नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248 | श्लोक 249 से 259 |
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 260 to 271
श्लोक ( Shlok ) 260 – 271
उत्कृष्टजीवितं तत्र गमयित्वा त्रयोऽपि ते । सोदर्याः प्रच्युता यूयं जाता रत्नत्रयोपमाः ॥ २६० ॥धर्मजो भीमसेनश्च पार्थश्चाख्यातपौरुषः । धनमित्रश्रियौ चास्मिन्नभूतां स्तुतविक्रमौ ॥ २६१ ॥नकुलः सहदेवश्च चन्द्रादित्यसमप्रभौ । सुकुमारी च काम्पिल्पपुरे द्रुपदभूपतेः ॥ २६२ ॥सुता दृढरथायाश्च द्रौपद्याख्याजनिष्ट सा । इति नेमीश्वरप्रोक्तमाकर्ण्य बहुभिः समम् ॥ २६३ ॥पाण्डवाः संयमं प्रापन् सतामेषा हि बन्धुता । कुन्ती सुभद्रा द्रौपद्यश्च दीक्षां ताः परां ययुः ॥२६४ ॥निकटे राजिमत्याख्यगणिन्या गुणभूषणाः । तास्तिस्त्रः षोडशे कल्पे भूत्वा तस्मात्परिच्युताः ॥ २६५ ॥विश्वकर्ममलैर्मुक्ता मुक्तिमेष्यन्त्यसंशयम् । पञ्चापि पाण्डवा नेमिस्वामिनामहितर्द्धयः ॥ २६६ विहृत्य भाक्तिकाः काश्चित्समाः सम्प्राप्य भूधरम् । शत्रुञ्जयं समादाय योगमातपमास्थिताः ॥ २६७ ॥ तत्र कौरवनाथस्य भागिनेयो निरीक्ष्य तान् । क्रूरः कुर्यवरः स्मृत्वा स्वमातुलवधं क्रुधा ॥ २६८ ॥ आयसान्यग्नितप्तानि मुकुटादीनि पापभाक् । तेषां विभूषणानीति शरीरेषु निधाय सः ॥ २६९ ॥ उपसर्ग व्यधात्तेषु कौन्तेयाः श्रेणिमाश्रिताः । शुक्रुध्यानाग्निनिदग्धकर्मेधाः सिद्धिमामुवन् ॥ २७० ॥ नकुलः सहदेवश्च पञ्चमानुत्तरं ययौ । भट्टारकोऽपि सम्प्रापदूर्जयन्तं धराधरम् ॥ २७१ ॥
वहांकी उत्कृष्ष्ट आयु बिताकर उन तीनों भाइयोंके जीव वहांसे च्युत होकर रत्नत्रयके समान तुम प्रसिद्ध पुरुषार्थके धारक युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन हुए हो । तथा धनश्री और मित्रश्रीके जीव प्रशंसनीय पराक्रमके धारक नकुल एवं सहदेव हुए हैं। इनकी कान्ति चन्द्रमा और सूर्यके समान है। सुकुमारीका जीव काम्पिल्य नगर में वहांके राजा द्रुपद और रानी दृढरथाके द्रौपदी नामकी पुत्री हुई है। इस प्रकार नेमिनाथ भगवान्के द्वारा कहे हुए अपने भवान्तर सुनकर पाण्डवोंने अनेक लोगोंके साथ संयम धारण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंका बन्धुपना यही है। गुणरूपी आभूषणको धारण करनेवाली कुन्ती सुभद्रा तथा द्रौपदीने भी राजिमति गणिनीके पास उत्कृष्ट दीक्षा धारण कर ली। अन्तमें तीनोंके जीव सोलहवें स्वर्गमें उत्पन्न हुए और वहांसे च्युत होकर निःसन्देह समस्त कर्ममलसे रहित हो मोक्षप्राप्त करेंगे । जिन्हें अनेक उत्तमोत्तम ऋद्धियाँ प्राप्त हुई हैं और जो अतिशय भक्तिसे युक्त हैं ऐसे पाँचों पाण्डव कितने ही वर्षों तक नेमिनाथ भगवान्के साथ विहार करते रहे और अन्तमें शत्रुञ्जय पर्वतपर जाकर आतापन योग लेकर विराजमान हो गये । दैवयोगसे वहां दुर्योधनका भानजा ‘कुर्यवर’ आ निकला वह अतिशय दुष्ट था, पाण्डवोंको देखते ही उसे अपने मामा के वधका स्मरण हो आया जिससे क्रुद्ध होकर उस पापीने उनके शरीरोंपर अग्निप्से तपाये हुए लोहे के मुकुट आदि आभूषण रखकर उपसर्ग किया। उन पाँचों भाइयों में कुन्तीके पुत्र युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन तो क्षपकश्रेणी चढ़कर शुक्लत ध्यान रूपी अग्निके द्वारा कर्मरूपी ईन्धनको जलाते हुए मुक्त अवस्थाको प्राप्त हुए और नकुल तथा सहदेव सर्वार्थसिद्धि विमानमें उत्पन्न हुए । इधर भट्टारक नेमिनाथ स्वामी भी गिरनार पर्वतपर जा विराजमान हुए ।। २६०-२७१ ।।
“After completing their excellent lifespans there, the souls of those three brothers fell from that realm and were reborn as you—Yudhishthira, Bhimasena, and Arjuna—the renowned holders of true valor, resembling the Ratnatraya (Three Jewels). Furthermore, the souls of Dhanashri and Mitrashri became Nakula and Sahadeva, possessors of praiseworthy prowess, whose radiance is like that of the sun and the moon. The soul of Sukumari was born in the city of Kampilya as Draupadi, the daughter of King Drupada and Queen Dridharatha.
In this manner, having heard their past births narrated by Lord Neminatha, the Pandavas, along with many other people, accepted self-restraint (asceticism). This is indeed appropriate, for such is the true kinship of the righteous. Kunti, Subhadra, and Draupadi, who wore virtues as their ornaments, also accepted the supreme initiation under the chief nun (Ganini) Rajimati. In the end, the souls of the three women were reborn in the sixteenth heaven, and after falling from there, they will undoubtedly attain salvation (Moksha), completely liberated from all defilements of Karma.
The five Pandavas, who had attained various sublime spiritual powers (Riddhis) and were filled with profound devotion, wandered along with Lord Neminatha for many years. Finally, they went to Mount Shatrunjaya and remained seated there, undertaking Atapana Yoga (penance under the blazing sun). By a turn of fate, Duryodhana’s nephew, ‘Kuryavara’—who was exceedingly wicked—arrived there. The moment he saw the Pandavas, he remembered the killing of his maternal uncles. Filled with rage, that sinner caused a severe affliction (Upasarga) by placing iron crowns and other ornaments, heated red-hot in fire, onto their bodies.
Among those five brothers, Kunti’s sons—Yudhishthira, Bhima, and Arjuna—ascended the Kshapaka Shreni (the ladder of spiritual purification) and, burning the fuel of Karma with the fire of Shukla Dhyana (pure meditation), attained the state of absolute liberation (Moksha). Meanwhile, Nakula and Sahadeva were reborn in the Sarvarthasiddhi celestial vehicle (Vimana). On the other hand, the venerable Bhattarka Neminatha Swami went to Mount Girnar and remained stationed there.”260 – 271
श्लोक 272 से 281
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248 | श्लोक 249 से 259 |
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