Hindi Translation of Adi purana Parv 36
श्लोक 1 से 11 भरत की सेना का प्रस्थान
अथानन्तर-दूतके वचनरूपी तेज वायुके आघातसे प्रेरित हुआ चक्रवर्तीका सेना रूपी समुद्र आकाश और पृथिवीको रोकता हुआ चलने लगा ।।१।। उस समय युद्धकी सूचना करनेवाले बड़े बड़े नगाड़े गम्भीर शब्दोंसे बज रहे थे और उनके शब्दोंसे तलवार उठाने में व्यग्र हुए विद्याधर भयभीत हो रहे थे ।।२।। चक्रवर्तीकी सेनाएँ अलग अलग विभागोंमें विभक्त होकर चल रही थीं, सबसे आगे पैदल सैनिकोंका समूह था, उससे कुछ दूरपर घोड़ोंका समूह था और उससे कुछ दूर हटकर हाथियोंका समूह था ॥ ३॥ सेनाके दोनों ओर रथोंके समूह थे तथा आगे पीछे और ऊपर विद्याधर तथा देव चल रहे थे ।।४।। इस प्रकार छह प्रकारकी सेना-सामग्रीसे सम्पन्न हुए महाराज भरतेश्वरने अपने छोटे भाईको जीतनेकी इच्छासे अनेक राजाओंके साथ प्रस्थान किया ।।५।। उस समय विजय पताकाओंसे राहित बड़े बड़े हाथियों-के समूह ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो वृक्षोंके साथ साथ चलते हुए पर्वतों के समूह ही हों ॥६॥ जिनसे झरते हुए मदजलकी वृष्टि से समस्त भूमि सींची गई है और जिन्होंने सब दिशाएँ रोक ली हैं ऐसे मदोन्मत्त हाथियों के साथ चक्रवर्ती भरत चल रहे थे, उस समय वे हाथी ऐसे मालूम होते थे मानो झरनोंसे सहित पर्वत ही हों ॥ ७॥ जिनके समस्त शरीर-पर शृङ्गार किया गया हो और जो बहुत ऊँचे हैं ऐसे वे विजयके हाथी ऐसे सुशोभित होते थे मानो संध्याकाळकी सघन धूपसे व्याप्त हुए चलते-फिरते पर्वत ही हों ।।८।। जो सब प्रकारसे सजाये गये हैं और जिनपर विजय पताकाएँ फहरा रही हैं ऐसे वे सेनाके हाथी इस प्रकार सुशो-भित हो रहे थे मानो महाराज भरतको अपना बल दिखानेके लिये कुलाचल ही आये हों ।॥९॥ जिन्होंने देदीप्यमान तथा वीररसके योग्य वेष धारण किया है, और जिन्होंने अंकुश हाथमें ले रखा है ऐसे हाथियों के कंधोंपर बैठे हुए महावत लोग ऐसे जान पड़ते थे मानो एक जगहइकट्ठा हुआ अभिमान ही हो ।।१०।। घुड़सवार लोग, जिनकी आगेकी धारका अग्रभाग बहुत तेज है ऐसी तलवारोंसे ऐसे जान पड़ते थे मानो उनके पराक्रम ही मूर्तिमान् होकर उनकी भुजाओंके अग्रभाग अर्थात् हाथोंमें आ लगे हों ।॥११॥
श्लोक 12 से 21 सेना की शोभा और योद्धाओं का उत्साह
जिनके तरकस अनेक प्रकारके बाणों-से भरे हुए हैं ऐसे धनुर्धारी लोग इस प्रकार जान पड़ते थे मानो बड़ी बड़ी शाखावाले वनके वृक्ष कोटरोंमें रहनेवाले सर्पोंसे ही सुशोभित हो रहे हों ।॥१२॥ जिन्होंने रथोंके समूहमें युद्ध के योग्य सब शस्त्र भर लिये हैं ऐसे रथोंपर बैठनेवाले योद्धा लोग इस प्रकार चल रहे थे मानो युद्धरूपी समुद्रको पार करनेके लिये नाव चलानेवाले खेवटिया ही हों ।॥१३॥ जिन्होंने शिर-पर टोप और शरीरपर कवच धारण किया है तथा हाथमें पैनी तलवार ऊँची उठा रक्खी है ऐसे कितने ही योद्धा लोग हाथियोंके पैरोंकी रक्षा करनेके लिये उनके सामने चल रहे थे ।।१४।। जिनके हाथोंम शस्त्रोंके समूह चमक रहे हैं और जो लोहेके कवच पहने हुए हैं ऐसे कितने ही योद्धा ऐसे देदीप्यमान हो रहे थे मानो किसी उत्पातको सूचित करनेवाले उल्कासहित काले काले मेव ही उठ रहे हों ।।१५।। कोई अन्य योद्धा पैनी धारवाली तलवार हाथमें लेकर उसमें अपने मुखका रङ्ग देखता हुआ अपने पराक्रमका परिज्ञान प्राप्त कर रहा था ।।१६।। कोई अन्य योद्धा हाथके अग्र भागपर रखी हुई तलवारको तोलता हुआ ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो वह उससे अपने स्वामी के आदर-सत्कारका गौरव ही तोलना चाहता हो ।।१७।। पैदल सेना, हाथियोंके समूह, घुड़सवार और रथोंके समूह आदि सामग्रीके साथ साथ महामुकुट-बद्ध राजाओंकी सेनाएँ भी चल रही थीं ।॥१८॥ रत्नोंकी किरणोंसे जिनके मुकुट ऊँचे उठ रहे हैं ऐसे वे मुकुटवद्ध राजा इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो लीला सहित लोकपालोंके अंश ही पृथ्वीपर आ गये हों ।॥१९॥ अनेक राजा लोग महाराज भरतको घेरकर चल रहे थे और दूरसे ही अपनी सेनाकी सामग्री यथायोग्यरूपसे दिखलाते जाते थे ।॥२०॥ युद्धका प्रारम्भ सुनकर जिनके चित्त व्याकुल हो रहे हैं ऐसी स्त्रियोंको वीर योद्धा बड़ी धीरता-के साथ समझाकर आश्वासन दे रहे थे ॥ २१।।
श्लोक 22 से 31 युद्ध की तैयारी और चिंतन
उस समय घोड़ोंके खुरोंसे उठी हुई और आकाशको उल्लंघन करनेवाली पृथिवीकी धूल क्षण भरके लिये देवांगनाओंके देखनेमें भी बाधा कर रही थी ।। २२ ।। समस्त दिशाओंको व्याप्त करनेवाले और आकाशको उल्लंघन करनेवाले उस धूलिसे उत्पन्न हुए अन्धकारमें चक्ररत्नका प्रकाश ही मनुष्यों के नेत्रोंको अपना अपना विषय ग्रहण करनेके सन्मुख कर रहा था ।।२३।। राजा लोग रास्ते में अत्यन्त उत्कट वीररससे भरे हुए योद्धाओं के परस्परके वार्तालापसे तथा इसी प्रकारके अन्य लोगोंकी बात-चीतसे ही उत्साहित हो रहे थे ।। २४।। उधर राजा बाहुबली रणभूमिको दूरसे ही युद्धके योग्य बनाकर ठहरे हुए हैं और इधर राजाओंमें सिंहके समान तेजस्वी महाराज भरत भी यन्त्रणा-रहित (उच्छृङखल) होकर उनके सन्मुख जा रहे हैं ।॥ २५॥ नहीं मालूम इस युद्धमें इन दोनों भाइयों का क्या होगा ? प्रायः कर इनका यह युद्ध सेवकोंकी शान्तिके लिये नहीं है। भावार्थ-इस युद्धमें सेवकों का कल्याण दिखाई नहीं देता है ।। २६ ।। भरतेश्वरने यह युद्ध बहुत ही अयोग्य प्रारम्भ किया है सो ठीक ही है क्योंकि जो ऐश्वर्य के मदसे रोके नहीं जा सकते ऐसे प्रभु लोग स्वेच्छाचारी ही होते हैं ।॥ २७।। जो ये मुकुटबद्ध राजा समस्त सामग्रीके साथ युद्ध करनेके लिये आये हुए हैं वे क्या इन दोनोंको नहीं रोक सकते हैं ? ॥२८॥ अहो, भुजाओंका परा-क्रम रखनेवाला यह कुमार बाहुबली भी महाप्रतापी है जो कि चक्रवर्तीक कुपित होनेपर भी इस प्रकार युद्धके लिये सन्मुख खड़ा हुआ है ।॥ २९॥ अथवा शूरवीर लोगोंको सामग्रीकी अधिकता विजयका कारण नहीं है क्योंकि एक ही सिंह झुण्डके झुण्ड हाथियोंको जीत लेता है ॥३०।। नमस्कार करते हुए हजारों देव जिसकी रक्षा करते हैं ऐसा यह चक्रको धारण करने-वाला भरत भी साधारण पुरुष नहीं है ।। ३१।।
