Hindi Translation of Adi purana Parv 37
श्लोक 1 से 11 भरत का अयोध्या में अभिषेक
अथानन्तर जिसने समस्त दिग्विजय समाप्त कर लिया है ऐसे भरतेश्वरने जिसमें अनेक ध्वजाएँ फहरा रही हैं ऐसे अयोध्यानगरमें बड़े वैभवके साथ प्रवेश किया ।।१।। चतुरंग विजयसे उत्पन्न हुई आपकी लक्ष्मी संसारमें अतिशय वृद्धि और प्रसिद्धिको प्राप्त होती रहे यही विचार कर बड़े बड़े राजाओंने उस अयोध्या नगरमें हर्ष के साथ महाराज भरतका अभिषेक किया था ।।२।। हे देव, आप दीर्घजीवी होते हुए चिरकालतक पृथिवीका राज्य करें, इस प्रकार कहते हुए अन्तःपुर तथा पुरोहितोंके साथ नगरके लोगोंने उनका अभिषेक किया था ॥३॥ जो विधि भगवान् वृषभदेवके राज्याभिषेकके समय हुई थी, तीर्थोंका जल इकट्ठा करना आदि वह सब विधि महाराज भरतके अभिषेकके समय भी राजाओंने की थी ॥४॥ देवोंके साथ साथ राजाओंने भगवान् वृषभदेवके समान ही भरतेश्वरका अभिषेक किया था, उसी प्रकार आभूषण पहिनाये थे और उसी प्रकार जयघोषणा आदि की ॥५॥ उसीप्रकार परिवार-के लोगोंके साथ साथ राजाओंका सत्कार किया गया था, और उसीप्रकार दानमें दी हुई सम्पत्ति से सब लोग संतुष्ट किये गये थे ॥ ६। जिनके शब्दोंने क्षोभित हुए समुद्रके शब्दको भी तिरकृत कर दिया था ऐसे बड़े बड़े शब्दोंवाले मांगलिक नगाड़े उसीप्रकार बजाये गये थे ।।७।। उसी प्रकार आनन्दकी महाभेरियां बार बार बजाई जा रही थीं और आनन्दमण्डपमें संगीतकी विधि भी उसी प्रकार प्रारम्भ की गई थी ॥८॥ मेरु पर्वतपर इन्द्रोंके द्वारा अभिषेक किये हुए आदिब्रह्मा भगवान् वृषभदेवकी जैसी कान्ति हुई थी उसी प्रकार राजाओंके द्वारा अभिषेकको प्राप्त हुए महाराज भरतकी भी हुई थी ।।९।। गंगा-सिन्धु नदियोंकी अधिष्ठात्री गंगा-सिन्धु नामकी देवियोंने आकर रत्नोंके भृङ्गारोंमें भरे हुए अक्षत सहित तीर्थजलसे भरत-का अभिषेक किया था ।।१०।। जिनका अभिषेक समाप्त हो चुका है और जो राजसिंहासनपर बैठे हुए हैं ऐसे महाराज भरतकी अनेक गणबद्धदेव अपने मणिमयी मुकुटोंको नवा-नवाकरसेवा कर रहे थे ।।११।।
श्लोक 12 से 21 भरत की विनम्रता और वैभव
हिमवान् और विजयार्थ पर्वतके अधीश्वर हिमवान् तथा विजयार्ध-देव, मागध आदि अन्य अनेक देव, और उत्तर-दक्षिण श्रेणीके विद्याधर अपने मस्तक झुका झुकाकर उन्हें नमस्कार कर रहे थे ।।१२।। अनेक अच्छे अच्छे राजाओंके द्वारा अभिषिक्त होनेपर भी उन्हें कुछ भी अहंकार नहीं हुआ था सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंकी मनोवृत्ति अहंकारका स्पर्श नहीं करती ॥१३॥ यद्यपि उनके ऊपर चमर ढुलाये जा रहे थे तथापि वे उससे संतोषको प्राप्त नहीं हुए थे क्योंकि उन्हें निरन्तर इस बातका पछतावा हो रहा था कि मैंने अपनी विभूति भाइयोंकी नहीं बांट पाई ।।१४।। भाई बाहुबलीके संघर्षसे उनका तेज कुछ कम नहीं हुआ था किन्तु कसौटीपर घिसे हुए सोनेके समान अधिक ही हो गया था ॥१५।। इस प्रकार निष्कण्टक राज्यको पाकर महाराज भरत उस सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे जिसका कि प्रताप बढ़ रहा है और मण्डल अत्यन्त शुद्ध है ॥१६॥ योग (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति करना) और क्षेम (प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा करना) को फैलानेवाले उन उत्तम राजा भरतके विद्यमान रहते हुए प्रजा अपने आपको सनाथ समझती हुई कुशल मंगलको प्राप्त होती रहती थी ।।१७।। महाराज भरतने निधियोंका यथायोग्य विभागकर उनका उपभोग किया था सो ठीक ही है क्योंकि स्वयं संभोग करना और दूसरेको विभाग कर देना ये दो ही धन कमाने के मुख्य फल हैं ।।१८।। निधियोंके स्वामी भरतने रत्नोंका भी इच्छानुसार उपभोग किया था सो ठीक ही है क्योंकि वास्तवमें रत्न वही हैं जो उपयोगमें आवें ॥१९॥ यह सोलहवां मनु है, चक्रतियोंमें प्रथम चक्रवर्ती है, षट् खण्ड भरतका स्वामी है, राजराजेश्वर है, अधिराट् है और सम्राट् है इस प्रकार उसका यश उद्घोषित हो रहा था ।।२०।। यह भरत भगवान् वृषभदेवका पुत्र है और इसकी माताके सौ पुत्र हैं इस प्रकार इसकी कभी नष्ट नहीं होनेवाली उज्वल कीति आकाश तथा पृथिवीमें व्याप्त हो रही थी ॥२१॥
श्लोक 22 से 31 भरत की सेना और शारीरिक बल
उस चक्रवर्ती-का परिवार कितना था ? और विभूति कितनी थी ? राजा श्रेणिकके इस प्रश्नका उत्तर देनेके लिये गौतमस्वामी उसकी विभूतिका इस प्रकार वर्णन करने लगे ॥ २२॥ महाराज भरतके, जिनके गण्डस्थलसे मदरूपी जल झर रहा है, और जो जड़े हुए सुसज्जित दांतोंसे सुशो- भित हैं ऐसे ऐरावत हाथीके समान चौरासी लाख हाथी थे ॥ २३॥ जिनका वेग मन और वायुके समान है अथवा जिनकी तेज चाल सूर्यके साथ स्पर्धा करनेवाली है ऐसे दिव्य रत्नोंके वने हुए उतने ही अर्थात् चौरासी लाख ही रथ थे ।। २४।। जिनके खुरोंके अग्रभाग पवित्र गंगा-जलसे धुले हुए हैं और जो पृथिवी, जल तथा आकाशमें समान रूपसे चल सकते हैं ऐसे अठारह करोड़ घोड़े हैं ।॥ २५॥ अनेक योद्धाओंके मर्दन करनेमें जिनका पुरुषार्थ प्रसिद्ध है ऐसे चौरासी करोड़ पैदल सिपाही थे ।। २६ ।। महाराज भरतका शरीर वजू को हड्डियोंके बन्धन और वज के ही वेष्टनोंसे वेष्टित था, वजमय कीलोंसे कीलित था और अभेद्य अर्थात् भेदन करने योग्य नहीं था। भावार्थ-उनका शरीर वज्रवृषभनाराचसंहननका धारक था ।। २७।। उनका शरीर चतुरस्र था-चारों ओरसे मनोहर था, उसके अंगोंपांगोंका विभाग समानरूपसे हुआ था अंगोंकी मिला-वट भी ठीक थी और समचतुरस्र नामके प्रथम संहननसे अत्यन्त सुन्दर था ।॥२८॥ जिसकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी और जिसपर चौंसठ लक्षण थे ऐसा उसका स्वभावसे ही सुन्दर शरीर तिल आदि व्यञ्जनोंसे बहुत ही सुशोभित हो रहा था ।। २९।। छहों खण्डक राजाओंका जो और जितना कुछ शारीरिक बल था उससे कहीं अधिक बल उस बलवान् भरत-के शरीरमें था ॥३०॥ जिसका चक्र ही चिह्न है और समुद्रपर्यन्त जिसे कोई नहीं रोक सकता ऐसे उसके शासनको बड़े बड़े पराक्रमको धारण करनेवाले राजालोग अपने शिरपर धारण करते थे ।॥३१॥
श्लोक 32 से 41 भरत का साम्राज्य और रानियां
उनके बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा थे, उन राजाओंसे वेष्टित हुए महाराज भरत कुलाचलोंसे घिरे हुए सुमेरु पर्वतके समान सुशोभित होते थे ॥३२॥ महाराज भरत-के अच्छी अच्छी रचनावाले बत्तीस हजार ही देश थे और उन सबसे सुशोभित हुआ चक्रवर्तीका लम्बा चौड़ा क्षेत्र बहुत ही अच्छा जान पड़ता था ।। ३३ ।। उनके उतनी ही अर्थात् बत्तीस हजार ही देवियां थीं जो कि उच्च कुल और जातिसे सम्पन्न थीं तथा जो रूप लावण्य और कान्तिकी शुद्ध खानिके समान जान पड़ती थीं ॥ ३४।। इनके सिवाय जिन्होंने पृथिवीपर अप्सराओंकी कथाओंको उतार लिया था ऐसी म्लेच्छ राजा आदिकों के द्वारा दी हुई बत्तीस हजार प्रियरानियां थीं ।॥ ॥३५॥ इसी प्रकार जिनका शरीर अत्यन्त कोमल था और कामको उत्तेजित करने- वाले जिनके नेत्ररूपी बाणोंसे यह समस्त संसार जीता गया था ऐसी बत्तीस हजार रानियां और भी उनके अन्तःपुरमे थों ॥ ३६।। वे छियानबे हजार रानियां नखोंकी किरणरूपी फूलों-के खिलनेसे, कुछ कुछ लाल हथेलीरूपी पल्लवोंसे और भुजारूपी शाखाओंसे कल्पलताकी शोभा धारण कर रहीं थीं ॥ ३७॥ कामदेवके निवास करनेकी भूमिस्वरूप वे रानियां स्तनरूपी कमलोंकी बोड़ियोंसे और खिले हुए मुखरूपी कमलोंस कमलिनियोंक समान सुशोभित हो रही थीं ।॥ ३८।। मैं समझता हूँ कि उन रानियोंके शरीर कामरूपी पिशाचकी उन्नतिके पात्र थे क्योंकि उनके आवेशके वशसे ही यह कामदेव सबको उल्लंघन करनेवाली विशाल अवस्था-को प्राप्त हुआ था ।। ३९।। अथवा मुझे यह भी शंका होती है कि उन रानियोंके नख, काम-देवके बाण पैने करनेके पाषाण थे क्योंकि वह उन्हींपर घिसकर पैने किये हुए बाणोंसे कामी लोगोंपर प्रहार किया करता था ॥४०॥ यह भी सच है कि उनकी जंघाएँ कामदेवरूपी धनु-र्धारीके बड़े बड़े तरकस थे और ऊरुदण्ड (घुटनोंसे ऊपरका भाग) कामदेवके चढ़नेकी नसैनी के समान थे ।।४१।।
श्लोक 42 से 51 रानियों की शारीरिक शोभा
करधनीरूपी कोटसे घिरी हुई उनकी कमर कामदेवकी कुटीके समान थी और उनकी नाभि कामदेवकी गहरी कूपिका (कुइयाँ) के समान जान पड़ती थी ॥४२॥ मैं मानता हूँ कि उनकी रोमराजि कामदेवरूपी अत्यन्त वृद्ध पुरुषके सहारेकी लकड़ी थी और उनके स्तन कामदेवके रत्न रखनेके पिटारे थे ॥४३॥ शिरीषके फूलके समान कोमल उनकी दोनों भुजाएँ कामदेव के पाशके समान लम्बी थीं और अच्छे कण्ठवाली उन रानियोंका मनोहर कण्ठ कामदेवके उच्छ्वासके समान था ।।४४।। उनका मुख रति (प्रीति) रूपी सुखका प्रधान भवन था और उनके औंठ वैराग्यरसकी प्राप्तिके मुखबन्धन अर्थात् द्वार बन्द करनेवाले कपाट थे ॥४५।। उन रानियोंके नेत्रोंके कटाक्ष विजयकी इच्छा करनेवाले कामदेवके बाणोंके समान थे, कानके अन्तभाग उसके लक्ष्य अर्थात् निशानोंके समान थे और भाँहरूपी लता धनुषकी लकड़ीके समान थी ॥४६॥ में समझता हूँ कि उन रानियोंके ललाटका विस्तार इष्टभोग रूपी गेंदसे खेलनेवाले कामदेवरूपी राजाके खेलनेका मानो मैदान ही हो ॥४७॥ उनकेइकट्ठे हुए आगे के सुन्दर बाल कामदेवरूपी काले सर्पके बच्चोंके समान जान पड़ते थे तथा कुछ कुछ टेढ़ी हुई केशरूपी लताएँ कामदेवके जालके समान जान पड़ती थीं ।॥४८।। इस प्रकार अपने शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली काममयी रचनाको प्रकट करती हुई वे रानियाँ अपनी सुन्दर कामकी चेष्टाओं से महाराज भरतका मन हरण करती थीं ।॥४९॥ उनके कोमल हाथोंके स्पर्शसे, प्रेमपूर्ण सरस अवलोकनसे, और अव्यक्त मधुर शब्दोंसे इसे बहुत ही संतोष होता था ।।५०।। रससे भरा हुआ सुरतरूपी वृक्ष इन रानियोंके मन्द मन्द हँसनेपर कुछ खिल जाता था, जोरसे हँसनेपर पूर्णरूपसे खिल जाता था और आलिंगन करनपर फलोंसे युक्त हो जाता था ।।५१।।
श्लोक 52 से 61 रानियों का कामदेव और साम्राज्य
