Hindi Translation of Adi purana Parv 33
श्लोक 1 से 11 अयोध्या की ओर प्रस्थान
अथानन्तर-जिन्होंने समस्त राजा विद्याधर और देवोंको नम्रीभूत किया है तथा समस्त दिग्विजयमें सफलता प्राप्त की है ऐसे श्रीमान् चक्रवर्ती भरत अपनी अयोध्यापुरीके प्रति लौटे ॥१॥ इन महाराज भरतको नौ निधियां और चौदह रत्न सिद्ध हुए थे तथा विद्या-धरोंके साथ साथ छह खण्डोंके समस्त राजा भी इनके वश हुए थे ।।२।। लवण समुद्र ही जिसकी मेखला है ऐसी इस समस्त पृथिवीको जीतकर चक्रवर्तीने अपने अयोध्या नगरकी ओर प्रस्थान किया ।।३।। ढलते हुए चमर ही जिसकी लहरें हैं और ऊपर चमकते हुए छत्र ही जिसके बबूले हैं ऐसी वह सेना गंगाके समान विजयार्ध पर्वतके तटसे निकली ॥४॥ हथिनीरूपी नावोंसे, घोड़ोंके समूहरूपी लहरोंसे और मनुष्योंके समूहरूपी छोटी छोटी तरङ्गोंसे दिशाओंको रोकता हुआ तथा खूब शब्द करता हुआ वह सेनारूपी समुद्र चारों ओर फैल गया ।।५।। उस समय चलते हुए रथोंके पहियोंके चीत्कार शब्दसे, घोड़ोंकी हिनहिनाहटसे और हाथियोंकी गर्जनासे शब्दाद्वैत हो रहा था अर्थात् सभी ओर एक शब्द ही शब्द नजर आ रहा था ।।६।। जिनका शब्द अतिशय गम्भीर है ऐसी प्रस्थान-कालको सूचित करनेवाली भेरियाँ मयूरोंको असमयमें ही बादलोंके गरजनेकी शंका बढ़ाती हुई शब्द कर रही थीं ।।७।। उस समय दौड़ते हुए हाथियों के समूहसे घोड़ोंका समूह रुक गया था और चलते हुए रथोंके समूहसे पैदल चलनेवाले सिपाहियों का समूह रुक गया था ॥८॥ पैदल सेनाके द्वारा जिन्हें कुछ बाधा की गई है ऐसे हाथी घोड़े और रथ-थोड़ी दूरतक कुछ तिरछे चलकर ठीक रास्तेपर आ रहे थे। भावार्थ-सामने पैदल मनुष्योंकी भीड़ देखकर हाथी घोड़े और रथ बगलसे बरक कर आगे निकल रहे थे ।।९।। जिनका मुकुट कुछ कुछ हिल रहा है और जिनकी कान्ति इन्द्रके समान है ऐसे चक्रवर्तीने पर्वत के समान ऊंचे विजय पर्वत नामके हाथीपर सवार होकर प्रस्थान किया ।।१०।। चक्रवर्ती की वह सेना गङ्गा नदीके किनारे किनारे अनेक देश, नदी और पर्वतोंको उल्लंघन करती हुईक्रमसे कैलास पर्वतके समीप जा पहुंची ।।११।।
श्लोक 12 से 27 कैलास पर्वत का दर्शन
तदनन्तर चक्रवर्तीने कैलास पर्वतको समीप ही देखकर सेनाओंको वहीं पासमें ठहरा दिया और स्वयं जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेके लिये प्रस्थान किया ।।१२।। जिस प्रकार सौधर्म इन्द्रके पीछे पीछे देदीप्यमान मुकुटको धारण करनेवाले अनेक देव जाते हैं उसी प्रकार आगे आगे जाते हुए अतिशय कान्तिमान् महाराज भरतके पीछे पीछे देदीप्यमान मुकुटको धारण करनेवाले अनेक राजा लोग जा रहे थे ॥१३॥ जिसकी कान्ति शरऋतुके बादलोंके समान है और इसीलिये जो जिनेन्द्र भगवान्के यशके समूहके समान जान पड़ता है ऐसे उस कैलास पर्वतको बहुत शीघ्र पाकर महाराज भरत बहुत ही प्रसन्न हुए ॥१४।। जो पड़ते हुए झरनोंके शब्दोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो समीप आकर तीनों जगत्के गुरु भगवान् वृषभदेवकी सेवा करो इस प्रकार देव लोगोंको आदरपूर्वक बुला ही रहा हो-जिनकी ऊँची ऊँची शाखाओंके अग्रभाग वायुके द्वारा हिल रहे हैं और जिनपर फूले हुए फूल उनके मन्द हास्यके समान मालूम होते हैं ऐसे अपने किनारेपर के वृक्षोंसे जो ऐसा जान पड़ता है मानो सन्तोषसे नृत्य ही कर रहा हो-जो किनारोंपरसे झरनोंके पड़नेसे ऐसा जान पड़ता है मानो जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना करनेके लिये चारों ओरसे आते हुए भव्य जीवों के समूहके लिये पैर धोनेके लिये जल देनेको ही उद्यत हुआ हो-जो शिखरोंसे विदीर्ण हुए बादलोंके समूहसे गिरते हुए जलसे ऐसा जान पड़ता है मानो दावानलके डरसे अपने समीपवर्ती लताओंके वनको सींच ही रहा हो-जो स्फटिक मणिके सफेद पत्थरोंसे बने हुए और आकाश को घेरनेवाले अपने ऊँचे ऊँचे शिखरोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो सूर्यकी गतिके फैलावको रोक ही रहा हो-जिनमें कहीं तो किन्नर जातिके देव संभोग कर रहे हैं, कहीं नागकुमार जाति के देव सेवा कर रहे हैं और कहीं विद्याधर लोग क्रीड़ा करते हैं ऐसे अनेक वनोंसे जिसकी शोभा प्रकट हो रही है-जो कहींपर कुछ कुछ नीलमणियोंकी किरणोंसे मिले हुए स्फटिक मणियोंके पत्थरोंसे देवोंको चन्द्रमण्डलकी आशंका उत्पन्न करता रहता है। जो कहींपर हरे रंगके मणियों की प्रभाके समूहसे और स्फटिक मणियोंकी प्रभाके समूहसे आकाशरूपी आंगनमें इन्द्रधनुष की रेखा लिख रहा था। कहींपर पद्मराग मणियोंकी किरणोंसे मिले हुए स्फटिक मणियोंकी किरणोंसे जिसके किनारेका समीपभाग कुछ कुछ लाली लिये हुए सफेद रंगका हो गया है औरइसलिये जो ऐसा जान पड़ता है मानो उसे किलास (कुष्ठ) रोग ही हो गया हो। जिनपर कहीं कहीं अनेक धातुओंके टुकड़े टूट-टूटकर पड़े हैं तथा जो सिंहोंके नखोंका आघात सहनेवाली हैं और इसलिये जो ऐसी जान पड़ती हैं मानो उनपर बहुतसा दाद हो गया हो ऐसी अनेक चट्टानों से जो व्याप्त हो रहा है। कहीं कहींपर जिनमें गुफाओंके भीतर गरजते हुए सिंहोंकी प्रतिध्वनि व्याप्त हो रही है और इसीलिये जिन्हें मदोन्मत्त हाथियोंने छोड़ दिया है ऐसे अनेक किनारोंको जो धारण कर रहा है-और जो कहीं कहींपर शरऋतुके बादलोंके भीतर रहनेवाली बिज-लियोंके समान स्फटिक मणियोंकी शिलाओंपर चलनेवाली देवांगनाओंको धारण कर रहा है – इस प्रकार अद्भुत शोभासे सहित उस कैलास पर्वतको देखकर चक्रवर्ती भरत बहुत ही आनन्दको प्राप्त हुए। और उसका खास कारण यह था कि वह चक्रवर्तीके समान ही अलंघ्य था और भूभृत अर्थात् पर्वतों (पक्षमें राजाओं) का अधिपति था ॥ १५-२७॥
श्लोक 28 से 41 पर्वत पर चढ़ाई और शोभा
धर्मबुद्धिको धारण करनेवाले महाराज भरत पर्वतके नीचे दूरसे ही सवारी आदि परिकरको छोड़कर पैदल चलने लगे ॥२८॥ पैदल ही पर्वतपर चढ़ते हुए भरतको थोड़ा भी खेद नहीं हुआ था सो ठीक ही है क्योंकि कल्याण चाहनेवाले पुरुषोंको आत्माका हित करनेवाली क्रियाओंका करना खेद के लिये नहीं होता है ॥ २९॥ स्वर्गकी सीढियोंके समान देवरूपी कारीगरोंके द्वारा बनाई हुई पवित्र मणिमयी सीढ़ियोंके द्वारा महाराज भरत उस कैलास पर्वतपर चढ़ रहे थे ॥३०॥ चढ़ते चढ़ते वे उस पर्वतके ऊपरकी भूमिपर जा पहुंचे और वहां उन्होंने वनकी पंक्तियोंमें वनकी शीतल वायु के द्वारा मानो अतिथिसत्कार ही प्राप्त किया था ॥३१॥ वहां उन्होंने कहीं तो फूले हुए मन्दार वनकी गलियोंमें घूमती हुई तथा फूलोंके पवित्र आभूषण धारण किये हुई वनदेवियोंको देखा ।॥३२॥ कहीं वनके भीतर अपने बच्चोंके साथ लेटी हुई और धीरे धीरे रोमन्थ करती हुई हरिणियोंको देखा ॥३३॥ कहीं लतागृहोंमें सोते हुए और एक जगह इकट्ठे हुए अजगरके उन बड़े बड़े बच्चोंको देखा जो कि उस पर्वतकी अंतड़ियोंके समहके समान जान पड़ते थे ।॥३४।। और कहींपर हाथियोंके मदसे सुवासित बड़ी बड़ी काली चट्टानोंको हाथी समझकर नखरूपी अंकुरोंसे विदारण करता हुआ सिंह देखा ॥ ३५॥ भरत महाराज कुछ दूर आगे चढ़कर जब पर्वतकी शोभा देखने लगे तब पुरोहितने अवसर पाकर नीचे लिये अनुसार वचन कहे ॥३६॥ हे देव, इस पर्वतके अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए उन प्रदेशोंको देखिये जिन पर कि देव लोग भी स्वर्गवासमें अनादर करते हुए क्रीड़ा कर रहे हैं ।। ३७।। समस्त लोकको उल्लंघन करनेवाली इस पर्वतकी महिमा इतनी ही नहुत है कि चर और अचर–सभीके गुरु भगवान् वृषभदेव इसपर विराजमान हैं ।। ३८।। यह महापर्वत अपनी गोदी अर्थात् नीचले मध्यभागमें रहनेवाली और जिनके नीले जलरूपी वस्त्र छूट रहे हैं ऐसी नदीरूपी स्त्रियोंको कामी पुरुपकी तरह सदा धारण करता है ।। ३९।। यह सिंह अहिंसक होनेपर भी केवल क्रीड़ा के लिये पर्वतकी गुफामेंसे एक बड़े भारी सर्पको खींच रहा है परन्तु लम्बा होनेसे खींचनेके लिये असमर्थ होता हुआ उसे छोड़ भी रहा है ॥४०।। यह पर्यंत अपने तटभागपर ऐसे अनेक वनके प्रदेशोंको धारण करता है जो कि ठीक मुनियोंके समान जान पड़ते हैं क्योंकि जिस प्रकार मुनि सब प्रकारके द्वन्द्व अर्थात् शीत उष्ण आदिकी बाधा सहन करते हैं उसी प्रकार वे वनके प्रदेश भी सब प्रकारके द्वन्द्व अर्थात् पशुपक्षियों आदिके युगल सहन करते हैं, धारण करते हैं, जिस प्रकार मुनि सबका कल्याण करते हैं उसी प्रकार वनके प्रदेश भी सवका कल्याण करते हैं और जिस प्रकार मुनि जनसमूहके संताप अर्थात् मानसिक व्यथाको दूर करते हैं उसी प्रकार वनके प्रदेश भी संताप अर्थात् सूर्यके घामसे उत्पन्न हुई गरमीको दूर करते हैं ॥४१।।
श्लोक 42 से 51 पर्वत की महिमा
यह पर्वत शब्द करते हुए झरनोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो जिन्होंने अपने नखोंसे मदोन्मत्त हाथियों के मस्तक विदारण किये हैं ऐसे सिंहोंको पापके डरसे तर्जना ही कर रहा हो-डाट ही दिखा रहा हो ॥४२।। हे नाथ, जिस प्रकार आप सानुचर अर्थात् सेवकों सहित, भद्र, उच्च कुलमें उत्पन्न हुए और उत्तम शरीरवाले अनेक राजाओंको धारण करते हैं उन्हें अपने आधीन रखते हैं, उसी प्रकार यह पर्वत भी सानुचर अर्थात् शिखरोंपर चलनेवाले, पीठपरकी उच्च रीढ़से युक्त और उत्तम शरीरवाले भद्र जातिके जंगली हाथियोंको धारण करता है ।॥४३॥ इधर ये अष्टापद, गरजते हुए मेधोंके समूहको हाथी समझकर उनपर उछलते हैं परन्तु फिर नीचे गिरकर शोचनीय दशाकों प्राप्त हो रहे हैं ।।४४।॥ कपोलोंके बिसनेसे जिनकी छाल घिस गई है और जो मंदरूपी जलसे मलिन हो रहे हैं ऐसे इस वनके वृक्ष हाथियोंकी वनक्रीड़ा को साफ साफ सूचित कर रहे हैं ।॥४५॥ इधर देखिये, सिहोंकी गर्जनासे डरे हुए ये बन्दर भयसे इकट्ठे होकर लतामण्डपोंमें बैठे हुए हैं ।॥४६।। यह वन इधर तो बड़े बड़े मुनियोंके पाठ करने के शब्दोंसे रमणीय हो रहा है और इधर तृणोंके अग्रभागका ग्रास खानेवाले हरिणों के समहसे व्याप्त हो रहा है ॥ ४७।। इधर सिहोंके कठोर शब्दोंसे भयंकर हो रहा है और इधर खाना-पीना छोड़कर हाथियोंके समूह भाग रहे हैं ।॥४८।। इधर, जिनमें वृद्ध जंगली भैंसाओंने सींगोंकी नोकसे बामियोंके किनारे खोद दिये हैं और सुअरोंने छोटे छोटे तालाब खोद डाले हैं ऐसे ये सुन्दर सुन्दर वनके प्रदेश हैं ।॥४९।। छोटे छोटे तालाबोंमें घुसे हुए हरिणों और बाँसकी झाड़ियोंके समीप छिपकर खड़े हुए हाथियोंसे साफ साफ सूचित होता है कि इस भयंकर वनपर अभी अभी सिंहने आक्रमण किया है ॥५०॥ सदा वनमें प्रवेश करनेवाले और सदा जमीनपर सोनेवाले हरिण और मुनियोंके समूह इस वनको कभी नहीं छोड़ते हैं ।।५१।।
श्लोक 52 से 61 पर्वत की शांति और रत्न
इस प्रकार यह पर्वत सदा शान्त और भयंकर रहता है परन्तु इस समय श्री जिनेन्द्रदेवके सन्नि-धानसे शान्त ही है ।।५२।। इधर, इस वनमें सिहोंका हाथियोंके साथ सहवास देखिये, ये सिंह अपने नखोंसे किये हुए हाथियोंके घावोंका इच्छानुसार स्पर्श कर रहे हैं ।॥ ५३॥ जिनके पीछे पीछे बच्चे चल रहे हैं ऐसे हरिण, सिंह, व्याघ्र आदि दुष्ट जीवोंके साथ साथ चारण-मुनियोंसे अधिष्ठित गुफाओंमें निर्भय होकर प्रवेश करते हैं ।॥ ५४।। अहा, बड़ा आश्चर्य है कि पशुओं के समूह भी, जिन्हें वनके भय और शोभाका कुछ भी पता नहीं है ऐसे मुनियोंके पीछे पीछे फिर रहे हैं ।।५५।। सार्थक नामको धारण करनेवाले अष्टापद नामके जीवोंसे सेवित हुआ यह पर्वत आपके चढ़नेके बाद अष्टापद नामको प्राप्त होगा ।।५६॥ जिसपर अनेक मणि देदी-प्यमान हो रहे हैं ऐसे इस पर्वतके किनारेके समीप आता हुआ नक्षत्रोंका समूह उन मणियोंकी किरणोंसे अपना मण्डल तिरोहित हो जानेसे प्रकटताको प्राप्त नहीं हो रहा है। भावार्थ- किनारेके समीप संचार करते हुए नक्षत्रोंके समूहपर मणियोंकी कान्ति पड़ रही है जिससे वे मणियोंके समान ही जान पड़ते हैं, पृथक् रूपसे दिखाई नहीं देते हैं ।॥५७॥ यद्यपि यहाँ रात्रि के समय औषधियोंका समूह प्रकाशमान रहता है तथापि किन्नर जातिके देव अंधकारकी आशंका से इन्द्रनील मणियोंके बने हुए इस पर्वतके किनारोंके सन्मुख नहीं जाते हैं ।॥ ५८।। इस पर्वत पर हरित मणियोंके बने हुए किनारोंकी फैलती हुई किरणोंको हरी घासके अंकुर समझकर हरिण आते हैं परन्तु घास न मिलनेसे बहुत ही आश्चर्य और लज्जाको प्राप्त होते हैं ।॥५९॥ इधर पद्मराग मणियोंकी किरणोंसी व्याप्त हुई वनकी पंक्तियाँ ऐसी उत्कृष्ट शोभा धारण कर रही हैं मानो उनपर संध्याकालकी लाल लाल धूप ही फैल रही हो ॥६०॥ ये सूर्यकान्त मणि सूर्यकी किरणोंका स्पर्श पाकर जल रही हैं सो ठीक ही है क्योंकि प्रायः तेजस्वी पदार्थका संबंध तेजस्वी पदार्थके तेजको पुष्ट कर देता है ॥ ६१ ॥
श्लोक 62 से 71 जिनेन्द्र के समान पर्वत