श्लोक 32 से 41 युद्ध की शांति की कामना
इसलिये जो अनेक लोगोंके विनाशका कारण है ऐसा इन दोनोंका युद्ध नहीं हो तो अच्छा है, यदि देव लोग यहां समीपमें हों तो वे इस युद्धकी शान्ति करें ।॥ ३२॥ इस प्रकार कितने ही लोग मध्यस्थ भावसे प्रशंगनीय वचन कह रहे थे और कितने ही पक्षपातसे प्रेरित होकर अपने ही पक्षकी प्रशंसा कर रहे थे ॥३३॥ प्रायः लोगों के इसी प्रकारके वचनोंसे मन बहलाते हुए राजा लोग शीघ्र ही उस स्थानपर जा पहुंचे जहां वीरशिरोमणि कुमार बाहुबली पहलेसे विराजमान था ।। ३४।। बाहुबली के समीप पहुंचते ही भरत के योद्धा, जिसका शत्रु कभी उल्लंघन नहीं कर सकते ऐसा बाहुबलीको भुजाओं-का दर्प देखकर प्रायः कुछ डर गये ।। ३५।। इस प्रकार चक्रवर्ती भरतकी सेनाके समीप पहुँचने-पर वीरोंके शब्दोंसे दिशाओंको भरनेवाली बाहुबलीकी सेना समुद्रके जलके समान क्षोभको प्राप्त हुई ।।३६।।
अथानन्तर-दोनों ही सेनाओंमें जो शूरवीर लोग थे वे परस्पर युद्ध करनेकी इच्छा-से आने हाथी घोड़े आदि सजाकर सेनाकी रचना करने लगे अनेक प्रकारके व्यूह आदि बनाने लगे ।। ३७।। इतने में ही दोनों ओरके मुख्य मुख्य मंत्री विचार कर इस प्रकार कहने लगे कि क्रूरग्रहों के समान इन दोनोंका युद्ध शान्तिके लिये नहीं है ॥ ३८।। क्योंकि ये दोनों ही चरम शरीरी हैं, इनकी कुछ भी क्षति नहीं होगी, केवल इनके युद्धके बहानेसे दोनों ही पक्षके लोगोंका क्षय होगा ।।३९।। इस प्रकार निश्चय कर तथा भारी मनुष्योंके संहारसे डरकर मंत्रियोंने दोनोंकी आज्ञा लेकर धर्मयुद्ध करनेकी घोषणा कर दी ॥४०॥ उन्होंने कहा कि मनुष्योंका संहार करनेवाले इस कारणहीन युद्धसे कोई लाभ नहीं है क्योंकि इसके करनेसे बड़ा भारी अधर्म होगा और यशका भी बहुत विघात होगा ।।४१।।
श्लोक 42 से 51 धर्मयुद्ध की घोषणा
यह बलके उत्कर्षकी परीक्षा अन्य प्रकारसे भी हो सकती है इसलिये तुम दोनोंका ही परस्पर तीन प्रकारका युद्ध हो ॥४२॥ इस युद्धमें जो पराजय हो वह तुम दोनोको भौंहके चढ़ाये बिना ही सरलतासे सहन कर लेना चाहिये तथा जो विजय हो वह भी अहंकारके बिना तुम दोनोंको सहन करना चाहिये क्योंकि भाई भाइयोंका यही धर्म है ।॥४३॥ इस प्रकार जब समस्त राजाओं और मंत्रियोंने बड़े आग्रह-के साथ कहा तब कहीं बड़ी कठिनतासे उद्धत हुए उन दोनों भाइयोंने वैसा युद्ध करना स्वीकार किया ।।४४।। ‘इन दोनोंके बीच जल युद्ध, दृष्टि युद्ध और बाहु युद्धमें जो विजय प्राप्त करेगा वही विजय-लक्ष्मीका स्वयं स्वीकार किया हुआ पति हो, इस प्रकार सवको आनन्द देनेवाली गंभीर भरियोंक द्वारा जिसमें सबको हर्ष हो इस रीतिसे घोषणा कर मंत्री लोगोंने सेनाके मुख्य मुख्य पुरुषोंको एक जगह इकट्ठा किया ।।४५-४६।। जो भरतके पक्षवाले राजा थे उन्हें एक ओर बैठाया और जो बाहुबली के पक्षके थे उन्हें दूसरी ओर बैठाया ।।४७।। उन सब राजाओंके बीचमें बैठे हुए भरत और बाहुबली ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो किसी कारणसे निषध और नीलपर्वत ही पास पास आ गये हों ॥४८॥ उन दोनोंमें नीलमणिके समान सुन्दर छविको धारण करता हुआ और काले काले केशोंसे सुशोभित कुमार बाहुबली ऐसा जान पड़ता था मानो भूमरोंसे सहित ऊँचा जम्बूवृक्ष ही हो ।।४९।। इसी प्रकार मुकुटसे जिसका शरीर ऊँचा हो रहा है और जो तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिको धारण करनेवाला है ऐसा राज-राजेश्वर भरत भी इस प्रकार सुशोभित हो रहा था मानो चूलिकासहित गिरिराज-सुमेरु ही हो ।।५०।। अत्यन्त धीर तथा पलकोंके संचारसे रहित शान्त दृष्टिको धारण करते हुए कुमार बाहुबलीने दृष्टियुद्धमें बहुत शीघ्र विजय प्राप्त कर ली ।। ५१ ।।
श्लोक 52 से 61 जलयुद्ध और बाहुयुद्ध
हर्षरो क्षोभ मचाते हुए बाहुबली के दुनिवार सेनारूपी समुद्रको रोककर राजाओंने बड़ी मर्यादाके साथ कुमार बाहुबलीको विजयसे युक्त किया अर्थात् दृष्टियुद्धमें उनकी विजय स्वीकार की ॥५२॥ तदनन्तर मदोन्मत्त दिग्गजोंक समान अभिमानसे उद्धत हुए वे दोनों भाई जलयुद्ध करनेके लिये सरोवरके जलमें प्रविष्ट हुए और अपनी लम्बी लम्बी भुजाओंसे एक दूसरेपर पानी उछालन लगे ।।५३।। चक्रवर्ती भरतके वक्षःस्थलपर बाहुबली के द्वारा छोड़ी हुई जलकी उज्ज्वल छटाएं ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो सुमेरुपर्वतके मध्यभागमें जलका प्रवाह ही पड़ रहा हो ।।५४।। भरतेश्वर के द्वारा छोड़ा हुआ जलका प्रवाह अत्यन्त ऊँचे वाहुबलीके मुख-को दूर छोड़कर दूरसे ही नीचे जा पड़ा ।। भावार्य भरतेश्वरने भी बाहुबली के ऊपर पानी फेंका था परन्तु बाहुबली के ऊँचे होने के कारण वह पानी उनके मुखतक नहीं पहुँच सका, दूरसे ही नीचे जा पड़ा । भरतका शरीर पाँचसौ धनुष ऊँचा था और बाहुबलीका पाँचसौ पच्चीस धनुब । इसलिये बाहुबलीके द्वारा छोड़ा हुआ पानी भरतके मुख तथा वक्षःस्थलपर पड़ता था परन्तु भरतके द्वारा छोड़ा हुआ पानी बीच में ही रह जाता था बाहुबलीके मुखतक नहीं पहुँच पाता था ।।५५।। इस प्रकार जब भरतेश्वरने इस जलयुद्धमें भी विजय प्राप्त नहीं की तब वाहुबलीकी सेनाओंने फिरसे अपनी विजयकी घोषणा कर दी ।।५६।॥ अथानन्तर सिंह-के समान पराक्रमको धारण करनेवाले धीरवीर तथा परस्पर स्पर्धा करनेवाले वे दोनों नर-शार्दूल-थेष्ठ पुरुष वाहुयुद्धकी प्रतिज्ञा कर रंगभूमिमें आ उतरे ॥५७॥ अपनी अपनी भुजाओंके अहंकारसे सुशोभित उन दोनों भाइयोंका, अनेक प्रकारसे हाथ हिलाने, ताल ठोकने, पैंतरा बदलने और भुजाओंके व्यायाम आदिसे बड़ा भारी वाहु युद्ध (मल्ल युद्ध) हुआ ।॥५८॥ जिसके मुकुटकी दीप्तिका समूह अतिशय देदीप्यमान हो रहा है ऐसे भरतको बाहुबलीने लीला मात्रमें ही घुमा दिया और उस समय घूमते हुए चक्रवर्तीने क्षण भरके लिये अलातचक्रकी लीला धारण की थी ।।५९।। बाहुबलीने राजाओंमें श्रेष्ठ, बड़े तथा भरत क्षेत्रको जीतनेवाले भरत-को जीतकर भी ‘ये बड़े हैं’ इसी गौरवसे उन्हें पृथिवीपर नहीं पटका ।।।। ६० ।। किन्तु भुजाओं-से पकड़कर ऊंचा उठाकर कन्धेपर धारण कर लिया। उस समय भरतेश्वरको कन्धेपर धारण करते हुए बाहुबली ऐते जान पड़ते थे मानो नील गिरिने बड़े बड़े शिखरोंसे देदीप्यमान हिमवान् पर्वतको ही धारण कर रक्खा हो ।।६१।।