भौहों के चलानेरूप यन्त्रोंसे फेंके हुए पत्थरोंके द्वारा तथा दृष्टियों के फेंकनेरूपी यन्त्र विशेषों (गुथनों) के द्वारा उन स्त्रियोंका बहुत प्रकारका किलेबन्दीका युद्ध होता था ओर कामदेव उसमें सबकी चोटी पकड़नेवाला था। भावार्थ कामदेव उन स्त्रियों-से अनेक प्रकारकी चेष्टा कराता था ।। ५२ ।। कामदेव इनके प्रेमपूर्ण क्रोधके समय कठोर हो जाता था, अनुनय करने अर्थात् पतिके द्वारा मनाये जानेपर कोमल हो जाता था, भूठा अभि-मान करनेपर उद्दण्ड हो जाता था, प्रेमपूर्ण कपट करते समय भोला या अनजान हो जाता था, आलिंगनके समय निर्दय हो जाता था, चुम्बनके लिये मुख प्रदान करते समय आज्ञा देनेवाला हो जाता है, स्वीकार करते समय विचार मूढ़ हो जाता है, हाव-भाव आदि चेष्टाओंके समय अत्यन्त चतुर हो जाता है, संकल्प करते समय उत्कर्षको धारण करनेवाला हो जाता है, नवीन समागमके समय लज्जासे कुछ मन्द हो जाता है, संभोग प्रारम्भ करते समय अत्यन्त रसिक हो जाता था और संभोगके अन्त में करुणासे कातर हो जाता था। इस प्रकार उन रानियोंका अत्यन्त प्रज्वलित हुआ कामदेव ऊंची-नीची अवस्थाको प्राप्त होता था अर्थात् घटता-बढ़ता रहता था सो ठीक ही है जो काम प्रायः भिन्न भिन्न रसोंसे भरा रहता है वही कामी पुरुषोंको सुन्दर मालूम होता है ॥ ५३-५६।। इस प्रकार वह चक्रवर्ती उन रानियोंके साथ अत्यन्त मधुर तथा इच्छाओंसे भी अधिक भोगोंको भोगता हुआ शरीरधारी कामदेवके समान क्रीड़ा करता था ।।५७।। भरतके चित्तको हरण करनेवाली और प्रेमसे भरी हुई वे तरुण स्त्रियां ऐसी जान पड़ती थीं मानो साम्राज्यको प्राप्त हुई रत्युत्सवरूपी लक्ष्मी ही हों ।॥५८।।
उनकी विभूतिमें बत्तीस हजार नाटक थे जो कि भूमियोंसे मनोहर थे और अच्छे अच्छे बाजों तथा गानोंसे सहित थे ।। ५९।। इन्द्रके नगर समान शोभा धारण करनेवाले ऐसे बहत्तर हजार नगर थे जिनसे अलंकृत हुआ यह नरलोक स्वर्गलोकके समान जान पड़ता था ।।६०।। उस चक्रवर्ती ऐसे छियानवे करोड़ गांव थे कि जिनके बगीचोंकी शोभा नन्दन वनको भी जीत रही थी ।।६१।।
श्लोक 62 से 71 साम्राज्य की समृद्धि
जो धन-धान्यकी समृद्धियोंके स्थान थे ऐसे निन्यानवे हजार द्रोणामुख अर्थात् बन्दरगाह, थे ।।६२।। जिनके प्रशंसनीय बाजार रत्नाकर अर्थात् समुद्रोंके समान सुशोभित हो रहे थे ऐसे अड़तालीस हजार पत्तन थे ।। ६३।। जो कोट, कोटके प्रमुख दरवाजे, अटारियां, परिखाएं और परकोटा आदिसे शोभायमान हैं ऐसे सोलह हजार खेट थे ।।६४।। जो कुभोगभूमि या मनुष्योंसे व्याप्त थे तथा समुद्रके सारभूत पदार्थके समान जान पड़ते थे ऐसे छप्पन अन्तरद्वीप थे ॥ ६५।। जो लोगोंके योग अर्थात् नवीन वस्तुओंकी प्राप्ति और क्षेम अर्थात् प्राप्त हुई वस्तुओंकी रक्षा करना आदिकी समस्त व्यवस्थाओंको धारण करते थे तथा जिनके चारों ओर परिखा थी ऐसे चौदह हजार संवाह थे ।। ६६ ।। पकाने के काम आनेवाले एक करोड़ हंडे थे जो कि पाकशाला में अपने भीतर डाले हुए बहुतसे चावलोंको पकानेवाले थे ।। ६७ ।। फसल आने के बाद जो निरन्तर खेतोंको जोतने में लगाये जाते हैं और जिनके साथ बीज बोनेकी नाली लगी हुई है ऐसे एक लाख करोड़ हल थे ॥६८॥ दही मथने के शब्दोंसे आकर्षित हुए पथिक लोग जहां क्षणभरके लिये ठहर जाते हैं और जो निरन्तर गायों के समूहसे भरी रहती हैं ऐसी तीन करोड़ व्रज अर्थात् गौशालाएँ थीं ।। ६९।। जहां आश्रय पाकर समीपवर्ती लोग आकर ठहरते थे ऐसे कुक्षिवासों की संख्या पण्डित लोगोंने सातसौ बतलाई है ॥७०।। अट्ठाईस हजार ऐसे सघन वन थे जो कि निर्जल प्रदेश और ऊंचे ऊंचे पहाड़ी विभागों में विभक्त थे ।।७१॥
श्लोक 72 से 81 भरत के म्लेच्छ राजा और नौ निधियां
जिनके चारों ओर रत्नोंके उत्पन्न होनेके क्षेत्र अर्थात् खानें विद्यमान हैं ऐसे अठारह हजार म्लेच्छ राजा थे ॥ ७२॥ महाराज भरतके काल, महाकाल, नैस्तर्ण्य, पाडुण्क, पद्म, माणव, पिङ्ग, शंख और सर्वरत्न इन प्रसिद्ध नामोंसे युक्त ऐसी नौ निधियां थीं कि जिनसे चक्रवर्ती घरकी आजीविकाके विषयमें बिलकुल निश्चिन्त रहते थे ॥७३-७४।। पुण्यकी निधिस्वरूप महाराज भरतके पहली काल नामकी निधि थी जिससे प्रत्येक दिन लौकिक शब्द अर्थात् व्याकरण आदिके शास्त्रोंकी उत्पत्ति होती रहती थी ।।७५।। तथा वीणा, बाँसुरी, नगाड़े आदि जो जो इन्द्रियों के मनोज्ञ विषय थे उन्हें भी यह निधि समया-नुसार विशेष रीतिसे उत्पन्न करती रहती थी ।॥ ७६॥ जिससे असि, मषी आदि छह कर्मोंक साधनभूत द्रव्य और संपदाएं निरन्तर उत्पन्न होती रहती थीं वह महाकाल नामकी दूसरी निधि थी ।॥ ७७।। शय्या, आसन तथा मकान आदिकी उत्पत्ति नैसर्ण्य नामकी निधिसे होती थी । पाण्डुक निधिसे धान्योंकी उत्पत्ति होती थी इसके सिवाय छह रसोंकी उत्पत्ति भी इसी निधिसे होती थी ।॥७८॥ जिससे रेशमी सूती आदि सब तरहके वस्त्रोंकी उत्पत्ति होती रहती है और जो कमलके भीतरी भागोंसे उत्पन्न हुए के समान प्रकाशमान है ऐसी पद्म नामकी निधि अत्यन्त देदीप्यमान थी ॥७९॥ पिङ्गल नामकी निधिसे अनेक प्रकारके दिव्य आभरण उत्पन्न होते रहते थे और माणव नामकी निधिसे नीतिशास्त्र तथा अनेक प्रकारके शस्त्रोंकी उत्पत्ति होती रहती थी ।॥८०॥ जो अपने प्रदक्षिणावर्त नामके शंखसे सुवर्णकी सृष्टि उत्पन्न करती थी और जिसने उछलती हुई सुवर्ण जैसी कान्तिसे सूर्यकी किरणोंको जीत लिया है ऐसी शंख नामकी निधि थी ।॥८१॥
श्लोक 82 से 92 चौदह रत्न और सुभद्रा का परिचय
जिसके मणियोंकी कान्तिसे इन्द्रधनुषकी शोभा प्रकट हो रही है ऐसी सर्वरत्न नामकी निधिसे महानील, नील तथा पद्मराग आदि अनेक तरहके रत्न प्रकट होते थे ।।८२।। इनके सिवाय भरत महाराजके जीव और अजीवके भेदसे दो विभागोंमें बंटे हुए चौदह रत्न भी थे जो कि पृथिवीकी रक्षा और ऐश्वर्य के उपभोग करनेके साधन थे ।।८३।। चक्र, छत्र, दण्ड, असि, मणि, चर्म और काकिणी ये सात अजीव रत्न थे और सेनापति, गृहपति, हाथी, घोड़ा, स्त्री, सिलावट और पुरोहित ये सात सजीव रत्न थे ।।८४।। चक्र, दण्ड, असि और छत्र ये चार रत्न आयुधशाला में उत्पन्न हुए थे तथा मणि, चर्म और काकिणी ये तीन रत्न श्रीगृहमें प्रकट हुए थे ॥८५।। स्त्री, हाथी और घोड़ाकी उत्पत्ति विजयार्ध शैलपर हुई थी तथा अन्य रत्न निधियोंके साथ साथ अयोध्या में ही उत्पन्न हुए थे ॥८६॥ जिनके द्वारा सेवन किया हुआ चक्रवर्तीका हृदय अतिशय बलिष्ठ हो रहा था उन निधियों और रत्नोंका वर्णन कौन कर सकता है ? ॥८७॥ वह चक्रवर्ती स्त्रीरत्नके साथ साथ छहों ऋतुओंमें उत्पन्न होनेवाले पञ्चेन्द्रियोंके योग्य भोगोंका उपभोग करता था सो ठीक ही है क्योंकि स्त्री ही समस्त सुख सम्पदाओंका भण्डार है ।॥८८॥ महाराज भरतके रोगादि उपद्रवोंसे रहित सुभद्रा नामकी स्त्रीरत्न थी, वह सुभद्रा स्वभावसे ही भद्रा अर्थात् कल्याणरूप थी और जातिसे विद्याधरोंके वंशकी थी ।॥८९॥ उसके समस्त अंग शिरीषके फूलके समान कोमल थे, कान्ति चम्पाकी कलीके समान थी, श्वासोच्छ्वास बकौली (मौलश्री) के फूलके समान सुगन्धित था, अधर गुलाब के फूलके समान कुछ कुछ लाल थे, मुख प्रफुल्लित कमलके समान सुन्दर था, नेत्र नील कमलके दलके समान थे, भौंहें अच्छी थीं, केश भूमरोंके समूहके समान काले, कोमल और कुछ कुछ टेढ़े थे, उदर कृश था, नितम्ब सुन्दर थे, जाँचें मनोहर थीं, स्तन कठोर थे और भुजा-रूपी लताएँ कोमल थीं, इस प्रकार वह सुभद्रा कामरूपी अग्निको उत्पन्न करने के लिये अरणिके समान थी । भावार्थ-जिस प्रकार अरणि नामकी लकड़ीसे अग्नि उत्पन्न होती है उसी प्रकार उस सुभद्रासे दर्शकों के मनमें कामाग्नि उत्पन्न हो उठती थी ॥९०-९२॥
श्लोक 93 से 101 सुभद्रा की शारीरिक शोभा
नूपुरोंकी मनोहर भंकारसे वाचालित हुए उसके दोनों चरण ऐसे जान पड़ते थे मानो कामदेवरूपी हाथीके विजय के नगाड़े ही बजा रहे हों ॥९३॥ ऐसा मालूम होता था मानो कामदेव अपने निवासगृहपर पहुंचने की इच्छासे उस सुभद्राकी दोनों जंवाओंको नसैनी बनाकर जिसमें उत्तम ऊरु ही दरवाजे के बन्धन हैं ऐसे उसके नितम्बोंपर जा पहुंचा हो ।॥९४॥ रोमावलीके छलसे कामदेव-रूपी काला सर्प उसकी नाभिरूपी बामीसे निकलकर उसके स्तनरूपी पिटारेके समीप जा पहुंचा था ।।९५।। वह सुभद्रा कामरूपी सर्पकी कांचलीके समात सुन्दर स्तनपरका’ वस्त्र (चोली) धारण करती थी और उस कामरूप सर्पको सन्तुष्ट करने के लिये सर्पिणीके समान श्रेष्ठ एकावली हारको धारण करती थी ।। ९६ ।। वह कण्ठमें पड़ी हुई, नाभि तक लटकती हुई और कामको उद्दीपित करनेवाली जिस हाररूपी लताको धारण कर रही थी वह ऐसी मालूम होती थी मानो कामदेवके द्वारा गूंथा हुआ और मन्त्रोंसे मंत्रित हुआ रक्षाका डोरा ही हो ॥९७।। जिसके स्तनोंका मध्यभाग हारसे व्याप्त हो रहा है ऐसी वह सुभद्रा इस प्रकारकी उत्कृष्ट शोभा धारण कर रही थी मानो जिसका प्रवाह दोनों ओरके यमक पर्वतोंको स्पर्श कर रहा है ऐसी उत्तम सीता नदी ही हो ।। ९८ ।। कामदेवके पाशको जीतनेवाली तथा देदीप्य-मान आभूषणोंसे सुशोभित उसकी दोनों भुजाएं ऐसी शोभा धारण कर रही थीं मानो काम-रूपी कल्पवृक्षके दो अंकुरे ही हों ॥ ९९।। सूक्ष्म रेखाओंसे व्याप्त हुआ उसका करतल ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अन्य स्त्रियोंके पराजयसे उत्पन्न हुई विजयकी रेखाएं ही धारण कर रहा हो ।।१००।। जिसकी भौंहें ऊपरको उठी हुई हैं और जिसमें चंचल कटाक्ष हो रहे हैं ऐसा उस कृशोदरीका मुख ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो बाण और महाधनुषसे सहित कामदेवकी आयुधशाला ही हो ॥ १०१ ॥
श्लोक 102 से 111 सुभद्रा की रूप-महिमा
उसका मुख अपनी शोभाके द्वारा चन्द्रमाकी कान्ति-को जीतकर क्या कानों के बहानेते भौंहरूपी पताकाके चिह्न सहित विजयपत्र (जीतका प्रमाण-पत्र) ही धारण कर रहा था ।।१०२।। सोनेके पत्रोंसे चिह्नित उसके दोनों कान ऐसी शोभा धारण कर रहे थे मानो उन्होंने देवांगनाओंको जीतने के लिये कागज-पत्र ही ले रक्खे हों ॥१०३।। उसके दोनों उज्ज्वल कपोल ऐसे जान पड़ते थे मानो अपनी दश प्रकारकी अवस्थाओं को देखने की इच्छा करनेवाले कामदेवके दर्पणकी शोभा ही धारण कर रहे हों ।। १०४।। उस चञ्चल लोचनवाली सुभद्राकी नाक आँखों के बीच में मुंहकी ओर झुकी हुई थी और उससे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो कौतूहलसे मुंहका सुगन्ध सूंघने के लिये प्रयत्न ही कर रही हो ॥१०५।। उसके दोनों नेत्र ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो कामदेवके सभापति रहते हुए कानों-को साक्षी बनाकर परस्परमें हाव-भावके द्वारा स्पर्धा ही कर रहे हों ।। १०६।। जिसपर काली काली अलकें बिखर रही हैं ऐसे चकोरके समान नेत्रवाली उस सुभद्राके ललाटपर जो कान्ति थी वह सुवर्णके पटियेपर लटकती हुई नीलकमलकी मालाके समान बहुत ही सुन्दर जान पड़ती थी ।।१०७।। अत्यन्त काले और नीचेकी ओर लटकते हुए कबरीके वन्धनसे सुशोभित उसके केशपाश ऐसे अच्छे जान पड़ते थे मानो फैला हुआ कामदेवका पाश ही हो ॥१०८॥ इस प्रकार जिसकी उत्तमता प्रकट है ऐसे उस सुभद्रा के रूपको तीनों जगत्को जीतनेवाला जानकर ही मानो कामदेवने उसके प्रत्येक अंगोंमें अपना निवासस्थान बनाया था ।।१०९।। उसका रूप देखने के लिये जो सदा चक्षुओंको ऊपर उठाये रहता है, उसके शरीरका स्पर्श करनेके लिये जो सदा उत्कण्ठित बना रहता है, जो बार बार उसके मुखकी सुगन्ध सूंघा करता है, वार बार उसके मुखका स्वाद लिया करता है और उसके संगीतके सुन्दर शब्दोंके सुनने में जिसके कान सदा तल्लीन रहते हैं ऐसा वह चक्रवर्ती उस सुभद्राके शरीररूपी बड़े बगीचे में सुखसे सन्तुष्ट होकर क्रीड़ा किया करता था ।।११०-१११॥
श्लोक 112 से 121 सुभद्रा और कामदेव की रूपकात्मकता
कविलोग, जिनका कहीं प्रतिबन्ध नहीं होता ऐसा सुभद्राका रूप, कोमल स्पर्श, मुखकी सुगन्ध, ओठोंका रस और संगीतमय सुन्दर शब्द इन पाँचको ही कामदेवके पाँच बाण बतलाते हैं। लोकमें जो कामदेवके पांचो बाणोंकी चर्चा है वह रूढ़ि मात्रसे ही प्रसिद्ध हो गई है ।। ११२ ॥ मूर्ख लोग कहते हैं कि कामदेवका धनुष फूलोंका है परन्तु वास्तव में स्त्रियोंका अत्यन्त कोमल शरीर ही उसका धनुष है ।। ११३।। न जाने क्यों मूर्ख लोग कामदेवको पांच बाण ही प्रदान करते हैं अर्थात् उसके पांच बाण बतलाते हैं क्योंकि जो कुछ भी कामीलोगों के चित्तको हरण करनेवाला है वह सभी कामको उत्तेजित करनेवाला कामदेवका बाण है। भावार्थ कामदेवके अनेक बाण हैं ।॥ ११४॥ स्त्रियोंका मन्द हास्य, तिरछी चितवन, जोरसे हंसना और कामके आवेशसे अस्पष्ट बोलना यही सब काम-देव के अङ्ग हैं इनके सिवाय जो उनका कपट है वह इन्हीं सबका पोषण करनेवाला है ।। ११५।। जो जवानी के कारण गर्म हो रहे हैं ऐसे सुभद्रा के दोनों स्तन हेमन्तऋतुमें ठण्डसे उठे हुए भरत के शरीर के रोमांचों को दूर करते थे ।।११६।। गोदमें शयन करनेवाली सुभद्रा शीतलवायुकेद्वारा उत्पन्न हुई स्तनोंकी कँपकँपीको क्लेश दूर करनेवाले प्रिय पतिके करतलके स्पर्शसे दूर करती थी ।।११७।। अशोकवृक्षकी कलीके साथ साथ कानोंमें लगी हुई आमकी मंजरीको धारण करती हुई वह सुभद्रा वसन्तऋतुमें चम्पाके फूलोंसे गुंथी हुई चोटीसे बहुत ही अधिक सुशोभित हो रही थी ।।११८।। वसन्तऋतुमें मधुके मदसे जिसकी आंखें कुछ कुछ लाल हो रही हैं और जिसकी गति कुछ कुछ लड़खड़ा रही है- स्खलित हो रही है ऐसी उस सुभद्राको भरत महाराज मूर्तिमती मदकी शोभाके समान बहुत कुछ मानते थे ।।११९।। वह वसन्तऋतु सन्तुष्ट होकर भूमरोंकी सुन्दर भंकार और कोकिलाओंकी कमनीय कूकसे मानो राजा भरतकी सुन्दर स्तुति ही करता था ॥१२०॥ कोयलोंके सुन्दर शब्दोंसे मिली हुई भूमरोंकी फंकार-से ऐसा जान पड़ता था मानो कामदेवने नगाड़ोंके साथ अकस्मात् आक्रमण ही किया हो-छापा ही मारा हो ।॥ १२१ ॥
श्लोक 122 से 131 ऋतुओं में सुभद्रा के साथ क्रीड़ा
फूले हुए आमके वनोंसे जो अत्यन्त सुगन्धित हो रहा है, जिसमें कमलोंके समह फूले हुए हैं और जिसने समस्त दिशाएं सुगन्धित कर दी हैं ऐसा वह वसन्तका चैत्र मास चारों ओर फैल रहा था ।।१२२।। भूमरसमूहकी भंकारको हरण करनेवाला, चारों ओर फिरता हुआ मलयसमीर ऐसा जान पड़ता था मानो कामदेवरूपी राजाके शासनकी घोषणा ही कर रहा हो ।॥ १२३॥ उस समय सन्ध्याकालकी लालीसे कुछ कुछ लाल हुई चन्द्रमा की कलाको लोग ऐसा मानते थे मानो जगत्को निगलनेवाले कामदेवरूपी राक्षसकी रक्तसे भीगी हुई भयंकर डांढ़ ही हो ॥ १२४॥ जिसमें कोयल और भूमर सभी उन्मत्त हो जाते हैं ऐसे उस वसन्तके समय कामदेवके साथ द्रोह करनेवाले मुनियोंको छोड़कर और कोई ऐसा मनुष्य नहीं था जो उन्मत्त न हुआ हो ।॥ १२५॥ सायंकालके समय जलमें अवगाहन करनेसे जो स्वच्छ किये गये हैं और जो बर्फके समान शीतल हैं ऐसे अपने समस्त अंगोंसे वह सुभद्रा ग्रीष्मकालमें कामके संतापसे संतप्त हुए भरतके शरीरको शान्त करती थी ।। १२६।। जिसकी शरीररूनी सुन्दर लतापर घिसे हुए चन्दनका लेप किया गया है ऐसी अपनी प्रिया सुभद्राको भरत महाराज दोनों हाथोंसे गाढ़ आलिंगन कर अपना शरीर शान्त करते थे ।।१२७॥ जो कामज्वरके संतापसे पीड़ित हो रही है और जिसे ग्रीष्मकालकी तीव्र गर्मी बिलकुल ही सहननहीं हो सकती ऐसी उस सुभद्राको महाराज भरत अपने शरीरके स्पर्शसे उत्पन्न हुए सुखरूपी जलसे शान्त करते थे ।। १२८।। खिली हुई मालतीकी सुगंधको धारण करनेवाले तथा रतिसमय में सुख पहुंचानेवाले सायंकाल और प्रातःकालकी वायुके द्वारा चक्रवर्ती भरत बहुत ही अधिक संतोष प्राप्त करते थे ॥ १२९॥ फूले हुए गुलाबकी सुगन्धयुक्त मालतीकी मालाओं-को धारण करनेवाली उस सुभद्राको आलिंगन कर महाराज भरत बड़े प्रेमसे ग्रीष्मकालकी रात व्यतीत करते थे ।।१३०।। वर्षाऋतुमें मेवोंकी गर्जना के बहानेसे मानो कामदेवने जिसे घुड़की दिखाकर भयभीत किया है ऐसी वह सुभद्रा भुजाओंसे आलिंगनकर पतिके साथ शयन करती थी ।।१३१।।
श्लोक 132 से 141 वर्षा और शरद में सुभद्रा का सौन्दर्य
उस वर्षाऋतुमें नये जलसे मलिन हुए नदियोंके प्रवाह, उन्मत्त मयूरों के शब्द और कई बके फूलोंकी सुगन्धिसे युक्त वायु ये सब कामी लोगोंके संतोष के लिये थे ।।१३२।। जिसपर कालिमा छाई हुई है और जो बगुलाओंकी पंक्तिको धारण कर रही है ऐसी मेघमाला-को देखते हुए पथिक आंसू डालते हुए दिशाओंको अन्धकारपूर्ण मानते थे ॥१३३।। उस वर्षा-ऋतुमें जो जलकी धाराएं पड़ती थीं उनसे रस्सियोंके समान व्याप्त हुई यह पृथिवी ऐसी जान पड़ती थी मानो कामदेवरूपी शिकारीने पथिकरूपी हिरणोंको रोकने के लिये जाल ही फैलाया हो ।॥१३४।। जो आनेकी अवधि करके गया था ऐसा पति अब तक नहीं आया और यह वर्षा ऋतु आ गई इस प्रकार बादलोंको देखकर कोई पतिव्रता स्त्री अपने हृदय में शून्य हो रही थी अर्थात् चिन्तासे उसकी विचारशक्ति नष्ट हो गई थी ।। १३५॥ केतकीकी बौड़ियोंको भेदन करता हुआ और उनकी धूलको चारों ओर बिखेरता हुआ वायु ऐसा जान पड़ता था मानो पथिकों-की दृष्टि रोकने के लिये धूलि ही उड़ा रहा हो ।। १३६।। इस प्रकार उस वर्षाकालमें जव बादलों के समूह अत्यन्त निकट आ जाते थे तब चक्रवर्ती भरत अपने मनोहर महलमें प्रिया सुभद्राको बार बार प्रसन्न करता था उसके साथ क्रीड़ा करता था ।। १३७।। जिसने पानी में उत्पन्न होने-वाले बेंतकी सुगन्धि खींच ली है ऐसे उस सभद्राके मुखकी सुगन्धको ग्रहण करता हुआ चक्रवर्ती उसके स्तनतटके समीप ही वर्षाऋतुकी रात्रि व्यतीत करता था ।।१३८।। शरऋतु- के प्रारम्भमें वह चक्रवर्ती, जिनमें नवीन खिले हुए सप्तच्छद वृक्षोंकी सुगन्ध फैल रही है ऐसे वनोंमें अपनी स्त्रीके साथ विहार करता हुआ क्रीडा करता था ।। १३९।। राजभवनकी मनोहर छतोंपर शरऋतुकी चांदनीका उपभोग करता हुआ वह चक्रवर्ती हारकी कान्तिसे जिसके स्तन सुशोभित हो रहे हैं ऐसी प्रिया सुभद्राको प्रसन्न करता था उसके साथ क्रीडा करता था ॥१४०।। जब कभी रानी सुभद्रा पतिके वक्षःस्थलपर लेट जाती थी उस समय उसके मस्तक-पर कंचुकियोंके द्वारा गुंथी हुई भरतकी कमलों सहित माला लटकने लगती थी और उसे वह बड़े प्रेमसे सूंघती थी ।। १४१।।
श्लोक 142 से 151 भरत के भोग और वैभव
इस प्रकार इस सुभद्रादेवीमें प्रेमकी परवशताको अच्छी तरह प्रकट करता हुआ और रतिसुखके आधीन हुआ वह चक्रवर्ती दश प्रकारके कहे हुए भोगोंके साधनों-से क्रीडा करता था ।। १४२।। रत्नसहित नौ निधियां, रानियां, नगर, शय्या, आसन, सेना नाट्यशाला, वर्तन, भोजन और सवारी ये दश भोगके साधन कहलाते हैं ।॥ १४३।। इस प्रकार अपनेको तृप्त करनेवाले दश प्रकारके भोगके साधनोंका उपभोग करते हुए महाराज भरतने चिरकालतक जिसपर एक ही छत्र है ऐसी पृथिवीका पालन किया ॥१४४।॥ चक्रवर्ती भरतके ऐसे सोलह हजार गणबद्ध देव थे जो कि तलवार धारणकर निधि, रत्न और स्वयं उनकी रक्षा करनेमें सदा तत्पर रहते थे ।। १४५।। उनके घरको घेरे हुए क्षितिसार नामका कोट था और देदीप्यमान रत्नोंके तोरणोंसे युक्त सर्वतोभद्र नामका गोपुर था ।। १४६। उनकी बड़ी भारी छावनीके ठहरनेका स्थान नन्द्यावर्त नामका था और जो सब ऋतुओंमें सुख देनेवाला है ऐसा वैजयन्त नामका महल था ॥ १४७॥ बहुमूल्य मणियोंसे जड़ी हुई दिकस्वस्तिका नामकी सभाभूमि थी और टहलने के समय हाथ में लेनेके लिये मणियोंकी बनी हुई सुविधि नामकी लकड़ी थी ॥१४८।। सब दिशाएं देखने के लिये गिरिकूटक नामंका राजमहल था और उन्हीं चक्रवर्तीके नृत्य देखनेके लिये वर्धमानक नामकी नृत्यशाला थी ।॥१४९।। उन चक्रवर्तीके गर्मीको नष्ट करनेवाला धारागृह नामका बड़ा भारी स्थान था और वर्षाऋतुमें निवास करने के लिये बहुत ऊंचा गृहकूटक नामका महल था ।॥ १५०॥ चूनासे सफेद हुआ पुष्करावर्त नामका खास महल था और कुबेरकान्त नामका भाण्डारगृह था जो कभी खाली नहीं होता था ।।१५१।।
श्लोक 152 से 161 भरत के महल और आयुध
वसुधारक नामका बड़ा भारी अटूट कोठार था और जीमूत नामका बड़ा भारी स्नानगृह था ।।१५२।। उस चक्रवर्तीके अवतंसिका नामकी अत्यन्त देदीप्यमान रत्नोंकी माला थी और देवरम्या नामकी बहुत बड़ी सुन्दर चांदनी थी ।। १५३॥ भयंकर सिंहों के द्वारा धारण की हुई सिंहवाहिनी नामकी शय्या थी और गुण तथा नाम दोनोंसे अनुत्तर अर्थात् उत्कृष्ट बहुत ऊंचा सिंहासन था ।।१५४।। जो विजयार्थकुमारके द्वारा निधियों के स्वामी चक्रवर्तीके लिये समर्पित किये गये थे ऐसे अनुपमान नामके उनके चमर उपमाको उल्लंघन कर अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे ।।१५५।। उस चक्रवर्ती के बहुमूल्य रत्नोंसे बना हुआ और सैकड़ों सूर्यकी प्रभाको जीतने-वाला सूर्यप्रभ नामका अतिशय देदीप्यमान छत्र था ॥१५६॥ उनके देदीप्यमान कान्तिके धारक विद्युत्प्रभ नामके दो ऐसे सुन्दर कुण्डल थे जो कि बिजलीकी दीप्तिको पराजित कर सुशोभित हो रहे थे ।। १५७।। महाराज भरतके रत्नोंकी किरणोंसे व्याप्त हुई विषमोचिका नामकी ऐसी खड़ाऊं थीं जो कि दूसरेके पैरका स्पर्श होते ही भयंकर विष छोड़ने लगती थीं ।। ॥१५८।। उनके अभेद्य नामका कवच था जो कि अत्यन्त देदीप्यमान था और महायुद्धमें शत्रुओं-के तीक्ष्ण वाणोंसे भी भेदन नहीं किया जा सकता था ।। १५९॥ विजयलक्ष्मीके भारको धारण करनेवाला अजितंजय नामका रथ था जिसपर शत्रुओंको जीतनेवाले अनेक दिव्य शस्त्र रक्खे रहते थे ।।१६०।। असमय में होनेवाले प्रचण्ड वज्रपातके समान जिसकी प्रत्यंचाक आघातसे समस्त संसार कंप जाता था और जिसने देव, दानव-सभीको जीत लिया था ऐसा वजूकाण्ड नामका धनुष उस चक्रवर्तीके पास था ।। १६१।।
श्लोक 162 से 171 भरत के शस्त्र
जो कभी व्यर्थ नहीं पड़ते ऐसे उसके अमोघ नामके बड़े बड़े बाण थे। इन बाणोंके द्वारा ही चक्रवर्ती जिसमें विजय पाना असाध्य हो ऐसे युद्धस्थलमें प्रशंसा प्राप्त करता था ।॥ १६२॥ राजा भरतके शत्रुओंको खण्डित करनेवाली वज्रतुण्डा नामकी शक्ति थी, जो कि वजूकी बनी हुई थी और इन्द्रको भी जीतने में प्रशंसनीय थी ॥१६३।। जिसकी नोक बहुत तेज थी, जो मणियोंके बने हुए डंडेके अग्रभागपर सुशोभित हो रहा था और जो सिंहके नाखूनों के साथ स्पर्धा करता था ऐसा उनका सिंहाटक नामका भाला था ।।१६४।। जो अत्यन्त देदीप्यमान थी, जिसकी रत्नोंसे जड़ी हुई मूठ बहुत ही चमक रही थी, और जो विजयलक्ष्मी के दर्पणके समान जान पड़ती थी ऐसी लोहवाहिनी नामकी उनकी छुरी थी ।।१६५।। मनोवेग नामका एक कणप (अस्त्रविशेष) था जो कि विजयलक्ष्मी-पर प्रेम करनेवाला था और शत्रुओंके वंशरूपी कुलाचलोंको खण्डित करनेके लिये वजूके समान था ।।१६६।। भरतके सौनन्दक नामकी श्रेष्ठ तलवार थी जिसकी कान्ति अत्यन्त देदीप्यमान हो रही थी और जिसे हाथमें लेते ही यह समस्त जगत् भूलामें बैठे हुएके समान कांप उठता था ॥१६७।। उनके भूतोंके मुखोंसे चिह्नित भूतमुख नामका खेट (अस्त्रविशेष) था, जो कि युद्धके प्रारम्भमें चमकता हुआ शत्रुओंके लिये मृत्यके मुखके समान जान पड़ता था ।।१६८।। उन विजयी चक्रवर्तीक सुदर्शन नामका चक्र था, जो कि समस्त दिशाओंपर आक्रमण करनेमें समर्थ था, देदीप्यमान था और जो शत्रुओंके द्वारा देखा भी नहीं जा सकता था ।।१६९।। जिसका नियोग गुफाके कांटे वगैरह शोधनेमें था ऐसा चण्डवेग नामका बहुत भारी प्रचण्ड (भयंकर) दण्ड उस चक्रवर्तीक था ।।१७०।। भरतेश्वर महाराजके वजूमय चर्मरत्न था, वह चर्मरत्न, कि जिसके बलसे उनकी सेना जलके उपद्रवसे पार हुई थी बची थी ।।१७१।।
श्लोक 172 से 181 भरत के रत्न
उनके चूड़ामणि नामका वह उत्तम चिन्तामणि रत्न था जिसने कि जगत्के चूड़ामणि-स्वरूप महाराज भरतका चित्त अनुरक्त कर लिया था ।।। १७२॥ चिन्ताजननी नामकी वह काकिणी थी जो कि अत्यन्त देदीप्यमान हो रही थी और जो विजयार्थ पर्वतकी गुफाओंका अन्धकार दूर करनेके लिये मुख्य दीपिकाके समान थी ।। १७३।। उन प्रभुके अयोध्य नामका सेनापति था जो कि मनुष्यों में रत्न था और युद्धमें शत्रुओंको जीतनेसे जिसका यश आकाश और पृथिवी-के बीच व्याप्त हो गया था ।।१७४।। समस्त धार्मिक क्रियाएं जिसके आधीन थीं और दैविक उपद्रव होनेपर उनका प्रतिकार करना भी जिसके आश्रित था ऐसा बुद्धिसागर नामका महा-बुद्धिमान् पुरोहित था ।।१७५।। उनके कामवृष्टि नामका गृहपति रत्न था, जो कि अत्यन्त बुद्धिमान् था, इच्छानुसार सामग्री देनेवाला था तथा जो चक्रवर्तीके छोटे बड़े सभी खर्चोंकी चिन्तामें नियुक्त था । ।। १७६।। मकान बनानेकी विद्यामें जिसकी बुद्धि प्रवेश पाये हुई है और जो अनेक राजभवनों के बनाने में चतुर है ऐसा भद्रमुख नामका उनका शिलावटरत्न (इंजीनियर) था ।।१७७।। जो पर्वतके समान ऊंचा था, बहुत बड़ा था, पूज्य था, जिससे मद झर रहा था, भद्र जातिका था और जिसका गर्जन उत्तम था ऐसा विजयपर्वत नामका सफेद हाथी था ।।१७८।। जिसने विजयार्थपर्वतकी गुफाक मध्यभागको लीलामात्रमें उल्लंघन कर दिया था ऐसा वायुके वेगको जीतनेवाला पवनंजय नामका घोड़ा था ।। १७९।। और जिसका वर्णन पहले कर चुके हैं, जिसका नाम अत्यन्त प्रसिद्ध है, जो स्वभावसे ही मधुर है और जो किसी अन्य रसायनके समान हृदयको आनन्द देनेवाला है ऐसा सुभद्रा नामका स्त्रीरत्न था ।।१८०।। इस प्रकार चक्रवर्तीके ये दिव्य रत्न थे जिनकी देव लोग रक्षा किया करते थे, और जिन्हें शत्रु कभी उल्लंघन नहीं कर सकते थे ॥ १८१॥
श्लोक 182 से 190 भरत की भोग-सामग्री
उस चक्रवर्तीके समुद्रके समान गंभीर आवाजबाली आनन्दिनी नामकी बारह भेरियां थीं जो अपनी आवाजको बारह योजन दूर तक फैलाकर बजती थीं ॥१८२॥ इनके सिवाय बारह नगाड़े और थे जिनकी आवाज घरके मयूर ऊंची गर्दन कर बड़े आनन्दके साथ सुना करते थे ।॥१८३॥ जिनकी आवाज अतिशय गंभीर है, जो शुभ हैं, और पुण्यरूपी समुद्रसे उत्पन्न हुए हैं ऐसे गम्भीरावर्त नामके चौबीस शंख थे ॥१८४।। उस प्रभुके रत्नोंके बने हुए वीरांगद नामके कड़े थे जो कि हाथकी कलाई-को घेरकर सुशोभित हो रहे थे और जिनकी कान्ति बिजलीको कड़ोंके समान थी ।।१८५।। वायुके भँकोरेसे उड़ते हुए कपड़ोंसे जिन्होंने आकाशरूपी आंगनको झाड़कर साफ कर दिया है ऐसी उसकी अड़तालीस करोड़ पताकाएं थीं ॥ १८६॥ महाराज भरतके महाकल्याण नाम का दिव्य भोजन था जिससे कि कल्याणमय शरीरको धारण करनेवाले उनके बलसहित तृप्ति और पुष्टि दोनों ही होती थीं ॥ १८७।। जो अत्यन्त गरिष्ठ रससे उत्कट हैं, जिन्हें कोई अन्य पचा नहीं सकता तथा जो रुचिकर, स्वादिष्ट और सुगन्धित है ऐसे उसके अमृतगर्भ नामके भक्ष्य अर्थात् खाने योग्य मोदक आदि पदार्थ थे ॥१८८॥ जिनका स्वाद हृदयको अच्छा लगनेवाला है और मसाले वगैरहसे जिनका संस्कार किया गया है ऐसे अमृतकल्प नामके उनके स्वाद्य पदार्थ थे तथा रसायनके समान रसीला अमृत नामका दिव्य पानक अर्थात् पीने योग्य पदार्थ था ।। १८९।। चक्रवर्तीके ये सब भोगोपभोगके साधन उसके पुण्यरूपी कल्पवृक्षके फल थे, उन्हें अन्य कोई नहीं भोग सकता था और वे संसारमें अपनी बराबरी नहीं रखते थे ।।१९०।।
श्लोक 191 से 201 पुण्य की महिमा और भरत का वैभव
पुण्यके बिना चक्रवर्तीके समान अनुपम रूपसम्पदा कैसे मिल सकती है ? पुण्यके बिना वैसा अभेद्य शरीरका बंधन कैसे मिल सकता है ? पुण्यके बिना अतिशय उत्कृष्ठ निधि और रत्नोंकी ऋद्धि कैसे प्राप्त हो सकती है ? पुण्यके बिना वैसे हाथी घोड़े आदिका परिवार कैसे मिल सकता है ? पुण्यके बिना वैसे अन्तःपुरका वैभव कैसे मिल सकता है ? पुण्यके बिना दस प्रकारके भोगोपभोग कहां मिल सकते हैं ? पुण्यके बिना द्वीप और समुद्रोंको उल्लंघन. करनेवाली वैसी आज्ञा कैसे प्राप्त हो सकती है ? पुण्यके बिना दिशाओंको जीतनेवाली वैसी विजयलक्ष्मी कहां मिल सकती है ? पुण्यके बिना देवताओंको भी नमू करनेवाला वैसा प्रताप कहां प्राप्त हो सकता है ? पुण्यके बिना समुद्रको उल्लंघन करनेवाला वैसा उद्योग कैसे मिल सकता है ? पुण्यके बिना तीनों लोकोंको जीतनेवाला वैसा प्रभाव कहां हो सकता है ? पुण्य-के बिना वैसा हिमवान् पर्वतको विजय करनेका उत्सव कैसे मिल सकता है? पुण्यके बिना हिमवान् देवके द्वारा किया हुआ वैसा अधिक सत्कार कहां मिल सकता है? बिना पुण्यके नदियोंकी अधिष्ठात्री देवियोंके द्वारा किया हुआ वैसा अभिषेक कहां हो सकता है ? पुण्यके बिना विजयार्थ पर्वतको जीतना कैसे हो सकता है ? पुण्यके बिना अन्य मनुष्योंको दुर्लभवैसे रत्नोंका लाभ कहां हो सकता है ? पुण्यके बिना समस्त भरतक्षेत्रमें वैसा सुन्दर विस्तार कैसे हो सकता है ? और पुण्यके बिना दिशाओंके किनारेको उल्लंघन करनेवाली वैसी कीति कैसे हो सकती है ? इसलिये हे पण्डित जन, चक्रवर्तीकी विभूतिको पुण्यके उदयसे उत्पन्न हुई मानकर उस पुण्यका संचय करो जो कि समस्त सुख और सम्पदाओंकी दुकानके समान है ।।१९१-२००।। इस प्रकार जिसने सम्पदाएं प्रकट की हैं, जिसने समस्त राजाओंको जीत लिया है, और जो दूसरेके शासनसे रहित अपने छह खण्डकी विस्तृत राज्यलक्ष्मीको निरन्तर फैलाता रहता है ऐसे उस चक्रवर्ती भरतका बड़ा भारी समय पूर्व पुण्यकर्म के उदयसे उत्पन्न हुए, सब तरहका आनन्द देनेवाले और अत्यन्त स्वादिष्ट छहों ऋतुओंके भोगोंके द्वारा क्षण-भरके समान व्यतीत हो गया था ॥२०१॥
श्लोक 202 से 205 भरत और वृषभदेव की महिमा
अनेकों रत्नों, निधियों और देशोंसे सुशोभित हुई सम्पत्तिके द्वारा जो भारी गौरवको प्राप्त हो रही है ऐसी इस समस्त साम्राज्यलक्ष्मीको एक अपने ही उपभोग करने के योग्य बनाकर उसका पालन करता हुआ जो चक्रवर्ती गोदमें बैठी हुई कुलवधूकी रक्षा करते हुए के समान कभी व्याकुल नहीं हुआ वह भरत एक छत्रवाली इस पृथिवीका चिरकाल तक पालन करता रहा था ।।२०२।। छह खण्डोंसे विभूषित पृथिवी जिसके नामसे भरतभूमि नामको प्राप्त हुई, जिसने दक्षिण समुद्रसे लेकर हिमवान् पर्वततक के इस क्षेत्र में शत्रुओंका क्षय कर उसकी रक्षा की, तथा प्रकट हुई निधि और रत्न आदि सम्पदाओं-से योग्य लक्ष्मी जिसके वक्षःस्थलपर शयन करती थी वह प्रभु-श्रीमान् भरतेश्वर निधियों के स्वामी अर्थात् चक्रतियों में प्रथम और मुख्य चक्रवर्ती हुआ था ॥ २०३॥ जो तीनों जगत् के जीवों के द्वारा स्तुति करने के योग्य हैं परन्तु जो स्वयं किसीकी स्तुति नहीं करते, बड़े बड़े योगी लोग जिनका ध्यान करते हैं परन्तु जो किसीका ध्यान नहीं करते, जो नमस्कार करनेवालों-को भी उन्नत स्थानपर ले जाने के लिये समर्थ हैं परन्तु स्वयं नमस्कार करने योग्य पक्षमें स्थित हैं अर्थात् किसीको नमस्कार नहीं करते, वे तीनों जगत्के गुरु अत्यन्त पवित्र श्रीमान् भगवान् वृषभदेव सदा जयवन्त रहें ।। २०४।। भव्य लोग जिन्हें नमस्कार कर फिर किसी अन्यको नमस्कार नहीं करते, जिनकी स्तुति कर फिर किसी अन्यकी स्तुति नहीं करते, जिनका आश्रय लेकर कल्याण के लिये फिर किसी अन्यका आश्रय नहीं लेते, और बुद्धिमान् लोग जिनका सबने आदर किया है ऐसे जिनका सत्कार कर फिर किसी अन्यका सत्कार नहीं करते वे श्रीमान् वृषभजिनेन्द्र तीर्थ कर हम सबकी संसारके भयसे रक्षा करें ।॥ २०५।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहके भाषानुवादमें भरतेश्वरके वैभवका वर्णन करनेवाला यह सैंतीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
पर्व 38
हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 |
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena