शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation of Uttar Puran parv 63- shlok 115 to 121
श्लोक ( Shlok ) 115
तथा चक्रधरे राज्यलक्ष्म्यालिङ्गितविग्रहे । दशाङ्गभोगसाद्भूते पाति षट्खण्डमण्डलम् ॥ ११५॥
इस प्रकार जिनका शरीर राज्यलक्ष्मीसे आलिङ्गित हो रहा है ऐसे चक्रवर्ती वज्रायुध दश प्रकारके भोगोंके आधीन होकर जब छहो खण्ड पृथिवी का पालन करते थे ।। ११५ ।।
“In this manner, while his physical form was embraced by the goddess of royal fortune (Rajyalakshmi), the Chakravartin (universal emperor) Vajrayudha ruled over all six realms of the earth, fully immersed in the ten kinds of supreme worldly pleasures.” 115
श्लोक ( Shlok ) 116 – 117
विद्याधराद्रय पाग्भागे शिवमन्दिरभूपतिः । मेघवाहननामास्य विमलाख्या प्रिया तयोः ॥११६॥सुता कनकमालेति कल्याणविधिपूर्वकम् । जाता कनकशान्तेः सा झषकेतु सुखावहा ॥ ११७ ॥
तब विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीके शिवमन्दिर नगरमें राजा मेघवाहन राज्य करते थे उनकी स्त्रीका नाम विमला था। उन दोनोंके कनकमाला नामकी पुत्री हुई थी। उसके जन्मकालमें अनेक उत्सव मनाये गये थे। तरुणी होनेपर वह राजा कनकशान्तिको कामसुख प्रदान करने वाली हुई थी अर्थात् उसके साथ विवाही गई थी ॥ ११६-११७ ।।
At that time, King Meghavahana ruled in the city of Shivamandira, located on the southern ridge of Mount Vijayardha. His wife’s name was Vimala. A daughter named Kanakamala was born to them, and numerous grand celebrations were held at the time of her birth. Upon reaching youth, she became the bestower of amorous bliss to King Kanakashanti—which is to say, she was wedded to him. || 116-117 ||
श्लोक ( Shlok ) 118 – 119
तथा वस्त्वोकसाराख्यपुराधीशखगेशिनः । सुता समुद्रसेनस्य जयसेनोदरोदिता ॥११८॥प्रिया वसन्तसेनाऽपि बभूवास्य कनीयसी । ताभ्यां निर्वृतिमापासौ दृष्टिचर्याद्वयेन वा ॥११९॥
इसके सिवाय वस्त्वोकसार नगरके स्वामी समुद्रसेन विद्याधरकी जयसेना रानीके उदसे उत्पन्न हुई वसन्तसेना भी कनकशान्तिकी छोटी स्त्री थी। जिसप्रकार दृष्टि और चर्या – सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्रसे निवृति-निर्वाण-मोक्ष प्राप्त होता है उसी प्रकार उन दोनों स्त्रियोंसे राजा कनकशान्ति निवृति-सुख प्राप्त कर रहा था ॥ ११८-११९ ॥
Furthermore, Vasantasena—who was born from the womb of Queen Jayasena, the consort of the Vidyadhara King Samudrasena of Vastvokasara City—was the younger wife of Kanakashanti. Just as ultimate liberation and bliss (Nirvana) are attained through Drishti and Charya (Right Faith and Right Conduct), similarly, King Kanakashanti was experiencing supreme bliss and contentment in the company of those two wives. || 118-119 ||
श्लोक ( Shlok ) 120
कोकिलाप्रथमालापैराहूत इव कौतुकात् । अयाद्वनविहाराय कदाचित्स सहप्रियः ॥ १२० ॥
किसी समय राजा कनकशान्ति कोयलोंके प्रथम आलापसे बुलाये हुएके समान कौतुक वश अपनी स्त्रियोंके साथ वनविहारके लिए गया था ।। १२० ।।
Once, as if beckoned by the first notes of the cuckoos, King Kanakashanti, filled with a spirit of recreation, went out to the forest for a pleasure excursion along with his wives. || 120 ||
श्लोक ( Shlok ) 121
कन्दमूलफलान्वेषी निधिं वा सुकृतोदयात् । कुमारो मुनिमद्राक्षीद्विपिने विमलप्रभम् ॥१२१॥
जिस प्रकार कन्दमूल फल ढूंढने वालेको पुण्योदयसे खजाना मिल जाय उसी प्रकार उस कुमारको वनमें विमलप्रभ नामके मुनिराज दीख पड़े ॥ १२१ ॥
Just as a person searching for wild roots and fruits might, by the dawn of good fortune (punyodaya), stumble upon a hidden treasure, similarly, the prince beheld the revered sage (Muniraja) named Vimalaprabha in that forest. || 121 ||
श्लोक 122 से 132
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