आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 अग्नियों की स्थापना और पूजा
क्रियाओं के प्रारंभ में उत्तम द्विजों को रत्नत्रय का संकल्प कर अग्निकुमार देवों के इंद्र के मुकुट से उत्पन्न तीन प्रकार की अग्नियाँ (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि) स्थापित करनी चाहिए। ये अग्नियाँ तीर्थंकर, गणधर, और सामान्य केवली के निर्वाण महोत्सव में पूजा का अंग होकर पवित्र मानी जाती हैं। इन्हें तीन कुंडों में स्थापित कर मंत्रों द्वारा पूजा करनी चाहिए। पूजा करने वाला द्विजोत्तम और नित्य पूजा करने वाला अग्निहोत्री कहलाता है। गार्हपत्य से नैवेद्य, आहवनीय से धूप, और दक्षिणाग्नि से दीप जलाया जाता है। इन अग्नियों की रक्षा करनी चाहिए और असंस्कृत व्यक्तियों को नहीं देनी चाहिए। अग्नि स्वयं पवित्र नहीं, परंतु अरहंतदेव की पूजा के संबंध से पवित्र हो जाती है। जैन ब्राह्मणों को व्यवहार नय से अग्नि पूजा करनी चाहिए, जो निर्वाण क्षेत्र की पूजा के समान दोषरहित है। सामान्य मंत्रों के बाद विशेष क्रियाओं के मंत्रों का वर्णन किया गया है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
त्रयोऽग्नयः प्रणेयाः स्युः कर्मारम्भे द्विजोत्तमैः । रत्नत्रितयसङकल्पादग्नीन्द्रमुकुटोद्भवाः ॥ ८२॥
क्रियाओंके प्रारम्भमें उत्तम द्विजोंको रत्नत्रयका संकल्प कर अग्निकुमार देवों के इन्द्रके मुकुटसे उत्पन्न हुई तीन प्रकारकी अग्नियाँ प्राप्त करनी चाहिये ॥८२॥
“At the commencement of the sacred rites, the noble twice-born should undertake the vow of the Three Jewels and acquire the threefold fires that have arisen from the diadem of the lord of the Agnikumāra deities.” ॥82॥
श्लोक ( Shlok ) 83
तीर्थकृद्गणभृच्छे षकेवल्यन्त महोत्सवे । पूजाङ्गत्वं समासाद्य पवित्रत्वमुपागताः ॥८३॥
ये तीनों ही अग्नियाँ तीर्थङ्कर, गणधर और सामान्य केवली के अन्तिम अर्थात् निर्वाणमहोत्सवमें पूजाका अंग होकर अत्यन्त पवित्रताको प्राप्त हुई मानी जाती हैं ।॥८३॥
“These three sacred fires are regarded as supremely sanctified, for they form an integral part of the worship performed during the final celebration—the Nirvāṇa Mahotsava—of the Tīrthaṅkara, the Gaṇadhara, and the ordinary Kevalī.” ॥83॥
श्लोक ( Shlok ) 84
कुण्डत्रये प्रणेतव्यास्त्रय एते महाग्नयः । गार्हपत्याहवनीयदक्षिणाग्निप्रसिद्धयः ॥८४॥
गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि नामसे प्रसिद्ध इन तीनों महाअग्नियोंको तीन कुण्डों में स्थापित करना चाहिये ।।८४।।
“These three great fires—renowned as Gārhapatya, Āhavanīya, and Dakṣiṇāgni—should be duly established in three distinct sacrificial pits.” ॥84॥
श्लोक ( Shlok ) 85
अस्मिन्नग्नित्रये पूजां मन्त्रैः कुर्वन् द्विजोत्तमः । आहिताग्निरिति ज्ञेयो नित्येच्या यस्य सद्मनि ॥८५॥
इन तीनों प्रकारकी अग्नियोंमें मंत्रोंके द्वारा पूजा करनेवाला पुरुष द्विजोत्तम कहलाता है और जिसके घर इस प्रकारकी पूजा नित्य होती रहती है वह आहिताग्नि अथवा अग्निहोत्री कहलाता है ॥८५॥
“He who performs worship with sacred mantras in these three kinds of fires is hailed as a foremost twice-born; and he in whose household such worship is performed daily is known as an Āhitagni or Agnihotrī.” ॥85॥
श्लोक ( Shlok ) 86
हविष्पाके च धूपे च दीपोद्बोधनसंविधौ । वह्नीनां विनियोगः स्यादमीषां नित्यपूजने ॥८६॥
नित्य पूजन करते समय इन तीनों प्रकारकी अग्नियोंका विनियोग नैवेद्यके पकानेमें, धूपखेनेमें और दीपक जलानेमें होता है अर्थात् गार्हपत्य अग्निसे नैवेद्य पकाया जाता है, आहवनीय अग्निमें धूप खेई जाती है और दक्षिणाग्निसे दीपक जलाया जाता है ।। ८६ ।।
