अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 352 to 363
श्लोक ( Shlok ) 352 – 355
राजा तामिन्द्रसेनस्य विवाहविधिना ददौ । तया सहागतानन्तमतिः सामान्यकामिनी ॥ ३५२ ॥एतयोपेन्द्रसेनस्य साङ्गत्यं स्नेहनिर्भरम् । अभूदभूच्च तद्धेतोस्तयोरुद्यानवर्तिनोः ॥ ३५३ ॥ युद्धोद्यमस्तदाकर्ण्य तौ निवारयितुं नृपः । गत्वा कामातुरौ क्रुद्धावसमर्थः प्रियात्मजः ॥३५४ ॥ सोढुं तनुजयोर्दुःखमार्द्राशयतया स्वयम् । अशक्नुवन् समाघ्राय विषपुष्पं मृतिं ययौ ॥ ३५५ ॥
राजा महाबलने वह श्रीकान्ता विवाहकी विधिपूर्वक इन्द्रसेनके लिए दी थी। श्रीकान्ताके साथ अनन्तमति नामकी एक साधारण स्त्री भी गई थी। उसके साथ उपेन्द्रसेनका स्नेहपूर्ण समागम हो गया और इस निमित्तको लेकर बगीचामें रहनेवाले दोनों भाइयोंमें युद्ध होनेकी तैयारी हो गई। जब राजाने यह समाचार सुना तब वे उन्हें रोकनेके लिए गये परन्तु वे दोनों ही कामी तथा क्रोधी थे अतः राजा उन्हें रोकने में असमर्थ रहे। राजाको दोनों ही पुत्र अत्यन्त प्रिय थे। साथ ही उनके परिणाम अत्यन्त आर्द्र-कोमल थे अतः वे पुत्रोंका दुःख सहनमें समर्थ नहीं हो सके। फल यह हुआ कि वे विष-पुष्प सूंघ कर मर गये ।। ३५२-३५५ ॥
“King Mahabal had given that Shrikanta to Indrasen in accordance with the formal marriage rituals. Along with Shrikanta, an ordinary woman named Anantamati also went. She and Upendrasen entered into an affectionate, intimate relationship, and because of this circumstance, preparations for a war began between the two brothers who lived in the garden. When the King heard this news, he went to stop them; however, because both brothers were consumed by passion and anger, the King was unable to restrain them. Both sons were immensely dear to the King. Furthermore, because his heart was exceedingly tender and compassionate, he could not bear the thought of his sons’ impending sorrow or destruction. Consequently, he smelled a poisonous flower and passed away. (352–355)”
श्लोक ( Shlok ) 356
तदेव पुष्पमाघ्राय समीयुर्विगतासुताम् । तद्देव्यौ सत्यभामा च विचित्रा विधिचोदना ॥ ३५६ ॥
वही विष-पुष्प सूंघकर राजाकी दोनों स्त्रियां तथा सत्यभामा भी प्राणरहित हो गई सो ठीक ही है क्योंकि कर्मोंकी प्रेरणा विचित्र होती है ।। ३५६ ।।
“By smelling that very same poisonous flower, both of the King’s wives as well as Satyabhama also lost their lives. And this is only fitting, for the promptings of karma are mysterious and diverse. (356)”
श्लोक ( Shlok ) 357 – 358
धातकीखण्डपूर्वार्द्धकुरुपूत्तरनामसु । दम्पती नृपतिः सिंहनन्दिता च बभूवतुः ॥ ३५७ ॥ अभूदनिन्दिताऽऽर्योऽयं सत्यभामा च वल्लभा । तस्थुः सर्वेऽपि ते तत्र भोगभूभोगभागिनः ॥३५८॥
धातकीखण्डके पूर्वार्ध भागमें जो उत्तरकुरु नामका प्रदेश है उसमें राजा तथा सिंह-नन्दिता दोनों दम्पती हुए और अनिन्दिता नामकी रानी आर्य तथा सत्यभामा उसकी स्त्री हुई । इस प्रकार वे सब वहाँ भोगभूमिके भोग भोगते हुए सुखसे रहने लगे ।। ३५७-३५८ ।।
“In the eastern half of Dhatakikhanda, within the region named Uttarākuru, the King and Simhanandita became husband and wife, while the noble Queen Anindita and Satyabhama became his other wives. In this manner, they all began to live happily there, enjoying the material pleasures of the Bhoga-bhumi (land of enjoyment). (357–358)”
श्लोक ( Shlok ) 359-360
अथ कश्चित्खगो मध्ये प्रविश्य नृपपुत्रयोः । वृथा किमिति युद्धथेतामनुजा युवयोरियम् ॥ ३५९ ॥ इत्याह तद्वचः श्रुत्वा कुमाराभ्यां सविस्मयम् । कथं तदिति सम्पृष्टः प्रत्याह गगनेचरः ॥ ३६० ॥
अथानन्तर कोई एक विद्याधर युद्ध करनेवाले दोनों भाइयोंके बीच प्रवेश कर कहने लगा कि तुम दोनों व्यर्थ ही क्यों युद्ध करते हो ? यह तो तुम्हारी छोटी बहिन है। उसके वचन सुनकर दोनों कुमारोंने आश्चर्यके साथ पूछा कि यह कैसे ? उत्तर में विद्याधरने कहा ।। ३५९-३६० ।।
“Thereafter, a certain Vidyadhara (a celestial/magical being) stepped in between the two warring brothers and said, ‘Why are you two fighting in vain? She is, in fact, your younger sister.’ Hearing his words, both princes asked in astonishment, ‘How can that be?’ In response, the Vidyadhara said:” (359–360)
श्लोक ( Shlok ) 361 – 363
धातकीखण्डप्राग्भाग 3 मन्दरप्राच्यपुष्कला । वती खगाद्रयपाश्रेणीगतादित्याभपूर्भुजः ॥ ३६१ ॥ तनूजो मित्रसेनायां सुकुण्डलिखगेशिनः । मणिकुण्डलनामाहं कदाचित्पुण्डरीकिणीम् ॥ ३६२ ॥ गतोऽमितप्रभाहँदुभ्यः श्रुत्वा धर्म सनातनम् । मत्पूर्व भवसम्बन्धमप्राक्षमवदंश्च ते ॥ ३६३ ॥
कि धातकीखण्ड द्वीपके पूर्वभागमें मेरुपर्वतसे पूर्वकी ओर एक पुष्कलावती नामका देश है। उसमें विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणी पर आदित्याभ नामका नगर है। उसमें सुकुण्डली नामका विद्याधर राज्य करता है। सुकुण्डलीकी स्त्रीका नाम मित्रसेना है। मैं उन दोनोंका मणिकुण्डल नामका पुत्र हूँ। मैं किसी समय पुण्डरीकिणी नगरी गया था, वहाँ अमितप्रभ जिनेन्द्रसे सनातनधर्मका स्वरूप सुनकर मैंने अपने पूर्वभव पूछे । उत्तरमें वे कहने लगे – ॥ ३६१-३६३ ॥
“In the eastern part of Dhatakikhanda continent, to the east of Mount Meru, lies a country named Pushkalavati. In that country, on the southern range of Mount Vijayardha, is a city named Adityabha. A Vidyadhara named Sukundali rules there, and his wife’s name is Mitrasena. I am their son, named Manikundal.
At one time, I went to the city of Pundarikini. There, after listening to the true nature of the Eternal Dharma (Sanatana Dharma) from the Jinendra Amitaprabha, I asked about my past lives. In response, the Jinendra began to speak—” (361–363)
श्लोक 364 से 371
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351
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