आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 196 समवसरण की संरचना और प्रभाव
समवसरण में मानस्तंभ, सरोवर, कोट, सभाएँ और पीठिका थी। बारह गण क्रम से बैठते थे। भगवान स्याद्वाद-रथ पर सवार थे। उनकी स्तुति करने वाला अर्हंत अवस्था पाता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 192 to 196
श्लोक ( Shlok ) 192
मानस्तम्भाः सरांसि प्रविमलजलसत्खातिका पुष्पवाटी प्राकारो नाट्यशाला द्वितयमुपवनंवेदिकान्तर्ध्वजाध्या ।
सालः कल्पद्रुमाणां सपरिवृतवनं स्तूपहर्म्यावली च प्राकारः स्फाटिकोन्तर्नृसुरमुनिसभा पीठिकाग्रे स्वयंभूः ॥१९२॥
संक्षेप में समवसरण की रचना इस प्रकार है―सबसे पहले (धूलीसाल के बाद) चारों दिशाओं में चार मानस्तंभ हैं, मानस्तंभों के चारों ओर सरोवर है, फिर निर्मल जल से भरी हुई परिखा है, फिर पुष्पवाटिका (लतावन) हैं, उसके आगे पहला कोट है, उसके आगे दोनों ओर दो-दो नाट्यशालाएँ हैं, उसके आगे दूसरा अशोक आदि का वन है, उसके आगे वेदिका है, तदनंतर ध्वजाओं की पंक्तियाँ हैं, फिर दूसरा कोट है, उसके आगे वेदिकासहित कल्पवृक्षों का वन है, उसके बाद स्तूप और स्तूपों के बाद मकानों की पंक्तियों है, फिर स्फटिकमणिमय तीसरा कोट है, उसके भीतर मनुष्य, देव और मुनियों की बारह सभाएं हैं तदनंतर पीठिका है और पीठिका के अग्रभाग पर स्वयंभू भगवान् अरहंतदेव विराजमान हैं ।।192।।
In summary, the structure of the Samavasarana is as follows: First (after the Dust Hall), there are four Mānastambhas (pillars of honor) in the four directions. Surrounding these pillars is a lake, followed by a moat filled with pure water. Next comes a flower garden (Latavana), followed by the first enclosure (Koṭa). Beyond this, on both sides, there are two Nāṭyaśālās (theaters). Then comes the second forest, consisting of Ashoka and other trees. Further ahead is the Vedi (sacred platform), followed by rows of flags.
Beyond this lies the second enclosure, after which there is a forest of Kalpavṛkṣas (wish-fulfilling trees) with associated Vedis. Then come the stupas, followed by rows of houses. After that is the third enclosure made of crystal (Sphaṭika-maṇi). Inside this enclosure are twelve assemblies of humans, deities, and monks. Next is the Pīṭhikā (pedestal), and at its forefront, the self-existent Lord Arahantadeva is seated in all his divine splendor. ( 192)
श्लोक ( Shlok ) 193
देवोऽर्हन्प्राङ्मुखो वा नियतिमनुसर न्नुत्तराशामुखो वा यामध्यास्ते स्म पुण्यां समवसृतिमहीं तां परीत्याध्यवात्सुः ।
प्रादक्षिण्येन धोन्द्रा द्युयु वतिगणिनी नृस्त्रीयस्त्रिश्च देव्यो देवाः सेन्द्राश्च मर्त्या पशव इति गणा द्वादशामी क्रमेण ॥१९३॥
अरहंतदेव स्वभाव से ही पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख कर जिस समवसरणभूमि में विराजमान होते हैं उसके चारों ओर प्रदक्षिणारूप से क्रमपूर्वक 1 बुद्धि के ईश्वर गणधर आदि मुनिजन, 2 कल्पवासिनी देवियाँ, 3 आर्यिकाएँ―मनुष्यों की स्त्रियाँ, 4 भवनवासिनी देवियाँ 5 व्यंतरणी देवियाँ, 6 ज्योतिष्किणी देवियाँ 7 भवनवासी देव, 8 व्यंतर देव, 9 ज्योतिष्क देव, 10 कल्पवासी देव, 11 मनुष्य और 12 पशु इन बारह गणों के बैठने योग्य बारह सभाएं होती हैं ।।193।।
The Arahantadeva, by their very nature, is seated in the Samavasarana Bhumi facing either the east or the north. Surrounding them in a circumambulatory manner, in sequential order, are twelve assemblies designated for twelve groups:
- The enlightened Gaṇadharas and other ascetic sages,
- Kalpavasini goddesses,
- Āryikās (female ascetics) – human women,
- Bhavanavāsinī goddesses,
- Vyantarī goddesses,
- Jyotiṣkiṇī goddesses,
- Bhavanavāsin gods,
- Vyantara gods,
- Jyotiṣka gods,
- Kalpavāsi gods,ौॆ
- Humans, and
- Animals.
These twelve groups have their designated twelve assemblies around the divine Samavasarana. ( 193)
श्लोक ( Shlok ) 194
योगीन्द्रा रुन्द्रबोधा विबुधयुवतयः सार्यका राजपत्न्यो ज्योतिर्वन्येशकन्या भवनजवनिता भावना व्यन्तराश्च ।
ज्योतिष्काः कल्पनाथा नरवरवृषभास्तिर्यगौघैः सहामी कोष्ठेषूक्तेप्वतिष्ठन् जिनपतिममितो भक्तिमारावनम्राः ॥१९४॥
उनमें से पहले कोठे में अतिशय ज्ञान के धारक गणधर आदि मुनिराज, दूसरे में कल्पवासी देवों की देवांगनाएँ, तीसरे में आर्यिकासहित राजाओं की स्त्रियाँ तथा साधारण मनुष्यों की स्त्रियां, चौथे में ज्योतिष देवों की देवांगनाएँ, पाँचवें में व्यंतर देवों की देवांगनाएँ, छठे में भवनवासी देवों की देवांगनाएँ, सातवें में भवनवासी देव, आठवें में व्यंतरदेव, नवें में ज्योतिषी देव, दसवें में कल्पवासी देव, ग्यारहवें में चक्रवर्ती आदि श्रेष्ठ मनुष्य और बारहवें में पशु बैठते हैं । ये सब ऊपर कहे हुए कोठों में भक्तिभार से नम्रीभूत होकर जिनेंद्र भगवान् के चारों ओर बैठा करते हैं ।।194।।
In the first enclosure sit the Gaṇadharas and other ascetic sages who possess extraordinary knowledge.
In the second, the celestial maidens (Devāṅganās) of the Kalpavāsi gods.
In the third, the wives of kings along with Āryikās (female ascetics) and the wives of ordinary humans.
In the fourth, the celestial maidens of the Jyotiṣa gods.
In the fifth, the celestial maidens of the Vyantara gods.
In the sixth, the celestial maidens of the Bhavanavāsin gods.
In the seventh, the Bhavanavāsin gods themselves.
In the eighth, the Vyantara gods.
In the ninth, the Jyotiṣka gods.
In the tenth, the Kalpavāsi gods.
In the eleventh, the Chakravarti (universal monarchs) and other distinguished humans.
In the twelfth, animals.
