आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 |श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21
श्लोक 22 से 31 भगवान के मुख की शोभा और वचनों की महिमा
भगवान का मुख शरद् चंद्रमा की तरह कांतिमय है और वीतरागता को प्रकट करता है। उनकी पवित्र कांति अंधकार को नष्ट करती है और सरस्वती की तरह सुशोभित है। देवों की नेत्र-पंक्ति उनके मुखरूपी कमल पर भ्रमरों की तरह प्रतीत होती है। उनके वचनरूपी मकरंद से भव्य जीव आनंदित होते हैं। एक दिशा में मुख होने पर भी वे सर्वदर्शी प्रतीत होते हैं। उनके वचनरूपी किरणें अंधकार नष्ट करती हैं और अमृत की तरह जीवों को अमर बनाती हैं। उनका मुख धर्म का खजाना है और वचन सभा को आनंदित करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
तवेदमाननं धत्ते प्रफुल्लकमलश्रियम् । स्वकान्तिज्योत्स्नया विश्वमाक्रामच्छरबिन्दुवत् ॥ २२॥
हे भगवन्, शरद् ऋतु के चंद्रमा के समान अपनी कांतिरूपी चाँदनी से समस्त जगत् को व्याप्त करता हुआ आपका यह मुख फूले हुए कमल की शोभा धारण कर रहा है ।।22।।
O Lord, Your face, radiant like the autumn moon, envelops the entire world with its soothing moonlight and possesses the beauty of a blossoming lotus. — 22.
श्लोक ( Shlok ) 23
अनट्टहास हुंकारमदष्टोष्ठपुटं मुखम् । जिना ख्याति सुमेधोभ्यस्तावकी वीतरागताम् ॥२३॥
हे जिन, आपका मुख न तो अट्टहास से सहित है, न हुंकार से युक्त है और न ओठों को ही दबाये है इसलिए वह बुद्धिमान लोगों को आपकी वीतरागता प्रकट कर रहा है ।।23।।
O Jina, Your face is neither marked by loud laughter, nor by roaring sounds, nor by clenched lips. Thus, it reveals to the wise Your state of perfect detachment (Vitaragata). — 23.
श्लोक ( Shlok ) 24
त्वन्मुखादुद्यती दीप्तिः पावनीव सरस्वती। विथुन्वती तमो भति जितबालातपद्युतिः ॥२४॥
हे देव, जो अंधकार को नष्ट कर रही है और जिसने प्रातःकाल के सूर्य की प्रभा को जीत लिया है ऐसी आपकी मुख से निकलती हुई पवित्र कांति सरस्वती के समान सुशोभित हो रही है ।।24।।
O Lord, the sacred radiance emanating from Your face, which dispels darkness and surpasses the brilliance of the morning sun, shines resplendently like Goddess Saraswati. — 24.
श्लोक ( Shlok ) 25
त्वन्मुखाम्बुरुहालग्ना सुराणां नयनावलिः । भातीयमलिमालेव तदामोदानुपातिनी ॥ २५॥
हे भगवन्, आपके मुखरूपी कमल पर लगी हुई यह देवों के नेत्रों की पंक्ति ऐसी जान पड़ती है मानो उसकी सुगंधि के कारण चारों ओर से झपटती हुई भ्रमरों की पंक्ति ही हो ।।25।।
O Lord, the rows of divine eyes fixed upon Your lotus-like face appear as if they are swarms of bees rushing from all directions, drawn by its enchanting fragrance. — 25.
श्लोक ( Shlok ) 26
मकरन्द्रमिवापीय त्वद्वक्त्राव्जोद्गतं वचः । अनाशितंभवं भव्यभ्रमरा यान्त्यमी मुदम् ॥२६॥
हे नाथ, जिनसे कभी तृप्ति न हो ऐसे आपके मुखरूपी कमल से निकले हुए आपके वचनरूपी मकरंद का पान कर ये भव्य जीवरूपी भ्रमर आनंद को प्राप्त हो रहे हैं ।।26।।
O Lord, the noble souls, like bees, derive bliss by drinking the nectar of Your words, which flow from Your lotus-like face and are never exhausting in their sweetness. — 26.
श्लोक ( Shlok ) 27
एकत्तोऽभिमुखोऽपि त्वं लक्ष्यसे विश्वतोमुखः । तेजोगुणस्य माहात्म्यमिदं नूनं तवाद्भुतम् ॥२७॥
हे भगवन्, यद्यपि आप एक ओर मुख किये हुए विराजमान हैं तथापि ऐसे दिखाई देते हैं जैसे आपके मुख चारों ओर हों । हे देव, निश्चय ही यह आपके तपश्चरणरूपी गुण का आश्चर्य करनेवाला माहात्म्य है ।।27।।
O Lord, though You are seated facing only one direction, You appear as if You have faces in all directions. Indeed, this is the marvelous glory of Your virtue of asceticism. — 27.
श्लोक ( Shlok ) 28
विश्वदिक्षु विसर्पन्ति तावका वागभीषवः । तिरश्चामपि हृद्ध्वान्तमुद्धन्वन्तो जिनांशुमान् ॥२८॥
हे जिनेंद्ररूपी सूर्य, तिर्यंचों के भी हृदयगत अंधकार को नष्ट करने वाली आपकी वचनरूपी किरणें सब दिशाओं में फैल रही हैं ।।28।।
O Sun-like Jinendra, Your words, like radiant rays, spread in all directions, dispelling the darkness residing even in the hearts of lower beings. — 28.
श्लोक ( Shlok ) 29
तब वागमृतं पीत्वा वयमद्यामराः स्फुटम् । पीयूषमिदमिष्टं नो देव सर्वरुजाहरम् ॥२९॥
हे देव, आपके वचनरूपी अमृत को पीकर आज हम लोग वास्तव में अमर हो गये हैं इसलिए सब रोगों को हरने वाला आपका यह वचनरूप अमृत हम लोगों को बहुत ही इष्ट है―प्रिय है ।।29।।
O Lord, by drinking the nectar of Your words, we have truly become immortal today. Therefore, this nectar-like speech of Yours, which cures all ailments, is most beloved to us. — 29.
श्लोक ( Shlok ) 30
जिनेन्द्र तव वक्त्राब्जं प्रक्षरद्वचनामृतम् । भव्यानां प्रीणनं भाति धर्मस्येव निधानकम् ॥३०॥
हे जिनेंद्रदेव, जिससे वचनहारी अमृत झर रहा है और जो भव्य जीवों का जीवन है ऐसा यह आपका मुखरूपी कमल धर्म के खजाने के समान सुशोभित हो रहा है ।।30।।
O Jinendra Deva, Your lotus-like face, from which the nectar of words flows and which serves as the very life of noble souls, shines like a treasure of Dharma. —30.
श्लोक ( Shlok ) 31
मुखेन्दुमण्डलाद्देव तब वाक्किरणा इमे । विनिर्यान्तो हतध्वान्ताः सभामाह्लादयन्त्यलम् ॥३१॥
हे देव, आपके मुखरूपी चंद्रमंडल से निकलती हुई ये वचनरूपी किरणें अंधकार को नष्ट करती हुई सभा को अत्यंत आनंदित कर रही हैं ।।31।।
O Lord, the rays of speech emanating from Your moon-like face dispel darkness and bring immense joy to the entire assembly.—31.
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21