आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
श्लोक 224 से 231 हिरण्योत्कृष्ट जन्मता और मन्दराभिषेक-गुरुपूजन-यौवराज्य क्रिया
हिरण्योत्कृष्ट जन्मता क्रिया में भगवान गर्भ में रहते हुए तीन ज्ञान धारण करते हैं और सुवर्ण वर्षा से जन्म की उत्कृष्टता प्रकट करते हैं। उनकी माता विश्वेश्वरी, महादेवी आदि नामों से जानी जाती है, और श्री, बुद्धि, धृति आदि छह देवियां उनकी सेवा करती हैं। मन्दराभिषेक क्रिया में जन्म के बाद इंद्र मेरु पर्वत पर क्षीरसागर के जल से भगवान का अभिषेक करते हैं। गुरुपूजन क्रिया में भगवान बिना शिष्य भाव के गुरु बनते हैं, और इंद्र उनकी पूजा करते हैं। यौवराज्य क्रिया में कुमारकाल में भगवान को युवराज पद प्राप्त होता है, और उनका राज्यपट्ट बंधन व अभिषेक होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 224 to 231
श्लोक ( Shlok ) 224
हिरण्यसूचितोत्कृष्टजन्यत्वात् स तथा श्रुतिम्। बिभ्राणां तां क्रियां धत्ते गर्भस्थोऽपि त्रिबोधभृत् ॥२२४।॥इति हिरण्यजन्मता ।
जो गर्भमें स्थित रहते हुए भी तीन ज्ञानको धारण करनेवाले हैं ऐसे भगवान्, हिरण्य अर्थात् सुवर्णकी वर्षासे जन्मकी उत्कृष्टता सूचित होनेके कारण हिरण्योत्कृष्ट जन्म इस सार्थक नामको धारण करनेवाली क्रियाको धारण करते हैं ।। २२४।।यह उनतालीसवीं हिरण्योत्कृष्ट जन्मता क्रिया है ।
The Lord who, even while dwelling in the womb, possesses the threefold knowledge—such a divine being, whose birth is heralded by a shower of gold, is known by the illustrious name Hiraṇyotkṛṣṭa (Supreme Golden Birth),and thus is honored with the rite bearing this sacred title.This is the thirty-ninth Hiraṇyotkṛṣṭa Janmātta Kriyā—the Supreme Golden Birth Rite.224
श्लोक ( Shlok ) 225
‘विश्वेश्वरा जगन्माता महादेवी महासती । पूज्या सुमङ्गला चेति धत्ते रूढि जिनाम्बिका ॥ २२५॥
उस समय वह भगवान्की माता विश्वेश्वरी, जगन्माता, महादेवी, महासती, पूज्या और सुमंगला इत्यादि नामोंको धारण करती है ॥ २२५॥
At that divine moment, the mother of the Lord assumes exalted titles—Viśveśvarī, Sovereign of the Universe; Jaganmātā, Mother of Worlds; Mahādevī, the Great Goddess; Mahāsatī, the Supreme Chaste One; Pūjyā, the Venerable; and Sumangalā, the Auspicious and Blessed.225
श्लोक ( Shlok ) 226
कुलाद्रिनिलया देव्यः श्रीह्रोधीधृतिकीर्तयः । समं लक्ष्म्या षडेताश्च सम्मता जिनमातृकाः ॥२२६॥
कुलाचलोंपर रहनेवाली श्री, ही, बुद्धि, धृति, कीति और लक्ष्मी ये छह देवियां जिनमातृका अर्थात् जिनमाताकी सेवा करनेवाली कहलाती हैं ।॥ २२६॥
The six goddesses—Śrī, Hrī, Buddhi, Dhṛti, Kīrti, and Lakṣmī—residing upon the lofty peaks of the Kulācalas,are known as attendants in the divine service of the Jinamātṛkā, the Sacred Mother of the Jina. 226
श्लोक ( Shlok ) 227 – 228
जन्मानन्तरमायातैः सुरेन्द्रैर्मेरुमूर्द्धनि । योऽभिषेकविधिः क्षीरपयोधेःमध्वरे शुचिभिर्जलैः ॥ २२७॥मन्दरेन्द्राभिषेकोऽसौ क्रियाऽस्य परमेष्ठिनः । सा पुनः सुप्रतीतत्वात् भूयो नेह प्रतन्यते ॥ २२८॥इति मन्दरेन्द्राभिषेकः ।
जन्मके अनन्तर आये हुए इन्द्रोंके द्वारा मेरु पर्वतके मस्तक पर क्षीरसागरके पवित्र जलसे भगवान्का जो अभिषेक किया जाता है वह उन परमेष्ठीकी मन्दराभिषेक क्रिया है। वह क्रिया अत्यन्त प्रसिद्ध है इसलिये यहां उसका फिरसे विस्तार नहीं किया जाता है ।। २२७-२२८।। यह चालीसवीं मन्दराभिषेक क्रिया है ।
After the divine birth, the Indras who arrive perform the sacred Abhiṣeka of the Lord atop the summit of Mount Meru,using the sanctified waters of the Ocean of Milk. This solemn rite is known as the Mandarābhiṣeka Kriyā—the Holy Anointment of the Supreme Being.So renowned is this rite among the exalted that further elaboration is deemed unnecessary.This is the fortieth rite, the Mandarābhiṣeka Kriyā.227 – 228
श्लोक ( Shlok ) 229
ततो विद्योपदेशोऽस्य स्वतन्त्रस्य स्वयम्भुवः । शिष्यभावव्यतिक्रान्तिः गुरुपूजोपलम्भनम् ॥२२९॥
तदनन्तर स्वतंत्र और स्वयंभू रहनेवाले भगवान्के विद्याओंको उपदेश होता है वे शिष्यभावके बिना ही गुरुकी पूजाको प्राप्त होते हैं अर्थात् किसीके शिष्य हुए बिना ही सबके गुरु कहलाने लगते हैं ।॥ २२९।।
Thereafter, the Lord—independent and self-manifest—receives the revelations of the sacred Vidyās (divine knowledges).Without ever assuming the role of a disciple, He is venerated as a Guru by all;for though none have instructed Him, He becomes the teacher of all.229
श्लोक ( Shlok ) 230
तदेन्द्राः पूजयन्त्येनं त्रातारं त्रिजगद्गुरुम् । अशिक्षितोऽपि देवत्व सम्मतोऽसीति विस्मिताः ॥२३०॥इति गुरुपूजनम् ।
उस समय इन्द्र लोग आकर हे देव, आप अशिक्षित होनेपर भी सबको मान्य हैं इस प्रकार आश्र्चर्यको प्राप्त होते हुए सबकी रक्षा करनेवाले और तीनों जगत्के गुरु भगवान् की पूजा करते हैं ॥ २३०॥ यह इकतालीसवीं गुरुपूजन क्रिया है।
At that time, the Indras approach and, marvelling, exclaim, “O Lord! Though untaught, You are revered by all!”Thus awestruck, they worship the Lord—Protector of all beings,and the Guru of the three worlds.This is the forty-first rite, known as Guru-pūjana Kriyā—the Worship of the Supreme Preceptor. 230
श्लोक ( Shlok ) 231
ततः कुमारकालेऽस्य यौवराज्योवलम्भनम् । पट्टबन्धोऽभिष कश्च तदास्य स्यान्महौजसः ॥२३१॥ इति यौवराज्यम् ।
तदनन्तर कुमारकाल आनेपर उन्हें युवराजपदकी प्राप्ति होती है, उस समय महा-प्रतापवान् उन भगवान्के राज्यपट्ट बांधा जाता है और अभिषेक किया जाता है ।। २३१।। यह बियालीसवीं यौवराज्य क्रिया है।
Thereafter, upon the arrival of his princely youth, the Lord—resplendent in supreme majesty—is anointed and invested with the dignity of Crown Prince.At that sacred hour, the royal diadem is bound upon His head, and He is consecrated with regal ceremony.
This is the forty-second rite, known as the Yauvarājya Kriyā—the Rite of Royal Investiture. 231
श्लोक 232 से 240
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
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