श्लोक 62 से 71 भरत का अपमान और वैराग्य
उस समय बाहुबली के पक्षवाले राजाओंने बड़ा कोला-हल मचाया और भरतके पक्ष के लोगोंने लज्जासे अपना शिर झुका लिया ॥६२॥ दोनों पक्षके राजाओंके साक्षात् देखते हुए चक्रवर्ती भरतका अत्यन्त अपमान हुआ था इसलिये वे भारी लज्जा और आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥ ६३॥ जिसने भौंहें चढ़ा ली हैं, जिसकी रक्तके समान लाल लाल आंखें इधर उधर फिर रही हैं और जो क्रोधसे जल रहा है ऐसा वह चक्रवर्ती क्षण भरके लिये भी दुनिरीक्ष्य हो गया अर्थात् वह क्रोधसे ऐसा जलने लगा कि उसे कोई क्षणभर नहीं देख सकता था ।। ६४।। उस समय क्रोबसे अन्धे हुए निधियोंके स्वामी भरतने बाहुबली-का पराजय करने के लिये समस्त शत्रुओंके समूहको उखाड़कर फेंकनेवाले चक्ररत्नका स्मरण किया ।॥६५॥ स्मरण करते ही वह चक्ररत्न भरतके समीप आया, भरतने बाहुबलीपर चलाया परन्तु उनके अवध्य होनेसे वह उनकी प्रदक्षिणा देकर तेजरहित हो उन्हीं के पास जा ठहरा । भावार्थ-देवोपनीत शस्त्र कुटुम्बके लोगोंपर सफल नहीं होते, बाहुबली भरतेश्वरके एक पितृक भाई थे इसलिये भरतका चक्र बाहुबलीपर सफल नहीं हो सका, उसका तेज फीका पड़ गया और वह प्रदक्षिणा देकर बाहुबली के समीप ही ठहर गया ।। ६६।। उस समय बड़े बड़े राजाओं-ने चक्रवर्तीको धिक्कार दिया और दुःखके साथ कहा कि ‘बस बस’ ‘यह साहस रहने दो’ बन्द करो, यह सुनकर चक्रवर्ती और भी अधिक संतापको प्राप्त हुए ।। ६७।। आपने खूब पराक्रम दिखाया, इस प्रकार उच्च स्वरसे कहकर धीर वीर बाहुबलीने पहले तो भरतराजको हाथोंसे तोला और फिर कन्धेसे उतारकर नीचे जमीनपर रख दिया अथवा (धोरो अनिकृष्टां ऐसा पदच्छेद करनेपर) उच्च स्थानपर विराजमान किया ।। ६८।। अनेक अच्छे अच्छे राजाओंने समीप आकर महाराज बाहुबली के विजयकी प्रशंसा करते हुए उनका सत्कार किया और बाहुबलीने भी उस समय अपने आपको उत्कृष्ट अनुभव किया ।। ६९।। साथ ही साथ वे यह भी चिन्तवन करने लगे कि देखो, हमारे बड़े भाई ने इस नश्वर राज्य के लिये यह कैसा लज्जा-जनक कार्य किया है ।। ७० ।। यह साम्राज्य फलकालमें बहुत दुख देनेवाला है, और क्षणभंगुर है इसलिये इसे धिक्कार हो, यह व्यभिचारिणी स्त्रीके समान है क्योंकि जिस प्रकार व्यभिचारिणी स्त्री एक पतिको छोड़कर अन्य पतिके पास चली जाती है उसी प्रकार यह साम्राज्य भी एक पतिको छोड़कर अन्य पतिके पास चला जाता है। यह राज्य प्राणियोंको छोड़ देता है परन्तु अविवेकी प्राणी इसे नहीं छोड़ते यह दुःखकी बात है ।। ७१॥
श्लोक 72 से 81 विषयों की नश्वरता और हानि
अहा, विषयों-में आसक्त हुए पुरुष, इन विषयजनित सुखोंका निन्द्यपना, अपकार, क्षणभंगुरता और नीरस-पनेको कभी नहीं सोचते हैं ।॥ ७२॥ जिनके वशमें पड़े हुए प्राणी अनेक दुःखोंकी परम्पराको प्राप्त होते हैं ऐसे विषके समान भयंकर विषयोंको कौन बुद्धिमान् पुरुष प्राप्त करना चाहेगा ? ।।७३।। विष खा लेना कहीं अच्छा है क्योंकि वह एक ही भवमें प्राणीको मारता है अथवा नहीं भी मारता है परन्तु विषय सेवन करना अच्छा नहीं है क्योंकि ये विषय प्राणियोंको अनन्तबार फिर फिरसे मारते हैं ।। ७४।। जो प्रारम्भ कालमें तो मनोहर मालूम होते हैं परन्तु फलकाल- में कड़वे (दुःख देनेवाले) जान पड़ते हैं ऐसे विषयोंके लिये यह अज्ञ प्राणी क्या व्यर्थ ही अनेक दुःखोंको प्राप्त नहीं होता है ? ॥७५॥ जो प्रारम्भ कालमें तो अत्यन्त आनन्द देनेवाले हैं और अन्तमे प्राणोंका अपहरण करते हैं ऐसे किपाक फल (विषफल) के समान विषम इन विषयों को कौन बुद्धिमान् पुरुष सेवन करेगा ? ॥७६॥ ये विषयरूपी शत्रु प्राणियोंको जैसा उद्वेग करते हैं वैसा उद्वेग शस्त्रोंका प्रहार, प्रज्वलित अग्नि, वजू, बिजली और बड़े बड़े सर्प भी नहीं कर सकते हैं ।।७७।। भोगोंकी इच्छा करनेवाले मूर्ख पुरुष धन पानेकी इच्छासे बड़े बड़े समुद्र, प्रचण्ड युद्ध, भयंकर वन, नदी और पर्वतोंमें प्रवेश करते हैं ।॥७८।। विषयोंकी चाह रखनेवाले पुरुष जलचर जीवोंकी लम्बी लम्बी भुजाओंके आवातसे उत्पन्न हुए वजूपात जैसे कठोर शब्दों-से क्षुब्ध हुए समुद्रमें भी जाकर संचार करते हैं ।॥ ७९ ॥ भोगोंसे लुभाये हुए पुरुष, चारों ओरसे पड़ते हुए वागोंके समूहसे जहां आकाशरूपी आंगन भर गया है ऐसे युद्धके मैदानमें भी निर्भय होकर प्रवेश कर जाते हैं ।॥८०॥ जिनमें वनचर लोग भी भय सहित नेत्रोंसे संचार करते हैं ऐसे भयंकर बड़े-बड़े वनोंमें भी भोगोंकी आशासे पीड़ित हुए मूर्ख मनुष्य घूमा करते हैं ।॥८१॥
श्लोक 82 से 91 बुढ़ापे और शरीर की नश्वरता
कितने दुःखकी बात है कि विषयरूपी विषम ग्रहोंसे जकड़े हुए कितने ही लोग, ऊंची-नीची भंत्ररोंसे भयंकर और मगरमच्छोंसे भरी हुई नदियोंको भी पार करना चाहते हैं ।।८२।। रसायन तथा रस आदिके ज्ञानका उपदेश देनेवाले धूर्तोंक द्वारा मोहित होकर उद्योग करने-वाले कितने ही पुरुष कठिनाईसे चढ़ने योग्य पर्वतोंपर भी चढ़ जाते हैं ।।८३।। यह जरा सफेद बालोंक बहानेसे वेगपूर्वक केशोंको पकड़ती हुई अनिष्ट स्त्रीके समान जबर्दस्ती आलिंगन करती है ।।८४।। जो प्राणी भोगोंमें अत्यन्त उत्कण्ठित हो रहा है वह हित और अहितको नहीं जानता तथा जिसे वृद्धावस्थाने घेर लिया है उसमें और मरे हुएमें क्या अन्तर है ? अर्थात् बेकार होनेसे वृद्ध मनुष्य भी मरे हुएके समान है ।॥ ८५॥ यह बुढापा मनुष्यको शीतज्वरके समान अनेक कष्ट देनेवाला है क्योंकि जिस प्रकार शीतज्वर उत्पन्न होते ही जबर्दस्ती जमीन- पर पटक देता है उसी प्रकार बुढापा भी जबर्दस्ती जमीनपर पटक देता है और जिस प्रकार शीतज्वर शरीरमें कम्पन पैदा कर देता है उसी प्रकार बुढापा भी शरीरमें कम्पन पैदा कर देता है ।।८६।। शरीरमें प्रविष्ट हुई तथा उपभोगमें आई हुई जरा और मदिरा दोनों ही लोगों-के शरीरको शिथिल कर देती हैं, उनकी बुद्धि भूष्ट कर देती हैं और वचनोंमें अस्पष्टता ला देती हैं ॥८७॥ जिसके बलका सहारा मनुष्यों के जीवनका आलम्बन है ऐसा यह आयुरूपी खंभा कालरूपी दुष्ट हाथी के द्वारा जबर्दस्ती उखाड़ दिया जाता है ।॥८८॥ यह शरीरका बल हाथी के कानके समान चंचल है और यह जीर्ण-शीर्ण शरीररूपी झोंपड़ा रोगरूपी चूहोंके द्वारा नष्ट किया हुआ है ॥८९॥ इस प्रकार यह राज्यादि सब विनश्वर है फिर भी मोहो उदयसे जिसकी चेतना नष्ट हो गई है ऐसा भरत इन्हें नित्य मानता है यह कितने दुःखकी बात है ? ॥९०।। इस प्रकार बड़े भाईकी नीचताका चिरकाल तक विचार करते हुए बाहुबली-ने भरतको उद्देश्य कर नीचे लिखे अनुसार कठोर अक्षरोंवाली वाणी कही ।।९१॥
श्लोक 92 से 101 बाहुबली का भरत को संबोधन
हे राजाओं-में श्रेष्ठ, क्षणभर के लिये अपनी लज्जा या भेंत्र छोड़, मैं कहता हूं सो सुन। तूने मोहित होकर ही इस न करने योग्य बड़े भारी साहसका संहारा लिया है ।।९२।। जो कभी भिद नहीं सकता । ऐसे मेरे शरीररूपी पर्वतपर तूने चक्र चलाया है सो तेरा यह चक्र वजूके बने हुए पर्वतपर पड़ते हुए वजूके समान व्यर्थ है ऐसा निश्चयसे समझ ॥९३।। दूसरी बात यह है कि जो तूने भाइयोंकी सामग्री नष्ट कर राज्य प्राप्त करना चाहा है सो उससे तूने बहुत ही अच्छा धर्म और यशका उपार्जन किया है ॥ ९४।॥ तूने अपनी यह स्तुति भी स्थापित कर दी कि चक्रवर्ती भरत आदिब्रह्मा भगवान् वृषभदेवका ज्येष्ठ पुत्र था तथा वह अपने कुलका उद्धारक हुआ था ।।९५।। हे भरत, आज तूने जिसे जीता है और जो पापसे भरी हुई है ऐसी इस राज्य-लक्ष्मीको तू एक अपने ही द्वारा उपभोग करने योग्य तथा अविनाशी समझना है ।॥९६॥ जिसका तूने आदर किया है ऐसी यह राज्यलक्ष्मी अब तुझे ही प्रिय रहे, हे आयुष्मन्, अव यह मेरे योग्य नहीं है क्योंकि बन्धन सज्जन पुरुषोंके आनन्दके लिये नहीं होता है। भावार्थ – यह लक्ष्मी स्वयं एक प्रकारका बन्धन है अथवा कर्म बन्धका कारण है इसलिये सज्जन पुरुष इसे कभी नहीं चाहते ॥९७॥ यद्यपि यह तेरी लक्ष्मी फलवती है तथापि अनेक प्रकारके कांटोंसे-विपत्तियोंसे दूषित है। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो कांटेवाली लताको हाथसे छएगा भी ।॥९८॥ अव हम कंटक रहित तपरूपी लक्ष्मीको अपने आधीन करना चाहते हैं इसलिये यह राज्यलक्ष्मी हम लोगोंके लिये विषके कांटोंकी श्रेणीके समान सर्वथा त्याज्य है ।।९९।। अतएव जो मैंने यह ऐसा अपराध किया है उसे क्षमा कर दीजिये । मैं विनयसे च्युत हो गया था अर्थात् मैंने आपकी विनय नहीं की सो इसे में अपनी चंचलता ही समझता हूँ ।॥१००॥ जिस प्रकार मेघसे निकलती हुई गर्जना संतप्त मनुष्योंको आनन्दित कर देती है उसी प्रकार महाराज बाहुबली के मुखसे निकलते हुए वाणीके समूहने चक्रवर्ती भरतके संतप्त मनको कुछ-कुछ आनन्दित कर दिया था ।। १०१।।
श्लोक 102 से 111 बाहुबली की दीक्षा और तप
‘हा मैने बहुत ही दुष्टताका कार्य किया है’ इस प्रकार जोर जोरसे अपनी निन्दा करता हुआ चक्रवर्ती अपने पाप कर्मसे बहुत ही संतप्त हुआ ॥१०२॥ जिसमें अनेक प्रकारके अनुनय विनयका प्रयोग किया गया है इस रीतिसे अन्तिम कुलकर महाराज भरतको बार-बार प्रसन्न करता हुआ बाहुबली अपने संकल्पसे पीछे नहीं हटा सो ठीक ही है क्योंकि तेजस्वी पुरुषों की स्थिरता भी आश्चर्यजनक होती है ॥१०३।। उसने अपने पुत्र महावलीको राज्यलक्ष्मी सौंप दी और स्वयं गुरुदेव के चरणोंकी आराधना करते हुए जैनी दीक्षा धारण कर ली ।। १०४।। जिसने समस्त परिग्रह छोड़ दिया है तथा जो दीक्षा रूपी लतासे आलिङ्गित हो रहा है ऐसा वह बाहुबली उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो पत्तों के गिर जानेसे कुश लतायुक्त कोई वृक्ष ही हो ।॥ १०५ ॥ गुरुकी आज्ञामें रहकर शास्त्रों का अध्ययन करने में कुशल तथा एक विहारीपन धारण करनेवाले जितेन्द्रिय बाहुबलीने एक वर्वतक प्रतिमा योग धारण किया अर्थात् एक ही जगह एक ही आसनसे खड़े रहनेका नियम लिया ॥१०६।। जिन्होंने प्रशंसनीय व्रत धारण किये हैं, जो कभी भोजन नहीं करते, और जिनके समीपका प्रदेश वनकी लताओंसे व्याप्त हो रहा है ऐसे वे बाहुबली वामी के छिद्रोंसे निकलते हुए सर्वोसे बहुत ही भयानक हो रहे थे ।।१०७।। जिनके फणा प्रकट हो रहे हैं ऐसे फुंकारते हुए सर्पके बच्चोंकी उछल-कूदसे चारों ओरसे घिरे हुए वे बाहुबली ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो उनके चरणोंके समीप विषके अंकूरे ही लग रहे हों ।॥१०८।। कन्धों पर्यन्त लटकती हुई केशरूपी लताओंको धारण करनेवाले वे बाहुबली मुनिराज अनेक काले सर्पोंके समहको धारण करनेवाले हरिचन्दन वृक्षका अनुकरण कर रहे थे ॥१०९।। फूली हुई वासंती-लता अपनी शाखारूपी भुजाओंके द्वारा उनका गाढ आलिंगन कर रही थी और उससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो हार लिये हुए कोई सखी ही अपनी भुजाओंसे उनका आलिंगन कर रही हो ॥११०।। जिसके कोमल पत्ते विद्याधरियोंने अपने हाथसे तोड़ लिये हैं ऐसी वह वासन्ती लता उनके चरणोंपर पड़कर सूख गई थी और ऐसी मालूम होती थी मानो कुछ नमू होकर अनुनय करती हुई कोई स्त्री ही पैरोंपर पड़ी हो ।॥ १११॥
श्लोक 112 से 121 बाहुबली की तपस्या और परिषह-जय
ऐसी अवस्था होनेपर भी वे कठिन तपश्चरण करते थे जिससे उनका शरीर कृश हो गया था और उससे ऐसे जान पड़ते थे मानो मुक्तिरूपी स्त्रीकी इच्छा करता हुआ कोई कामी ही हो ॥ ११२ ॥ तपरूपी अग्निके संतापसे संतप्त हुए बाहुबलीका केवल शरीर ही खड़े-खड़े नहीं सूख गया था किन्तु दुःख देनेवाले कर्म भी सूख गये थे अर्थात् नष्ट हो गये थे ॥११३॥ तीव्र तपस्या करते हुए बाहुबली के कभी कोई उपद्रव नहीं हुआ था सो ठीक ही है क्योंकि बड़े पुरुषोंका धैर्य अचिन्त्य होता है जिससे कि वे कभी विकार-को प्राप्त नहीं होते ।। ११४।। वे सब बाबाओंको सहन कर लेते थे, अत्यन्त शान्त थे, परिग्रह रहित थे और अतिशय देदीप्यमान थे इसलिये उन्होंने अपने गुणोंरो पृथ्वी, जल, वायु और अग्निको जीत लिया था ।।११५।। वे मार्गसे च्युत न होनेके लिये भूख, प्यास, शीत, गर्मी तथा डांस मच्छर आदि परीषहोंके दुःख सहन करते थे ।। ११६ ॥ उत्कृष्ट नाग्न्य व्रतको धारण करते हुए बाहुबली इन्द्रियरूपी धूर्तों के द्वारा नहीं भेदन किये जा सके थे। ब्रह्मचर्य की उत्कृष्ट रूपसे रक्षा करना ही नाग्न्य व्रत है और यही उत्तम तय है। भावार्थ वे यद्यपि नग्न रहते थे तथापि इन्द्रियरूप धूर्त उन्हें विकृत नहीं कर सके थे ।।११७।। वे रति और अरति इन दोनों परिवहोंको भी सहन करते थे अर्थात् रागके कारण उपस्थित होनेपर किसीसे राग नहीं करते थे और द्वेष के कारण उपस्थित होनेपर किसीसे द्वेष नहीं करते थे सो ठीक ही है क्योंकि विषयों- की इच्छा न रखनेवाले पुरुषको रति तथा अरतिकी बाधा नहीं होती ।। ११८।। भोगोंस विरक्त हुए तथा स्त्रियों के अपवित्र शरीरको चमड़ेकी पुतलीके समान देखते हुए उन बाहुबली महाराजको स्त्रियों के द्वारा की हुई कोई बाधा नहीं हुई थी अर्थात् वे अच्छी तरह स्त्रीपरिषह सहन करते थे ।।११९।। वे हमेशा खड़े रहते थे और जूता तथा शयन आसन आदिकी मनसे भी इच्छा नहीं करते थे इसलिये उन्होंने चर्या, निवद्या और शय्या परिषहको लीला मात्रमें ही जीत लिया था ।। १२० ।। जो स्वयं नष्ट हो जानेवाले शरीरमें निःस्पृह रहते हैं और न उसमें कोई आनन्द ही मानते हैं ऐसे परमार्थ के जाननेवालोंमें श्रेष्ठ बाहुबलो महाराज बध और आक्रोश परिषहको भो सहन करते थे ।। १२१।।
श्लोक 122 से 131 बाहुबली का परिषह-जय और कषाय-विजय
याचनासे प्राप्त हुए भोजनके द्वारा शरीर-की स्थिति रखना उन्हें इष्ट नहीं था इसलिये वे मौन रहकर याचना परिषहको बाधाको सहन करते थे ॥१२२॥ जिन्होंने उत्तम क्षमा धारण की है, शरीरका संस्कार छोड़ दिया है और जिन्हें सुख तथा दुःख दोनों ही समान हैं ऐसे उन मुनिराजने स्वेद मल तथा तृण स्पर्श परिषह-को भी सहन किया था ।। १२३।। ‘यह शरीर रोगोंका घर है’ इस प्रकार चिन्तवन करते ही वे धीरवीर बुद्धिके धारक बाहुबली बड़ी कठिनतासे सहन करने के योग्य रोगोंसे उत्पन्न हुई बाधाको भी सहन करते थे ॥१२४।॥ ज्ञानका उत्कर्ष सर्वज्ञ होने तक है अर्थात् जबतक सर्वज्ञ न हो जावे तबतक ज्ञान घटता बढ़ता रहता है इसलिये ज्ञानसे उत्पन्न हुए अहंकार-का त्याग करते हुए अतिशय बुद्धिमान् और साहसी वे मुनिराज प्रज्ञा परिषहको सहन करते थे । भावार्थ केवलज्ञान होनेके पहले सभीका ज्ञान अपूर्ण रहता है ऐसा विचार कर वे कभी ज्ञानका गर्व नहीं करते थे ।। १२५।। वे अपने सत्कार पुरस्कारमें कभी उत्कण्ठित नहीं होते थे । यदि किसीने उन्हें अपने कार्य में अगुआ बनाया तो वे हर्षित नहीं होते थे और किसीने उनका सत्कार किया तो संतुष्ट नहीं होते थे। भावार्थ अपने कार्य में किसीको अगुआ बनाना पुरस्कार कहलाता है तथा स्वयं आये हुएका सम्मान करना सत्कार कहलाता है वे मुनिराज सत्कार पुरस्कार दोनोंमें ही निरुत्सुक रहते थे उन्होंने सत्कार पुरस्कार परिषह अच्छी तरह सहन किया था ।।१२६।॥ सदा सन्तुष्ट रहनेवाले बाहुबलीजीने अलाभ परिषहको जीता था तथा अज्ञान और अदर्शनसे उत्पन्न होनेवाली बाधाएं भी उन मुनिराजको नहीं हुई थीं ।॥१२७।। इस प्रकार परिषहों के जीतने से उनके बहुत बड़ी कर्मोंकी निर्जरा हो गई थी सो ठीक ही है क्योंकि परिवहोंको जीतना ही कर्मोंकी निर्जरा करनेका श्रेष्ठ उपाय है ॥ १२८॥ उन्होंने क्षमासे क्रोध को, अहंकारके त्यागसे मानको, सरलतासे मायाको और संतोषसे लोभको जीता था ॥ १२९।। काम देवको जीतने वाले उन मुनिर। जने पांच इन्द्रियोंको अनायास ही जीत लिया था सो ठीक ही है क्योंकि विषयरूपी ईंधन जलती हुई कामरूपी अग्निको शमन करने-वाला तपश्चरण ही है। भावार्थ इन्द्रियोंको वश करना तथ है और यह तभी हो सकता है जब कामरूपी अग्निको जीत लिया जावे ॥ १३०॥ उन्होंने कामको जीत लेनेस आहार, भय, मैथुन और परिग्रह इन संज्ञाओंको नष्ट किया था ।। १३१।।
श्लोक 132 से 141 बाहुबली के गुण और रत्नत्रय की रक्षा
इस प्रकार अन्तरङ्ग शत्रुओंके प्रसारको बार बार नष्ट करते हुए उन आत्मज्ञानी तथा समस्त पदार्थोंको जाननेवाले मुनिराजने अपने आत्माके द्वारा ही अपने आत्माको जीत लिया था ।॥१३२॥ पांच महाव्रत, पांच समितियां, पांच इन्द्रियदमन, वस्त्र परित्याग, केशोंका लोंच करना, छह आवश्यकोंमें कभी बाधा नहीं होना, स्नान नहीं करना, पृथिवीपर सोना, दांतौन नहीं करना, खड़े होकर भोजन करना और दिनमें एक बार आहार लेना, इन्हें अट्ठाईस मूलगुण कहते हैं इनके सिवाय चौरासी लाख उत्तर गुण भी हैं, वे महामुनि उन सबके पालन करने में प्रयत्न करते थे ।।१३३-१३५।। इनमें कुछ भी नहीं छोड़ते हुए अर्थात् सबका पूर्ण रीतिसे पालन करते हुए वे मुनिराज व्रतोंकी उत्कृष्ट विशुद्धिको प्राप्त हुए थे तथा जिस प्रकार देदीप्यमान किरणोंसे सूर्य प्रकाशमान होता है उसी प्रकार वे भी तपकी देदीप्यमान किरणोंसे प्रकाशमान हो रहे थे ॥ १३६।। वे रसगौरव, शब्द गौरव, और ऋद्धिगौरव इन तीनोंसे रहित थे, अत्यन्त निःशल्य थे और दशधर्मोंके द्वारा उन्हें मोक्ष मार्ग में अत्यन्त दृढ़ता प्राप्त हो गई थी ॥ १३७।। वे मुनिराज किसी विजिगीषु अर्थात् शत्रुओंको जीतने की इच्छा करनेवाले राजाके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार विजि-गीषु राजा किसी दुर्ग आदि सुरक्षित स्थानका आश्रय लेता है, तलवारसे देदीप्यमान होता है और कवच पहने रहता है उसी प्रकार उन मुनिराजने भी तीन गुप्तियोंरूपी दुर्गोंका आश्रय ले रक्खा था, वे भी ज्ञानरूपी तलवारसे देदीप्यमान हो रहे थे और पांच समितियांरूप कवच पहिन रक्खा था। भावार्थ-यथार्थमें वे कर्मरूप शत्रुओंको जीतने की इच्छा रखते थे ॥१३८।। कषायरूपी चोरोंके द्वारा उनका रत्नत्रयरूपी धन नहीं चुराया गया था क्योंकि वे सदा जागते रहते थे और बार बार प्रमादरहित होते रहते थे। भावार्थ-लोकम भी देखा जाता है कि जो मनुष्य सदा जागता रहता है और कभी प्रमाद नहीं करता उसकी चोरी नहीं होती । भगवान् बाहुबली अपने परिणामोंके शोधमें निरन्तर लवलीन रहते थे और प्रमादको पासमें भी नहीं आने देते थे इसलिये कषायरूपी चोर उनके रत्नत्रयरूपी धनको नहीं चुरा सके थे ।।१३९॥ वे सदा मौन रहते थे इसलिये कभी उनका विकथाओंमें आदर नहीं होता था। और उनका मनरूपी दुर्ग अत्यन्त सुरक्षित था इसलिये वह इन्द्रियोंके द्वारा नहीं तोड़ा जा सका था । भावार्थ वे कभी विकथाएं नहीं करते थे और पांचों इन्द्रियों तथा मनको वशमें रखते थे ।।१४०।। उनके मनरूपी विशाल घरमें सदा ज्ञानरूपी दीपक प्रकाशमान रहता था इसलिये ही समस्त पदार्थ उनके ध्येयकोटिम थे अर्थात् ध्यान करने योग्य थे। भावार्थ -पदार्थोंका ध्यान करने के लिये उनका ज्ञान होना आवश्यक है, मुनिराज बाहुबलीको सब पदार्थों-का ज्ञान था इसलिये सभी पदार्थ उनके ध्यान करने योग्य थे ।। १४१।।
श्लोक 142 से 151 बाहुबली का ज्ञान और तप
वे मति और श्रुत ज्ञान-के द्वारा संसारके समस्त पदार्थोंका चिन्तवन करते रहते थे इसलिये उन्हें यह जगत् हाथपर रक्खे हुए आंवले के समान अत्यन्त स्पष्ट था ॥ १४२॥ जो परिषहोंको जीत लेनेसे देदीप्यमान हो रहे हैं और जिन्होंने इन्द्रियरूपी शत्रुओंको जीत लिया है ऐसे वे बाहुबली कषायरूपी शत्रुओंको छेदकर तपरूपी राज्यका अनुभव कर रहे थे ॥ १४३॥ तपश्चरणका बल पाकर उन मुनिराजके योगके निमित्तसे होनेवाली ऐसी अनेक ऋद्धियां प्रकट हुई थीं जिनसे कि उनके तीनों लोकोंमें क्षोभ पैदा करनेकी शक्ति प्रकट हो गई थी ।।१४४।। उस समय उनके मतिज्ञाना-वरण आदि कर्मोंके क्षमोपशमसे मतिज्ञान आदि चारों प्रकारके ज्ञानोंमें वृद्धि हो गई थी ॥१४५।। मतिज्ञानकी वृद्धि होनेसे उनके कोष्ठबुद्धि आदि ऋद्धियां प्रकट हो गई थीं और श्रुत ज्ञानके बढ़नेसे समस्त अंगों तथा पूर्वोक जानने आदिकी शक्तिका विस्तार हो गया था ।।१४६।। वे अवधिज्ञानमें परमावधिको उल्लंघन कर सर्वावधिको प्राप्त हुए थे तथा मनःपर्यय ज्ञानमें विपुलमति मनःपर्यय ज्ञानको प्राप्त हुए थे ॥ १४७॥ उन मुनिराजके ज्ञानकी शुद्धि होनेसे तपकी शुद्धि भी बहुत अधिक हो गई थी सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रकार किसी बड़े वृक्षके ठह-रनेमें मूल कारण उसकी जड़ है उसी प्रकार तपके ठहरने आदिमें मूल कारण ज्ञान है ।॥१४८।।
वे महामुनि उग्र, और महाउग्र तपसे अत्यन्त कृश हो गये थे तथा दीप्त नामक तपसे सर्यके समान अत्यन्त देदीप्यमान हो रहे थे ।। १४९॥ उन्होंने तप्तघोर और महाघोर नामके तपश्चरण किये थे तथा इनके सिवाय उत्तर तप भी उनके खूब बढ़ गये थे ।। १५०।। इन बड़े बड़े तपोंसे वे उत्तम मुनिराज ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो मेघोंके आवरणसे निकला हुआ सूर्य ही अपनी किरणोंसे सुशोभित हो रहा हो ।। १५१॥
श्लोक 152 से 161 बाहुबली की ऋद्धियां और ध्यान
यद्यपि वे मुनिराज समस्त प्रकारकी विक्रिया अर्थात् विकार भावोंको छोड़कर कठिन तपस्या करते थे तथापि आश्चर्य की बात है कि उनके तपके वलसे आठ प्रकारकी विक्रिया प्रकट हो गई थी। भावार्थ रागद्वेष आदि विकार भावोंको छोड़-कर कठिन तपस्या करनेवाले उन बाहुबली महाराजके अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, और वशित्व यह आठ प्रकारकी विक्रिया ऋद्धि प्रकट हुई थीं ।। १५२।। जिन्हें अनेक प्रकारकी औषध ऋद्धि प्राप्त है और जो आमर्श, क्ष्वेल तथा जल्ल आदिके द्वारा प्राणियोंका उपकार करते हैं ऐसे उन मुनिराजकी समीपता जगत्का कल्याण करनेवाली थी । भावार्थ-उनके समीप रहनेवाले लोगोंके समस्त रोग नष्ट हो जाते थे ॥ १५३।। यद्यपि वे आहार नहीं लेते थे तथापि शक्ति मात्रसे ही उनके रसऋद्धि प्रकट हुई थी और तपश्चरणके बलसे प्रकट हुई उनकी बल ऋद्धि भी विस्तार पा रही थी। भावार्थ भोजन करनेवाले मुनिराजके ही रसऋद्धिका उपयोग हो सकता है परन्तु वे भोजन नहीं करते थे इसलिये उनके शक्तिमात्र से रसऋद्धिका सद्भाव बतलाया है ॥ १५४॥ व मुनिराज अक्षीणसंवास तथा अक्षीणमहानस ऋद्धिको भी धारण कर रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि पूर्ण रीतिसे पालन किया हुआ तप अक्षीण फल उत्पन्न करता है ।।१५५॥ विकल्प रहितं चित्तकी वृत्ति धारण करना ही अध्यात्म है ऐसा निश्चयकर योगके जाननेवालोंम श्रेष्ठ उन जितेन्द्रिय योगिराजने मनको जीतकर उसे ध्यानके अभ्यासमें लगाया ।। १५६॥ उत्त मक्षमा, उत्तममार्दव, उत्तमआर्जव, उत्तमसत्य, उत्तमशौच, उत्तमसंयम, उत्तमतप, उत्तमत्याग, उत्तमआकिञ्चन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य ये दश धर्भध्यानकी भावनाएं हैं। इस लोकमें योगकी सिद्धि होनेपर ही उत्कृष्ट सिद्धि-सफलता-मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है ऐसा योगी लोग मानते हैं ।।१५७-१५८॥ अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचित्व, आस्स्रव, संजर, निर्जरा, लोक, बोधि दुर्लभ और धर्माख्यातत्त्व इन बारह भावनाओंका उन्होंने विशुद्ध चित्तसे चिन्तवन किया था ॥१५९-१६०।। वे आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थानका चिन्तयन करते हुए तथा कर्मों-के अंशोंको क्षीण करते हुए धर्मध्यान धारण करते थे ॥१६१।।
श्लोक 162 से 171 बाहुबली के तप का प्रभाव