“In the course of daily worship, these three kinds of sacred fires are employed respectively for the preparation of offerings, the burning of incense, and the lighting of lamps—Gārhapatya fire is used to cook the naivedya (sacred food), Āhavanīya fire to offer incense, and Dakṣiṇāgni to kindle the lamp.” ॥86॥
श्लोक ( Shlok ) 87
प्रयत्नेनाभिरक्ष्यं स्यादि दमग्नित्रयं गृहे। नंव दातव्यमन्येभ्यस्तेऽन्ये ये स्युरसंस्कृताः ॥८७॥
घरमें बड़े प्रयत्नके साथ इन तीनों अग्नियोंकी रक्षा करनी चाहिये और जिनका कोई संस्कार नहीं हुआ है ऐसे अन्य लोगोंको कभी नहीं देनी चाहिये ।। ८७ ।।
“Within the household, these three sacred fires must be preserved with utmost care and devotion, and they should never be entrusted to others who have not undergone the requisite rites of consecration.” ॥87॥
श्लोक ( Shlok ) 88
न स्वतोऽग्नेः पवित्रत्वं देवतारूपमेव वा । किन्त्वर्हद्दिव्यमूर्तीज्यासम्बन्धात् पावनोऽनलः ॥ ८८ ॥
अग्निमें स्वयं पवित्रता नहीं है और न वह देवतारूप ही है किन्तु अरहन्तदेवकी दिव्य मूर्ति की पूजाके सम्बन्धसे वह अग्नि पवित्र हो जाती है ॥८८॥
“Fire, in itself, possesses neither sanctity nor divinity; yet, through its association with the worship of the divine image of the Arhant Lord, it becomes hallowed and sacred.” ॥88॥
श्लोक ( Shlok ) 89
ततः पूजाङ्गतामस्य मत्वार्चन्ति द्विजोत्तमाः । निर्वाणक्षेत्रपूजावत्तत्पूजाऽतो न दुष्यति ॥८९॥
इसलिये ही द्विजोत्तम लोग इसे पूजाका अंग मानकर इसकी पूजा करते हैं अतएव निर्वाणक्षेत्रकी पूजाके समान अग्निकी पूजा करनेमें कोई दोष नहीं है। भावार्थ-जिस प्रकार जिनेन्द्रदेवके सम्बन्धसे क्षेत्र भी पूज्य हो जाते हैं उसी प्रकार उनके सम्बन्धसे अग्नि भी पूज्य हो जाती है अतएव जिस प्रकार निर्वाण आदि क्षेत्रोंकी पूजा करनेमें दोष नहीं है उसी प्रकार अग्निकी पूजा करने में भी कोई दोष नहीं है ।॥८९॥
“Therefore, the noble twice-born regard fire as an essential element of worship and venerate it accordingly. Just as there is no fault in venerating the sacred sites of Nirvāṇa, so too is there no blemish in the worship of fire.For, just as regions become sanctified through their association with the Jina, even so does fire become worthy of reverence through its relation to Him.” ॥89॥
श्लोक ( Shlok ) 90
व्यवहारनयापेक्षा तस्येष्टा पूज्यता द्विजै । जैनैरध्यवहार्यो ऽयं नयोऽद्यत्वेऽग्रजन्मनः ॥९०॥
ब्राह्मणोंको व्यवहार नयकी अपेक्षा ही अग्निकी पूज्यता इष्ट है इसलिये जैन ब्राह्मणों को भी आज यह व्यवहारनय उपयोगमें लाना चाहिये ।॥९०॥
“For Brāhmaṇas, the reverence for fire is upheld from the standpoint of practical convention (vyavahāra-naya); therefore, even Jaina Brāhmaṇas ought to adopt this conventional perspective in their observance today.” ॥90॥
श्लोक ( Shlok ) 91
साधारणास्त्विमे मन्त्राः सर्वत्रैव क्रियाविधौ । यथा सम्भवमुन्नेष्ये विशेषविषयाश्च तान् ॥९१॥
ये ऊपर कहे हुए मन्त्र साधारण मन्त्र हैं, सभी क्रियाओंमें काम आते हैं अब विशेष क्रियाओंसे सम्बन्ध रखनेवाले विशेष मन्त्रोंको यथासम्भव कहता हूँ ।।९१॥
“The mantras mentioned above are general in nature and are employed in all rites; now, to the extent possible, I shall set forth the specific mantras associated with particular sacred acts.” ॥91॥
श्लोक 92 से 101
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
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आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81
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