नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 325 to 341
श्लोक ( Shlok ) 325 – 341
ततोऽन्धा३हिः समुत्पन्नो मृत्वान्धश्चाथ सूकरः । ग्रामे यो भक्षितो मृत्वा सोऽपि श्वभिरतोऽमुतः ॥३२५॥मत्स्यस्य मन्दिरग्रामे नद्युत्तरणकारिणः । मण्डूक्याश्च सुता जाता पुतिका नाम पापिनी ॥ ३२६ ॥स्वोत्पत्त्यनन्तरं लोकान्तरं यातः पिता ततः । माता च पोविता मातामह्या सर्वाशुभाखिलैः ॥ ३२७ ॥विचिकित्स्या नदीतीरवर्तिनी सा कदाचन । समाधिगुप्तमालोक्य नदीतीरे पुरातनम् ॥ ३२८ ॥काललब्ध्या समासाद्य प्रतिमायोगधारिगम् । गृहीतोपशमा योगिदेहस्थमशकादिकम् ॥ ३२९ ॥अपास्यन्ती प्रयत्नेन निशान्ते योगनिष्ठितौ । उपविष्टस्य पादाब्जमुपाश्रित्योदितं मुनेः ॥ ३३० ॥श्रुत्वा धर्मधियादत्रा पर्वोपवसतिं सुधीः । परेद्युर्जिनपूजार्थ गच्छन्ती वीक्ष्य सार्यिकाम् ॥ ३३१ ॥ग्रामान्तरं समं गत्वा तदानीतान्धसा सदा । प्राणसन्धारणं कृत्वा कस्मिश्चिन्द्भूभृतो बिले ॥ ३३२ ॥उपविष्टा निजाचारं पालयन्ती भयादघान् । सम्यग्ज्ञात्वार्थिकाख्यानात्स्ववृत्तान्तं सकौतुकात् ॥३३३॥चित्रं नीचकुलोत्पन्नाप्येवंवृत्चेति सादरम् । पूजानिर्वर्तिकां द्रष्टुं स्वां वात्सल्यादुपागताम् ॥ ३३४ ॥अभिधायाम्ब पापिष्ठां मां त्वं पुण्यवती कुतः । पश्यसीति निजातीतभवान् ज्ञातान् यतीश्वरात् ॥३३’५॥तस्या व्यावर्णयत्सापि वयस्यास्याः पुरातनी । तथैतदवबुद्धयायान्मार्ग जैनमघक्षयात् ॥ ३३६ ॥प्राग्जन्मार्जितपापस्य परिपाकाद्विरूपिता । रोगवत्त्वं कुगन्धत्वं निर्धनत्वादिकञ्च कैः ॥ ३३७ ॥न प्राप्यतेऽत्र संसारे तत्त्वं भूर्माहिता शुचा । त्वयात्तं व्रतशीलोपवासादिपरजन्मने ॥ ३३८ ॥पाथेयं दुर्लभं तस्मान्मा भैत्रीस्त्वमतः परम् । इति प्रोत्साहिता सख्या सा सन्न्यस्य समाधिना ॥ ३३९॥च्युतप्राणाच्युतेन्द्रस्य वल्लभाभूदतिप्रिया । पल्यानां पञ्चपञ्चाशत्तं तत्राच्छिन्नसौख्यभाक् ॥ ३४० ॥च्युत्वा ततो विदर्भाख्यविषये कुण्डलाह्वये । पुरे वासवभूभर्तुः श्रीमत्याश्च सुताऽभत्रः ॥ ३४१ ॥
फिर अन्धा साँप हुआ, फिर मरकर अन्धा सुअर हुआ, उस सुअरको गाँवके कुत्तोंने खा लिया जिससे मरकर मन्दिर’ नामक गाँवमें नदी पार करानेवाले मत्स्य नामक धीवरकी मण्डकी नामकी खीसे पूतिका नामकी पापिनी पुत्री हुई। उत्पन्न होते हीउसका पिता मर गया और माता भी चल बसी इसलिए मातामही (नानी) ने उसका पोषण किया। वह सब प्रकारसे अशुभ थी और सबलोग उससे घृणा करते थे। किसी एक दिन वह नदीके किनारे बैठी थी वहीं पर उसे उन्न समाधिगुप्त मुनिराजके दर्शन हुए जिनकी कि उसने लक्ष्मीमतिपर्यायमं निन्दा की थी। वे मुनि प्रतिमायांगसे अवस्थित थे, पूतिकाकी काललब्धि अनुकूल थी इसलिए वह शान्तभावको प्राप्तकर रात्रिभर मुनिराजके शरीरपर बैठनेवाले मच्छर आदिको दूर हटाती रही । जब प्रातःकालके समय प्रतिमायोग समाप्तकर मुनिराज विराजमान हुए तब वह उनके चरणकमलोंके समीप जा पहुँची और उनका कहा हुआ धर्मोपदेश सुनने लगी। धर्मोपदेशसे प्रभावित होकर उस बुद्धिमतीने पर्वके दिन उपवास करनेका नियम लिया। दूसरे दिन वह जिनेन्द्र भगवान्की पूजा (दर्शन) करनेके लिए जा रही थी कि उसी समय उसे एक आर्यिकाके दर्शन हो गये। वह उन्हीं आर्यिकाके साथ दूसरे गाँव तक चली गई। वहींपर उसे भोजन भी प्राप्त हो गया। इस तरह वह प्रतिदिन ग्रामान्तरसे लाये हुए भोजनसे प्राण रक्षा करती और पापके भयसे अपने आचारकी रक्षा करती हुई किसी पर्वतकी गुफामें रहने लगी। एक दिन एक श्राविका आर्यिकाके पास आई। आर्यिकाने उससे कहा कि पूतिका नीच कुल में उत्पन्न होकर भी इस तरह सदाचारका पालन करती है यह आश्वर्यकी बात है। आर्यिकाकी बात सुनकर उस श्राविकाको बड़ा कौतुक हुआ। जब पूतिका पूजा (दर्शन) कर चुकी तब वह स्नेहवश उसके पास आकर उसकी प्रशंसा करने लगी। इसके उत्तरमें पूतिकाने कहा कि हे माता ! मैं तो महापापिनी हूँ, मुझे आप पुण्यवती क्यों कहती हैं? यह कह, उसने समाधिगुप्त मुनिराजसे जो अपने पूर्वभव सुने थे वे सब कह सुनाये। वह श्राविका पूतिकाकी पूर्वभवकी सखी थी। पूतिकाके मुखसे यह जानकर उसने कहा कि ‘यह जीव पापका भय होनेसे ही जैनमार्ग-जैनधर्मको प्राप्त होता है। इस संसारमें पूर्वभव से अर्जित पापकर्मके उदयसे विरूपता, रोगीपना, दुर्गन्धता तथा निर्धनता आदि किन्हें नहीं प्राप्त होती ? अर्थात् सभीको प्राप्त होती है इसलिए तू शोक मतकर, तेरे द्वारा ग्रहण किये हुए व्रत शील तथा उपवास आदि पर-जन्मके लिए दुर्लभ पाथेय (संबल) के समान हैं, तू अब भय मत कर।’ इस प्रकार उस श्राविकाने उसे खूब उत्साह दिया । तदनन्तर-समाधिमरणकर वह अच्युतेन्द्रकी अतिशय प्यारी देवी हुई। पचपन पल्य तक वह अखण्ड सुखका उपभोग करती रही। वहाँ से च्युत होकर विदर्भ देशके कुण्डलपुर नगर में राजा वासव की रानी श्रीमतीसे तू रुक्मिणी नामकी पुत्री हुई ।। ३२५-३४१ ।।
“Then it was reborn as a blind snake, and after dying, it was reborn as a blind pig, which was eventually devoured by the village dogs. Dying from that state, she was born as a sinful daughter named Putika to Mandaki, the wife of a ferryman named Matsya who rowed people across the river in a village called Mandir.
Immediately after her birth, her father passed away, and her mother also died; consequently, her maternal grandmother (naani) brought her up. She was inauspicious in every way, and everyone despised her.
One day, while she was sitting on the riverbank, she beheld the very same Muniraj Samadhigupta whom she had insulted and slandered in her past birth as Lakshmimati. The monk was standing still in Pratima-yoga (a deep, motionless meditative posture). As Putika’s Kaallabdhi (the opportune time for spiritual awakening) had arrived, she attained a peaceful state of mind. Throughout the night, she kept driving away the mosquitoes and other insects that landed on the Muniraj’s body.
In the morning, when the Muniraj concluded his Pratima-yoga and sat down, she approached his lotus-like feet and began listening to his religious discourse. Deeply moved by the sermon, the intelligent girl took a vow to fast on auspicious festival days (Parva days).
The following day, while she was on her way to worship and pay obeisance to Lord Jinendra, she happened to meet an Aryika (a Jain nun). She walked along with that Aryika to another village, where she also obtained some food. In this manner, she preserved her life daily with food brought from other villages, and out of fear of committing sin, she protected her moral conduct and began residing in a mountain cave.
One day, a Shravika (a laywoman) came to visit the Aryika. The Aryika said to her, ‘It is truly a wonder that despite being born into a lower-status family, Putika observes such noble conduct.’ Upon hearing the Aryika’s words, the Shravika became very curious. When Putika finished her prayers, the Shravika affectionately approached her and began praising her. In response, Putika said, ‘O Mother! I am a great sinner; why do you call me virtuous?’ Sayings this, she narrated the entire account of her past births that she had previously heard from Muniraj Samadhigupta.
That Shravika happened to be Putika’s friend from a past life. Learning this from Putika’s own mouth, she remarked, ‘A living being attains the path of the Jinas—the Jain religion—only when there is a fear of sin. In this worldly existence (samsara), who does not encounter deformity, illness, foul odor, and poverty due to the rise of sinful karmas earned in past lives? That is to say, everyone experiences them. Therefore, do not grieve. The vows, moral discipline, and fasts accepted by you are like a rare and precious provisions (sambal) for the next life; fear no more.’ In this manner, the Shravika greatly encouraged her.
Subsequently, after passing away with Samadhimaran (a peaceful, meditative death), she was reborn as the exceedingly beloved queen (devi) of Achyutendra. She enjoyed uninterrupted celestial bliss for fifty-five Palya (a metaphorically long unit of cosmic time). Descending from that celestial realm, you were reborn in the city of Kundalpur in the Vidarbha country as a daughter named Rukmini to King Vasav and his queen, Shrimati.”[ 325-341]
श्लोक 342 से 351
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