नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222 – 225
वीक्ष्य मङ्गधाः परीक्ष्यार्थं तदभ्यर्णमुपागतः । स्वाङ्गसन्दर्शनं कृत्वा मधुरालापचेष्टितैः ॥ २२२ ॥लीलावलोकनैर्हासैर्व्यधाद्विस्त्रम्भणं भृशम् । साप्याह भवता सार्धमागमिष्यामि मां भवान् ॥ २२३ ॥ गृहीत्वा यात्विति व्यक्तं श्रुत्वा तत्त्वत्पतेरहम् । बिभेमि तन्न वक्तव्यमिति तेनाभिलाषिता ॥ २२४ ॥मा भैषीस्त्वं वराकोऽसौ किं करिष्यति भीलुकः । ततो येन तवापायो न स्यात्तक्रियते मया ॥ २२५ ॥
वह मंगीकी परीक्षा करनेके लिए उसके पासआया और उसने उसे अपना शरीर दिखाकर मीठी बातों, चेष्टाओं, लीलापूर्ण विलोकनों और हँसी मजाक आदिसे शीघ्र ही अपने वश कर लिया। वह शूरसेनने कहने लगी कि मैं आपके साथ चलूँगी, आप मुझे लेकर चलिए। मंगीकी बात सुनकर उसने स्पष्ट कहा कि मैं तुम्हारे पति से डरता हूँ इसलिए तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए । उत्तर में मंगीने कहा कि तुम डरो मत, वह नीच डरपोंक तुम्हारा क्या कर सकता है? फिर भी जिससे तुम्हारी कुछ हानि न हो वह काम मैं किये देती हूँ ।। २२२-२२५ ।।
“He approached Mangi to test her, and by showing off his physical charm and using sweet words, seductive gestures, playful glances, and witty humor, he quickly brought her under his influence. Mangi then said to Shurasena, ‘I want to come with you; please take me away.’ Hearing Mangi’s words, he replied plainly, ‘I am afraid of your husband, so you should not say such things.’ In response, Mangi said, ‘Do not be afraid, what can that wretched coward do to you? Even so, I will do something that ensures no harm comes to you.’ || 222-225 ||”
श्लोक ( Shlok ) 226 – 228
इत्यन्योन्यकथाकाले हस्तानीतसरोरुहः । वज्रमुष्टिः समागत्य करवालं प्रियाकरे ॥ २२६ ॥ निधाय मुनिपादाब्जद्वयमभ्यर्च्य भक्तितः । आनमत्तं प्रिया तस्य प्रहर्तुमसिमुद्दधे ॥ २२७ ॥ करेण शूरसेनोऽहंस्तत्करासिं तदैव सः । आच्छिय न्यपतद्भूमौ शूरसेनकराङ्गलिम् ॥ २२८ ॥
इस प्रकार इन दोनोंकी परस्पर बात-चीत हो रही थी कि उसी समय हाथमें कमल लिये वज्रमुष्टि आ गया। उसने अपनी तलवार तो मंगीके हाथमें दे दी और स्वय वह भक्तिसे मुनिराजके दोनों चरण-कमलोंकी पूजा करनेके लिए नम्रीभूत हुआ । उसी समय उसकी प्रियाने उसपर प्रहार करनेके लिए तलवार उठाई परन्तु शूरसेनने उसके हाथसे उसी वक्त तलवार छीन ली । इस कर्मसे शूरसेनके हाथकी अंगुलियाँ कट-कट कर जमीन पर गिर गई ।। २२६-२२८ ॥
“While the two were conversing with each other in this manner, Vajramushti arrived, carrying the lotuses in his hands. He handed his sword over to Mangi, while he himself bowed down with deep devotion to worship both the lotus-feet of the Muniraj. At that very moment, his beloved wife raised the sword to strike him—but Shurasena instantly wrenched the sword away from her hand. Because of this brave intervention, the fingers of Shurasena’s hand were severed and fell to the ground. || 226-228 ||”
श्लोक ( Shlok ) 229
वज्रमुष्टिस्तदालोक्य मा भैषीरित्यभाषत । भीताहमिति सा शाठयाददितास्मै घृथोत्तरम् ॥ २२९ ॥
यह देखकर वज्रमुष्टिने कहा कि हे प्रिये ! डरो मत। इसके उत्तरमें मंगीने झूठमूठ ही कह दिया कि हाँ, मैं डर गई थी ।॥ २२९ ॥
“Seeing this, Vajramushti said, ‘O my beloved, do not be afraid!’ In response, Mangi falsely replied, ‘Yes, I was indeed frightened.’ || 229 ||”
श्लोक ( Shlok ) 230
तदैव शूरसेनोऽपि भ्रातृभिर्लब्धवित्तकैः । चौर्येणाङ्ग भवद्भागं गृहाणेत्युदितः पृथक् ॥ २३० ॥
जिस समय यह सब हो रहा था उसी समय शूरसेन के छह भाई चोरीका धन लेकर आ गये और उससे कहने लगे कि हे भाई ! तू अपना हिस्सा ले ले ।। २३० ।।
“At the very moment this was taking place, Shurasena’s six brothers returned with the stolen treasure and said to him, ‘O brother! Take your share.’ || 230 ||”
श्लोक ( Shlok ) 231
स भव्योऽतिविरक्तः सन्न धनेन प्रयोजनम् । संसारादतिभीतोऽहं तद्द्महिष्यामि संयमम् ॥ २३१ ॥
परन्तु, वह भव्य अत्यन्त विरक्त हो चुका था अतः कहने लगा कि मुझे धनसे प्रयोजन नहीं है, मैं तो संसारसे बहुत ही डर गया हूं इसलिए संयम धारण करूँगा ।। २३१ ।।
“However, that noble soul (Bhavya) had become completely detached from worldly desires. Thus, he replied, ‘I have no need for wealth. I have become deeply terrified of this cycle of worldly existence (Samsara); therefore, I shall embrace the path of self-restraint (Sanyama).’ || 231 ||”
श्लोक 232 से 241
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |