आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 |
श्लोक 42 से 51 अर्हंतदेव की आप्तता
अर्हंतदेव राग-द्वेष से रहित, वाणी, आत्मा, और भाग्य के अतिशय से युक्त आप्त हैं। उनकी दिव्य वाणी सभ को संतुष्ट करती है, अनंत ज्ञान-दर्शन-सुख-बल उनका आत्म अतिशय है, और आठ प्रातिहार्य, समवसरण, बारह सभाएं उनके भाग्य का अतिशय हैं। अन्य मतों में ऐसा पुरुष नहीं, अतः अर्हंतदेव ही आप्त हैं। क्षत्रियों को अनाप्त मतों से वंश को पृथक् रखकर बुद्धि की रक्षा करनी चाहिए, जिससे अखंड पृथ्वी की रक्षा संभव है। तीन उदाहरण (पुरुष, बेड़ी, संसारी जीव) इस स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
वागाद्यतिशयोपेतः सार्वः सर्वार्थदृग्जिनः । स्यादाप्तः परमेष्ठी च परमात्मा सनातनः ॥४२॥
जितेन्द्र भगवान् वाणी आदिके अतिशय से सहित हैं, सबका हित करनेवाले हैं, समस्त पदार्थोंको साक्षात् देखनेवाले हैं, परमेष्ठी हैं, परमात्मा हैं और सनातन हैं इसलिये वे ही आप्त हो सकते हैं ।।४२।।
The victorious Lord, endowed with supreme excellence of speech and all divine attributes, is the benefactor of all beings, the seer of all realities as they are, the Supreme Abode, the Supreme Self, and Eternal. Therefore, He alone can rightfully be called Āpta—the true and infallible authority.42
श्लोक ( Shlok ) 43
स वागतिशयो ज्ञेयो येनायं विभुरक्रमात् । वचसैकेन दिव्येन प्रीणयत्यखिलां सभाम् ॥४३॥
भगवान् अरहन्तदेव अपनी जिस एक दिव्य वाणीके द्वारा समस्त सभाको संतुष्ट करते हैं वही उनकी वाणीका अतिशय जानना चाहिये ॥४३।।
The single divine speech of the blessed Arhant, by which He brings satisfaction to the entire assembly—this alone must be understood as the supreme excellence of His speech.43
श्लोक ( Shlok ) 44
तथाऽऽत्मा तिशयोंऽप्यस्य दोषावरणसंक्षयात् । अनन्तज्ञानदृग्वीर्य सुखातिशयसन्निधिः ॥४४॥
इसी प्रकार ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय कर्मके अत्यन्त क्षय हो जानेसे जो उनके अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त बलकी समीपता प्रकट होती है वही उनके आत्माका अतिशय है ।।४४।।
In like manner, the utter annihilation of the karmic veils—those of knowledge, perception, delusion, and obstruction—reveals the nearness of infinite knowledge, infinite perception, infinite bliss, and infinite power. This glorious manifestation is the supreme excellence of the Arhant’s soul.44
श्लोक ( Shlok ) 45
प्रातिहार्यमयी भूतिरुद्भूतिश्च सभावनेः । गणाश्च द्वादशेत्येष स्याद्भाग्यातिशयोऽर्हतः ।॥४५॥
तथा आठ प्रातिहार्यरूप विभूति प्राप्त होना, समवसरणभूमिकी रचना होना और बारह सभाएं होना यह सब अरहन्तदेवके भाग्यका अतिशय है ॥४५॥
The attainment of the eight miraculous prātihāryas, the divine construction of the Samavasaraṇa assembly-hall, and the presence of twelve noble congregations—these are the supreme excellences that manifest the glorious fortune of the Arhant Lord.45
श्लोक ( Shlok ) 46
वागाद्यतिशयेरेभिरन्वितोऽनन्यगोचरैः । भगवान्निष्ठितार्थोऽर्हन् परमेष्ठी जगद्गुरुः ।।४६।।
जो किन्हीं दूसरों में न पाये जानेवाले इन वाणी आदिके अतिशयोंसे सहित हैं तथा कृतकृत्य हैं ऐसे भगवान् अरहन्त परमेष्ठी ही जगत्के गुरु हैं ।॥ ४६।।
He who is adorned with such unparalleled excellences of speech and other divine attributes—found in none else—and who has accomplished all that is to be accomplished, such a Lord Arhant, the Supreme Being, alone is the true Preceptor of the world. 46
श्लोक ( Shlok ) 47
न च ताग्विधः कश्चित् पुमानस्ति मतान्तरे । ततोऽन्ययोग व्यावृत्त्या सिद्धमाप्तत्वमर्हति ॥४७॥
अन्य किसी भी मतमें ऐसा-अरहन्तदेवके समान कोई पुरुष नहीं है इसलिये अन्य योगकी व्यावृत्ति होनेसे अरहन्तदेवमें ही आप्तपना सिद्ध होता है ।।४७।।
In no other creed is there found a being equal to the Arhant Lord; hence, by the absence of such supreme qualities in all other paths, the true status of Āpta—the perfectly enlightened authority—is established solely in the Arhant.47
श्लोक ( Shlok ) 48
इत्याप्तानुमतं क्षात्रमिमं धर्ममनुस्मरन् । मतान्तरादनाप्तीयात् स्वान्वयं विनिवर्तयेत् ॥४८॥
इस प्रकार आप्तके द्वारा कहे हुए इस क्षात्रधर्मका स्मरण करते हुए क्षत्रियोंको अनाप्त पुरुषों-के द्वारा कहे हुए अन्य मतोंसे अपने वंशको पृथक् करना चाहिये ।।४८।।
Thus, ever remembering this Kṣātra Dharma as proclaimed by the true Āpta, the enlightened authority, Kṣatriyas must dissociate their noble lineage from all other creeds propounded by unenlightened and unauthoritative men.48
श्लोक ( Shlok ) 49
वृत्तादनात्मनीनाद्धीः स्यादेवमनुरक्षिता । तद्र क्षणाच्च संरक्षेत् क्षत्रियः क्षितिमक्षताम् ॥४९॥
इस प्रकार जिनमें आत्माका हित नहीं है ऐसे आचरणसे अपनी बुद्धिकी रक्षा की जा सकती है और बुद्धिकी रक्षा-से ही क्षत्रिय अखण्ड पृथिवीकी रक्षा कर सकता है ।॥४९॥
In this manner, by avoiding conduct that brings no true benefit to the soul, one may safeguard one’s discernment; and through the preservation of right discernment alone can a Kṣatriya uphold and protect the indivisible dominion of the earth.49
श्लोक ( Shlok ) 50
उक्तस्यैवार्थतत्त्वस्य भूयोऽप्याविश्चिकीर्षया । निदर्शनानि त्रीण्यत्र वक्ष्यामस्तान्यनुक्रमात् ॥५०।।
ऊपर जो पदार्थका स्वरूप कहा है उसीको फिर भी प्रकट करनेकी इच्छासे यहांपर क्रमानुसार तीन उदाहरण कहते हैं ।॥५०॥
That very nature of reality which has been previously expounded shall now be further illumined through three illustrative examples, presented here in due sequence for the sake of clearer understanding.50
श्लोक ( Shlok ) 51
व्यक्तये पुरुषार्थस्य स्यात् पुरुषनिदर्शनम् । तथा निगलदृष्टान्तः स संसारिनिदर्शनः ॥५१॥
अपना पुरुषार्थ प्रकट करने के लिये पहला पुरुषका दृष्टान्त है, दूसरा निगल अर्थात् बेड़ीका दृष्टान्त है और तीसरा संसारी जीवोंका दृष्टान्त है ।।५१।।
To reveal the nature of one’s own spiritual effort, three examples are now presented: the first is the parable of the man; the second, of the shackle or chain; and the third, that of the worldly, transmigrating soul.51
श्लोक 52 से 62
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 |
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