आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |
श्लोक 22 से 31 भगवान् वृषभदेव का दिव्य स्वरूप और भरत की पूजा
भगवान् वृषभदेव चमरों, छत्रों, और पुष्पवृष्टि से सुशोभित दिखते हैं, मानो सुमेरु पर्वत हों। उनकी प्रभा और दिव्य ध्वनि से आनंद फैलता है। भरत उनकी प्रदक्षिणा करते हैं और उत्कृष्ट सामग्री से पूजा करते हैं। पूजा के बाद वे घुटनों पर बैठकर भगवान् को नमस्कार करते हैं और स्तुति शुरू करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 24 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
चलच्चामरसंघातवीज्यमानमहातनुम् । प्रपतन्निर्झरं मेरुरिव चामीकरच्छविम् ॥२२॥
ढुरते हुए चमरों के समूह से जिनका विशाल शरीर संवीज्यमान हो रहा है और जो सुवर्ण के समान कांति को धारण करने वाले हैं ऐसे वे भगवान् उस समय ऐसे जान पड़ते थे मानो जिसके चारों ओर निर्झरने पड़ रहे हैं ऐसा सुमेरु पर्वत ही हो ।।22।।
With a majestic form being gently fanned by the swaying Chamaras (celestial fly-whisks) and radiating a golden brilliance, Lord Rishabhadeva appeared at that moment like Mount Sumeru, surrounded by cascading waterfalls. ||22||
श्लोक ( Shlok ) 23
महाशोकतरोर्मूले छत्रत्रितयसंश्रितम् । त्रिधाभूतावधूद्मासिबलाहकभिवाद्रिपम् ॥२३॥
वे भगवान् बड़े भारी अशोकवृक्ष के नीचे तीन छत्रों से सुशोभित थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो जिस पर तीन रूप धारण किये हुए चंद्रमा से सुशोभित मेघ छाया हुआ है ऐसा पर्वतों का राजा सुमेरु पर्वत ही हो ।।23।।
The Lord, seated beneath the grand Ashoka tree, was adorned with three divine umbrellas, appearing as if Mount Sumeru, the king of mountains, were shaded by a celestial cloud illuminated by the moon in its three phases. ||23||
श्लोक ( Shlok ) 24
पुष्पवृष्टिप्रतानेन परितो भ्राजितं प्रभुम् । कल्णद्रुमप्रगलितप्रसूनमिव मम्दरम् ॥२४॥
वे भगवान् चारों ओर से पुष्पवृष्टि के समूह से सुशोभित थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो जिसके चारों ओर कल्पवृक्षों से फल गिरे हुए हैं ऐसा सुमेरु पर्वत ही हो ।।24।।
The Lord was magnificently adorned by showers of celestial flowers from all directions, appearing like Mount Sumeru, around which the Kalpavriksha (wish-fulfilling trees) had shed their divine fruits. ||24||
श्लोक ( Shlok ) 25
नभो व्यापिभिरुद्घोषं सुरदुन्दुभिनिः स्वनैः । प्रसरद्वे लमम्भोधिमिव वातविघूर्णितम् ॥२५॥
आकाश में व्याप्त होने वाले देव दुंदुभियों के शब्दों से भगवान् के समीप ही बड़ा भारी शब्द हो रहा था जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो वायु के द्वारा चलायमान हुआ और जिसकी लहरें किनारे तक फैल रही है ऐसा समुद्र ही हो ।।25।।
The space around the Lord resounded with the deep echoes of divine drums (Dundubhis) reverberating in the sky. This made Him appear like a vast ocean, whose waves, stirred by the wind, extended all the way to the shore. ||25||
श्लोक ( Shlok ) 26
धीरध्वानं प्रवर्षन्तं धर्मामृतमतर्कितम् । आह्वादित जगत्प्राणं प्रावृषेण्य मिवाम्बुदम् ॥२६॥
जिसका शब्द अतिशय गंभीर है और जो जगत् के समस्त प्राणियों को आनंदित करने वाला है ऐसे संदेहरहित धर्मरूपी अमृत की वर्षा करते हुए भगवान् वृषभदेव ऐसे जान पड़ते थे मानो गरजता हुआ और जलवर्षा करता हुआ वर्षाऋतु का बादल ही हो ।।26।।
