आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 व्रतियों का सम्मान और पूजा के प्रकार
भरत ने व्रतियों का सम्मान किया, जिससे वे अपने व्रतों में और दृढ़ हुए। उन्होंने उपासकाध्ययनांग से इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम, और तप का उपदेश दिया। अर्हंत भगवान की पूजा चार प्रकार की बताई गई: सदार्चन (नित्यमह), चतुर्मुख, कल्पद्रुम, और आष्टाह्निक। सदार्चन में प्रतिदिन जिनालय में पूजा, मंदिर निर्माण, और दान शामिल हैं। चतुर्मुख यज्ञ राजाओं द्वारा किया जाता है, और कल्पद्रुम यज्ञ में चक्रवर्ती सभी की इच्छाएं पूरी करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
गुणभूमिकृताद् भेदात्” क्लृप्त यज्ञोपवीतिनाम् । सत्कारः क्रियते स्मैषामव्रताश्च बहिः कृताः ।।२२॥
प्रतिमाओंके द्वारा किये हुए भेदके अनुसार जिन्होंने यज्ञोपवीत धारण किये हैं ऐसे इन सबका भरतने सत्कार किया तथा जो व्रती नहीं थे उन्हें वैसे ही जाने दिया ।।२२।।
According to the distinctions marked by their sacred emblems, Bharata honored all those who had donned the sacred thread; as for those who had not undertaken any vows, he let them be as they were. 22
श्लोक ( Shlok ) 23
अथ ते कृतसन्मानाः चक्रिणा व्रतधारिणः । भजन्ति स्म परं दाढर्य “लोकश्चनानपूजयत् ॥२३॥
अथानन्तर चक्रवर्तीने जिनका सन्मान किया है ऐसे व्रत धारण करनेवाले वे लोग अपने अपने व्रतोंमें और भी दृढ़ताको प्राप्त हो गये तथा अन्य लोग भी उनकी पूजा आदि करने लगे ॥२३॥
Thereafter, those who had undertaken vows and had been honored by the Emperor grew yet more steadfast in their observances; and even the others began to revere and pay homage to them.23
श्लोक ( Shlok ) 24
इज्यां वार्ता च दंत्ति च स्वाध्यायं संयमं तपः । श्रुतोपासकसूत्रत्वात् स तेभ्यः समुपादिशत् ॥२४॥
भरतने उन्हें उपासकाध्ययनांगसे इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम और तपका उपदेश दिया ।। २४।।
He then instructed them in sacrificial rites, noble vocations, truthfulness, scriptural study, self-restraint, and austerity—for they were now fit to be disciples, having approached with reverence and devotion to sacred knowledge.24
श्लोक ( Shlok ) 25
कुलधर्मोऽयमित्येषामर्हत्पूजादिवर्णनम् । तदा भरतरार्षिरन्ववोचदनुक्रमात् ॥२५॥
यह इनका कुलधर्म है ऐसा विचार कर राजर्षि भरतने उस समय अनुक्रमसे अर्हपूजा आदिका वर्णन किया ॥२५॥
Deeming these to be their ancestral duties, the royal sage Bharata then proceeded to expound, in due order, the rites of worship to the Worthy Ones and other sacred observances.25
श्लोक ( Shlok ) 26
प्रोक्ता पूजार्हता’ मिज्या सा चतुर्धा सदार्चनम् । चतुर्मुखमहः कल्पद्रुमाश्चाष्टाह्निकोऽपि च ॥२६॥
वे कहने लगे कि अर्हन्त भगवान की पूजा नित्य करनी चाहिये, वह पूजा चार प्रकारकी है सदार्चन, चतुर्मुख, कल्पद्रुम और आष्टाह्निक ॥२६॥
They declared that the worship of the Blessed Arhats must be performed daily. This worship is of four kinds: Sadārchana (constant adoration), Chaturmukha (fourfold homage), Kalpadruma (wish-fulfilling rite), and Ashtāhnika (the eight-day observance).
श्लोक ( Shlok ) 27
-तत्र नित्यमहो नाम शश्वज्जिनगृहं प्रति । स्वगृहान्नीयमानाऽर्चा गन्धपुष्पाक्षतादिका ॥२७॥
इन चारों पूजाओंमेंसे प्रतिदिन अपने घरसे गन्ध, पुष्प, अक्षत इत्यादि ले जाकर जिनालयमें श्री जिनेन्द्रदेवकी पूजा करना सदार्चन अर्थात् नित्यमह कहलाता है ॥२७॥
Of these four forms of worship, the daily offering of fragrance, flowers, rice-grains, and the like—brought from one’s home to the temple for the veneration of Lord Jina—is known as Sadārchana, or the sacred daily rite.27
श्लोक ( Shlok ) 28
चैत्यचैत्यालयादीनां भक्त्या निर्मापणं च यत् । शासनीकृत्य दानं च ग्रामादीनां सदार्चनम् ॥२८॥
अथवा भक्तिपूर्वक अर्हन्तदेवकी प्रतिमा और मन्दिरका निर्माण कराना तथा दानपत्र लिख-कर ग्राम खेत आदिका दान देना भी सदार्चन (नित्यमह) कहलाता है ।। २८॥
Alternatively, the devout construction of a temple and an image of the Blessed Arhat, along with the endowment of villages, fields, and other gifts through formal deeds of donation—this too is known as Sadārchana, the sacred daily rite.28
श्लोक ( Shlok ) 29
या च पूजा मुनीन्द्राणां नित्यदानानुषङ्गिणी। स च नित्यमहो ज्ञेयो यथा शक्त्युपकल्पितः ॥२९॥
इसके सिवाय अपनी शक्तिके अनुसार नित्य दान देते हुए महामुनियोंकी जो पूजा की जाती है उसे भी नित्य-मह समझना चाहिये ।। २९ ।।
Moreover, the daily offering of gifts according to one’s means, and the reverent worship of the great sages—this too must be regarded as Nitya-maha, the sacred daily rite.29
श्लोक ( Shlok ) 30
महामुकुटबद्धैश्च क्रियमाणो महामहः । चतुर्मुखः स विज्ञेयः सर्वतोभद्र इत्यपि ॥३०॥
महामुकुटबद्ध राजाओंके द्वारा जो महायज्ञ किया जाता है उसे चतुर्मुख यज्ञ जानना चाहिये। इसका दूसरा नाम सर्वतोभद्र भी है ॥ ३०॥
The grand sacrifice performed by sovereign kings adorned with mighty crowns is to be known as the Chaturmukha Yajña—the Fourfold Sacrifice; it is also known by another name: Sarvatobhadra, the Rite Auspicious in All Directions.30
श्लोक ( Shlok ) 31
दत्वा किमिच्छकं दानं सम्राङ्भिर्यः प्रवर्त्यते । कल्पद्रुममहः सोऽयं जगदाशाप्रपूरणः ॥३१॥
जो चक्रवतियों-के द्वारा किमिच्छक (मुंहमांगा) दान देकर किया जाता है और जिसमें जगत्के समस्त जीवों-की आशाएं पूर्ण की जाती हैं वह कल्पद्रुम नामका यज्ञ कहलाता है। भावार्थ – जिस यज्ञमें कल्पवृक्षके समान सबकी इच्छाएं पूर्ण की जावें उसे कल्पद्रुम यज्ञ कहते हैं, यह यज्ञ चक्रवर्ती ही कर सकते हैं ।। ३१।।
That sacrifice wherein sovereign emperors, through boundless generosity, bestow gifts as freely as desired—fulfilling the hopes of all beings in the world—is known as the Kalpadruma Yajña, the Wish-Fulfilling Rite.
(Explanation): A sacrifice akin to the celestial wish-granting tree, in which all desires are fulfilled—such a rite is called Kalpadruma, and it can be performed only by a Chakravartin (Universal Monarch).31
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 | कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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