इस पर्वतपर चन्द्रमाकी किरणोंका स्पर्श होनेपर चन्द्रकान्त मणियोंसे यद्यपि प्रत्येक रात्रिको पानी झरता है तथापि ये कुछ भी कम नहीं होते सो ठीक ही है क्योंकि पुगलका स्वभाव बड़ा ही विचित्र है ।।६२।। अथवा यह पर्वत ठीक जिनेन्द्रदेवके समान जान पड़ता है क्योंकि जिस प्रकार जिनेन्द्रदेवके समीप देव आते हैं उसी प्रकार इस पर्वतपर भी देव आते हैं, जिस प्रकार जिनेन्द्रदेवने सिंहासन स्वीकार किया है उसी प्रकार इस पर्वतने भी सिंहासन अर्थात् सिंहके आसनोंको स्वीकार किया है-इसपर जहाँ-तहाँ सिंह बैठे हुए हैं अथवा सिंह और असन वृक्ष स्वीकार किये हैं, जिस प्रकार जिनेन्द्रदेव महान् अर्थात् उत्कृष्ट हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी महान् अर्थात् ऊँचा है और जिनेन्द्रदेव जिस प्रकार अचल अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थिर हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी अचल अर्थात् स्थिर है ॥६३॥ हे देव, जिसका उदार शरीर शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल है ऐसा यह पर्वतराज कैलास शुद्धात्माकी तरह आपका कल्याण करनेवाला हो ।।६४।। इस प्रकार जब पुरोहितने उस पर्वतकी उत्कृष्ट शोभाका वर्णन किया तब शत्रुओंको संतप्त करनेवाले महाराज भरत इस प्रकार परम आनन्दको प्राप्त हुए मानो सुखरूप ही हो गये हों ॥६५॥ विद्वानोंमें श्रेष्ठ भरत चक्रवर्ती प्रसन्न चित्तसे कुछ ही आगे बढ़े थे कि उन्हें वहाँ समीप ही जिनेन्द्रदेवका समवसरण जान पड़ा ।।६६।। ऊपरसे पड़ती हुई पुष्पवृष्टिसे और दुन्दुभि बाजों के शब्दोंसे उन्होंने जान लिया था कि त्रिलोकीनाथ जिनेन्द्रदेव समीप ही विराजमान हैं ।॥६७॥ मन्दार वृक्षोंके फूलों से सुगन्धित और लताओंके वनको कम्पित करनेवाला वायु उनके सामने इस प्रकार आया था मानो उनकी अगवानी ही कर रहा हो ।॥६८॥ जिन्होंने पृथिवीको धूलि रहित कर दिया है ऐसी जलकी शीतल बूंदोंके साथ साथ आकाशरूपी आँगनको भरती हुई फूलोंकी वर्षा पड़ रही थी ॥६९॥ जिन्हें मेथोंकी गर्जना समझनेवाले मयूर, अपनी गर्दन ऊँची कर सुन रहे हैं ऐसे आकाशरूपी आँगनमें होनेवाले दुन्दुभि बाजोंके गम्भीर शब्द भी महाराज भरतने सुने थे ॥७०॥ राजाओंमें श्रेष्ठ महाराज भरत, पैरकी गाँठों तक ऊँचे फैले हुए फूलोंके संमर्दसे जो अत्यन्त कोमल हो गया है ऐसे मार्ग के द्वारा बिना किसी परिश्रमके बाकी बचे हुए उस पर्वत पर चढ़ गये थे ॥७१।।
श्लोक 72 से 81 समवसरण का दर्शन
तदनन्तर उस पर्वतपर चढ़कर भरतने उसके मस्तकपर पहले कही हुई रचनासे सहित जिनेन्द्रदेवका समवसरणमण्डल देखा ॥७२।। इसमें समस्त सुर और असुर आकर दिव्य ध्वनिके अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए बैठते हैं इसलिये जानकार गणधरादि देवोंने इसका समवसरण ऐसा सार्थक नाम कहा है ॥७३।।
अथानन्तर-महाराज भरत, जो अपने प्रकाशसे अखण्ड मण्डलवाले इन्द्रधनुषकी रेखा को प्रकट कर रहा है ऐसे धूलिसालके समीप जा पहुँचे ॥७४॥ सुवर्णके खंभोंके अग्रभागपर लगे हुए रत्नोंके तोरणोंसे जो अत्यन्त देदीप्यमान हो रहा है ऐसे धूलिसालको उल्लंघन कर उन्होंने मानस्तम्भकी पूजा की ॥७५॥ जिनमें स्वच्छ और शीतल जल भरा हुआ है और कमल कूल रहे हैं ऐसी जिनेन्द्र भगवान्की वाणीके समान मानस्तम्भके चारों ओरकी बावड़ियाँ भी महाराज भरतने देखीं ॥७६॥ धूलिसालकी परिधिके भीतर चारों ओरसे गलियोंके बीच वीचमें उन्होंने देवोंके निवास करने योग्य पृथिवी भी देखी ॥७७॥ कुछ और आगे चलकर उन्होंने जलसे भरी हुई परिखा देखी। वह परिखा सज्जन पुरुषोंके चित्तकी वृत्तिके समान स्वच्छ और गम्भीर थी ।। ७८ ।। तदनन्तर जो अनेक प्रकारके फूलोंकी लताओंसे व्याप्त हो रहा है और जो फूलोंके आसवरूपी रससे मत्त होकर फिरते हुए भूमरोंसे व्याप्त है ऐसा लता-वन देखा ॥७९॥ वहाँसे कुछ आगे जाकर उन्होंने पहला कोट देखा जो कि निषध पर्वतके किनारेके साथ स्पर्धा कर रहा था और रत्नोंकी दीप्तिसे सुशोभित था ।।८०।। देवरूप द्वारपाल जिसकी रक्षा कर रहे हैं ऐसे गोपुरद्वारके समीप रखे हुए आठ मङ्गलद्रव्य भी उन्होंने देखे ॥८१॥
श्लोक 82 से 91 समवसरण की शोभा
तदनन्तर भीतर प्रवेश करते हुए चक्रवर्ती भरत इन्द्राणीके नृत्य करनेके योग्य दोनों ओरकी दो नाट्यशालाओंको देखकर परम प्रीतिको प्राप्त हुए ॥८२॥ वहाँसे कुछ आगे चलकर मार्गके दोनों ओर बगलमें रखे हुए तथा सुगन्धित ई धनके समूहके द्वारा जिनसे अत्यन्त सुग-न्धित धूम निकल रहा है ऐसे दो धूपघट देखे ॥८३॥ इस दूसरी कक्षामें उन्होंने चार वन भी देखे जो कि झड़ते हुए फूलोंवाले वृक्षोंसे अर्थ देते हुएके समान जान पड़ते थे ।।८४।। फूले हुए अशोक वृक्षोंका वन, सप्तपर्ण वृक्षोंका वन, चम्पक वृक्षोंका वन और आमोंका सुन्दर वन देखकर भरत महाराजका आनन्द भी दूना हो गया था ।।८५।। श्रीमान् भरतने उन वनोंमें जिनप्रतिमाओंसे अधिष्ठित और इन्द्र नरेन्द्र आदिके द्वारा पूजित बहुत ऊँचे चैत्यवृक्षोंकी भी पूजा की ॥८६॥ उन्हीं वनोंमें किन्नर जातिकी देवियाँ भगवान्का उत्सव गा रही थीं, उनके गंभीर तानवाले गीतोंसे चक्रवर्ती भरतने परम संतोष प्राप्त किया था ।। ८७ ।। सुगन्धित पवन ही जिसका सुगन्धिपूर्ण निःश्वास है और फूल ही जिसका मंद हास्य है ऐसी वह वनकी लक्ष्मी कोयलोंके मधुर शब्दोंसे ऐसी जान पड़ती थी मानो चक्रवर्ती के साथ वार्तालाप ही कर रही हो ॥८८॥ भूमरियोंके संगीतसे मिले हुए कोकिलारूपी नगाड़ोंके शब्दोंसे वे वन ऐसे जान पड़ते थे मानो जिनेन्द्र भगवान्ने जो कामदेवको जीत लिया है उसीकी घोषणा कर रहे हों ।।८९।। वहाँपर तीनों लोकोंके जनसमूहके निरन्तर प्रवेश करनेकी उतावलीसे जो समुद्र के जलकी गर्जनाके समान बड़ा भारी कोलाहल हो रहा था उसे भी भरत महाराजने सुना था ।।९०।। तदनन्तर उन वनोंसे रुकी हुई पृथिवीके आगे उन्होंने वनपंक्तिरूपी विलासिनी स्त्रीकी मणिमयी मेखलाके समान मणियोंसे जड़ी हुई वनकी वेदी देखी ॥९१॥
श्लोक 92 से 101 समवसरण की संरचना
