नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 152 to 162
श्लोक ( Shlok ) 152 – 157
परेद्युः समये पाणिजलसेकस्य माधवः । यियासुर्दुति लोभसुतीब्रानुभवोदयात् ॥ १५२ ॥दुराशयः सुराधीशपूज्यस्यापि महात्मनः । स्वराज्यादानमाशङ्कय नेमेर्मायाविदां वरः ॥ १५३ ॥निर्वेदकारणं किञ्चिश्निरीक्ष्यैष विरंस्यति । भोगेभ्य इति सञ्चित्य तदुपायविधित्सया ॥ १५४ ॥व्याधाधिपैर्भूतानीतं नानामृगकदम्बकम् । विधायैकत्र सङ्कीर्णा वृति तत्परितो व्यधात् ॥ १५५ ॥अशिक्षयष्व तदक्षाध्यक्षान्यदि समीक्षितुम् । अदिशो नेमीश्वरोऽभ्येति भवद्भिः सोऽभिधीयताम् ॥१५६॥त्वद्विवाहे व्ययीकतु चक्रिणैष मृगोत्करः । समानीत इति व्यक्त’ महापापोपलेपकः ॥ १५७ ॥
दूसरे दिन वरके हाथमें जलधारा देनेका समय था। उस दिन मायाचारियोंमें श्रेष्ठ तथा दुर्गतिको जानेकी इच्छा करनेवाले श्रीकृष्णका अभिप्राय लोभ कषायके तीव्र उदयसे कुत्सित हो गया। उन्हें इस बात की आशंका उत्पन्न हुई कि कहीं इन्द्रोंके द्वारा पूजनीय भगवान् नेमिनाथ हमारा राज्य न ले लें। उसी क्षण उन्हें विचार आया कि ‘ये नेमिकुमार वैराग्यका कुछ कारण पाकर भोगोंसे विरक्त हो जायेंगे। ऐसा विचार कर वे वैराग्यका कारण जुटानेका प्रयत्न करने लगे। उनकी समझमें एक उपाय आया। उन्होंने बड़े-बड़े शिकारियोंसे पकड़वाकर अनेक मृगोंका समूह बुलाया और उसे एक स्थानपर इकट्ठाकर उसके चारों ओर बाड़ी लगवा दी तथा वहाँ जो रक्षक नियुक्त किये थे उनसे कह दिया कि यदि भगवान् नेमिनाथ दिशाओंका अवलोकन करनेके लिए आवें और इन मृगोंके विषयमें पूछें तो उनसे आप लोग साफ साफ कह देना कि आपके विवाह में मारनेके लिए चक्रवर्तीने यह मृगोंका समूह बुलाया है। महा-पापका बन्ध करनेवाले श्रीकृष्णने ऐसा उन लोगोंको आदेश दिया ॥१५२-१५७ ॥
“The following day was the time for the ritual of pouring the stream of water into the groom’s hands (Kanyadaan). On that day, the intent of Shri Krishna—who was acting as the foremost among deceptive orchestrators and whose path was heading toward an unfortunate rebirth (durgati)—became corrupted due to the intense rise of his greed passion (lobha kashaya). He was seized by the apprehension that Lord Neminatha, who is worthy of worship even by the Indras (kings of gods), might seize His kingdom.
At that very moment, a thought struck him: ‘If Prince Nemikumara encounters some cause for detachment, He will become indifferent to worldly pleasures.’ Reflecting thus, he began making efforts to arrange a cause for such detachment (vairagya). A strategy came to his mind. He had an immense herd of various deer captured by master hunters and gathered them in one place, securing them within a fenced enclosure. He then instructed the guards stationed there: ‘If Lord Neminatha happens to look around the area and inquires about these deer, you must clearly tell Him that the Emperor (Chakravarti) has gathered this herd of deer to be slaughtered for His wedding feast.’ Shri Krishna, binding himself to supreme sin (maha-papa), gave this command to those men. || 152-157 ||”
श्लोक ( Shlok ) 158 – 162
अथ नेमिकुमारोऽपि नानाभरणभासुरः । सहस्त्रकुन्तलो रक्तोत्पलमालाद्यलङ्कृतः ॥ १५८ ॥तुरङ्गमखुरोद्धूतधूलीलिप्तदिगाननः । सवयोभिरिति प्रीतैर्महासामन्तसूतुभिः ॥ १५९ ॥परीतः शिबिकां चित्रामारुह्य नयनप्रियः । दिशो विलोकितु गच्छंस्तन्त्रालोक्य यदृच्छया ॥ १६० ॥मृगानितस्ततो घोरं रुदित्वा करुणस्वनम् । भ्रमतस्तृषितान् दीनदृष्टीनतिभयाकुलान् ॥ १६१ ॥किमर्थमिदमेकत्र निरुद्धं तृणभुक्कुलम् । इत्यन्वयुङ क्त तद्रक्षानियुक्ताननुकम्पया ॥ १६२ ॥
तदनन्तर जो नाना प्रकारके आभूषणोंसे देदीप्यमान हैं, जिनके शिरके बाल सजे हुए हैं, जो लाल कमलोंकी मालासे अलंकृत हैं, घोड़ोंके खुरोंसे उड़ी हुई धूलिके द्वारा जिन्होंने दिशाओंके अग्रभाग लिप्त कर दिये हैं, और जो समान अवस्था वाले, अतिशय प्रसन्न बड़े-बड़े मण्डलेश्वर राजाओंके पुत्रोंसे घिरे हुए हैं ऐसे नयनाभिराम भगवान् नेमिकुमार भी चित्रा नामकी पालकीपर आरूढ़ होकर दिशाओंका अवलोकन करनेके लिए निकले। वहाँ उन्होंने घोर करुण स्वरसे चिल्ला-चिल्लाकर इधर-उधर दौड़ते, प्यासे, दीनदृष्टिसे युक्त तथा भयसे व्याकुल हुए मृगोंको देख दयावश वहाँ के रक्षकोंसे पूछा कि यहपशुओंका बहुत भारी समूह यहाँ एक जगह किस लिए रोका गया है ? ।। १५८-१६२ ॥
“Subsequently, Lord Nemikumara—who was resplendent with various kinds of ornaments, whose hair was elegantly arranged, and who was adorned with garlands of red lotuses—set out to survey the surroundings, mounted upon a palanquin named Chitra. As He rode, the dust kicked up by the horses’ hooves enveloped the horizons, and He was surrounded by the exceedingly joyful sons of great regional kings (mandaleshwaras) of His own age.
There, looking around with His delightful eyes, He beheld the deer running frantically here and there, weeping in deep, pitiful cries. They were parched with thirst, cast helpless glances, and were entirely distressed with fear. Moved by deep compassion, Lord Neminatha questioned the guards stationed there, ‘For what purpose has this massive herd of animals been confined here in one place?’ || 158-162 ||”
श्लोक 163 से 171
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