अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 253 to 261
श्लोक ( Shlok ) 253 – 255
अभवत्पोदनाध्येऽपि बहूत्पातविजृम्भणम् । तद्दृष्ट्वाऽमोघजिह्वाख्यो जयगुप्तश्च सम्भ्रमात् ॥ २५३ ॥उत्पन्नं स्वामिनः किश्चिद् भयं तदपि निर्गतम् । आगमिष्यति चाद्यैव कश्चित्कुशलवार्तया ॥ २५४ ॥स्वस्थास्तिष्ठन्तु तत्तत्रभवन्तो मा गमन् भयम् । इति स्वयम्प्रभादीस्तानाश्वासं नयतः स्म तान् ॥ २५५॥
उधर पोदनपुरमें भी बहुत उत्पातोंका विस्तार हो रहा था, उसे देखकर अमोघजिह्व और जयगुप्त नामके निमित्तज्ञानी बड़े संयमसे कह रहे थे कि स्वामीको कुछ भय उत्पन्न हुआ था परन्तु अब वह दूर हो गया है, उनका कुशल समाचार लेकर आज ही कोई मनुष्य आवेगा। इसलिए आप लोग स्वस्थ रहें, भयको प्राप्त न हों। इस प्रकार वे दोनों ही विद्याधर, स्वयंप्रभा आदिको धीरज बँधा रहे थे ।। २५३-२५५ ।।
Meanwhile, in Podanpur, many ill omens and disturbances were spreading. Seeing this, the seers of signs (Nimittajnani) named Amoghajihva and Jayagupta spoke with great restraint, “The master did encounter some danger, but now it has passed. Someone will arrive this very day bringing news of his well-being. Therefore, remain calm and do not yield to fear.”
In this manner, both of those Vidyadharas were reassuring Svayamprabha and the others. [253-255]
श्लोक ( Shlok ) 256 – 257
तथैव गगनाद्दीपशिखोऽप्यागम्य भूतलम् । स्वयम्प्रभां सुतं चास्याः प्रणम्य विविधवत्सुधीः ॥२५६॥ क्षेमं श्रीविजयाधीशो भवद्भिस्त्यज्यतां भयम् । इति तद्धृत्तकं सर्वं यथावस्थं न्यवेदयत् ॥ २५७ ॥
उसी समय दीपशिख नामका बुद्धिमान् विद्याधर आकाशसे पृथिवी-तलपर आया और विधि-पूर्वक स्वयंप्रभा तथा उसके पुत्रको प्रणाम कर कहने लगा कि महाराज श्रीविजयकी सब प्रकारकी कुशलता है, आप लोग भय छोड़िये, इस प्रकार सब समाचार ज्योंके त्यों कह दिये ।। २५६-२५७ ।।
At that very moment, the wise Vidyadhara named Dipashikha descended from the sky to the earth. After bowing respectfully and according to tradition before Svayamprabha and her son, he began to speak, “King Shrivijaya is safe and well in every way. Please cast away your fear.” In this manner, he related all the news exactly as it had occurred. [256-257]
श्लोक ( Shlok ) 258 – 259
तद्वार्ताकर्णनाद्दावपरिम्लानलतोपमा । निर्वाणाभ्यर्णदीपस्य शिखेव विगतप्रभा ॥ २५८ ॥श्रुतप्रावृड्द्धनध्वानकलहंसीव शोकिनी । स्याद्वाद्वादिविध्वस्तदुः श्रुतिर्वाकुलाकुला ॥ २५९ ॥
उस बातको सुननेसे, जिस प्रकार दावानलसे लता म्लान हो जाती है, अथवा बुझनेवाले दीपककी शिखा जिस प्रकार प्रभाहीन हो जाती है, अथवा वर्षा ऋतुके मेघका शब्द सुननेवाली कलहंसी जिस प्रकार शोक-युक्त हो जाती है अथवा जिस प्रकार किसी स्याद्वादी विद्वान्के द्वारा विध्वस्त हुई दुःश्रुति (मिथ्या-शास्त्र) व्याकुल हो जाती है उसी प्रकार स्वयंप्रभा भी म्लान शरीर, प्रभारहित, शोकयुक्त तथा अत्यन्त आकुल हो गई थी ॥ २५८-२५९ ॥
Upon hearing those words, Svayamprabha became utterly overwhelmed with anxiety, her body losing its luster, filled with grief—just as a creeper withers in a forest fire, or as the flame of a dying lamp loses its radiance, or as a female swan (Kalahansi) is filled with sorrow upon hearing the rumbling of monsoon clouds, or as a false doctrine (Dushruti) is thrown into utter confusion when dismantled by a scholar of Syadvada (the Jaina doctrine of qualified assertion). [258-259]
श्लोक ( Shlok ) 260
तदानीमेध निर्गत्य चतुरङ्गबलान्विता । स्वयम्प्रभाऽगात् सखगा ससुता तद्वनान्तरम् ॥ २६० ॥
वह उस विद्याधरको तथा पुत्रको साथ लेकर उस वनके बीच पहुँच गई ।॥ २६० ॥
Taking that Vidyadhara and her son along with her, she reached the middle of that forest. [260]
श्लोक ( Shlok ) 261
आयान्तीं दूरतो दृष्ट्वा मातरं स्वानुजानुगाम् । प्रतिगत्यानमत्तस्याः पादयोः पोदनाधिपः ॥ २६१ ॥
पोदनाधिपतिने छोटे भाईके साथ आती हुई माताको दूरसे ही देखा और सामने जाकर उसके चरणोंमें नमस्कार किया ।। २६१ ॥
The Lord of Podanpur saw his mother approaching from afar with his younger brother, and going forward to meet her, he bowed reverently at her feet. [261]
श्लोक 262 से 271
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