All of these beings, seated in their respective enclosures, bow in devotion and reverence around the Jina Lord. ( 194)
श्लोक ( Shlok ) 195
भादुःष्य द्वाङ्मयूखैर्विंघटिततिमिरो धूतसंसाररात्रि-स्तत्संध्या संधिकल्पां मुहुरपघटयन् “क्षैणमोहीमवस्थाम् ।
सञ्ज्ञानोदग्रसादि प्रतिनियत नयोद्वेगसप्ति प्रयुक्त -स्याद्वादस्यन्दनस्यो भृशमथ रुरुचे भव्यबन्धुर्जिनार्कः ॥१९५॥
तदनंतर जिन्होंने प्रकट होते हुए वचनरूपी किरणों से अंधकार को नष्ट कर दिया है, संसाररूपी रात्रि को दूर हटा दिया है और उस रात्रि की संध्या संधि के समान क्षीणमोह नामक बारहवें गुणस्थान की अवस्था को भी दूर कर दिया है जो सम्यग्ज्ञानरूपी उत्तम सारथि के द्वारा वश में किये हुए सात नयरूपी वेगशाली घोड़ों से जुते हुए स्याद्वादरूपी रथ पर सवार हैं और जो भव्य जीवों के बंधु है ऐसे श्री जिनेंद्रदेवरूपी सूर्य अतिशय दैदीप्यमान हो रहे थे ।।195।।
Thereafter, the radiant Lord Jinedra, like a resplendent sun, shone brilliantly. His words, like luminous rays, dispelled the darkness of ignorance, removed the night of worldly existence, and even eliminated the twilight-like state of the twelfth Guṇasthāna (stage of spiritual development), known as Kṣīṇamoha (the stage where delusion is almost eradicated).
Seated in the divine chariot of Syādvāda (the doctrine of conditional predication), which is harnessed with seven powerful horses representing the seven Nayas (perspectives of truth), and guided by the excellent charioteer of Samyakjñāna (right knowledge), he illuminated the path of liberation. As a compassionate friend to all worthy souls, he radiated supreme brilliance and grace. ( 195)
श्लोक ( Shlok ) 196
इत्युच्चैः संगृहीतां समवसृतिमहीं धर्मचक्रादिभर्तु-र्भव्यात्मा संस्मरेद्यः स्तुतिमुखरमुखो भक्तिनम्रेण मूर्ध्ना । जैनीं लक्ष्मीमचिन्त्यां सकलगुणमयीं प्राश्नुतेऽसौ महर्द्धिं चूडाभिर्नाकभाजां मणिमुकुटजुषामर्चिंतां स्त्रग्धराभिः ॥ १९६॥
इस प्रकार ऊपर जिसका संग्रह किया गया है ऐसी, धर्मचक्र के अधिपति जिनेंद्र भगवान् की इस समवसरण-भूमि का जो भव्य जीव भक्ति से मस्तक झुकाकर स्तुति से मुख को शब्दायमान करता हुआ स्मरण करता है वह अवश्य ही मणिमय मुकुटों से सहित देवों के माला को धारण करने वाले मस्तकों के द्वारा पूज्य, समस्त गुणों से भरपूर और बड़ी-बड़ी ऋद्धियों से युक्त जिनेंद्र भगवान् की लक्ष्मी अर्थात् अर्हंत अवस्था की विभूति को प्राप्त करता है ।।196।।
Thus, the divine Samavasarana Bhumi of Lord Jinedra, the sovereign of the Dharma Chakra, has been described above. Any noble soul (Bhavya Jiva) who, with devotion, bows their head in reverence, utters praises with a voice filled with devotion, and remembers this sacred assembly is sure to attain the supreme fortune of the Arhant state.
Such a devotee becomes worthy of veneration by celestial beings, whose jewel-adorned crowns bow in respect. They become endowed with all virtues and blessed with immense supernatural powers (Ṛddhis), ultimately attaining the glorious splendor of Lord Jinedra’s divine state. ( 196)
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे भगवत्समवसृतिविभूतिवर्णनं नाम त्रयोविंशे पर्व ॥२३॥
इस प्रकार आर्षनाम से प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण के संग्रह में समवसरणविभूति का वर्णन करने वाला तेईसवां पर्व समाप्त हुआ ।।23।।
Thus, the twenty-third canto, describing the glory of Samavasarana, concludes in the renowned Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Mahāpurāṇa, composed by the revered Bhagavān Jinsenācārya. (Canto 23 )
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन
पर्व 24 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191