आदिपुराण एकविंशं पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 21 by Acharya Jinasena
पर्व 21 में ध्यान के प्रकार, ध्याता, ध्येय, और सिद्धि का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 268)
राजा श्रेणिक ने गौतम गणधर से ध्यान का स्वरूप पूछा। गौतम ने ध्यान को कर्मक्षय का साधन बताया। चित्त का निरोध ध्यान है। यह चार प्रकार का है: आर्त, रौद्र, धर्म्य, और शुक्ल। आर्त और रौद्र अशुभ हैं। धर्म्य और शुक्ल मोक्ष के साधन हैं। आर्तध्यान दुःख से उत्पन्न होता है। रौद्रध्यान क्रूरता से होता है। मुनि एकांत में पर्यंक आसन से ध्यान करते हैं। ध्याता वैरागी और शास्त्रज्ञ होता है। ध्येय आत्मतत्त्व, सिद्ध, और अर्हंत हैं। धर्म्यध्यान चार भेदों का है: आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, और संस्थानविचय। यह चौथे से सातवें गुणस्थान में होता है। इसका फल स्वर्ग और मोक्ष है। शुक्लध्यान दो प्रकार का है: शुक्ल और परम शुक्ल। पहले शुक्लध्यान के दो भेद हैं: पृथक्त्ववितर्क और एकत्ववितर्क। यह आठवें से बारहवें गुणस्थान में होता है। परम शुक्लध्यान केवलियों का है। वे योग निरोध कर निर्वाण पाते हैं। सिद्ध शुद्ध और सुखी होते हैं। ध्यान से कर्म नष्ट होते हैं। ऋषियों ने अन्य ध्यान पूछे। गौतम ने योग, समाधि, और बीजाक्षर बताए। ‘अर्हं’ आदि बीज मोक्ष देते हैं। अन्य मतों में ध्यान सिद्ध नहीं होता। स्याद्वाद में ही ध्यान संभव है। अर्हंत आप्त और सर्वज्ञ हैं। गौतम के उपदेश से मुनि संतुष्ट हुए और वृषभदेव की स्तुति की।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 21
श्लोक 1 से 11 श्रेणिक का प्रश्न और गौतम का उपदेश
राजा श्रेणिक ने गौतम गणधर से ध्यान का स्वरूप पूछा। उन्होंने ध्यान के लक्षण, भेद, स्वामी, समय, हेतु, और फल के बारे में जानना चाहा। गौतम ने कहा कि ध्यान कर्मों का क्षय करता है। चित्त का निरोध ध्यान है। यह अंतर्मुहूर्त तक रहता है। स्थिर चित्त ध्यान है, चंचल चित्त अनुप्रेक्षा है। यह बारहवें गुणस्थान तक होता है। बुद्धि के अधीन वृत्ति ही ध्यान है।
श्लोक 12 से 21 ध्यान की निरुक्ति और आलंबन
ध्यान के पर्याय शब्द योग, समाधि आदि हैं। आत्मा का परिणाम ध्यान है। करण, कर्तृ, और भाव से इसकी निरुक्ति होती है। ध्यान ज्ञान की पर्याय है। यह दर्शन, सुख, वीर्य को धारण करता है। चैतन्य से भिन्न होकर प्रकाशमान होता है। समस्त तत्त्व इसके आलंबन हैं। आत्मतत्त्व का चिंतवन विशुद्धि के लिए है। यह बंध नष्ट कर मुक्ति देता है। सभी पदार्थ ध्येय हैं।
श्लोक 22 से 31 शुभ और अशुभ ध्यान
शुभ चिंतवन ही ध्यान है। अशुभ चिंतवन असद्ध्यान है। तत्त्व न जानने वाला संक्लेश करता है। संकल्प से राग-द्वेष और बंध होता है। तृष्णा संकल्प है। तत्त्वार्थ भावना से ध्यान शुद्ध होता है। ध्यान प्रशस्त और अप्रशस्त दो प्रकार का है। यह आर्त, रौद्र, धर्म्य, शुक्ल चार भेदों में है। आर्त और रौद्र छोड़ने योग्य हैं। धर्म्य और शुक्ल ग्रहण करने योग्य हैं।
श्लोक 32 से 41 आर्तध्यान का वर्णन
आर्तध्यान चार प्रकार का है। इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग, निदान, और वेदना से यह होता है। इष्ट के लिए चिंतवन पहला आर्तध्यान है। अनिष्ट वियोग के लिए चिंतवन दूसरा है। भोगाकांक्षा तीसरा है। वेदना दूर करने का चिंतवन चौथा है। यह कषाय से छठवें गुणस्थान तक होता है। यह अशुभ लेश्या से उत्पन्न होता है। इसका फल तिर्यंच गति है। परिग्रह, कृपणता इसके चिह्न हैं।
श्लोक 42 से 51 रौद्रध्यान का वर्णन
रौद्रध्यान क्रूर पुरुष का होता है। यह चार प्रकार का है। हिंसानंद, मृषानंद, स्तेयानंद, और संरक्षणानंद इसके भेद हैं। यह पाँचवें गुणस्थान तक होता है। अशुभ लेश्या से उत्पन्न होता है। हिंसा, झूठ, चोरी, परिग्रह रक्षा इसके लक्षण हैं। हिंसक अपने आत्मा का घात करता है। क्रूरता, कठोर वचन इसके चिह्न हैं।
श्लोक 52 से 64 ध्यान की तैयारी
रौद्रध्यान का फल नरकगति है। आर्त और रौद्र का त्याग करना चाहिए। धर्म्य और शुक्ल उत्तम हैं। मुनि एकांत, श्मशान, नदी किनारे पर ध्यान करते हैं। पर्यंक आसन से शरीर सम रखते हैं। हाथ ऊपर, आँखें संतुलित रखते हैं। धीरे श्वास लेते हैं। मन को हृदय आदि में स्थिर कर तत्त्वों का चिंतवन करते हैं।
श्लोक 65 से 71 ध्यान में आसन का महत्व
तीव्र प्राणायाम से चित्त व्याकुल होता है। मंद श्वास से ध्यान सिद्ध होता है। सम शरीर से समाधान रहता है। विषम शरीर से बुद्धि आकुल होती है। पर्यंक और कायोत्सर्ग आसन सुखकर हैं। विषम आसन से पीड़ा होती है। ये दोनों आसन ध्यान के लिए उत्तम हैं।
श्लोक 72 से 81 आसन और स्थान की व्यवस्था
पर्यंक आसन अधिक सुखकर है। बलवान सभी आसनों से ध्यान करते हैं। कायोत्सर्ग और पर्यंक अशक्तों के लिए हैं। शक्तिशाली को सभी आसन ठीक हैं। शरीर की अवस्था ध्यान के विरोधी न हो। एकांत स्थान निवास के योग्य है। शहर में चित्त व्याकुल होता है। वन में रहना उचित है। सभी काल ध्यान के लिए ठीक हैं।
श्लोक 82 से 95 ध्याता का लक्षण
ध्यान करने वाला मुनि अपनी अवस्था से सिद्ध होता है। वह बलवान, तपस्वी, शास्त्रज्ञ होता है। आर्त-रौद्र से दूर रहता है। प्रमादरहित, बुद्धिमान, धीर-वीर होता है। वैरागी, सम्यग्ज्ञानी, व्रती होता है। कषायों से मुक्त, अनित्य का चिंतवन करता है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र से मोह से बचता है।
श्लोक 96 से 111 ध्यान की भावनाएँ और ध्येय
ज्ञान की पाँच भावनाएँ शास्त्र पठन आदि हैं। सम्यग्दर्शन की सात भावनाएँ भय, शांति आदि हैं। चारित्र की भावनाएँ समिति, गुप्ति, और परीषह हैं। वैराग्य की भावनाएँ विषय त्याग आदि हैं। इनसे मुनि की बुद्धि स्थिर होती है। चौदह पूर्व जानने वाला ध्याता उत्तम है। अल्पश्रुत भी ध्याता हो सकता है। यह मुनि शुक्लध्यान को प्राप्त करता है। तत्त्व, सात तत्त्व, और शास्त्र ध्येय हैं। शब्द, अर्थ, ज्ञान ध्येय हैं।
श्लोक 112 से 120 : सिद्ध और अर्हंत ध्येय
सिद्ध परमेष्ठी ध्यान करने योग्य हैं। वे कर्ममल से मुक्त और विशुद्ध हैं। अनंत गुणों से युक्त हैं। सूक्ष्म पर प्रकट हैं। वे कल्याणकारी और सर्वज्ञ हैं। साकार और निराकार हैं। रत्नमय दर्पण जैसे स्पष्ट हैं। वे संसार नष्ट करते हैं। अर्हंत जिनेंद्र भी ध्येय हैं।
श्लोक 121 से 131 : अर्हंत के गुण
अर्हंत राग-विद्या को जीतते हैं। वे सिद्ध, बुद्ध, विश्वदर्शी हैं। केवलज्ञान उनका नेत्र है। समवसरण में विराजते हैं। अष्ट प्रातिहार्य उनकी प्रभुता दिखाते हैं। वे विश्वरूप और विश्वव्यापी हैं। निःस्पृह, नित्य, और अविनाशी हैं। ये गुण धर्म्य और शुक्लध्यान के ध्येय हैं। विशुद्धि में भेद है।
श्लोक 132 से 141 धर्म्यध्यान के भेद
ध्यान मुक्ति का कारण है। यह धर्म्य और शुक्ल दो प्रकार का है। वस्तु का स्वरूप धर्म है। धर्म्यध्यान चार भेदों का है। आज्ञाविचय आगम का ध्यान है। आगम सूक्ष्म पदार्थों को प्रकाशित करता है। मुनि आगम का ध्यान करता है। अपायविचय संसार के दुःखों का चिंतवन है।
श्लोक 142 से 151 धर्म्यध्यान का विस्तार
अपायविचय में उपायों का चिंतवन है। विपाकविचय कर्मों के उदय का ध्यान है। कर्म स्वयं और तप से फल देते हैं। संस्थानविचय लोक के आकार का चिंतवन है। मुनि लोक की रचना और जीवों का ध्यान करता है। संसार दुस्तर और गंभीर है।
श्लोक 152 से 161 धर्म्यध्यान का स्वरूप
आगम का विस्तार ध्येय है। धर्म्यध्यान अप्रमत्त अवस्था में होता है। यह शुभ लेश्या से चौथे से छठे गुणस्थान में होता है। इसका फल उत्तम है। प्रसन्नता इसके चिह्न हैं। अनुप्रेक्षाएँ इसके अंतरंग चिह्न हैं।
श्लोक 162 से 171 धर्म्यध्यान का फल
धर्म्यध्यान से अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है। यह स्वर्ग और मोक्ष देता है। ध्यान छूटने पर भावनाओं का चिंतवन करना चाहिए। गौतम ने श्रेणिक को धर्म्यध्यान समझाया। शुक्लध्यान मोक्ष का कारण है। यह शुक्ल और परम शुक्ल दो भेदों का है। पहले शुक्लध्यान के दो भेद हैं।
श्लोक 172 से 182 शुक्लध्यान के भेद
पृथक्त्ववितर्क में शास्त्र का संक्रमण होता है। एकत्ववितर्क में संक्रमण नहीं होता। मुनि शब्द और योग बदलता है। चौदह पूर्व जानने वाला इसे धारण करता है। श्रुतस्कंध इसका ध्येय है। मोह का क्षय इसका फल है। यह आठवें से बारहवें गुणस्थान में होता है।
श्लोक 183 से 191 एकत्ववितर्क और परम शुक्ल
एकत्ववितर्क कषायमुक्त मुनि का है। यह केवलज्ञान देता है। यह बारहवें गुणस्थान में होता है। परम शुक्ल केवलियों का है। वे योग निरोध से समुद्घात करते हैं। आत्मा लोक को व्याप्त करती है। वे पूरक और रेचक अवस्था में पूज्य हैं।
श्लोक 192 से 205 परम शुक्लध्यान और सिद्ध अवस्था
केवली भगवान लोक को पूर्ण कर संकोच करते हैं। वे अघातिया कर्मों को नष्ट करते हैं। योग का निरोध कर तीसरा शुक्लध्यान करते हैं। फिर चौथा शुक्लध्यान प्राप्त करते हैं। इसमें कर्म नष्ट कर निर्वाण पाते हैं। चौदहवें गुणस्थान में कर्मप्रकृतियाँ नष्ट होती हैं। वे शुद्ध और मुक्त होकर लोकांत में निवास करते हैं। सिद्ध अनंत सुख में रहते हैं।
श्लोक 206 से 211 सिद्धों का सुख
सिद्धों के पर्याय शब्द कृतार्थ आदि हैं। उनका सुख अतींद्रिय है। वेदनाओं का अभाव होता है। शुद्ध आत्मा का सुख नित्य है। स्वास्थ्य ही सुख है। वे क्लेशरहित होने से अबाध्य हैं।
श्लोक 212 से 221 ध्यान का महत्व और प्रश्न
ध्यान से कर्म नष्ट होते हैं। यह कर्मरूपी विष को हरता है। ग्यारह तप इसके सहायक हैं। श्रेणिक संतुष्ट हुए। ऋषियों ने गौतम से अन्य ध्यान पूछे। वे विप्रतिपत्तियाँ दूर करना चाहते थे। गौतम को ऋषि, यति कहा। वे योग का निराकरण चाहते थे। गौतम ने तत्त्व स्पष्ट करने का वचन दिया।
श्लोक 222 से 231 योग के तत्त्व
योगवादी से योग, समाधि आदि पूछना चाहिए। योग काय, वचन, मन की क्रिया है। समाधि चित्त का स्थिर होना है। प्राणायाम योग का निग्रह है। धारणा बीजाक्षरों का अवधारण है। आध्यान भावनाओं का चिंतवन है। ध्येय शुद्ध आत्मतत्त्व है। स्मृति तत्त्वों का स्मरण है। ‘अर्हं’ बीज का ध्यान दुःख हरता है।
श्लोक 232 से 242 जाक्षर और योग का निराकरण
‘अर्हद्भ्यो नमः’ से अर्हंत अवस्था मिलती है। ‘नमः सिद्धेभ्यः’ मनोरथ पूर्ण करता है। ‘नमोऽर्हत्परमेष्ठिने’ दुःख हरता है। पंच परमेष्ठियों का बीज मोक्ष देता है। यह ब्रह्मतत्त्व को जानने में सहायक है। ध्यान से आनंद और ऋद्धियाँ मिलती हैं। बीज न जानने वाला बंधन में रहता है। अन्य मतों में जीव नित्य हो तो ध्यान असंभव है।
श्लोक 243 से 251 अन्य मतों का खंडन
अनित्य जीव में ध्यान सिद्ध नहीं होता। क्षणिक वृत्ति स्मरण नहीं कर सकती। पुद्गलवाद में ध्याता सिद्ध नहीं होता। विज्ञानाद्वैत में विषय के अभाव से ध्यान नहीं होता। शून्यवाद में कोई ध्यान नहीं कर सकता। सांख्य में चैतन्यरहित आत्मा ध्येय नहीं बनती।
श्लोक 252 से 261 स्याद्वाद और अर्हंत की महिमा
द्वैत-अद्वैत में ध्यान सिद्ध नहीं होता। स्याद्वाद में ही ध्यान संभव है। जीव द्रव्य से नित्य, पर्याय से अनित्य है। स्याद्वादी ही ध्यान सिद्ध करते हैं। अर्हंत मोह पर विजयी हैं। वे आप्त, सर्वज्ञ, और कल्याणकारी हैं। उनके अनेक नाम हैं।
श्लोक 262 से 268 अर्हंत और गौतम का उपदेश
अर्हंत का रूप प्रकाशमान है। उनका मुख शासकपना सिखाता है। गौतम ने ध्यानतत्त्व का निरूपण किया। मुनि संतुष्ट हुए। वे गौतम और वृषभदेव की स्तुति कर उनकी लक्ष्मी सुनने को तैयार हुए।
पर्व 22
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