आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 |
श्लोक 232 से 244 समवसरण और विहार का वैभव
तीर्थंकररूपी सूर्य भव्य जीवों का अनुग्रह करने को तैयार हुए। वे छत्रत्रय, चमर, और मधुर दिव्यध्वनि से सुशोभित हैं। करोड़ों सूर्यों से स्पर्धा करने वाला भामंडल और पुष्पवर्षा उनकी शोभा बढ़ाते हैं। मेरु शिखर जैसे सिंहासन, अशोकवृक्ष, और मानस्तंभ उनके समवसरण को अलंकृत करते हैं। स्वच्छ जल की परिखा, गोपुरद्वार, और कल्पवृक्ष उनकी महिमा दर्शाते हैं। किन्नरदेव यश गाते हैं, और गंधकुटी दिशाओं को सुगंधित करती है। वे तीनों लोकों के स्वामी और विहार के लिए उद्यत हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 232 to 244
श्लोक ( Shlok ) 232
अथ त्रिभुवनक्षोभः तीर्थकृत् पुण्यसारथिः । भव्याब्जानुग्रहं कर्तुमुत्तस्थे जिनभानुमान् ।।२३२॥
अथानंतर―जो तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न करने वाले हैं और तीर्थंकर नामक पुण्य प्रकृति ही जिनका सारथि―सहायक है ऐसे जिनेंद्रदेवरूपी सूर्य भव्य जीवरूपी कमलों का अनुग्रह करने के लिए तैयार हुए ।।232।।
After this, the Jinedradeva, who is like the sun and whose charioteer is the virtuous disposition called “Tirthankara” (the auspicious nature that guides him), became ready to bestow grace upon the lotus-like pious souls, who are like blooming lotuses in the three worlds.
Meaning:
Jinedradeva, like the radiant sun, prepared to shower his blessings upon the virtuous beings of the three worlds, who resemble blooming lotuses nurtured by his spiritual light.232
श्लोक ( Shlok ) 233 – 244
मोक्षाधिरोहनिःश्रेणीभूतच्छत्रत्रयोद् धुरः । यशःक्षीरोदफेनाभसितचामरवीजिता ॥ २३३॥
ध्वनन्मधुरगम्भीरधीरदिव्यमहाध्वनिः । भानु कोटिप्रतिस्पर्धिप्रभावलयभास्वरः ॥ २३४।।
मरुत्प्रहत गम्भीरदंध्वनद्दुन्दुभिः प्रभुः । सुरोत्करकरोन्मुक्तपुष्पवर्षार्चितक्रमः ।॥२३५।।
मेरुशृङ्गसमुत्तुङ्ग सिंह विष्टरनायकः । सच्छायसफलाशोकप्रकटीकृतचेष्टितः ॥२३६॥
धूलिसालवृतास्थान जगतीपरिमण्डलः । मानस्तम्भनिरुद्वान्यकुदृष्टिमदविभ्रमः ॥२३७॥
स्वच्छाम्भःखातिकाभ्यर्ण व्रततीवनवेष्टिताम् । सभाभूमिमलं कुर्वन्नपूर्वविभवोदयाम् ॥२३८॥
समग्रगोपुरोदग्रैः प्राकारवलयैस्त्रिभिः । परार्ध्य रचनोपेतैराविष्कृतमहोदयः ॥ २३९॥
अशोका दिवनश्रेणीकृतच्छायसभावनिः । स्रग्वस्त्रादिध्वजोल्लास समाहूतजगज्जनः ॥२४०।।
कल्पद्रुमवनच्छायाविश्रान्तामरपूजितः । प्रासादरुद्धभूमिष्ठकिन्नरोद्गीतसद्यशाः ॥२४१॥
ज्वलन्महोदयस्तूपप्रकटीकृतवैभवः । नाट्यशालाद्वयेद्धर्द्धिसंवर्धित जनोत्सवः ॥२४२॥
धूपामोदित दिग्भागमहागन्धकुटीश्वरः । त्रिविष्टपं पतिप्राज्यपूजार्हः परमेश्वरः ॥२४३॥
त्रिजगवल्लभः श्रीमान् भगवानादिपुरुषः । प्रचक्रे विजयोद्योगं धर्मचक्राधिनायकः ।।२४४।।
जो मोक्षरूपी महल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों के समान छत्रत्रय से सुशोभित हो रहे हैं, जिन पर क्षीरसमुद्र के फेन के समान सुशोभित चमर ढोले जा रहे हैं, मधुर, गंभीर, धीर तथा दिव्य महाध्वनि से जिनका शरीर शब्दायमान हो रहा है, जो करोड़ सूर्यों से स्पर्धा करने वाले भामंडल से दैदीप्यमान हो रहे हैं, जिनके समीप ही देवताओं के द्वारा बजाये हुए दुंदुभि गंभीर शब्द कर रहे हैं, जो स्वामी हैं, देवसमूह के हाथों से छोड़ी हुई पुष्पवर्षा से जिनके चरण-कमलों की पूजा हो रही है, जो मेरु पर्वत के शिखर के समान अतिशय ऊँचे सिंहासन के स्वामी हैं, छाया और फलसहित अशोकवृक्ष से जिनकी शांत चेष्टाएँ प्रकट हो रही हैं, जिनके समवसरण की पृथ्वी का घेरा धूलीसाल नामक कोट से घिरा हुआ है, जिन्होंने मानस्तंभों के द्वारा अन्य मिथ्यादृष्टियों के अहंकार तथा संदेह को नष्ट कर दिया है, जो स्वच्छ जल से भरी हुई परिखा के समीपवर्ती लतावनों से घिरी हुई और अपूर्व वैभव से संपन्न सभाभूमि को अलंकृत कर रहे हैं, समस्त गोपुरद्वारों से उन्नत और उत्कृष्ट रचना से सहित तीन कोटों से जिनका बड़ा भारी माहात्म्य प्रकट हो रहा है, जिनकी सभाभूमि में अशोकादि वनसमूह से सघन छाया हो रही है, जो माला वस्त्र आदि से चिह्नित ध्वजाओं की फड़कन से जगत् के समस्त जीवों को बुलाते हुए से जान पड़ते हैं, कल्पवृक्षों के वन की छाया में विश्राम करने वाले देव लोग सदा जिनकी पूजा किया करते हैं, बड़े-बड़े महलों से घिरी हुई भूमि में स्थित किन्नरदेव जोर-जोर से जिनका यश गा रहे हैं, प्रकाशमान और बड़ी भारी विभूति को धारण करने वाले स्तूपों से जिनका वैभव प्रकट हो रहा है, दोनों नाट्यशालाओं की बढ़ी हुई ऋद्धियों से जो मनुष्यों का उत्सव बढ़ा रहे हैं, जो धूप की सुगंधि से दशों दिशाओं को सुगंधित करने वाली बड़ी भारी गंधकुटी के स्वामी है, जो इंद्रों के द्वारा की हुई बड़ी भारी पूजा के योग्य हैं, तीनों जगत् के स्वामी हैं और अर्थ के अधिपति हैं, ऐसे श्रीमान् आदिपुरुष भगवान् वृषभदेव ने विजय करने का उद्योग किया―विहार करना प्रारंभ किया ।।233-244।।
The illustrious Adi-Purush, Lord Rishabhadeva, adorned by the threefold umbrella (Chatratraya) that serves as steps leading to the grand palace of liberation, commenced his journey of conquest—his spiritual wanderings.
He is shaded by the chhatras, with fans swaying like the froth of the ocean of milk. His body resonates with sweet, profound, steady, and divine sounds. Radiating with a brilliance that rivals millions of suns, he sits upon a throne as lofty as the peak of Mount Meru.
Surrounded by the sounds of drums played by the gods and showered with flowers at his lotus feet by divine beings, he reigns supreme. Under the Ashoka tree, with its shade and fruits, his serene nature is manifest.
The earth of his Samavasarana (divine assembly) is encircled by the Dhooleesaala enclosure, adorned with pillars of honor (Maanastambhas) that eliminate the arrogance and doubt of false believers. His magnificent assembly grounds are embellished with luscious vine gardens near clear, water-filled moats.
His grandeur is further proclaimed by the towering, splendid gateways and the three enclosures with their grand architecture. The assembly grounds are thickly shaded by forests of Ashoka trees and other divine groves, as if inviting all beings of the world with the fluttering of flags marked with garlands and cloth.
The divine beings, resting in the shade of the Kalpavriksha (wish-fulfilling trees), constantly worship him. His glory is sung aloud by the Kinnaras (celestial beings) dwelling on lands surrounded by magnificent palaces.
The grandeur of his Stupas, gleaming with immense power, shines forth. The prosperity of the two Natya Shalas (dance halls) enhances the celebration of humans. The grand Gandhakuti (fragrance hall), spreading the scent of incense throughout all ten directions, belongs to him.
He is worthy of the highest worship by Indras (celestial kings), the Lord of all three worlds, and the Master of all wealth.
Such a supreme Lord Rishabhadeva, adorned with immeasurable glory, began his divine journey.233-244
श्लोक 245 से 261
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 |