अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायणके अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 53 to 51
श्लोक ( Shlok ) 53 – 54
स्वयम्प्रभापि सद्धर्म तत्रादायैकदा मुदा । पर्वोपवासप्रम्लानतनुरभ्यर्च्य वार्हतः ॥ ५३ ॥तत्पादपङ्कजश्लेषापवित्रां पापहां त्रजम् । चित्रां पित्रेऽदित द्वाभ्यां हस्ताभ्यां विनयानता ॥ ५४ ॥
स्वयंप्रभाने भी वहाँ समीचीन धर्म ग्रहण किया। एक दिन उसने पर्वके समय उपवास किया जिससे उसका शरीर कुछ म्लान हो गया। उसने अर्हन्त भगवान्की पूजा की तथा उनके चरण-कमलोंके संपर्कसे पवित्र पापहारिणी विचित्र माला विनयसे झुककर दोनों हाथोंसे पिताके लिए दी ॥ ५३-५४ ॥
“Swayamprabha also accepted the right and true path of righteousness (dharma) on that occasion. One day, on the arrival of a holy festival, she observed a strict fast, due to which her body became somewhat frail and exhausted. Having performed the ritual worship of the Lord Arhat, she took a wondrous, sin-destroying garland—sanctified by its contact with His lotus feet—and, bowing down with deep humility, presented it with both hands to her father.” ।। 53-54 ।।
श्लोक ( Shlok ) 55
तामादाय महीनाथो भक्त्यापश्यत्स्वयम्प्रभाम् । उपवासपरिश्रान्तां पारयेति विसर्ज्य ताम् ॥ ५५ ॥
राजाने भक्ति पूर्वक वह माला ले ली और उपवाससे थकी हुई स्वयंप्रभाकी ओर देख, ‘जाओ पारण करो’ यह कर उसे विदा किया ।। ५५ ।।
“The King accepted the sacred garland with deep devotion and, looking upon Swayamprabha—who was visibly exhausted from her fast—said to her, ‘Go, break your fast,’ and sent her on her way with his blessings.” ।। 55 ।।
श्लोक ( Shlok ) 56
यौवनापूर्ण सर्वाङ्ग रमणीया प्रियात्मजा । कस्मै देयेयमित्येवमात्मन्येव वितर्कयन् ॥ ५६ ॥
पुत्रीके चले जाने पर राजा मन ही मन विचार करने लगा कि जो यौवन से परिपूर्ण समस्त अङ्गोंसे सुन्दर है ऐसी यह पुत्री किसके लिए देनी चाहिये ।॥ ५६ ॥
“After his daughter had departed, the King began to ponder deep within his heart: ‘To whom should I bestow this daughter of mine, who has now attained the fullness of youth and is flawless in every limb?'” ।। 56 ।।
श्लोक ( Shlok ) 57
‘मन्त्रिवर्ग समाहूय प्रस्तुतार्थ न्यवेदयत् । श्रुत्वा तत्सुश्रुतः प्राह परीक्ष्यात्मनि निश्चितम् ॥ ५७ ॥
उसने उसी समय मन्त्रिवर्गको बुलाकर प्रकृत बात कही, उसे सुनकर सुश्रुत नामका मंत्री परीक्षा कर तथा अपने मनमें निश्चय कर बोला ॥ ५७ ॥
“At that very moment, he summoned his council of ministers and disclosed the matter at hand. Having heard it, a minister named Sushrut—after analyzing the situation and arriving at a firm conclusion within his own mind—spoke thus:” ।। 57 ।।
श्लोक ( Shlok ) 58 – 59
अमुस्मिन्नुत्तरश्रेण्यामलकाख्यापुरेशितुः । मयूरग्रीवसंज्ञस्य प्रिया नीलाञ्जना तयोः ॥ ५८ ॥अश्वग्रीवोऽग्रिमो नीलरथः कण्ठान्तनीलसु । वज्राख्यातास्त्रयः सर्वेऽप्यभूवन् पञ्च सूनवः ॥ ५९ ॥
कि इसी विजयार्धकी उत्तर श्रेणीमें अलका नगरीके राजा मयूरग्रीव हैं, उनकी स्त्रीका नाम नीलाञ्जना है, उन दोनोंके अश्वग्रीव, नीलरथ, नीलकण्ठ, सुकण्ठ और वज्रकण्ठ नामके पाँच पुत्र हैं। इनमें अश्वग्रीव सबसे बड़ा है ।। ५८-५९ ॥
“He said: ‘On the northern ridge of this very same Vijayardha mountain lies the city of Alka, ruled by King Mayuragriva. His queen is named Nilanjana, and to them have been born five sons named Ashvagriva, Nilaratha, Nilakantha, Sukantha, and Vajrakantha. Among them, Ashvagriva is the eldest.'” ।। 58-59 ।।
श्लोक ( Shlok ) 60 – 61
अश्वग्रीवस्य कनकचित्रा देवी सुतास्तयोः । ते ग्रीवाङ्गदचूडान्तरत्ना रत्नरथादिभिः ॥ ६० ॥शतानि पञ्च मन्त्र्यस्य हरिश्मश्रुः श्रुताम्बुधिः । शतबिन्दुश्च नैमित्तिकोऽष्टाङ्गनिपुणो महान् ॥ ६१ ॥
अश्वग्रीवकी स्त्रीका नाम कनकचित्रा है उन दोनोंके रत्न-ग्रीव, रत्नाङ्गद, रत्नचूड तथा रत्नरथ आदि पाँच सौ पुत्र हैं। शास्त्रज्ञानका सागर हरिश्मश्रु इसका मंत्री है तथा शतबिन्दु निमित्तज्ञानी है- पुरोहित है जो कि अष्टाङ्ग निमित्तज्ञानमें अतिशय निपुण है ।। ६०-६१ ॥
“The wife of Ashvagriva is named Kanakachitra, and to them have been born five hundred sons, including Ratnagriva, Ratnangada, Ratnachuda, and Ratnaratha. His minister is Harishmashru, who is a veritable ocean of scriptural knowledge, and his royal priest is Shatabindu, an expert in omenology who is exceptionally skilled in the eightfold science of divination (Ashtanga Nimitta-jnana).” ।। 60-61 ।।
श्लोक 62 से 72
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