आदिपुराण द्वितीयं पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 2 by Acharya Jinasena
पर्व 2 में गौतम की महिमा, श्रेणिक की प्रार्थना, और पुराण का स्वरूप का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 162)
ग्रंथकर्ता वृषभदेव को नमस्कार कर पुराण का विस्तार करता है। श्रेणिक ने गौतम से महावीर द्वारा सुना पुराण ग्रंथरूप में पूछा। गौतम अकारण बंधु हैं। उनकी किरणें अज्ञान नष्ट करती हैं। समवसरण में पशु धन्य हैं। हरिण और हथिनियाँ शांतिपूर्वक रहते हैं। तपोवन दयावन-सा है। श्रेणिक ने पाप स्वीकार कर पुराण सुनने की प्रार्थना की। मुनियों ने उनकी प्रशंसा की। धर्म वृक्ष है, जो अर्थ और मोक्ष देता है। पुराण में क्षेत्र, काल, और तीर्थ हैं। श्रेणिक का प्रश्न गंभीर है। मुनि गौतम की स्तुति करते हैं। गौतम महायोगी और ऋद्धिधारी हैं। वे पुराण सुनाने को तैयार हुए। गौतम ने वृषभदेव द्वारा भरत को कहा पुराण श्रेणिक के लिए कहा। श्रुतस्कंध के चार अनुयोग हैं। प्रथमानुयोग में सत्पुरुषों का चरित्र है। इसमें 2554423107500 श्लोक हैं। यह तीर्थंकरों और लोकों का वर्णन करता है। इसमें 63 या 24 अधिकार हैं। दुःषम काल में यह घटेगा। सुधर्माचार्य और जंबूस्वामी इसे प्रकाशित करेंगे। 683 वर्ष बाद यह अल्प होगा। जिनसेन जैसे कवि इसे स्मरण करेंगे। वृषभनाथ का पुराण पहले कहा जाएगा। सभा श्रेणिक के साथ सुनने को सावधान हुई। यह पुराण पाप धोकर शुद्धि देता है।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 2
श्लोक 1 से 10 गौतम से प्रश्न और उनकी महिमा
ग्रंथकर्ता वृषभदेव को नमस्कार कर पुराण का विस्तार करता है। श्रेणिक ने गौतम से धर्म का स्वरूप पूछा। वे महावीर से सुना पुराण ग्रंथरूप में सुनना चाहते हैं। गौतम अकारण बंधु और वैद्य हैं। उनकी किरणें अभिषेक-सी हैं। वे सूर्य-से जगत को प्रबोधित करते हैं। उनकी वचन-किरणें अज्ञान नष्ट करती हैं। उनकी बुद्धि अग्नि-शिखाओं-सी है। समवसरण तपोवन-सा पवित्र है।
श्लोक 11 से 20 समवसरण की शोभा
समवसरण में पशु धन्य और पुष्ट हैं। हरिण अमृत-सा जल पीते हैं। हथिनियाँ सिंह के बच्चों को दूध पिलाती हैं। हरिण मुनियों-से चरणों का आश्रय लेते हैं। वृक्ष फल-पुष्पों से शोभित हैं। लताएँ कर-बाधा से मुक्त हैं। तपोवन दयावन-सा आनंदित करता है। दिगंबर तपस्वी मोक्षमार्ग की उपासना करते हैं। गौतम का माहात्म्य प्रकट है। वे तीनों लोकों को जानते हैं।
श्लोक 21 से 30 श्रेणिक की प्रार्थना
श्रेणिक ने अज्ञानवश पाप किए। उन्होंने हिंसा, झूठ आदि से घोर पाप संचित किए। मुनि-वध में आनंद लिया। वे पुराण सुनकर पाप-निराकरण चाहते हैं। दांतों की कांति से स्तुति कर चुप हुए। मुनियों ने श्रेणिक की प्रशंसा की। वे प्रश्न में श्रेष्ठ हैं। उन्होंने चित्त हर्षित किया। वे वही पुराण पूछते हैं जो मुनि चाहते थे। श्रेणिक का प्रश्न पुराण पूछने वालों से मेल खाता। धर्म स्वरूप जानने से संसार स्वरूप की इच्छा प्रकट की।
श्लोक 31 से 40 धर्म का माहात्म्य
श्रेणिक ने धर्म जानकर संसार जानना चाहा। धर्म वृक्ष है, अर्थ फल और काम रस है। धर्म से अर्थ, काम, स्वर्ग मिलते हैं। धर्म कामधेनु और कल्पवृक्ष है। यह संकटों से बचाता है। विचार, ज्ञान से इसका माहात्म्य जाना जाता है। यह नरक से रक्षा कर मोक्ष देता है। पुराण ही धर्म है। इसमें क्षेत्र, काल, तीर्थ, सत्पुरुष, और चेष्टाएँ हैं। श्रेणिक ने प्रश्न में पुराण का अर्थ समाविष्ट किया।
श्लोक 41 से 50 प्रश्न की महत्ता
श्रेणिक का प्रश्न सरल पर गंभीर और तत्त्वपूर्ण है। भरत और सगर ने भी यही पूछा था। श्रेणिक ने परंपरा सुशोभित की। वे प्रश्नकर्ता, महावीर उत्तरदाता, और मुनि श्रोता हैं। गौतम पुराण कहें। मुनि गौतम की स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति आश्चर्यकारी है। वे चौदह पूर्वों के पारगामी हैं। उनकी कीर्ति चंद्र-सी है।
श्लोक 51 से 60 गौतम की स्तुति
गौतम महायोगी और संघाधिपति हैं। वे उत्कृष्ट वाणी जानते हैं। नाम “गौतम” सार्थक (उत्कृष्ट वाणी जानने वाला)। इंद्रभूति (विभूति प्राप्त), और बुद्ध कहलाते हैं। उनकी ज्ञान-ज्योति अनोखी है। उनकी दीपिका संसार प्रकाशित करती है। उनके वचन मिथ्यात्व नष्ट करते हैं। उनकी प्रज्ञा नदी-सी है, द्वादशांग जहाज। उन्होंने श्रुतज्ञान अवतरित किया। वे दो ज्ञानों से श्रुतकेवली हैं।
श्लोक 61 से 70 गौतम के गुण
गौतम से मोक्ष द्वार की प्रार्थना। वे ब्रह्मसुत, सिद्ध पद अधीन। मुनि सम्यग्दर्शन आदि की उपासना करते। गौतम को बार-बार नमस्कार (महायोगी, बुद्धिमान, रक्षक, ऋद्धि धारक)। अवधिज्ञान, कोष्ठबुद्धि, बीजबुद्धि, पदानुसारी, संभिन्नश्रोतृ ऋद्धियाँ धारक। ऋजुमति, विपुलमति, प्रत्येक बुद्ध। दश पूर्व धारक, तपस्वी, ब्रह्मचारी, तेजस्वी।
श्लोक 71 से 80 गौतम की ऋद्धियाँ
गौतम आठ विक्रिया ऋद्धियों से युक्त हैं। वे आमर्ष, क्ष्वेल आदि ऋद्धियों से सुशोभित हैं। वे रस और बल ऋद्धियों से संपन्न हैं। वे चारण और अक्षीण ऋद्धियों के धारक हैं। वे परम हितकारी और गुरु हैं। उनकी सेवा से ज्ञान मिलता है। वे धर्मशास्त्र वर्णन करते हैं। उनकी स्तुति से गुप्तियाँ भंग होती हैं। वे शलाकापुरुषों का पुराण सुनाएँ।
श्लोक 81 से 95 गौतम का संबोधन
मुनियों की स्तुति से कोलाहल हुआ। गौतम प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रार्थना पर ध्यान दिया। श्रोता चुपचाप बैठे। गौतम गंभीर वाणी से बोले। उनकी किरणें सरस्वती-सी थीं। वे भक्ति से रत्न दिखाते थे। तप माहात्म्य से शोभित। बिना परिश्रम सरस्वती प्रकट।वे वैराग्य और विनय प्रकट करते थे।
श्लोक 96 से 105 पुराण का प्रारंभ और अनुयोग
गौतम स्वामी ने भव्यजनों से पुराण सुनने को कहा। उन्होंने वृषभदेव द्वारा भरत को कहा पुराण श्रेणिक के लिए कहा। श्रुतस्कंध के चार अनुयोग हैं। प्रथमानुयोग में सत्पुरुषों का चरित्र है। करणानुयोग में लोकों का वर्णन है। चरणानुयोग में चारित्र-शुद्धि है। द्रव्यानुयोग में द्रव्यों का निर्णय है। उपक्रम के पाँच भेद हैं। प्रथमानुयोग पहला और अंतिम दोनों हो सकता है।
श्लोक 106 से 115 ग्रंथ का प्रमाण
नाम उपक्रम प्रथमानुयोग का पहला भाग है। ग्रंथ-विस्तार के भय से प्रमाण बताया गया। प्रथमानुयोग शब्दों से परिमेय है। इसमें 2554423107500 अनुष्टुप् श्लोक हैं। पदों की संख्या 5000 और अक्षर 16348307888 हैं। यह द्रव्यश्रुत का प्रमाण है। द्वादशांग इसका अभिधेय है।
श्लोक 116 से 125 पुराण का अभिधेय
पुराण से सुभाषित रत्न उत्पन्न होते हैं। इसमें तीर्थंकरों और मुनियों की संपदा का वर्णन है। जीव, बंध, मोक्ष, द्रव्य, और पदार्थ इसमें हैं। तीनों लोक और काल का संग्रह है। सत्यदर्शन, मोक्ष, और पुरुषार्थ इसमें हैं। यह समस्त धर्म-सृष्टि को वर्णित करता है। यह कसौटी-सा पदार्थों की परीक्षा करता है। इसमें 63 अधिकार हैं।
श्लोक 126 से 135 अधिकारों का विस्तार
पुराण के 63 अधिकार हैं। अवांतर अधिकार अमर्यादित हैं। कुछ आचार्य 24 तीर्थंकरों के पुराण मानते हैं। ये वृषभनाथ से महावीर तक हैं। यह समूह महापुराण है। अवसर्पिणी युग के अंत में यह अल्प होगा।
श्लोक 136 से 145 पुराण का प्रकाश
दुःषम काल में बुद्धि और पुराण घटेंगे। सुधर्माचार्य और जंबूस्वामी इसे पूर्ण प्रकाशित करेंगे। तीन श्रुतकेवली 62 वर्ष तक रहेंगे। इसके बाद 100 वर्ष में पाँच आचार्य ग्यारह अंग और चौदह पूर्व धारण करेंगे। फिर 183 वर्ष तक ग्यारह आचार्य दश पूर्व धारक होंगे।
श्लोक 146 से 155 पुराण का ह्रास
220 वर्ष तक पाँच मुनि ग्यारह अंग धारक होंगे। पुराण तीन चतुर्थांश रहेगा। फिर चार आचार्य एक चौथाई धारण करेंगे। 683 वर्ष बाद पुराण घटेगा। जिनसेन जैसे कवि इसे स्मरण करेंगे। वर्धमान का पुराण ही प्रामाणिक है। पंचपरमेष्ठियों का नाम पवित्र करता है।
श्लोक 156 से 162 कथा की शुरुआत
भव्यजनों को पुराण में अवगाहन करना चाहिए। वृषभनाथ का पुराण पहले कहा जाएगा। इसमें काल, कुलकर, वंश, और निर्वाण हैं। यह उपोद्धात है। सभा श्रेणिक के साथ सुनने को सावधान हुई। यह पुराण पाप धोकर शुद्धि देता है।
पर्व 3
हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41
Download PDF
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena