आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 आप्त और समीचीन धर्म का वर्णन
मुनि या आचार्य भव्य को आप्त के सत्य वचनों को ग्रहण करने का उपदेश देते हैं। आप्त वह है, जो वीतराग, सर्वज्ञ, कल्याणकारी, और मोक्षमार्ग का उपदेशक है। आप्त के गुणों में रूप, तेज, ज्ञान, और सुखामृत आदि शामिल हैं। जैन मत आप्त का कथन है, जो युक्ति, आगम, और गंभीर शासन से युक्त है। इसमें शास्त्र, मंत्र, और क्रिया का यथार्थ निरूपण है। अन्य मतों के वचन दुष्ट हैं, जबकि जैन धर्म ही समीचीन मार्ग है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
विद्धि सत्योद्यमाप्तीयं वचः श्रेयोऽनुशासनम् । अनाप्तोपज्ञमन्यत्तु वचो वाङ्मलमेव तत् ॥१२॥
वे कहते हैं-हे भव्य, मोक्षका उपदेश देनेवाले आप्तके वचनको ही तू सत्य वचन मान और इसके विपरीत जो वचन आप्तका कहा हुआ नहीं है उसे केवल वाणीका मल ही समझ ॥ १२॥
They say: “O noble one, regard only the words of the enlightened teacher who reveals liberation as true; and regard all utterances contrary thereto—if not spoken by such a guide—as but the refuse of idle speech.”12
श्लोक ( Shlok ) 13
विरागः सर्ववित् सार्वः सूक्तसूनृतपूतवाक् । आप्तः सन्मार्गदेशी यस्तदाभासास्ततोऽपरे ॥१३॥
जो वीतराग है, सर्वज्ञ है, सबका कल्याण करनेवाला है, जिसके वचन समीचीन, सत्य और पवित्र हैं, तथा जो उत्कृष्ट-मोक्षमार्गका उपदेश देनेवाला है वह आप्त कहलाता है, इनसे भिन्न सभी आप्ता-भास हैं अर्थात् आप्त न होनेपर भी आप्तके समान मालूम होते हैं ।॥१३॥
He who is free from attachment, omniscient, the benefactor of all beings, whose words are fitting, truthful, and pure, and who imparts the supreme path to liberation—he alone is called an Āpta. All others, differing from him, are but semblances of Āpta—appearances that mimic the true teacher though lacking his essence.13
श्लोक ( Shlok ) 14 – 15
रूप तेजोगु णस्थानध्यानलक्ष्म्यनुवर्तिभिः । “काङ्क्ष्यता विजयज्ञानदृष्टिवीर्यसुखामृतैः ॥१४॥ प्रकृष्टो यो गुणैरेभिश्चक्रिकल्पा धिपादिषु । स आप्तः स च सर्वज्ञः स लोकपरमेश्वरः ॥१५॥
जो रूप, तेज, गुण-स्थान, ध्यान, लक्षण, ऋद्धि, दान, सुन्दरता, विजय, ज्ञान, दृष्टि, वीर्य और सुखामृत इन गुणोंसे चक्रवर्ती तथा इन्द्रादिकोंसे भी उत्कृष्ट है वही आप्त है, सर्वज्ञ है और समस्त लोकोंका परमेश्वर है ।।१४-१५।।
He who embodies form and brilliance, the abode of virtues, mastery of meditation, auspicious signs, supernatural powers, generosity, beauty, victory, wisdom, vision, vigor, and the nectar of bliss—He who surpasses even the Chakravartin and the Indras, is the true Āpta, omniscient, and the supreme Lord of all realms.14 – 15
श्लोक ( Shlok ) 16
ततः श्रेयोऽर्थिना श्रेयं मतमाप्तप्रणेतृकम् । अव्याहतमनालीढपूर्व सर्वज्ञमानिभिः ॥१६॥
इसलिये जो आप्तका कहा हुआ है, जिसका कोई खण्डन नहीं कर सकता और अपने आपको सर्वज्ञ माननेवाले पुरुष जिसका स्पर्श भी नहीं कर सके हैं ऐसा जैन मत है। कल्याणकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंके लिये कल्याणकारण है ।।१६।॥
Therefore, that which is declared by the Āpta—which admits no refutation—and the doctrine of him who esteems himself omniscient, yet remains beyond the reach of all, is the Jain teaching; a cause of welfare for those who earnestly seek their salvation.
श्लोक ( Shlok ) 17
“हेत्वाज्ञायुक्तमद्वैतं दीप्तं गम्भीरशासनम् । अल्पाक्षरमसन्दिग्धं वाक्यं स्वायम्भुवं विदुः ॥१७॥
जो युक्ति तथा आगमसे युक्त है, अनुपम है, देदीप्यमान है, जिसका शासन गंभीर है, जो अल्पाक्षर वाला है और जिसके पढ़नेसे किसी प्रकारका संदेह नहीं होता ऐसा वाक्य ही अरहन्त भगवान्का कहा हुआ कहलाता है ।।१७।।
That utterance which is consistent with logic and scripture, unparalleled and radiant, whose command is solemn and profound, composed of few syllables, and whose study leaves no room for doubt—such a statement is deemed to be the word of the Arhat Bhagavān.17
श्लोक ( Shlok ) 18
“इतश्च तत्प्रमाणं स्यात् श्रुतमन्त्रक्रियादयः । पदार्थाः सुस्थितास्तत्र यतो नान्यमतोचिता ॥ १८॥
चूंकि अरहन्तदेवके मतमें अन्य मतोंमें नहीं पाये जानेवाले शास्त्र, मंत्र तथा क्रिया आदि पदार्थोंका अच्छी तरह निरूपण किया गया है इसलिये वह प्रमाणभूत है ।।१८।।
Since, according to the Arhat Deva’s doctrine, the scriptures, mantras, and rites—unparalleled in other teachings—are thoroughly elucidated, it is thereby established as a veritable and authoritative testimony.18
श्लोक ( Shlok ) 19
युथाक्रममतो ब्रूमस्तान्पदार्थान् “प्रपञ्चतः । यैः सनिः कृष्यमाणाः स्युः दुःस्थिताः परसूक्तयः ॥१९॥
हे वत्स, मैं यथाक्रमसे विस्तारके साथ अपदार्थोंका निरूपण करता हूं क्योंकि उन पदार्थोंके समीप आनेपर अन्य मतोंके वचन दुष्ट जान पड़ते हैं ।॥१९॥
O dear one, I shall now systematically and in full detail expound the nature of the apadārthas (causes of downfall), for in their presence, the words of other doctrines appear manifestly flawed and misguided.19
श्लोक ( Shlok ) 20 – 21
वेदः पुराणं स्मृतयः चारित्रं च क्रियाविधिः । मन्त्राश्च देवतालिङ्गमाहाराद्याश्च शुद्धयः ॥२०॥ “एतेऽर्था” यत्र तत्त्वेन प्रणीताः परमर्षिणा । स धर्मः स च सन्मार्गः तदाभासाः स्युरन्यथा ॥२१॥
जिसमें वेद, पुराण, स्मृति, चारित्र, क्रियाओंकी विधि, मन्त्र, देवता, लिङग और आहार आदिकी शुद्धि इन पदार्थों का यथार्थ रीतिसे परमर्षियोंने निरूपण किया है वही धर्म है और वही समीचीन मार्ग है। इसकेसिवाय सब धर्माभास तथा मार्गाभास हैं ॥ २०-२१॥
That which the supreme sages have truly delineated—the purity of scriptures such as the Vedas, Puranas, Smritis; the conduct, rites, mantras, deities, symbols, and sustenance—this alone is Dharma, the righteous and fitting path.All else is but semblance of religion and misguided way.20 – 21
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11
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