वनवेदीके मुख्य द्वारको भूमिको उल्लंघन कर चक्रवर्ती भरतने ध्वजाओंसे रुकी हुई पृथिवी देखी, वह पृथिवी उस समय ऐसी मालूम हो रही थी मानो वायुसे हिलते हुए ध्वजाओंके वस्त्रोंके द्वाराउन्हें बुला ही रही हो ।। ९२ ।। वह ध्वजाभूमि यज्ञभूमिके समान सुशोभित हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार यज्ञभूमिका आकाश अनेक फहराती हुई ध्वजाओंके समूहसे व्याप्त होता है उसी प्रकार उस ध्वजाभूमिका आकाश भी अनेक फहराती हुई ध्वजाओंके समूहसे व्याप्त हो रहा था, जिस प्रकार यज्ञभूमि धर्मचक्र तथा हाथी आदिके मांगलिक चिह्नोंसे सहित होती है उसी प्रकार वह ध्वजाभूमि भी चक्र और हाथीके चिह्नोंसे सहित थी, तथा जिस प्रकार यज्ञभूमि जिनेन्द्रदेवके जय अर्थात् जयजयकार शब्दोंसे व्याप्त होती है उसी प्रकार वह ध्वजाभूमि भी जिनेन्द्रदेवके जयजयकार शब्दोंसे व्याप्त थी अथवा कर्मरूपी शत्रुओंको जीत लेनेसे प्रकट हुई थी ॥९३॥ जिनराजकी वे ध्वजाएं सिंह, वस्त्र, कमल, मयूर, हाथी, गरुड़, माला, बैल, हंस और चक्र इन चिह्नोंके भेदसे दश प्रकारकी थीं ।॥९४।। वे ध्वजाएँ प्रत्येक दिशामें एक-एक प्रकारकी एक सौ आठ स्थित थीं, उन सबकी पूजा करते हुए चक्रवर्ती महाराज उस ध्वजाभूमिसे आगे गये ॥ ९५।। आगे चलकर उन्होंने चार गोपुर दरवाजों सहित चांदीका बना हुआ दूसरा कोट देखा और उसे उल्लंघन कर उसके आगे पहिलेके समान ही नाट्यशाला आदि देखीं ।।९६।। वहां देवाङ्गनाओंके नृत्य देखते हुए, उनके गीत सुनते हुए और धूपकी सुगन्ध सूंघते हुए महाराज भरतकी इन्द्रियां बहुत ही संतुष्ट हुई थीं ।। ९७।। आगे चलकर उन्होंने उसी कक्षाके मध्यमें माला, वस्त्र और आभूषण आदि अभीष्ट फल देनेवाली कल्प वृक्षोंके वनकी भूमि देखी ॥९८॥ उसी वनभूमिमें उन्होंने सिद्धोंकी प्रतिमाओंसे अधिष्ठित और इन्द्रोंके द्वारा पूजित सिद्धार्थ वृक्षोंकी प्रदक्षिणा दी, उन्हें प्रणाम किया और उनकी पूजा की ।।९९।। तदनन्तर चार गोपुर दरवाजोंसे सुशोभित वनकी वेदीको उल्लंघन कर चक्रवर्ती ने अनेक महलोंसे भरी हुई पृथिवी और स्तूप देखे ॥१००॥ वहां देवोंके रहनेके लिये जो महल बने हुए थे वे तीन खण्ड, चार खण्ड, पांच खण्ड आदि अनेक प्रकारके थे तथा नाना प्रकारके उपकरणोंसे सजे हुए थे ।। १०१ ।।
श्लोक 102 से 111 समवसरण की संरचना और पूजा
जिनके बीच बीचमें रत्नोंके तोरण लगे हुए हैं और जिनपर चारों ओरसे जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाएँ विराजमान हैं ऐसे वे रत्नमयी स्तूप भी बहुत अधिक सुशो-भित हो रहे थे ॥१०२॥ उन स्तूपोंको देखते हुए, उनकी पूजा करते हुए और उन्हींका वर्णन करते हुए जिन्हें परम आश्चर्य प्राप्त हो रहा है ऐसे भरतने क्रम-क्रमसे उस कक्षाको उल्लंघन किया ॥१०३।। आगे चलकर उन्होंने आकाशस्फटिकका बना हुआ तीसरा कोट देखा। वह कोट ऐसा जान पड़ता था मानो जिनेन्द्रदेवकी समीपताके कारण उसे शुद्धि ही प्राप्त हो गई हो ।।१०४।। वहां महाद्वारपालके रूपमें खड़े हुए कल्पवासी देवोंसे आदरसहित आज्ञा लेकर भरत महाराजने भगवान्की सभामें प्रवेश किया ॥१०५।। वहां उन्होंने चारों ओरसे एक योजन लम्बा, चौड़ा, गोल और अपने भीतर समस्त जगत्को स्थान देनेवाला श्रीमण्डप देखा ॥१०६॥ उसी श्रीमण्डपके मध्यमें उन्होंने जिनेन्द्र भगवान्के चरणोंके दर्शन करने से उत्पन्न हुई प्रीतिसे जिनके नेत्र प्रफुल्लित हो रहे हैं ऐसे क्रमसे बैठे हुए उज्ज्वल ज्ञानके धारी मुनि, कल्पवासिनी देवियां, आर्यिकाओंसे सहित रानी आदि स्त्रियां, ज्योतिषी, व्यन्तर और भवनवासी देवोंकी देवियां, भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और कल्पवासी देव, राजा आदि मनुष्य और मृग आदि पशु ऐसे बारह संघ देखे तथा इन्हींको देखते हुए महाराज भरतने तीन कटनीदार पीठकी प्रथम कटनीका आश्रय लेकर उसकी प्रदक्षिणा दी ॥१०७-१०९॥ उस प्रथम कटनीपर चक्रवर्तीने, जिन्हें यक्षोंके इन्द्रोंने अपने मस्तकपर धारण कर रखा है और जो सूर्यके बिम्बका अनुकरण कर रहे हैं ऐसे चारों दिशाओंके चार धर्मचक्रोंकी प्रसन्नताके साथ पूजा की ॥११०।। दूसरी कटनीपर उन्होंने चक्र, हाथी, बैल, कमल, सिंह, माला, वस्त्र और गरुड़के चिह्नोंसे चिह्नित आठ महाध्वजाओंकी पूजा की ॥ १११।।
श्लोक 112 से 123 जिनेन्द्र का दर्शन
तदनन्तर विद्वान् चक्रवर्ती ने, जिसपर शोभायुक्त गन्धकुटी स्थित थी ऐसी तीसरी कटनीपर जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव को देखा ।।११२।। उस गन्धकुटीके भीतर जो रत्नोंकी बनावटसे बहुत ही सुन्दर और मेरु पर्वतकी शिखरके समान ऊंचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, जिनका शरीर बड़ा-जिनपर तीन छत्र छाया कर रहे थे परन्तु जो स्वयं छायारहित थे, पापोंको नष्ट करनेवाले थे, जिन्होंने अपने प्रभामण्डलसे मनुष्य, देव और धरणेन्द्र सभीके समूहको व्याप्त कर लिया था जो अशोक वृक्षके चिह्नसे ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने चरणोंका आश्रय लेनेवाले जीवोंका शोक दूर करनेके लिये अपनी शक्ति ही प्रकट कर रहे हों-जिनके समीपका भाग चारों ओरसे ढलते हुए चामरोंसे व्याप्त हो रहा था, जो सुन्दर शरीरके धारक थे और इसीलिये जो उस सुमेरु पर्वतके समान जान पड़ते थे जोकि शिखरोंके समीप भागसे पड़ते हुए झरनोंसे व्याप्त हो रहा है-जो चारों ओरसे फैलते हुए कान्तिमण्डलसे व्याप्त हो रहे थे और उससे ऐसे जान पड़ते थे मानो गोल परिधिसे घिरे हुए सूर्यमण्डलका अनुकरण ही कर रहे हों-गम्भीर शब्द करने-वाले आकाशदुन्दुभियोंके द्वारा जिनका माहात्म्य प्रकट हो रहा था तथा फूलोंकी वर्षा करने-वाले दिव्य मेधोंके द्वारा जिनकी शोभा बढ़ रही थी जिन्होंने चारों ओर फैलती हुई अपनी गंभीर गर्जनासे तीनों लोकोंके जीवोंकी सभाको संतुष्ट कर दिया था और इसीलिये जो धर्मरूपी जलकी वर्षा करते हुए वर्षाऋतुके मेघके समान जान पड़ते थे, जो उत्पत्तिस्थानकी अपेक्षा एक रूप होकर भी अतिशयवश श्रोताओंके कर्णकुहरके समीप अनेक भाषाओंरूप परिणमन करनेवाली और जीवोंके हृदयका अन्धकार दूर करनेवाली दिव्य ध्वनिको बिना किसी प्रयत्न के प्रसारित कर रहे थे जो अनन्त वीर्यको धारण कर रहे थे, आभूषणरहित होनेपर भी अति-शय सुन्दर थे, वाणीरूपी उत्तम विभूतिके धारक थे, जिनके शरीरसे सुगन्धि निकल रही थी, जो शुभ लक्षणोंसे सहित थे, पसीना और मलसे रहित थे, जिनके शरीरकी छाया नहीं पड़ती थी, जो आंखोंके पलक न लगनेसे अतिशय सुन्दर थे, समचतुरस्त्र संस्थानके धारक थे, और जो छेदन भेदन रहित अतिशय बलवान् शरीरको धारण कर रहे थे-ऐसे अचिन्त्य माहात्म्यके धारक श्री जिनेन्द्र भगवान्को दूरसे ही देखते हुए भरत महाराज आनन्दसे भर गये तथा उन्होंने अपने दोनों घुटने जमीनपर टेककर श्री भगवान्को नमस्कार किया ।।११३-१२३॥
श्लोक 124 से 131 पूजा और स्तुति का प्रारंभ
दूर-से ही नमू होनेके कारण जिनका मुकुट कुछ कुछ हिल रहा है और मणिमय कुण्डल चञ्चल हो रहे हैं ऐसे भक्तिपूर्वक जिनेन्द्रदेवको प्रणाम करते हुए चक्रवर्ती भरत ऐसे जान पड़ते थे मानो उन्हें रत्नोंके द्वारा अर्थ ही दे रहा हो ।। १२४।॥ तदनन्तर उन्होंने मोक्षरूपी फल प्राप्त करनेकी इच्छासे विधिपूर्वक जल, चन्दन, पुष्पमाला, अक्षत, नैवेद्य, दीप, धूप और फलोंके द्वारा भगवान्की पूजा की ।। १२५॥ पूजाकी विधि समाप्त कर चुकनेके बाद भरतेश्वरने परमेष्ठी वृषभदेवको प्रणाम किया और फिर अच्छे अच्छे स्तोत्रोंके द्वारा उनकी स्तुति करना प्रारम्भकिया ।।१२६।॥ हे भगवन्, आप परमात्मा हैं, अपार गुणोंके धारक हैं, अविनश्वर हैं और मैं शक्तिसे हीन हूँ तथापि बड़ी भारी भक्तिसे जबर्दस्ती प्रेरित होकर आपकी स्तुति करता हूँ ॥१२७॥ हे देव, जो गणधर देवोंके द्वारा भी गम्य नहीं हैं ऐसे कहाँ तो आपके अनन्त गुण और कहां मुझ सरीखा मन्द पुरुष ? तथापि आपके गुणोंके आधीन रहनेवाली भक्तिसे प्रेरित होकर आपकी स्तुति करनेका प्रयत्न करता हूँ ॥ १२८॥ हे भगवन्, आपके विषय में की हुई थोड़ी भक्ति भी बहुत भारी फल देनेके लिये समर्थ रहती है सो ठीक ही है क्योंकि स्वामीकी सम्पत्ति सेवक जनोंकी सम्पत्तिकी परम्पराको पुष्ट करती ही है ।। १२९ ।। हे नाथ, जिस प्रकार मेघोंके आवरणसे छूटे हुए सूर्यकी अनेक किरणें प्रकट हो जाती हैं उसी प्रकार घातिया कर्मरूपी मलके दूर हो जानेसे आपके अनेक गुण प्रकट हुए हैं ।॥ १३०॥ हे प्रभो, घातिया कर्मोंको जीत लेनेसे आपके यथार्थ दर्शन, ज्ञान, सुख और वीर्य आदि क्षायिक लब्धियाँ प्रकट हुई हैं ।॥१३१।।
श्लोक 132 से 141 सर्वज्ञता और सप्तभंगी
हे देव, जिस समय आपके केवल ज्ञान नामकी उत्कृष्ट ज्योति प्रकट हुई थी उसी समय आपने मर्यादाके बिना ही समस्त लोक और अलोकको जान लिया था ॥१३२॥ हे ईश, सब जगह जानेवाली अर्थात् संसारके सब पदार्थोंका निरूपण करनेवाली आपके वचनोंकी शुद्धि आपके सर्वज्ञपनेको प्रकट करती है सो ठीक ही है क्योंकि इस जगत्में मन्द बुद्धि-वाले जीवोंके इतना अधिक वचनोंका वैभव कभी नहीं हो सकता है ॥ १३३॥ हे देव, वक्ता की प्रमाणतासे ही वचनोंकी प्रमाणता मानी जाती है क्योंकि अत्यन्त अशुद्ध वक्तासे उज्ज्वल वाणी कभी उत्पन्न नहीं हो सकती है ।।१३४।। हे नाथ, समस्त पदार्थोंको विषय करनेवाली आपकी यह सप्तभंगरूप वाणी ही आपमें आप्तपनेकी निर्मल प्रतीति उत्पन्न करानेके लिये समर्थ है ॥१३५॥ हे सबका हित करनेवाले, आपकी सप्तभङ्गरूप वाणी इस प्रकार है कि जीवादि पदार्थ कथंचित् हैं ही, कथंचित् नहीं ही हैं, कथंचित् दोनों प्रकार ही हैं, कथंचित् अवक्तव्य ही हैं, कथंचित् अस्तित्व रूप होकर अवक्तव्य हैं, कथंचित् नास्तित्व रूप होकर अवक्तव्य हैं और कथंचित् अस्तित्व तथा नास्तित्व-दोनों रूप होकर अवक्तव्य हैं। विशेषार्थ-जैनागममें प्रत्येक वस्तुमें एक एक धर्मके प्रतिपक्षी धर्मकी अपेक्षासे सात सात भङ्ग माने गये हैं, जो कि इस प्रकार हैं-१ स्यादस्त्येव, २ स्यान्नास्त्येव, ३ स्यादस्ति च नास्त्येव, ४ स्यादवक्तव्यमेव, ५ स्यादस्ति चावक्तव्यं च ६ स्यान्नास्ति चावक्तव्यं च और ७ स्यादस्ति नास्ति चावक्तव्यं च । इनका स्पष्ट अर्थ यह है कि संसारकाहूँ ॥१२७॥ हे देव, जो गणधर देवोंके द्वारा भी गम्य नहीं हैं ऐसे कहाँ तो आपके अनन्त गुण और कहां मुझ सरीखा मन्द पुरुष ? तथापि आपके गुणोंके आधीन रहनेवाली भक्तिसे प्रेरित होकर आपकी स्तुति करनेका प्रयत्न करता हूँ ॥ १२८।। हे भगवन्, आपके विषय में की हुई थोड़ी भक्ति भी बहुत भारी फल देनेके लिये समर्थ रहती है सो ठीक ही है क्योंकि स्वामीकी सम्पत्ति सेवक जनोंकी सम्पत्तिकी परम्पराको पुष्ट करती ही है ।॥ १२९ ॥ हे नाथ, जिस प्रकार मेघोंके आवरणसे छूटे हुए सूर्यकी अनेक किरणें प्रकट हो जाती हैं उसी प्रकार घातिया कर्मरूपी मलके दूर हो जानेसे आपके अनेक गुण प्रकट हुए हैं ।॥ १३०॥ हे प्रभो, घातिया कर्मोंको जीत लेनेसे आपके यथार्थ दर्शन, ज्ञान, सुख और वीर्य आदि क्षायिक लब्धियाँ प्रकट हुई हैं ॥१३१।। हे देव, जिस समय आपके केवल ज्ञान नामकी उत्कृष्ट ज्योति प्रकट हुई थी उसी समय आपने मर्यादाके बिना ही समस्त लोक और अलोकको जान लिया था ।।१३२।। हे ईश, सब जगह जानेवाली अर्थात् संसारके सब पदार्थोंका निरूपण करनेवाली आपके वचनोंकी शुद्धि आपके सर्वज्ञपनेको प्रकट करती है सो ठीक ही है क्योंकि इस जगत्में मन्द बुद्धि-वाले जीवोंके इतना अधिक वचनोंका वैभव कभी नहीं हो सकता है ॥ १३३॥ हे देव, वक्ता की प्रमाणतासे ही वचनोंकी प्रमाणता मानी जाती है क्योंकि अत्यन्त अशुद्ध वक्तासे उज्ज्वल वाणी कभी उत्पन्न नहीं हो सकती है ।।१३४।। हे नाथ, समस्त पदार्थोंको विषय करनेवाली आपकी यह सप्तभंगरूप वाणी ही आपमें आप्तपनेकी निर्मल प्रतीति उत्पन्न कराने के लिये समर्थ है ।।१३५।। हे सबका हित करनेवाले, आपकी सप्तभङ्गरूप वाणी इस प्रकार है कि जीवादि पदार्थ कथंचित् हैं ही, कथंचित् नहीं ही हैं, कथंचित् दोनों प्रकार ही हैं, कथंचित् अवक्तव्य ही हैं, कथंचित् अस्तित्व रूप होकर अवक्तव्य हैं, कथंचित् नास्तित्व रूप होकर अवक्तव्य हैं और कथंचित् अस्तित्व तथा नास्तित्व-दोनों रूप होकर अवक्तव्य हैं। विशेषार्थ-जैनागममें प्रत्येक वस्तुमें एक एक धर्मके प्रतिपक्षी धर्मकी अपेक्षासे सात सात भङ्ग माने गये हैं, जो कि इस प्रकार हैं-१ स्यादस्त्येव, २ स्यान्नास्त्येव, ३ स्यादस्ति च नास्त्येव, ४ स्यादवक्तव्यमेव, ५ स्यादस्ति चावक्तव्यं च ६ स्यान्नास्ति चावक्तव्यं च और ७ स्यादस्ति नास्ति चावक्तव्यं च । इनका स्पष्ट अर्थ यह है कि संसारकाप्रत्येक पदार्थ स्वचतुष्टय (द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव) की अपेक्षा अस्तित्व रूप ही है, परचतुष्टयकी अपेक्षा नास्तित्व रूप ही है और एक साथ दोनों धर्म नहीं कहे जा सकनेके कारण अवक्तव्य रूप