जिस प्रकार दीपिकाके प्रज्व-लित होनेपर उसके चारों ओर कज्जलके अंश दिखाई देते हैं उसी प्रकार उनकी ध्यानरूपी दीपिका के प्रज्वलित होनेपर उसके चारों ओर क्षणभर नष्ट हुए कर्मों के अंश दिखाई देते थे ॥१६२॥ सब दिशाओं में फैरता हुआ उनके शरीरकी दीप्तिका समूह उस वनको नीलमणि-की कान्तिसे व्याप्त हुआ सा बना रहा था ।।१६३।। उनके चरणोंके समीय विश्राम करनेवाले मृग आदि पशु सदा विश्वस्त अर्थात् निर्भय रहते थे, उन्हें सिंह आदि दुष्ट जीव कभी बाधा नहीं पहुँचाते थे क्योंकि वे स्वयं वहां आकर अक्रूर अर्थात् शान्त हो जाते थे ।। १६४।। उनके चरणों-के समीप हाथी, सिंह आदि विरोधी जीव भी परस्परका वैर-भाव छोड़कर इच्छानुसार उठते बैठते थे और इस प्रकार वे मुनिराजके ऐश्वर्यको सूचित करते थे ॥ १६५॥ हालकी व्याई हुई सिही भैंसेके बच्चेका मस्तक सूंघकर उसे अपने बच्चे के समान अपना दूध पिला रही थी ।।१६६।। हाथी अपने झुण्डके मुखियों के साथ साथ सिंहोंके पीछे पीछे जा रहे थे और स्तन-के पीते में उत्सुक हुए सिंहके बच्चे हथिनियोंक समीप पहुँच रहे थे ।। १६७।। बालकपनके कारण मधुर शब्द करते हुए हाथियोंके बच्चों को सिंह अपने पैने नाखूनोंसे उनकी गर्दनपर स्पर्श कर रहा था और ऐसा करते हुए उस सिहको हाथियों के सरदार बहुत ही अच्छा समझ रहे थे-उसका अभिनन्दन कर रहे थे ।।१६८।। उन मुनिराजक ध्यान करनेके आसनके समीपकी भूमिको साफ करने की इच्छासे हथिनियां कमलिनी के पत्तोंका दोना बनाकर उनमें भर भरकर पानी ला रही थीं ॥ १६९।।
श्लोक 172 से 181 प्रकृति की शांति
हाथी अपनी सुड़ के अग्रभागसे उठाकर लाये हुए कमल उनके दोनों चरणोंपर रख देते थे और इस तरह वे उनकी उपासना करते थे । अहा, तपश्चरण कैसी शान्ति उत्पन्न करनेवाला है, ॥ १७०।। वे मुनिराज चरणोंके समीप आये हुए सर्पोंके काले फणाओंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो पूजाके लिये नीलकमलोंकी मालाएँ ही बनाकर रक्खी हों ।॥ १७१॥ बामीक छिद्रोंसे जिन्होंने केवल फणा ही बाहर निकाले हैं ऐसे काले सर्प उस समय ऐसे जान पड़ते थे मानो मुनिराज के चरणोंके समीप किसीने नील-कमलोंका अर्थ ही बनाकर रक्खा हो ।। १७२ ।। वनकी लताएं फूलोंसे उज्ज्वल तथा नीचेको झुक्री हुई छोटी छोटी डालियोंसे ऐसी अच्छी सुशोभित हो रही थीं मानो फूलोंका अर्घ लेकर भक्तिसे नमस्कार करती हुई मुनिराजकी सेवा ही कर रही हों ।॥ १७३॥ वनके वृक्ष, जिनपर सदा फूल खिले रहते हैं और जो वायुसे हिल रहे हैं ऐसे शाखाओंके अग्रभागोंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो संतोषसे बार बार नृत्य ही करना चाहते हों ।॥ १७४।॥ जिनके फणा ऊंचे उठ रहे हैं ऐसे सर्प, भूमोंके शब्दरूपी सुन्दर गाने के साथ साथ फणाओंपर लगे हुए रत्नोंकी किरणों-से देदीप्यमान अपने फणाओंको घुमा घुमाकर नृत्य कर रहे थे ।। १७५।। मोर, कोकिलोंके सुन्दर शब्दरूपी डिण्डिम बाजेके अनुसार होनेवाले लयके साथ साथ सर्पोंके देखते रहते भी बार बार नृत्य कर रहे थे ।।१७६।॥ इस प्रकार अतिशय शान्त रहनेवाले उन मुनिराजके माहात्म्यसे वह वन भी शान्त हो गया था सो ठीक ही है, क्योंकि महापुरुषोंका संयोग क्र जीवों में भी शान्ति उत्पन्न कर देता है ।। १७७।। इस वनमें अनेक पक्षी शान्त शब्दोंसे चहक रहे थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो इस बातकी घोषणा ही कर रहे हों कि यह तपोवन अत्यन्त शान्त है ।।१७८।। उन मुनिराजके तपके प्रभावसे यह वनका आश्रम ऐसा शान्त हो गया था कि यहांके किसी भी जीवको किसी के भी द्वारा कुछ भी उपद्रव नहीं होता था ।।१७९।। तपके सम्बन्धसे बड़े हुए मुनिराजके बड़े भारी तेजसे तिर्थ चोंक भी हृदयका अन्धकार दूर हो गया था और अब वे परसर में किसीसे द्रोह नहीं करते थे-अहिंसक हो गये थे ।।१८०।। विद्याधर लोग गति भंग हो जानेसे उनका सद्भाव जान लेते थे और विमानसे उतरकर ध्यान में बैठे हुए उन मुनिराजकी बार बार पूजा करते थे ।। १८१॥
श्लोक 182 से 191 बाहुबली का केवलज्ञान
तपकी शक्तिसे उत्पन्न हुए मुनि-राजके बड़े भारी माहात्म्यसे जिनके मस्तक झके हुए हैं ऐसे देवोंके आसन भी बार बार कम्पाय- मान होने लगते थे ॥१८२॥ कभी-कभी क्रीड़ाके हेतुसे आयी हुई विद्याधरियाँ उनके सर्व गरीर-पर-लगी हुई लताओको हटा जाती थी ॥१८३॥ इस प्रकार धारण किये हुए समीचीनधर्म-ध्यानके बलसे जिनके तपकी शक्ति उत्पन्न हुई है ऐसे वे मुनि लेश्याकी विशुद्धिको प्राप्त होते हुए शुक्लध्यानके सम्मुख हुए ॥१८४॥ एक वर्षका उपवास समाप्त होनेपर भरतेश्वरने आकर जिनकी पूजा की है ऐसे महामुनि वाहुवली कभी नष्ट नही होनेवाली केवलज्ञानरूपी उत्कृष्ट ज्योतिको प्राप्त हुए। भावार्थ दीक्षा लेते समय वाहुवलीने एक वर्षका उपवास किया था। जिस दिन उनका वह उपवास पूर्ण हुआ उसी दिन भरतने आकर उनकी पूजा की और पूजा करते ही उन्हे अविनाशी उत्कृष्ट केवलज्ञान प्राप्त हो गया ।।१८५।। वह भरतेश्वर ‘मुझसे संक्लेशको प्राप्त हुआ है अर्थात् मेरे निमित्तसे उसे दुख पहुँचा है यह विचार वाहुवलीके हृदयमे विद्यमान रहता था, इसलिए केवलज्ञानने भरतकी पूजाकी अपेक्षा की थी। भावार्थ भरतके पूजा करते ही बाहुबलीका हृदयं शल्यहित हो गया और उसी समय उन्हें केवलज्ञान भी प्राप्त हो गया ॥१८६।। प्रसन्न है वुद्धि जिसकी ऐसे सम्राट् भरतने केवलज्ञानरूपी सूर्यके उदय होनेके पहले और पीछे दोनों ही समय विधिपूर्वक उन मुनिराजकी पूजा की थी ॥१८७॥ भरतेश्वरने केवलज्ञान उत्पन्न होनेके पहले जो पूजा की थी वह अपना अपराध नष्ट करनेके लिए की थी और केवलज्ञान होनेके बाद जो वड़ी भारी पूजा की थी वह केवलज्ञानकी उत्पत्ति-का अनुभव करनेके लिए की थी ॥१८८॥ जिन्हे केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे अपने छोटे भाई बाहुबलीकी भरतेश्वरने जो बड़ी भारी पूजा की थी उसका वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ? ॥१८९।।
श्लोक 192 से 201 भरत और देवों की पूजा
प्रथम तो बाहुबली भरतके छोटे भाई थे, दूसरे भरतको धर्मका प्रेम बहुत था, तीसरे उन दोनोंका अन्य अनेक जन्मोसे सम्बन्ध था, और चौथे उन दोनोंमे बड़ा भारी प्रेम था इस प्रकार इन चारोंमे से एक-एक ‘भी भक्तिकी अधिकताको बढानेवाले है, यदि यह सब सामग्री एक साथ मिल जाये तो वह कौन-सी उत्तम क्रियाको पुष्ट नहीं कर सकती अर्थात् उससे कौन-सा अच्छा कार्य नही हो सकता ? ॥१९०-१९१॥ सम्राट् भरतेश्वरने मन्त्रियोंके साथ, राजाओके साथ और अन्त पुरकी समस्त स्त्रियो तथा पुरोहितके साथ उन बाहुबली मुनिराजको बडे हर्षसे नमस्कार किया था ॥ १९२॥ इस विषयमें अधिक कहाँतक कहा जावे, संक्षेपमें इतना ही कहा जा सकता है कि उसने रत्नोका अर्ध बनाया था, गंगाके जलकी जलधारा दी थी, रत्नोंकी ज्योतिके दीपक चढाये थे, मोतियोसे अक्षतकी पूजा की थी, अमृतके पिण्डसे नैवेद्य अर्पित किया था, कल्पवृक्षके टुकड़ो (चूर्णो) से धूपकी पूजा की थी, पारिजात आदि देववृक्षोके फूलोके समूहसे पुष्पोकी अर्चा की थी, और फलोंके स्थानपर रत्नों-‘सहित समस्त निधियाँ चढ़ा दी थी इस प्रकार उसने रत्नमयी पूजा की थी ।।१९३-१९५॥ आसन कम्पायमान होनेसे जिन्हे वाहुबलीके केवलज्ञान उत्पन्न होनेका बोध हुआ है ऐसे इन्द्र आदि देवोने आकर उनकी उत्कृष्ट पूजा की ।।१९६।। उस समय स्वर्गके बगीचेके वृक्षोंको हिलाने-‘में चतुर तथा गगा नदीकी बूँदोंको हरण करनेवाला सुगन्धित वायु धीरे-धीरे वह रहा था ॥१९७।। देवोके नगाड़े आकाशमें गम्भीरतासे बज रहे थे और कल्पवृक्षोसे उत्पन्न हुआ फूलो-का समूह आकाशमे पड़ रहा था ॥१९८॥ उनके ऊपर देवरूपी कारीगरोके द्वारा बनाया हुआ रत्नोंका छत्र सुशोभित हो रहा था और नीचे बहुमूल्य मणियोका बना हुआ दिव्य सिंहासन देदीप्यमान हो रहा था ॥१९९।। उनके दोनों ओर ऊँचाईपर चर्मरोंका समूह स्वयं ढुल रहा था तथा जिसका ऐश्वर्य प्रसिद्ध है ऐसी उनके योग्य सभाभूमि अर्थात् गन्धंकुटी भी बनायी गयी थी ॥२००।। इस प्रकार देवोने जिनकी पूजा की है और जिन्हे केवलज्ञानरूपी ऋद्धि प्राप्त ‘हुई है’ ऐसे वे योगिराज अनेक मुनियोसे घिरे हुए इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो नक्षत्रो-से घिरा हुआ चन्द्रमा ही हो ॥२०१॥
श्लोक 202 से 212 बाहुबली की महिमा
जो घातियाकर्मोके क्षयसे उत्पन्न हुई अर्हन्त परमेष्ठी-‘की ‘अवस्थाको धारण कर रहे है तथा इसीलिए देव लोग जिनकी उपासना करते है ऐसे भगवान् ‘बाहुबलीने समस्त पृथिवीमें बिहार किया ॥२०२॥ इस प्रकार समस्त पदार्थोको जाननेवाले बाहुबली अपने वचनरूपी अमृतके द्वारा समस्त ससारको सन्तुष्ट करते हुए, पूज्य पिता भगवान् वृषभदेवके सामीप्यसे पवित्र हुए कैलास पर्वतपर जा पहुँचे ॥ २०३॥ जिन्होंने समस्त राजाओंकी सभामे दृष्टियुद्ध, मल्लयुद्ध और जलयुद्ध के द्वारा भरत-की समस्त कीति जीत ली थी, जिन्होने बडे भारी राज्यके भारको तृणके समान तुच्छ समझकर मुक्ति प्राप्त करनेके लिए दीक्षा धारण की थी और जो चरमशरीरियोमें सबसे मुख्य थे ऐसे भगवान् वाहुबली तुम सवकी रक्षा करे ॥ २०४॥ सव क्षत्रियोके सामने भरतकी विजय-लक्ष्मी देदीप्यमान चक्रकी मूर्तिके बहानेसे जिन वाहुवलीके समीप गयी थी परन्तु जिनके द्वारा सदाके लिए तिरस्कृत होकर लज्जाका पात्र हुई थी और जिन्होने अपने पिताका मार्ग (मुनिमार्ग) स्वीकृत किया था वे भगवान् बाहुवली तुम सबकी रक्षा करे ॥२०५॥ जो अनेक राजाओंके सामने सफल हुई जयलक्ष्मीके समागमकी आशाको धारण कर रहे थे, सबसे अधिक तेजस्वी थे, जिनकी कीति समस्त जगरूपी घरमे व्याप्त थी और जिन्होने वास्तविक यगके लिए तप धारण किया था वे आदिब्रह्मा भगवान् वृपभदेवके पुत्र सदा जयवन्त हो ॥ २०६॥ जिनकी भुजाओका बल क्षत्रियोके सामने भरतराजके साथ हुए मल्लयुद्धमे प्रसिद्ध हुआ था, और जिनके नामके अक्षर स्मरणमें आते ही प्राणियोके समूहको पवित्र कर देते है वे बाहुबली स्वामी सदा जयवन्त हों ॥२०७॥ जिनके चरणोको पाकर सर्पोके मुँहके उच्छ्वाससे निकलती हुई विपकी अग्नि बार-बार गान्त हो जाती थी, जो समस्त लोकमें मान्य है, और जिनके शरीरपर फैली हुई लताओको विद्याधरियाँ अपने हाथोके अग्रभागसे हटा देती थी वे बाहुबली स्वामी सदा जयवन्त हों ।॥२०८॥ भरतराजके ऊँचे मुकुटके अग्र भागमे लगे हुए रत्नोसे जिनके चरण-के नखरूपी चन्द्रमा अत्यन्त चमक रहे थे, जो धैर्य और वलसे सहित थे तथा जो इसलिए ही क्षोभको प्राप्त हुए सर्वोके समूहसे कभी आकुलताको प्राप्त नही हुए थे वे आदि ब्रह्मा भगवान् वृपभदेवके पुत्र बाहुवली योगिराज सदा जयवन्त रहे ॥ २०९।। भ्रमरोंके समूहके समान काले, भुजाओं तक लटकते हुए तथा जिनका अग्रभाग टेढ़ा हो रहा है ऐसे मस्तकके वालोसे जिनकी भुजाओंका अग्रभाग ढक गया है और इसलिए ही जो मेघोंके आवरणसे मलिन शिखरवाले पर्वतकी पूर्ण गोभाको पुष्ट कर रहे है वे भगवान् बाहुबली हम सबकी रक्षा करे ॥२१०॥ जो शीतकालमें वर्फसे ढके हुए ऊँचे शरीरको धारण करते हुए पर्वतके समान प्रकट होते थे, वर्षाऋतुमें नवीन मेघोके जलके समूहसे प्रक्षालित होते थे भीगते रहते थे और ग्रीष्मकालमे सूर्यकी किरणोंको सहन करते थे वे वाहुवली स्वामी सदा जयवन्त हों ।॥२११॥ जिन्होने अन्तरंग-बहिरग गत्रुओपर विजय प्राप्त कर ली है, बड़े-बड़े योगिराज ही जिनकी महिमा जान सकते हैं, और जो पूज्य पुरुषोके द्वारा भी पूजनीय है ऐसे इन योगिराज बाहुबलीको जो पुरुप अपने हृदयमें स्मरण करता है उसका अन्तरात्मा शान्त हो जाता है और वह शीघ्र ही जिनेन्द्रभगवान्की अजय्य (जिसे कोई जीत न सके) विजयलक्ष्मी- मोक्षलक्ष्मीको प्राप्त होता है ॥२१२॥
इस प्रकार आर्य नामसे प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रह के भाषानुवादमे वाहुवलीका जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्धमें विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन करनेवाला छत्तीसबाँ पर्व समाप्त हुआ ।
पर्व 36 सारांश
पर्व 37
हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 |
आदिपुराण सारांश
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena