आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 व्रतावतरण और विवाह क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 16 से 17)
व्रतावतरण क्रिया 12-16 वर्ष बाद गुरु की साक्षी में जिन पूजा के साथ होती है। द्विजों का सत्कार कर वस्त्र, आभूषण ग्रहण किए जाते हैं। क्षत्रिय शस्त्र धारण कर सकता है। ब्रह्मव्रत का त्याग होता है, पर काम त्याग बना रहता है। विवाह क्रिया में उत्तम कुल की कन्या से गुरु की आज्ञा से विवाह होता है। सिद्ध भगवान और तीन अग्नियों की पूजा के बाद विवाहोत्सव होता है। वधू-वर अग्नि की प्रदक्षिणा देकर बैठते हैं और सात दिन तक ब्रह्मचर्य पालते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
मधुमांसपरित्यागः पञ्चोदुम्बरवर्जनम् । हिंसादिविरतिश्चास्य व्रतं स्यात् सार्वकालिकम् ॥१२२॥
इस क्रियाके बाद उसके मधुत्याग, मांसत्याग, पांच उदुम्बर फलोंका त्याग और हिंसा आदि पांच स्थूल पापोंका त्याग, ये सदा काल अर्थात् जीवन पर्यन्त रहनेवाले व्रत रह जाते हैं ।। १२२।।
After this rite, the vows of abstaining from honey and meat, the renunciation of the five Udumbara fruits, and the rejection of the five great sins of violence and the like remain ever steadfast—that is, these vows endure throughout one’s entire life. ॥122॥
श्लोक ( Shlok ) 123
व्रतावतरणं चेदं गुरुसाक्षिकृतार्चनम्। वत्सराद् द्वादशादूर्ध्वमथवा षोडशात् परम् ॥१२३॥
यह व्रतावतरण क्रिया गुरुकी साक्षीपूर्वक जिनेन्द्र भगवान्की पूजा कर बारह अथवा सोलह वर्ष बाद करनी चाहिये ।। १२३ ।।
The Vratāvataraṇa rite, performed before the Guru as witness and with worship of Jinendra Bhagavān, should be observed after twelve or sixteen years have passed. ॥123॥
श्लोक ( Shlok ) 124
कृतद्विजार्चनस्यास्य व्रतावतरणोचितम् । वस्त्राभरणमाल्यादिग्रहणं गुर्वनुज्ञया ॥१२४॥
पहले द्विजोंका सत्कार कर फिर व्रतावतरण करना उचित है और व्रतावतरण के बाद गुरुकी आज्ञासे वस्त्र, आभूषण और माला आदिका ग्रहण करना उचित है ।। १२४।।
First, it is proper to honor the twice-born (Dvija), and thereafter perform the Vratāvataraṇa ceremony. Following the rite, it is fitting—by the Guru’s command—to receive garments, ornaments, and a garland. ॥124॥
श्लोक ( Shlok ) 125
शस्त्रोपजीविवर्ग्यश्चेद् धारयेच्छस्त्रमप्यदः । स्ववृत्तिपरिरक्षार्थ शोभार्थं चास्य तद्ग्रहः ॥१२५।
इसके बाद यदि वह शस्त्रोपजीवी अर्थात् क्षत्रिय वर्गका है तो वह अपनी आजीविकाकी रक्षा के लिये शस्त्र भी धारण कर सकता है अथवा केवल शोभा-के लिये भी शस्त्र ग्रहण किया जा सकता है ।। १२५।।
Thereafter, if he belongs to the warrior class (Kṣatriya), he may bear arms to defend his livelihood, or he may accept weapons solely for ceremonial honor and display. ॥125॥
श्लोक ( Shlok ) 126
भोगब्रह्मव्रतादेवमवतीर्णो भवेत्तदा । कामब्रह्मवतं त्वस्य तावद्यावत्क्रियोत्तरा ॥१२६॥ इति व्रतावतरणम् ।
इस प्रकार इस क्रियामें यद्यपि वह भोगोप-भोगोंके ब्रह्मव्रतका अर्थात् ताम्बूल आदिके त्यागका अवतरण (परित्याग) कर देता है तथापि जब तक उसके आगेकी क्रिया नहीं होती तब तक वह काम परित्यागरूप ब्रह्मव्रतका पालन करता रहता है ।। १२६।। यह सोलहवीं व्रतावतरण क्रिया है।
Thus, in this rite, although he renounces the Brahmavratas related to indulgences—such as the abandonment of betel and similar pleasures—yet until the subsequent rites are performed, he continues to observe the Brahmavratas as vows of complete renunciation.This is the sixteenth rite, known as Vratāvataraṇa. ॥126॥
श्लोक ( Shlok ) 127
ततोऽस्य ‘गुर्वनुज्ञानादिष्टा वैवाहिकी क्रिया । वैवाहिके कुले कन्यामुचितां परिणेष्यतः ॥१२७॥
तदनन्तर विवाहके योग्य कुलमें उत्पन्न हुई कन्याके साथ जो विवाह करना चाहता है ऐसे उस पुरुषकी गुरुकी आज्ञासे वैवाहिकी क्रिया की जाती है ॥ १२७॥
Thereafter, when a man desires to wed a maiden born in a suitable lineage, the nuptial rites are performed according to the command of his Guru. ॥127॥
श्लोक ( Shlok ) 128
सिद्धार्चनविर्वाध सम्यक् निर्वर्त्य द्विजसत्तमाः । कृताग्नित्रयसम्पूजाः कुर्युस्तत्साक्षितां क्रियाम् ॥१२८॥
उत्तम द्विजोंको चाहिये कि वे सबसे पहले अच्छी तरह सिद्ध भगवान्की पूजा करें और फिर तीनों अग्नियोंकी पूजा कर उनकी साक्षीपूर्वक उस वैवाहिकी (विवाह सम्बन्धी) क्रियाको करें ॥ १२८॥
The noble twice-born (Dvijas) should first perform devout worship of the Siddha Bhagavān, and then reverently honor the three sacred fires (Agnis), conducting the nuptial rites in their solemn presence as witnesses. ॥128॥
श्लोक ( Shlok ) 129
पुण्याश्रमे क्वचित् सिद्धप्रतिमाभिमुखं तयोः । दम्पत्योः परया भूत्या. कार्यः पाणिग्रहोत्सवः ॥१२९॥
किसी पवित्र स्थानमें बड़ी विभूतिके साथ सिद्ध भगवान्की प्रतिमाके सामने वधू-वरका विवाहोत्सव करना चाहिये ॥ १२९॥
The marriage celebration of bride and groom should be held at a sacred place, amidst great splendor, before the image of the Siddha Bhagavān. ॥129॥
श्लोक ( Shlok ) 130
वेद्यां “प्रणीतमग्नीनां त्रयं द्वयमथैककम् । ततः प्रदक्षिणीकृत्य प्रसज्य विनिवेशनम् ॥१३०॥
वेदीमें जो तीन, दो अथवा एक अग्नि उत्पन्न की थी उसकी प्रदक्षिणाएं देकर वधू-वरको समीप ही बैठना चाहिये ॥१३०॥
The bride and groom should sit near the altar after circumambulating the three, two, or single sacred fires kindled therein. ॥130॥
श्लोक ( Shlok ) 131
पाणिग्रहणदीक्षायां नियुक्तं तद्वधूवरम् । आसप्ताहं चरेद् ब्रह्मवतं देवाग्निसाक्षिकम् ॥१३१॥
विवाहकी दीक्षामें नियुक्त हुए वधू और वरको देव और अग्निकी साक्षीपूर्वक सात दिन तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना चाहिये ।। १३१।।
The bride and groom, consecrated through the sacred initiation of marriage, should observe the vow of Brahmacharya for seven days, in the solemn presence of the gods and the sacred fire. ॥131॥
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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