भी है, इस प्रकार प्रत्येक पदार्थमें मुख्यतासे अस्तित्व, नास्तित्व और अवक्तव्य ये तीन धर्म पाये जाते हैं। इन्हीं मुख्य धर्मोके संयोगसे सात सात धर्म हो जाते हैं। जैसे ‘जीवोऽस्ति’ जीव है। यहांपर जीव और अस्तित्व क्रियामें विशेष्य विशेषण सम्बन्ध है। विशेषण विशेष्यमें ही रहता है इसलिये जीवका अस्तित्व जीवमें ही है दूसरी जगह नहीं है, इसी प्रकार ‘जीवोनास्ति’ जीव नहीं है यहाँपर भी जीव और नास्तित्वमें विशेष्यविशेषण सम्बन्ध है इसलिये ऊपर कहे हुए नियमसे नास्तित्व जीवमें ही है दूसरी जगह नहीं है। जीवके इन अस्तित्व और नास्तित्व रूप धर्मोको एक साथ कह नहीं सकते इसलिये उसमें एक अवक्तव्य नामका धर्म भी है। इन तीनों धर्मोमेंसे जब जीवके केवल अस्तित्व धर्मकी विवक्षा करते हैं तब ‘स्याद् अस्त्येव जीवः’ ऐसा पहला भङ्ग होता है, जब नास्तित्व धर्मको विवक्षा करते हैं तब ‘नास्त्येव जीवः’ ऐसा दूसरा भङ्ग होता है, जब दोनोंकी क्रम क्रमसे विवक्षा करते हैं तब ‘स्यादस्ति च नास्त्येव जीवः’ इस प्रकार तीसरा भङ्ग होता है, जब दोनोंकी अक्रम अर्थात् एक साथ विवक्षा करते हैं तब दो विरुद्ध धर्म एक कालमें नहीं कहे जा सकनेके कारण ‘स्यादवक्तव्यमेव’ ऐसा चौथा भङ्ग होता है, जब अस्तित्व और अवक्तव्य इन दो धर्मोकी विवक्षा करते हैं तब ‘स्यादस्ति चावक्तव्यं च’ ऐसा पाँचवाँ भङ्ग होता है, जब नास्तित्व और अवक्तव्य इन दो धर्मोकी विवक्षा करते हैं तब ‘स्यान्नास्ति चा वक्तव्यं च’ ऐसा छठवाँ भङ्ग हो जाता है और जब अस्तित्व, नास्तित्व तथा अवक्तव्य इन धर्मोकी विवक्षा करते हैं तब ‘स्यादस्ति नास्ति चावक्तव्यं’ च ऐसा सातवाँ भङ्ग हो जाता है। संयोगकी अपेक्षा प्रत्येक पदार्थ में प्रत्येक धर्म सात सात भङ्गके रूप रहता है इसलिये उन्हें कहने के लिये जिनेन्द्र भगवान्ने सप्त-भङ्गी (सात भङ्गों के समूह) रूप वाणी के द्वारा उपदेश दिया है। जिस समय जीवके अस्तित्व धर्मका निरूपण किया जा रहा है उस समय उसके अवशिष्ट धर्मोका अभाव न समझ लिया जावे इसलिये उसके साथ विवक्षा सूचक स्याद् शब्दका भी प्रयोग किया जाता है तथा सन्देह दूर करनेके लिये नियमवाचक एव या च आदि निपातोंका भी प्रयोग किया जाता है जिससे सब मिलाकर ‘स्यादस्त्येव जीवः’ इस वाक्यका अर्थ होता है कि जीव किसी अपेक्षासे है ही। इसी प्रकार अन्य वाक्योंका अर्थ भी समझ लेना चाहिये। जैनधर्म अपनी व्यापक दृष्टिसे पदार्थ के भीतर रहनेवाले उसके समस्त धर्मोका विवक्षानुसार कथन करता है इसलिये वह स्याद्वादरूप कहलाता है। वास्तव में इस सर्वमुखी दृष्टिके बिना वस्तुका पूर्ण स्वरूप कहा भी तो नहीं जा सकता ।। १३६।। हे देव, जिनकी बुद्धि प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध तथा सम्बन्धरहित वचनोंके जालमें फंसकर व्यामुग्ध हो गई है ऐसे कुदेवोंमें श्रद्धान नहीं करने योग्य सर्वज्ञता आपमें विराजमान है। भावार्थ-सर्वज्ञ वही हो सकता है जिसके वचनोंमें कहीं भी विरोध नहीं आता है। संसारके अन्य देवी-देवताओं के वचनोंमें पूर्वापर विरोध पाया जाता है और इसीसे उनकी भान्त बुद्धिका पता चल जाता है इन सब कारणोंको देखते हुए ‘ये सर्वज्ञ थे’ ऐसा विश्वास नहीं होता परन्तु आपके वचनों अर्थात् उपदेशोंमें कहीं भी विरोध नहीं आता तथा आपने बस्तुके समस्त धर्मोका वर्णन किया है इससे आपकी बुद्धि-ज्ञान-निर्भान्त है और इसीलिये आप सर्वज्ञ हैं ।॥ १३७।। जिस प्रकार
बीचमें जिसकी समस्त किरणें छिप गई हैं ऐसा सूर्य यद्यपि दिखाई नहीं देता तथापि फूले हुए कमलोंसे उसका अस्तित्व सूचित हो जाता है उसी प्रकार आपका प्रत्यक्ष रूप भी दिखाई नहीं देता तथापि आपके श्रेष्ठ वचनों के वैभवके द्वारा आपके प्रत्यक्ष रूपका अस्तित्व सूचित हो रहा है। भावार्थ-आपके महान् उपदेश ही आपको सर्वज्ञ सिद्ध कर रहे हैं ।॥ १३८।। अथवा जिस प्रकार सघन अन्धकारमें यद्यपि मयूर दिखाई नहीं देता तथापि अपने शब्दोंके द्वारा दूर से ही पहिचान लिया जाता है उसी प्रकार आपका आप्तपना यद्यपि प्रकट नहीं दिखाई देता तथापि आप अपने स्पष्ट और सत्यार्थ वचनोंसे आप्त कहलाने के योग्य हैं ।।१३९।। अथवा हे देव, जिसका बड़ा भारी अभ्युदय है ऐसी यह आपकी अध्यात्मसम्बन्धी ज्ञानरूपी सम्पत्ति दूर रहे, आपकी यह बाह्य विभूति ही हम लोगोंको आपके हितोपदेशीपनका उपदेश दे रही है । भावार्थ-आपकी बाह्य विभूति ही हमें बतला रही है कि आप मोक्षमार्गरूप हितका उपदेश देनेवाले सच्चे वक्ता और आप्त हैं ।॥ १४०॥ हे भगवन्, देवरूप कारीगरोंके द्वारा बनाया हुआ और रत्नोंकी किरणोंसे मिला हुआ आपका यह श्रेष्ठ सिंहासन मेरु पर्वतकी शिखर के समान सुशोभित हो रहा है ॥ १४१ ॥
श्लोक 142 से 151 भगवान की महिमा
देवोंके द्वारा ऊपरकी ओर धारण किया हुआ यह आपका प्रकाशमान छत्रत्रय आपकी तीनों लोकोंकी प्रभुताका चिह्न है ऐसा हम क्यों न विश्वास करें ? भावार्थ-आपके मस्तकके ऊपर आकाशमें जो देवोंने तीन छत्र लगा रखे हैं वे ऐसे मालूम होते हैं मानो आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं यही सूचित कर रहे हों ।॥ १४२॥ देवोंके द्वारा ढुलाये हुए ये चमर तीनों जगत्को उल्लंघन करनेवाले आपके असाधारण ऐश्वर्यको सूचित कर रहे हैं ।।१४३॥ हे देव, ये देवरूपी मेघ आपकी सभाके चारों ओर अत्यन्त सुगन्धित तथा भूमरों के समूहको बुलानेवाली फूलोंकी वर्षा कर रहे हैं ।॥१४४।। हे प्रभो, आपके विज-योत्सवमें देवरूप किंकरोंके हाथों के अग्र भागसे ताड़ित हुए ये देवोंके दुन्दुभि बाजे आकाश रूप आंगनमें गम्भीर शब्द कर रहे हैं ।॥ १४५॥ जिसका समीप भाग देवोंके द्वारा सेवित है अर्थात् जिसके समीप देव लोग बैठे हुए हैं और जो जनसमूहके शोक तथा संतापको दूर करने वाला है ऐसा यह अशोकवृक्ष प्रायः आपका ही अनुकरण कर रहा है क्योंकि आपका समीप भाग भी देवोंके द्वारा सेवित है और आप भी जनसमूहके शोक और संतापको दूर करनेवाले हैं ।॥१४६॥ जिसने प्रातःकालके सूर्यकी कान्ति धारण की है और जो नेत्रोंका उत्सव बढ़ा रही है ऐसी यह आपके शरीरकी देदीप्यमान कान्ति सभाके चारों ओर फैल रही है। भावार्थ- आपक भामण्डलको प्रभा सभाके चारों ओर फैल रही हैं ।। १४७।। समस्त भाषाओं के भेदोका अनुकरण करनेवाली अर्थात् समस्त भाषाओं रूप परिणत होनेवाली आपकी यह दिव्य ध्वनि जो वचन नहीं बोल सकते ऐसे पशु पक्षी आदि तिर्यञ्चोंके भी हृदयके अन्धकारको दूर कर देती है ।।१४८।। हे प्रभो, आपकी यह प्रातिहार्यरूप आठ प्रकारकी विभूति आपकी लोकोत्तर महिमाको स्पष्ट रूपसे प्रकट कर रही है ।। १४९॥ मेरु पर्वतके समान ऊंचे तीन कटनीदार पीठपर सबके द्वारा सेवन करने योग्य आपकी यह ऊँची गन्धकुटी मेरुकी चूलिकाके समान सुशोभित हो रही है ।। १५०।। वन्दना करनेवाले उत्तम मुनियोंके स्तोत्रोंकी प्रतिध्वनिसे यह गन्धकुटी ऐसी जान पड़ती है मानो भक्तिवश हर्षसे आपकी स्तुति ही करना चाहती हो ॥१५१॥
