आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 भरत का गृहस्थ धर्म
आश्रित राजा भरत के धर्माचरण का अनुसरण करते थे। चक्रवर्ती भरत अर्थ और काम की सफलता के बाद भी धर्म में एकाग्र रहते थे। गृहस्थ धर्म के चार प्रकार—दान, पूजा, शील, और उपवास—का पालन करते थे। वे मुनियों को विशुद्ध आहार, औषधि, और अभय दान देते थे। जिनेंद्रदेव की पूजा से पूज्यपना प्राप्त होता है, यह मानकर वे भक्ति से संतुष्ट रहते थे। जिनविम्ब और मंदिरों की रचना कर कल्पवृक्ष यज्ञ किया। शील की रक्षा आत्मा की रक्षा करती है। वे व्रतों का पालन कर गृहस्थों में मुख्य थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
भरतोऽभिरतो’ धर्मे वयं तदनुजीविनः । इति तद्वत्तमन्वीयुर्मौलिबद्धा महोक्षितः ॥१०२॥
‘भरत धर्ममें तत्पर है और हम लोग उसके सेवक हैं’ यही समझकर मुकुटबद्ध राजा उनके आचरणका अनुसरण करते थे। भावार्थ अपने राजाको धर्मात्मा जानकर आश्रित राजा भी धर्मात्मा बन गये थे ।। १०२ ।।
“Bharata is steadfast in Dharma, and we are but his vassals”—so thinking, the crowned kings under his dominion modeled their conduct upon his. In essence, knowing their sovereign to be righteous, the dependent rulers too became devoted to righteousness. 102
श्लोक ( Shlok ) 103
सोऽयं साधित कामार्थश्चक्री चकानभावतः । चरितार्थद्वये तस्मिन् भेजे धर्मकतानताम् ॥१०३॥
चक्रके प्रभावसे अर्थ और काम दोनों ही जिनके स्वाधीन हो रहे हैं ऐसे चक्रवर्ती भरत अर्थ और कामकी सफलता होनेपर केवल धर्ममें ही एकाग्रता को प्राप्त हो रहे थे ॥ १०३॥
By the sway of his imperial wheel, Bharata, master of both wealth and desire, having attained success in these realms, yet remained steadfastly devoted to unwavering concentration upon Dharma alone.103
श्लोक ( Shlok ) 104
दानं पूजां च शीलं च दिने पर्वण्युपोषितम्। धर्मश्चतुर्विधः सोऽयमम्नातो गृहमेधिनाम् ॥१०४॥
दान देना, पूजा करना, शील पालन करना और पर्वके दिन उपवास करना यह गृहस्थोंका चार प्रकारका धर्म माना गया है ।।
Giving charity, performing worship, upholding virtuous conduct, and fasting on festive days—these four have been esteemed as the cardinal duties of householders.104
श्लोक ( Shlok ) 105
ददौ दानमसौ सद्भ्यो मुनिभ्यो विहितादरम्। समेतो नवभिः पुण्यैः गुणैः सप्तभिरन्वितः ॥१०५॥
नव प्रकारके पुण्य और सात गुणोंसे सहित भरत उत्तम मुनियोंके लिये बड़े आदरके साथ दान देते थे
Bharata, endowed with ninefold merits and seven virtues, bestowed gifts upon the noble sages with utmost reverence and honor.105
श्लोक ( Shlok ) 106
सोऽदाद् विशुद्धमाहारं यथायोगं च भेषजम् । प्राणिभ्योऽभयदानं च दानस्यैतावती गतिः ॥१०६॥
वे विशुद्ध आहार, योग्यतानुसार औषधि और समस्त प्राणियोंके लिये अभय दान देते थे सो ठीक ही है क्योंकि दानकी यही तीन गति हैं ।॥१०६।।
They bestowed pure sustenance, medicines according to need, and the gift of safety to all living beings; for truly, these are the three noble forms of charity.106
श्लोक ( Shlok ) 107
जिनेषु भक्तिमातन्वत् तत्पूजायां धृतिं दधौ। पूज्यानां पूजनाल्लोके पूज्यत्वमिति भावयन् ॥१०७।।
संसारमें पूज्य पुरुषोंकी पूजा करनेसे पूज्यपना स्वयं प्राप्त हो जाता है ऐसा विचार करते हुए महाराज भरत जिनेन्द्रदेवमें अपनी भक्ति बढ़ाते हुए उनकी पूजा करनेमें बहुत ही संतोष धारण करते थे ॥ १०७।।
Contemplating that by venerating the venerable one, one attains venerability itself, King Bharata deepened his devotion to Lord Jina and found profound contentment in his worship.107
श्लोक ( Shlok ) 108
चेत्यचैत्यालयादीनां निर्मापणपुरस्सरम्। स चक्र परमामिज्यां कल्पवृक्षपृथुप्रथाम् ॥१०८॥
उन्होंने अनेक जिनविम्ब और जिनमन्दिरोंकी रचना कराकर कल्पवृक्ष नामका बहुत बड़ा यज्ञ (पूजन) किया था ।।१०८।।
He commissioned the creation of numerous Jina images and magnificent temples, and performed a grand sacrificial ceremony known as the Kalpavṛksha Yajña.108
श्लोक ( Shlok ) 109
शीलानु पालने यत्नो मनस्यस्य विभोरभूत् । शीलं हि रक्षितं यत्नाद् आत्मानमनुरक्षति ॥१०९।।
उनके मनमें शीलकी रक्षा करनेका प्रयत्न सदा विद्यमान रहता था सो ठीक ही है क्योंकि प्रयत्नपूर्वक रक्षा किया हुआ शील आत्माकी रक्षा करता है ।।१०९।।
In his heart ever dwelled the resolve to guard virtue, for rightly so—diligent preservation of conduct is the true safeguard of the soul.109
श्लोक ( Shlok ) 110
व्रतानुपालनं शीलवतान्युक्तान्यगारिणाम् । स्थूलहिंसाविरत्यादिलक्षणानि च लक्षणै ॥११०॥
व्रतों-का पालन करना शील कहलाता है और स्थूलहिंसाका त्याग करना (अहिंसाणु व्रत) आदि जो गृहस्थोंके व्रत हैं वे लक्षणोंके साथ पहले कहे जा चुके हैं ।। ११०।।
The observance of vows is termed conduct (śīla), and those vows prescribed for householders—such as the renunciation of gross violence (ahiṁsāṇuvrata)—have already been expounded earlier along with their defining attributes.110
श्लोक ( Shlok ) 111
‘सभावनानि तान्येष यथायोगं प्रपालयन् । प्रजानां पालकः सोऽभूद् धौरेयो गृहमेधिनाम् ॥१११॥
उन व्रतोंको भावनाओं सहित यथायोग्य रीतिसे पालन करते हुए प्रजापालक महाराज भरत गृहस्थोंमें मुख्य गिने जाते थे ॥१११।।
By observing those vows with due reverence and inner resolve, King Bharata—the protector of his people—was regarded as foremost among householders.111
श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
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