आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
श्लोक 202 से 211 साम्राज्य, आर्हन्त्य, और परिनिर्वृति
पांचवीं ‘साम्राज्य’ क्रिया में चक्रवर्ती को चक्ररत्न, निधियां, और भोग प्राप्त होते हैं। छठवीं ‘आर्हन्त्य’ क्रिया में अरहंत को स्वर्गावतार और पंचकल्याण की प्राप्ति होती है, जो तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न करती है। सातवीं ‘परिनिर्वृति’ क्रिया में कर्ममल नष्ट होकर सिद्धि प्राप्त होती है, जो आत्मतत्त्व की शुद्धि है। ये सात कर्त्रन्वय क्रियाएं मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती हैं। भव्य इनका पालन कर संसार के बंधनों को तोड़ता है, सज्जाति, सद्गृहित्व, पारिव्रज्य, सुरेंद्रता, चक्रवर्ती, अरहंत, और अंत में निर्वाण प्राप्त करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
साम्राज्यमाधिराज्यं स्याच्चक्ररत्नपुरःसरम् । निधिरत्नसमुद्भूतं भोगसम्पत्परम्परम् ॥ २०२॥इति साम्राज्यम् ।
जिसमें चक्ररत्नके साथ साथ निधियों और रत्नोंसे उत्पन्न हुए भोगोपभोगरूपी संपदाओं की परम्परा प्राप्त होती है ऐसा चक्रवर्तीका बड़ा भारी राज्य साम्राज्य कहलाता है ।।२०२।। यह पाँचवीं साम्राज्यक्रिया है ।
That mighty and vast dominion, bestowed upon a Chakravartin,
is called the great empire—where the heritage of wealth and pleasures, born of treasures and gems, abounds.This is the fifth act—the Sāmrājya Kriyā.202
श्लोक ( Shlok ) 203
आर्हन्त्यमर्हतो भावो कर्म वेति परा क्रिया । यत्र स्वर्गावतारादिमहाकल्याणसम्पदः ।।२०३॥
अर्हत् परमेष्ठीका भाव अथवा कर्मरूप जो उत्कृष्ट क्रिया है उसे आर्हन्त्य क्रिया कहते हैं। इस क्रिया में स्वर्गावतार आदि महाकल्याणकरूप सम्पदाओंकी प्राप्ति होती है ।॥ २०३॥
The exalted state of the Arhat Paramēṣṭhī, or the deed thereof—
which is the supreme of all acts—is called the Ārhaṇtya Kriyā.
By this deed, one attains the great auspicious treasures, such as the heavenly incarnation.
श्लोक ( Shlok ) 204
याऽसौ दिवोऽवतीर्णस्य प्राप्तिः कल्याणसम्पदाम् । तदा र्हन्त्यमिति ज्ञेयं त्रैलोक्यक्षोभकारणम् ॥२०४।।इत्यार्हन्त्यम् ।
स्वर्गसे अवतीर्ण हुए अर्हन्त परमेष्ठीको जो पञ्चकल्याणकरूप सम्पदाओंकी प्राप्ति होती है उसे आर्हन्त्य क्रिया जानना चाहिये, यह आर्हन्त्यक्रिया तीनों लोकोंमें क्षोभ उत्पन्न करने-वाली है ।॥२०४।। यह छठवीं आर्हन्त्यक्रिया है ।
The Arhat Paramēṣṭhī descended from heaven,who attains the fivefold auspicious treasures,is said to perform the Ārhaṇtya Kriyā—
an act that stirs profound upheaval throughout the three worlds.
This is the sixth Ārhaṇtya Kriyā.204
श्लोक ( Shlok ) 205
भवबन्धनमुक्तस्य यावस्था परमात्मनः । परिनिवृत्तिरिष्टा सा परं निर्वाणमित्यपि ॥२०५॥
संसारके बन्धनसे मुक्त हुए परमात्माकी जो अवस्था होती है उसे परिनिर्वृति कहते हैं । इसका दूसरा नाम परंनिर्वाण भी है ।। २०५।।
The state of the Supreme Self, liberated from the bonds of worldly existence,is called Parinirvāṇa;its other name is Paramnirvāṇa.205
श्लोक ( Shlok ) 206
कृत्स्नकर्ममलापायात् संशुद्धिर्याऽन्तरात्मनः । सिद्धिः स्वात्मोपलब्धिः सा नाभावो न गुणोच्छिवा ॥२०६॥इति निर्वतिः ।
समस्त कर्मरूपी मलके नष्ट हो जानेसे जो अन्त-रात्माकी शुद्धि होती है उसे सिद्धि कहते हैं, यह सिद्धि अपने आत्मतत्त्वकी प्राप्तिरूप है अभाव-रूप नहीं है और न ज्ञान आदि गुणों के नाशरूप ही है ।। २०६।। यह सातवीं परिनिर्वृति क्रिया है ।
The purification of the innermost Self, arising from the destruction of all karmic impurities,is called Siddhi.This Siddhi is the attainment of the true nature of the Self—not a mere absence,nor the destruction of knowledge or other qualities.This is the seventh Parinirvāṇa Kriyā.206
श्लोक ( Shlok ) 207
इत्यागमानुसारेण प्रोक्ताः कर्त्रन्वयक्रियाः । सप्तैताः परमस्थानसङ्गतिर्यत्र योगिनाम् ॥२०७॥
इस प्रकार आगमके अनुसार ये सात कर्त्रन्वय क्रियाएं कही गई हैं, इन क्रियाओंका पालन करनेसे योगियोंको परम स्थानकी प्राप्ति होती है ।। २०७।।
Thus, according to the Āgama, these seven sequential acts are declared;by observing and practicing these deeds,the yogis attain the supreme abode.207
श्लोक ( Shlok ) 208
योऽनुतिष्ठत्यतन्द्रालुः क्रिया ह्यतास्त्रिधोदिताः । सोऽधिगच्छेत् परं धाम यत्सम्प्राप्तौ परं शिवम् ॥२०८॥पुष्पिताग्रावृत्तम्
जो भव्य आलस्य छोड़कर निरूपण की हुई इन तीन प्रकारकी क्रियाओंका अनुष्ठान करता है वह उस परम धाम (मोक्ष) को प्राप्त होता है जिसके प्राप्त होनेपर उसे उत्कृष्ट सुख मिल जाता है ।॥२०८।।
He who renounces grand indolence and diligently performs the prescribed rites of these threefold actions attains that supreme abode — liberation — upon which attainment he is granted the highest bliss. 208
श्लोक ( Shlok ) 209
जिनमतविहितं पुराणधर्म य इममनुस्मरति क्रिया निबद्धम् । अनुचरति च पुण्यधीः स भव्यो भवभयबन्धनमाशु निधुनाति ॥२०९॥
पवित्र बुद्धिको धारण करने वाला जो भव्य पुरुष उक्त क्रियाओं सहित जिनमतमें कहे हुए इस पुराणके धर्मका अथवा प्राचीन धर्मका स्मरण करता है और उसी के अनुसार आचरण करता है वह संसारसम्बन्धी भयके बन्धनों को शीघ्र ही तोड़ देता है- नष्ट कर देता है ॥ २०९।।
He who, endowed with a pure intellect, is a noble soul, and remembers the dharma of this Purāṇa—or the ancient dharma—set forth by the wise along with the prescribed rites, and acts accordingly, swiftly breaks and destroys the bonds of worldly fear.
209
श्लोक ( Shlok ) 210
परमजिनपदानुरक्तधी-र्भजति पुमान् य इमं क्रियाविधिम् । स धुतनिखिलकर्म बन्धनो जननजरामरणान्त’कृद् भवेत् ॥२१०।।
जिसकी बुद्धि अंत्यन्त उत्कृष्ट जिनेन्द्रभगवान्के चरणकमलों में अनुरागको प्राप्त हो रही है ऐसा जो पुरुष इन क्रियाओंकी विधिका सेवन करता है वह समस्त कर्मबन्धनको नष्ट करता हुआ जन्म, बुढ़ापा और मरण-का अन्त करनेवाला होता है ।।२१०।।
He whose intellect is supremely attuned to the lotus feet of the Blessed Jina, and who follows the prescribed disciplines of these sacred actions—such a man, destroying all karmic bondage, brings an end to birth, old age, and death.210
श्लोक ( Shlok ) 211
भव्यात्मा समवाप्य जातिमुचितां जातस्ततः सद्गृही पारिव्राज्यमनुत्तरं गुरुमतादासाद्य यातो दिवम् । तत्रैन्द्रीं श्रियमाप्तवान् पुनरतश्च्युत्वा गतश्चक्रिताम् प्राप्ता र्हन्त्यपदः समग्रमहिमा प्राप्नोत्यतो निर्वृ तिम् ॥२११॥
यह भव्य पुरुष प्रथम ही योग्य जातिको पाकर सद्-गृहस्थ होता है फिर गुरुकी आज्ञासे उत्कृष्ट पारिव्रज्यको प्राप्तकर स्वर्ग जाता है, वहां उसे इन्द्रकी लक्ष्मी प्राप्त होती है, तदनन्तर वहांसे च्युत होकर चक्रवर्ती पदको प्राप्त होता है, फिर अरहन्त पदको प्राप्त होकर उत्कृष्ट महिमाका धारक होता है और इसके बाद निर्वाणको प्राप्त होता है ।।२११।।
This noble soul, having first taken birth in a worthy lineage, becomes a virtuous householder. Thereafter, by the command of his Guru, he embraces the exalted path of renunciation and ascends to the heavenly realms, where he is endowed with the splendour of Indra. From there, descending once more, he attains the sovereign glory of a Chakravartin. Then, rising further, he reaches the supreme state of Arhat, bearing divine majesty — and at last, he attains final liberation.
211
इत्याषै भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहा-पुराणसङ्ग्रहे दीक्षाकर्त्रन्वयक्रियावर्णनं नाम एकोनचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥३६॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहके भाषानुवादमें दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन करनेवाला उनतालीसवां पर्व समाप्त हुआ I
Thus ends the thirty-ninth canto, which describes the Dīkṣānvaya and Kartr̥nvaya rites, in this translation of the Triṣaṣṭi-Lakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the venerable Ācārya Jinaseṇa.
— End of Canto Thirty-Nine
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन
पर्व 40 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
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