With a profoundly deep and resonant voice that brought immense joy to all living beings, Lord Rishabhadeva showered the nectar of undoubted Dharma. He appeared like a monsoon cloud, thundering and pouring rain, nourishing the world with divine wisdom. ||26||
श्लोक ( Shlok ) 27
स्वदेह विसरज्योत्स्ना सलिलक्षालिताखिलम् । क्षीराब्धिमध्यसद् वृद्धमिव भूध्रं हिरण्मयम् ॥२७॥
अपने शरीर की फैलती हुई प्रभारूपी जल से जिन्होंने समस्त प्रभा को प्रक्षालित कर दिया है, वे भगवान् ऐसे जान पड़ते थे मानो क्षीरसमुद्र के बीच में बढ़ा हुआ सुवर्णमय पर्वत ही हो ।।27।।
With the radiance emanating from His divine form outshining all other light, Lord Rishabhadeva appeared like a golden mountain rising amidst the Ksheer Sagar (ocean of milk), illuminating the entire realm with His brilliance. ||27||
श्लोक ( Shlok ) 28
सोऽन्व क्प्रदक्षिणीकृत्य भगवन्तं जगद्गुरुम् । इयाज यायजूकानां ज्यायान्प्राज्ये ज्यया प्रभुम् ॥२८॥
इस प्रकार आठ प्रातिहार्यरूप ऐश्वर्य से युक्त और जगत् के गुरु स्वामी वृषभदेव को देखकर पूजा करने वालों में श्रेष्ठ भरत ने उनकी प्रदक्षिणा दी और फिर उत्कृष्ट सामग्री से उनकी पूजा की ।।28।।
Beholding Lord Rishabhadeva, the master of the universe, adorned with the eight divine Pratiharyas (miraculous wonders), the noble King Bharata, foremost among devotees, circumambulated Him with reverence and then worshipped Him with the finest offerings. ||28||
श्लोक ( Shlok ) 29
पूजान्ते प्रणिपत्येशं महीनिहित जान्वसौ । वचः प्रसूनमालाभिरि त्यानर्च गिरां पतिम् ॥२९॥
पूजा के बाद महाराज भरत ने अपने दोनों घुटने जमीन पर रखकर सब भाषाओं के स्वामी भगवान् वृषभदेव को नमस्कार किया और फिर वचनरूपी पुष्पों की मालाओं से उनकी इस प्रकार पूजा की अर्थात् नीचे लिखे अनुसार स्तुति की ।।29।।
After completing the worship, King Bharata knelt down, placing both knees on the ground, and bowed in reverence to Lord Rishabhadeva, the master of all languages. He then offered his devotion through garlands of words—praising the Lord with the following hymn of adoration. ||29||
श्लोक ( Shlok ) 30
त्वं ब्रह्मा परमज्योतिस्त्वं प्रभूष्णुरजोऽरजाः । त्वमादिदेवो देवानामधिदेवो महेश्वरः ॥३०॥
हे भगवन् आप ब्रह्मा हैं, परम ज्योतिस्वरूप हैं, समर्थ हैं, जन्मरहित हैं, पापरहित हैं, मुख्यदेव अथवा प्रथम तीर्थंकर हैं, देवों के भी अधिदेव और महेश्वर हैं ।।30।।
O Bhagavan, You are Brahma, the embodiment of supreme radiance, the all-powerful, birthless, and free from all sins. You are the Adi Deva (the first and foremost Tirthankara), the Lord of even the celestial beings, and the Maheshwara (the great divine sovereign). ||30||
श्लोक ( Shlok ) 31
त्वं स्त्रष्टा त्वं विधातासि त्वमीशानः पुरुः पुमान्। त्वमादिपुरुषो विश्वेट् विश्वाराङ् विश्वतोमुखः ।।३१ll
आप ही सृष्टा हैं, विधाता हैं, ईश्वर हैं, सबसे उत्कृष्ट हैं, पवित्र करने वाले हैं, आदि पुरुष हैं, जगत् के ईश हैं, जगत् में शोभायमान हैं और विश्वतोमुख अर्थात् सर्वदर्शी हैं ।।31।।
You are the Creator, the Ordainer, the Supreme Lord, the most exalted, the purifier of all, the Primordial Being, the Master of the universe, the radiance of the world, and Vishvatomukha—the All-Seeing One. ||31||
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |