थचिन्तयेवाकुलीकृता ॥२५॥
उस समय समस्त आशा अर्थात् दिशाओं (पक्षमें संगमकी इच्छाओं) को छोड़ती हुई मेघमाला कृश और पाण्डुवर्ण हो गई थी सो उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो वर्षा कालके वियोगसे उत्पन्न हुई चिन्तासे व्याकुल होकर ही वैसी हो गई हो ।। २५।।
At that time, the entire line of clouds had become thin and pale in color, as if having abandoned all hopes (or desires) of uniting with the directions. Because of this, it appeared as though the clouds had become that way due to the distress and anxiety born from separation from the rainy season. ||25||
श्लोक ( Shlok ) 26
नभः सतारमारेजे विहसत्कुमुदाकरम् । कुमुद्धतीवनं चाभाज्जयत्तारकित नभः ॥२६।।
उस शरऋतुके समय ताराओंसे सहित आकाश ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो कुमुदिनियों सहिंत सरोवरकी हँसी ही कर रहा हो और कुमुदिनियोंसे सहित सरोवर ऐसा जान पड़ता था मानो ताराओंसे सुशोभित आकाश को ही जीत रहा हो ।॥ २६॥
During that autumn season, the sky adorned with stars appeared so beautiful, as if it were smiling like a lake full of blooming kumudini (water lilies). And the lake, filled with kumudinis, seemed as though it was outshining—even conquering—the star-studded sky. ||26||
श्लोक ( Shlok ) 27
तारकाकुमुदाकीर्णे नभः सरसि निर्मले। हंसायते स्म शीतांशु र्विक्षिप्तकरपक्षतिः ॥२७॥
तारकारूप कुमुदोंसे भरे हुए आकाशरूपी निर्मल सरोवरमें अपने किरणरूप पंखोंको फैलाता हुआ चन्द्रमा ठीक हंसके समान आचरण करता था ।॥२७॥
In the clear sky, which appeared like a spotless lake filled with kumudas (water lilies) in the form of stars, the moon, spreading its ray-like wings, behaved just like a swan. ||27||
श्लोक ( Shlok ) 28
नभोगृहाङगणे तेनुः श्रियं पुष्पोपहारजाम् । तारकादिग्वधूहारतारमुक्ताफलत्विषः ॥२८॥
जिनकी कान्ति दिशारूपी स्त्रियोंके हारोंमें लगे हुए बड़े बड़े मोतियोंके समान है ऐसे तारागण आकाशरूपी घरके आंगनमें फूलोंके उपहारसे उत्पन्न हुई शोभाको बढ़ा रहे थे ।।२८।।
The stars, whose radiance resembled large pearls adorning the necklaces of direction-like women, were enhancing the beauty of the sky—like an inner courtyard of a celestial home—illuminated by the offering of flowers. ||28||
श्लोक ( Shlok ) 29
बभुर्नभोऽम्बुधौ ताराः स्फुरन्मुक्ताफलामलाः । करका इव मेघोघैः र्निहिता हिमशीतलाः ॥२९ ॥
देदीप्य मान मुक्ताफलोंके समान निर्मल तारे आकाशरूपी समुद्रमें ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो मेघों के समूहने बर्फके समान शीतल ओले ही धारण कर रक्खे हों ।॥२९॥
The radiant and pure stars, shining like glowing pearls, adorned the sky-like ocean in such a way that it seemed as though clusters of clouds were holding icy, snow-like hailstones. ||29||
श्लोक ( Shlok ) 30
ज्योत्स्ना सलिलसम्भूता इव बुद्बुदपङ्क्तयः । तारका रुचिमातेनुः र्विप्रकीर्णा नभोऽङ्गणे ॥३०॥
आकाशरूपी आंगनमें जहां तहां बिखरे हुए तारागण ऐसी शोभा धारण कर रहे थे मानो चांदनी रूप जलसे उत्पन्न हुए बबूलोंके समूह ही हों ।॥३०॥
The stars scattered here and there across the sky-like courtyard appeared so beautiful, as if they were clusters of babool trees that had sprung up from moonlight-like water. ||30||
श्लोक ( Shlok ) 31
तनूभूतपयोवेणी र्नद्यः परिकृशा दधुः। वियुक्ता घनकालेन विरहिण्य इवाङ्गनाः ॥३१॥
वर्षाकालरूपी पतिसे बिछुड़ी हुई नदियां विरहिणी स्त्रियोंके समान अत्यन्त कृश होकर जलके सूक्ष्म प्रवाहरूपी चोटियोंको धारण कर रही थीं ॥३१।।
The rivers, separated from their consort—the rainy season—had become extremely thin, like sorrowful, longing women. They appeared to be wearing the delicate streams of water as their slender, flowing tresses. ||31||
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |


