अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
स कदाचित्स्वजामातुः सुतयाऽमिततेजसः । स्वयंवरविधानेन मालामासन्जयद्गले ॥ १६२ ॥
किसी एक दिन त्रिपृष्ठने स्वयंवरकी विधिसे अपनी कन्या ज्योतिःप्रभाके द्वारा जामाता अमिततेजके गलेमें वरमाला डलवाई ।। १६२ ॥
“One day, Triprishta Narayana—following the sacred ritual of the Swayamvara—had his daughter Jyotiprabha place the wedding garland around the neck of her chosen groom, Amitateja.”162
श्लोक ( Shlok ) 163
अनेनैव विधानेन सुतारा चानुरागिणी । स्वयं श्रीविजयस्यासीद्वक्षस्थलनिवासिनी ॥ १६३ ॥
अनुरागसे भरी सुतारा भी इसी स्वयंवरकी विधिसे श्रीविजयके वक्षःस्थल पर निवास करनेवाली हुई ॥ १६३ ॥
“Deeply filled with love, Sutara too—by way of this very same Swayamvara ritual—came to dwell upon the chest of Shrivijaya.”163
श्लोक ( Shlok ) 164
इत्यन्योन्यान्वितापत्यसम्बन्धाः सर्वबान्धवाः । स्वच्छाम्भः पूर्णसम्फुल्लसरसः श्रियमभ्ययुः ॥ १६४ ॥
इस प्रकार परस्परमें जिन्होंने अपने पुत्र-पुत्रियोंके सम्बन्ध किये हैं ऐसे ये समस्त परिवारके लोग स्वच्छन्द जलसे भरे हुए प्रफुल्लित सरोवरकी शोभाको प्राप्त हो रहे थे ।। १६४ ॥
“In this manner, having happily united their sons and daughters through marriage, all the members of this vast family shone with immense splendor, resembling a magnificent lake brimming with pure, crystal-clear water and filled with beautifully blossoming lotuses.”164
श्लोक ( Shlok ) 165 – 167
आयुरन्तेऽवधिस्थानप्राप्ते ऽर्द्धभरतेशिनि । विजयो राज्यमायोज्य सुते श्रीविजये स्वयम् ॥ १६५ ॥दत्वा विजयभद्राय यौवराज्यपदं च सः । चक्रिशोकसमाक्रान्तस्वान्तो हन्तुमधद्विषम् ॥ १६६॥सहस्त्रैः सप्तभिः सार्द्ध राजभिः संयमं ययौ । सुवर्णकुम्भमभ्येत्य मुनिमभ्यर्णनिर्वृतिः ॥ १६७ ॥
आयुके अन्तमें अर्धचक्रवर्ती त्रिपृष्ठ तो सातवें नरक गया और विजय बलभद्र श्री-विजय नामक पुत्रके लिए राज्य देकर तथा विजयभद्रको युवराज बनाकर पापरूपी शत्रुको नष्ट करनेके लिए उद्यत हुए। यद्यपि उनका चित्त नारायणके शोकसे व्याप्त था तथापि निकट समयमें मोक्षगामी होनेसे उन्होंने सुवर्णकुम्भ नामक मुनिराजके पास जाकर सात हजार राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया ।। १६५-१६७ ॥
“At the end of his lifespan, the Ardha-Chakravarti (Half-Chakravarti) Triprishta departed for the seventh hell. Meanwhile, Balabhadra Vijaya prepared himself to destroy the true enemy—sin itself. After handing over the kingdom to his son named Shrivijaya and appointing Vijayabhadra as the crown prince (Yuvaraja), he sought ordination. Even though his heart was deeply consumed with grief over the death of his brother Narayana, yet—being destined to attain liberation in the near future—he approached the great Sage Suvarnakumbha and embraced ascetic self-restraint (Sanyama) along with seven thousand other kings.” 165 – 167
श्लोक ( Shlok ) 168
घातिकर्माणि निर्मूल्य कैवल्यं चोदपादयत् । अभून्निलिम्पसम्पूज्यो व्यपेतागारकेवली ॥ १६८ ॥
घातिया कर्म नष्ट कर केवलज्ञान उत्पन्न किया और देवोंके द्वारा पूज्य अनगारकेवली हुए ॥ १६८ ॥
“Having utterly destroyed his Ghatiya (destructive) karmas, he manifested omniscience (Kevala-Jnana) and became an unattached, wandering omniscient sage (Anagara-Kevali) worshipped by the celestial gods.”168
श्लोक ( Shlok ) 169
तदाकर्ष्यार्ककीर्तिश्च निधायामिततेजसम् । राज्ये विपुलमत्याख्याचारणादगमत्तपः ॥ १६९ ॥
यह सुनकर अर्ककीर्तिने अमित-तेजको राज्यपर बैठाया और स्वयं विपुलमति नामक चारणमुनिसे तप धारण कर लिया ॥ १६९ ॥
“Upon hearing this news, Arkakirti installed Amitateja onto the throne and personally embraced severe ascetic penance under the guidance of the sky-faring sage Vipulamati.”169
श्लोक ( Shlok ) 170
नष्टकर्माष्टकोऽभीष्टामसावापाष्टमीं महीम् । अनाप्यं नाम किं त्यक्तं व्यक्तमाशावधीरिणाम् ॥१७०॥
कुछ समय बाद उसने अष्ट कर्मोंको नष्ट कर अभिवांछित अष्टम पृथिवी प्राप्त कर ली सो ठीक ही है क्योंकि इस संसारमें जिन्होंने आशाका त्याग कर दिया है उन्हें कौन-सी वस्तु अप्राप्य है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ।॥ १७० ॥
“After some time, having utterly destroyed the eight types of karma, he attained the highly desired eighth realm. This is indeed fitting, for what object in this universe is unattainable to those who have completely renounced all worldly desires? That is to say, absolutely nothing is beyond their reach.”) 170
श्लोक ( Shlok ) 171
तयोरविकलप्रीत्या याति काले निराकुलम् । पुखेनामितशब्दादितेजःश्रीविजयाख्ययोः ॥ १७१ ॥
इधर अमिततेज और श्रीविजय दोनोंमें अखण्ड प्रेम था, दोनोंका काल बिना किसी आकुलताके सुखसे व्यतीत हो रहा था ।। १७१ ।।
“Meanwhile, between Amitateja and Shrivijaya, there existed an unbroken, profound love; the time of both princes passed in supreme happiness, entirely free from any anxiety or distress.”171
श्लोक 172 से 181
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