श्लोक 152 से 164 समवसरण की विभूति
हे प्रभो, जो श्रेष्ठ रत्नोंसे बनी हुई और अतिशय देदीप्यमान इस गन्धकुटीमें विराजमान हैं ऐसे आपकी, स्वर्गमें रहनेवाले देव नम होकर सेवा कर रहे हैं ।। १५२॥ हे देव, जो अग्रभागमें लगे हुए मणियोंसे सहित हैं ऐसे इन नमस्कार करते हुए देवोंके मुकुट ऐसे जान पड़ते हैं मानो आपके चरणोंके समीप दीनकसहित रत्नोंके अर्थ ही स्थापित किये गये हों ।॥१५३॥ नमस्कार करते हुए करोड़ों देवोंके मस्तकोंपर जो आपके चरणोंके नखोंकी किरणें पड़ रही थीं वे ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो उनपर प्रसन्नताके अंश ही लग रहे हों ।। १५४।। आपके नखरूपी दर्पणमें जिनका प्रतिविम्व पड़ रहा है ऐसे ये देवांगनाओंके मुख आपके चरणोंके समीपमें कमलोंकी शोभा धारण कर रहे हैं ॥ १५५॥ जवाके फूलके समान लाल वर्ण जो यह आपके पैरोंके तलवोंकी कान्ति फैल रही है वह देवांगनाओंके मुखोंपर बुद्धकुमकी शोभा धारण कर रही है ।॥१५६॥ जो वारह सभाओंसे भरी हुई पृथिवीके मध्यभागमें वर्तमान है और जिसपर अनेक मङगल द्रव्य प्रकट हो रहे हैं ऐसा यह तीन कटनीदार आपका पीठरूपी पर्वत बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा है ॥ १५७।। इस पीठकी पहली परिधि धर्मचक्रोंसे अलंकृत है और दूसरी परिधि भी आठों दिशाओंमें फहराती हुई आपकी इन बड़ी बड़ी ध्वजाओंसे सुशोभित है ॥१५८।। यद्यपि आपके श्रीमण्डपकी रचना एक ही योजन लम्बी-चौड़ी है तथापि वह तीनों जगत्के जनसमूहके निरन्तर प्रवेश कराते रहने रूप उपकार में समर्थ हैं ।॥ १५९॥ हे प्रभो, यह भूळीसालकी परिधि, ये मानस्तम्भ, सरोवर, स्वच्छ जलसे भरी हुई परिखा, लता- वनोंका समूह-ऊँचे ऊँचे चार गोपुर, दरवाजोंसे सुशोभित तीन कोट, मङगल द्रव्योंका समूह, निधियां, तोरण-दो-दो नाट्यशालाएँ, दो-दो सुन्दर धूप घट, चैत्यवृक्षोंसे सुशोभित वन पंक्तियोंकी परिधि-दो वनवेदी, ऊंची ऊंची ध्वजाओंकी पंक्तिसे भरी हुई पृथिवी, कल्पवृक्षों के वनका विस्तार, स्तूप और मकानोंकी पंक्ति-इस प्रकार मनुष्य देव और धरणेन्द्रोंको पवित्र करनेवाली आपकी यह सभाभूमि ऐसी जान पड़ती है मानो तीनों जगत्की अच्छी अच्छी वस्तुओंका समूह ही एक जगह इकट्ठा किया गया हो । १६०-१६४॥
श्लोक 165 से 181 जय-स्तुति
हे जिनेन्द्र, जिससे आपका महान् अभ्युदय या ऐश्वर्य प्रकट हो रहा है ऐसी यह आपकी अतिशय उत्कृष्ट बाह्य विभूति आपकी अन्तरङग लक्ष्मीको स्पष्ट रूपसे प्रकट कर रही है ।। १६५।। हे नाथ, जिसके विषयमें कोई तर्क-वितर्क नहीं कर सकता ऐसी यह देवोंके द्वारा रची हुई आपके समव-सरणकी विभूति आपके वैराग्यके अतिशयको नष्ट नहीं कर सकती है। भावार्थ-समवसरण सभाकी अनुपम विभूति देखकर आपके हृदयमें कुछ भी रागभाव उत्पन्न नहीं होता है ।।१६६।। इस प्रकार जिनकी अद्भुत महिमा है, जो तीनों लोकोंके स्वामी हैं, और जिनका शासन अतिशय पवित्र है ऐसे आप स्तुतिके द्वारा उपस्थान (पूजा) करनेवाले मुझे पवित्र कीजिये ॥१६७।। हे भगवन्, आपकी स्तुतिका प्रपञ्च करना व्यर्थ है क्योंकि आपके गुण अत्यन्त अचिन्त्य हैं इसलिये मैं संक्षेपसे इतनी ही स्तुति करता हूं कि हे ईशान, आपकी जय हो और आपको नमस्कार हो ॥१६८।। हे ईश, आपकी जय हो, हे कर्मरूप ईंधनको जलानेवाले, आपकी जय हो, हे जरारहित, आपकी जय हो, हे लोकोंके गुरु, आपकी जय हो, हे सबका हित करने वाले, आपकी जय हो, और हे जयशील, आपकी जय हो ।॥ १६९॥ हे अनन्तचतुष्ट्यरूप लक्ष्मीके स्वामी जयनशील, आपकी जय हो । हे अनन्तगुणोंसे उज्ज्वल, आपकी जय हो। हे समस्त जगत् के बन्धु, आपकी जय हो । हे समस्त जगत्का हित करनेवाले, आपकी जय हो ।॥१७०॥ हे समस्त जगत्को जाननेवाले, आपकी जय हो । हे समस्त सुखोंको प्राप्त करनेवाले, आपकी जय हो । हे समस्त जगत्में श्रेष्ठ, आपकी जय हो । हे समस्त जगत्के गुरु, आपकी जय हो ॥१७१॥ हे मोहरूपी शत्रुको जीतनेवाले, आपकी जय हो । हे कामदेवको भर्त्सना करने वाले, आपकी जय हो। हे जन्मजरारूपी रोगको जीतनेवाले, आपकी जय हो। हे मृत्युको जीतनेवाले, आपकी जय हो । १७२॥ हे मदरहित, मायारहित, आपकी जय हो । हे मोह रहित, ममतारहित, आपकी जय हो। हे निर्मल और निर्द्वन्द्व, आपकी जय हो । हे शरीर-रहित, और पूर्ण ज्ञानसहित, आपकी जय हो ।॥ १७३॥ हे समीचीन मार्गको जाननेवाले, आप की जय हो । हे मिथ्या मार्गको रोकनेवाले, आपकी जय हो । हे कर्मरूपी शत्रुओंके मर्मको बेधन करनेवाले, आपकी जय हो । हे धर्मचक्रके द्वारा विजय प्राप्त करनेमें उत्कट, आपकी जय हो ॥१७४।। हे यज्ञके अधिपति, आपकी जय हो। हे कर्मरूप ई धनको ध्यानरूप अग्नि में होम करनेवाले, आपकी जय हो। हे पूज्य तथा महान् वैभवको धारण करनेवाले, आपकी जय हो । हे उत्कृष्ट दयारूप चिह्नसे सहित तथा हे समीचीन धर्मरूपी रथके सारथि, आपकी जय हो ।। १७५।। हे संसाररूपी समुद्रको पार करनेवाले, हे गुणोंकी खानि, आपकी जय हो । हे समस्त विद्यारूपी समुद्रका पान करनेवाले, हे प्रभो, आपकी जय हो ॥ १७६॥ आप उत्कृष्ट अनन्त सुखरूप हैं तथा सबकी रक्षा करनेवाले हैं इसलिये आपको नमस्कार हो । आप परम आनन्दमय और परमात्मा हैं इसलिये आपको नमस्कार हो ।। १७७।। आप समस्त लोकको प्रकाशित करनेवाले ज्ञानकी दीप्तिके समूहसे देदीप्यमान हो रहे हैं इसलिये आपको नमस्कार हो । आपके परमौदारिक शरीरकी कान्ति नेत्रोंको आनन्द देनेवाली है इसलिये आपको नमस्कार हो ॥१७८॥ हे देव, स्वर्गावतरण अर्थात् गर्भकल्याणकके उत्सवके समय इन्द्रोंने अपने हाथों की अञ्जलिरूपी बिना खिले कमल अपने मस्तकपर रखकर आपकी स्तुति की थी इसलिये आपको नमस्कार हो ।॥ १७९॥ अपने नमू हुए मस्तकपर दोनों हाथ जोड़कर रखनेवाले उत्तम उत्तम देवोंने जिनकी स्तुति की है तथा सुमेरु पर्वतके अग्रभागपर जिनका जन्माभिषेक किया गया है ऐसे आपके लिये नमस्कार है ॥ १८०।। दीक्षाकल्याणकके उत्सवके समय अपने मुकुट के समीप ही हाथ जोड़कर लगा रखनेवाले लौकान्तिक देवोंने जिनका अधिष्ठान अर्थात् स्तुति की है ऐसे आपके लिये नमस्कार हो ॥१८१॥
श्लोक 182 से 191 स्तुति का फल
अपने मुकुटके अग्रभागमें लगे हुए रत्नोंका चुम्बन करनेवाले देवोंके हाथरूपी मुकुलित कमलोंके द्वारा जिनके केवलज्ञानकी पूजा की गई है ऐसे आपके लिये नमस्कार हो ॥१८२॥ हे भगवन्, जब आपका मोक्षकल्याणक होगाउस समय भी देदीप्यमान मुकुटोंको धारण करनेवाले वह्निकुमार देवोंके इन्द्र आपकी पूजा करेंगे इसलिये आपको नमस्कार हो ॥१८३॥ हे नाथ, आपको गर्भ आदि कल्याणकोंके समय बड़ी भारी पूजा प्राप्त हुई है, आप महान् तेजके धारक हैं, आपको तीन लोकका उत्कृष्ट राज्य प्राप्त हुआ है और आप बड़ोंमें भी बड़े अथवा श्रेष्ठोंमें भी श्रेष्ठ हैं इसलिये आपको नमस्कार हो ।।१८४।। नमस्कार करते हुए स्वर्गके इन्द्रोंके मुकुटमें लगे हुए मणियोंसे जिनके चरणोंकी पूजा की गई है ऐसे आपके लिये नमस्कार हो और जिन्होंने कर्मरूपी दुर्जेय शत्रुओंको जीतकर अनन्तचतुष्ट्यरूपी उत्तम लक्ष्मी प्राप्त की है ऐसे आपके लिये नमस्कार हो ॥ १८५॥ हे उत्कृष्ट ऋद्धियोंको धारण करनेवाले, आप उत्कृष्ट पूजाके योग्य हैं तथा रहस् अर्थात् अन्तराय रज अर्थात् ज्ञानावरण दर्शनावरण और अरि अर्थात् मोहनीय कर्मके नष्ट करनेसे आपने ‘अरिहन्त’ ऐसा सार्थक नाम प्राप्त किया है इसलिये आपको नमस्कार हो ॥ १८६॥ हे मृत्युको जीतनेवाले, आपको नमस्कार हो। हे मोहको जीतनेवाले, आपको नमस्कार हो। और हे कामको जीतनेवाले, आप वीतराग तथा स्वयंभू हैं इसलिये आपको नमस्कार हो ।॥ १८७॥ हे नाथ, जो आपको नमस्कार करता है वह पुण्यात्मा पुरुष अन्य अनेक नम् पुरुषोंके द्वारा नमस्कृत होता है और जो आपके विजयकी घोषणा करता है वह कुशल पुरुष जीतने योग्य समस्त कर्मरूप शत्रुओंको जीतकर गो अर्थात् पृथिवी या वाणीको जीतता है ॥ १८८।। हे देव, आज आपकी स्तुति करनेसे मेरे वचन पवित्र हो गये हैं, आपका स्मरण करनेसे मेरा मन पवित्र हो गया है, आपको नमस्कार करनेसे मेरा शरीर पवित्र हो गया है और आपके दर्शन करनेसे में धन्य हो गया हूं ॥ १८९॥ हे भगवन्, आज मैं कृतार्थ हो गया हूं, आज मेरा जन्म सफल हो गया है, आज मेरे नेत्र संतुष्ट हो गये हैं और आज मेरा मन अत्यन्त प्रसन्न हो गया है ।॥ १९०॥ हे देव, स्वच्छ और पुण्यरूप जलसे खूब भरे हुए आपके तीर्थरूपी सरोवरमें मैंने चिरकालसे अच्छी तरह स्नान किया है इसीलिये मैं आज पवित्र तथा सुखसे सन्तुष्ट हो रहा हूं ॥१९१॥
श्लोक 192 से 202 अयोध्या की वापसी
हे प्रभो, जिसने समस्त पाप नष्ट कर दिये हैं ऐसा जो यह आपके चरणोंके नखोंकी कान्तिका समूहरूप जल मेरे मस्तकपर लग रहा है उससे में ऐसा मालूम होता हूं मानो मेरा अभिषेक ही किया गया हो ॥ १९२॥ हे विभो, एक ओर तो मुझे दूसरेके शासनसे रहित यह चक्रवर्तीकी विभूति प्राप्त हुई है और एक ओर समस्त लोकको पवित्र करनेवाली आपके चरणोंकी सेवा प्राप्त हुई है ॥ १९३।। हे भगवन्, दिशाभूम होनेसे विमूढ होकर अथवा दिग्विजयके लिये अनेक दिशाओंमें भूमण करनेके लिये मुग्ध होकर मैंने जो कुछ पाप उपार्जन किया था वह आपके दर्शन मात्रसे उस प्रकार विलीन हो गया है जिस प्रकार कि सूर्यके दर्शनसे रात्रिका अन्धकार विलीन हो जाता है ।।१९४।। हे देव, आपके चरणोंके स्मरणमात्रसे ही जब मनुष्य पवित्रताको प्राप्त हो जाता है तब फिर इस प्रकार भक्तिसे की हुई आपके गुणोंकी स्तुतिसे क्यों नहीं पवित्रताको प्राप्त होगा ? अर्थात् अवश्य ही होगा ।।१९५॥ हे भगवन्, आपके गुणोंकी स्तुति करनेसे जो मैंने पुण्य उपार्जन किया है उससे यही चाहता हूं कि आपके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे ।।१९६।। इस प्रकार चर अचर जीवोंके गुरु सर्वोत्कृष्ट भगवान् वृषभदेवको नमस्कार कर जिसने आनन्द के आँसुओंकी बूंदोंसे सामनेका प्रदेश सींच दिया है, जिसका ज्ञान प्रकाशमान हो रहा है, और जिसने दोनों हाथ जोड़कर अपने मस्तकसे लगा रखे हैं ऐसे चक्रवर्ती भरतने भक्तिपूर्वक भगवान् को नमस्कार किया ॥१९७॥ कर्मरूपी शत्रुओंके समूहको जीतनेसे जिन्हें विशुद्ध ज्ञान प्राप्त हुआ है ऐसे पुराण पुरुष भगवान् वृषभदेवसे पुरातन धर्मका स्वरूप सुनकर भरताधिपति महाराज भरत बड़ी प्रसन्नताको प्राप्त हुए सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमान् पुरुषोंको प्रायः अपना हित करनेमें ही सन्तोष होता है ॥१९८॥ तदनन्तर अपने चञ्चल मुकुटके किनारेसे जिन्होंने भग-वान्के पाद पीठका स्पर्श किया है ऐसे निधियोंके स्वामी भरत महाराज अपने पिता आदिनाथ भगवान्से पूछकर तथा वहाँ विराजमान अन्य मुनियोंको नमू हुए मस्तकसे नमस्कार कर अपनी निवासभूमि अयोध्याको जानेके लिये तत्पर हुए ॥ १९९॥ चक्राधिपति भरतने जिसमें अनुक्रमसे खिले हुए सुन्दर फूल गुधे हुए हैं और जो श्री जिनेन्द्रदेवके चरणोंमें भक्तिपूर्वक पित की गई है ऐसी मालाके समान, सुन्दर मनकी प्रसन्नतासे युक्त अपनी दृष्टिको शेषाक्षत समझ बड़ी कठिनाईसे हटाकर भगवान् के सभाभवन अर्थात् समवसरणसे प्रस्थान किया ।।२००।। भगवान्के समवसरणकी प्रकाशमान विभूतिको देखनेसे जिनके दोनों नेत्र खुल रहे हैं, जिनकी भुजायें युग (जुवाँरी) के समान लम्बी हैं, मस्तक झुकाये हुए अनेक राजा लोग जिनके पीछे पीछे चल रहे हैं और जो कुलकरोंके वंशकी पताकाके समान जान पड़ते हैं ऐसे भरत महाराज अपने घरकी ओर लौटे ॥२०१।। चूंकि पुण्यके उदयसे ही चक्रवर्तीने समस्त दिशाएं जीतीं, तथा उनके जीतनेमें साठ हजार वर्ष लगाये और फिर प्रीतिपूर्वक जिनेन्द्रदेवको नमस्कार कर उत्कृष्ट आनन्द प्राप्त किया। इसलिये हे वृद्धिमान् जन, पुण्यके संग्रह करनेमें प्रयत्न करो
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराण संग्रहके भाषानुवादमें भरतराजका कैलाश पर्वतपर जानेका वर्णन करनेवाला तैंतीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
हिन्दी-भाषानुवाद
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena