पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 33 to 43
श्लोक ( Shlok ) 33
स चक्रलक्षितां लक्ष्मीमक्षुण्णां पुण्यरक्षितः । भुक्त्वाप्यतृप्नुवन्भोक्तुं मोक्षलक्ष्मी समुद्यतः ॥ ३३ ॥
पुण्यके द्वारा रक्षित हुआ वज्रनाभि, चक्रवर्तीकी अखण्ड लक्ष्मीका उपभोग कर भी संतुष्ट नहीं हुआ इसलिए मोक्ष-लक्ष्मीका उपभोग करनेके लिए उद्यत हुआ ॥ ३३ ॥
Guarded by his immense merit (Punya), Vajranabhi enjoyed the unexcelled and absolute wealth of a sovereign world-ruler (Chakravarti). Yet, even this boundless worldly luxury failed to bring him true inner satisfaction. Therefore, he turned his heart toward attaining the eternal bliss of liberation (Moksha-Lakshmi). || 33 ||
श्लोक ( Shlok ) 34 – 35
क्षेमङ्कराख्यभट्टारकस्य वक्त्राब्जनिर्गतम् । धर्मामृतरसं पीत्वा त्यक्ताशेषरसस्पृहः ॥ ३४ ॥सुतं स्वराज्ये सुस्थाप्य राजभिर्बहुभिः समम् । संयमं समगात्सम्यक्सर्वसत्स्वानुकम्पनम् ॥ ३५ ॥
उसने क्षेमंकर भट्टारकके मुख-कमलसे निकले हुए धर्मरूपी अमृत रसका पानकर अन्य समस्त रसोंकी इच्छा छोड़ दी तथा अपने राज्य पर पुत्रको स्थापित कर अनेक राजाओंके साथ समस्त जीवोंपर अनुकम्पा करनेवाला संयम अच्छी तरह धारण कर लिया ।। ३४-३५ ।।
After drinking the nectar of righteousness (Dharma) flowing from the lotus-like mouth of the great sage Kshemankar Bhattarak, Vajranabhi lost all desire for any other worldly pleasures. He then coronated his son as the king and, alongside many other rulers, firmly embraced the path of self-restraint (Sanyama), which is rooted in absolute compassion toward all living beings. || 34-35 ||
श्लोक ( Shlok ) 36
प्राक्तनोऽजगरः षष्ठनरके तनुमाश्रितः । द्वाविंशत्यब्धिसङ्ख्यानजीवितेनातिदुःखितः ॥ ३६ ॥
कमठका जीव, जो कि पहले अजगर हुआ था मरकर छठवें नरकमं उत्पन्न हुआ और वहाँ बाईस सागर तक अत्यन्त दुःख भोगता रहा ॥ ३६॥।
The soul of Kamatha, which had previously been reborn as the python, passed away and was cast into the sixth hell (Naraka). There, it continued to endure excruciating, unyielding torments for a vast duration of twenty-two Sagaras. || 36 ||
श्लोक ( Shlok ) 37
चिरात्तस्माद्विनिर्गत्य कुरङ्गाख्यो वनेचरः । कम्पयन्वनसम्भूतान् सम्भूतः सर्वदेहिनः ॥ ३७ ॥
चिरकाल बाद वहाँ से निकल कर कुरङ्ग नामका भील हुआ। यह भील उस वनमें उत्पन्न हुए समस्त जीवोंको कम्पित करता रहता था ।॥३७॥
After a vast period of time, he emerged from that hellish realm and was reborn as a tribal hunter named Kuranga. Living in the heart of the forest, this hunter became a constant terror, striking fear into the hearts of all living creatures that inhabited it. || 37 ||
श्लोक ( Shlok ) 38 – 39
विवर्जितार्त्तध्यानस्य विधृतातपनस्थितेः । तस्य त्यक्तशरीरस्य शरीरबलशालिनः ॥ ३८ ॥तपोधनस्य चक्रेशो घोरं कातरदुस्सहम् । उपसर्ग स्फुरद्वैरः स पापी बहुधा व्यधात् ॥ ३९ ॥
किसी एक दिन शरीर सम्बन्धी बलसे शोभायमान तथा शरीरसे स्नेह छोड़ने वाले तपस्वी चक्रवर्ती वज्रनाभि आर्तध्यान छोड़कर उस वनमें आतापन योगसे विराजमान थे। उन्हें देखने ही जिसका वैर भड़क उठा है ऐसे पापी भीलने उन मुनिराज पर कायर जनोंके द्वारा असहनीय अनेक प्रकारका भयंकर उपसर्ग किया ॥ ३८-३९।।
One day, the royal ascetic Vajranabhi—glorious in his physical strength yet completely detached from his own body, and free from all agonizing or anxious thoughts (Arta-dhyana)—stood in that very forest performing the severe Atapana Yoga (sun-facing meditation). The moment the sinful hunter caught sight of him, his ancient animosity flared up instantly. Driven by this deep-seated malice, the wicked hunter inflicted a variety of horrific, terrifying afflictions (Upasarga) upon the holy sage—torments that cowardly souls could never hope to endure. || 38-39 ||
श्लोक ( Shlok ) 40
धर्मध्यानं प्रविश्यासौ समाराध्य सुरोत्तमः । समुत्पन्नः सुभद्राख्ये सदृङमध्यममध्यमे ॥ ४० ॥
उक्त मुनिराजका जीव धर्मध्यानमें प्रवेशकर तथा अच्छी तरह आराधनाओंकी आराधना कर सुभद्र नामक मध्यम ग्रेवेयकके मध्यम विमानमें सम्यग्दर्शन का धारक श्रेष्ठ अहमिन्द्र हुआ ॥४०॥
Anchoring his soul firmly in righteous meditation (Dharma-dhyana) and flawlessly perfecting the fourfold sacred adorations (Aradhana), the soul of that holy sage passed away in absolute serenity. He was reborn in the middle celestial mansion of the Subhadra middle Graiveyaka realm, becoming a supreme Ahamindra divinity, fully endowed with right, enlightened faith (Samyag-darshana). || 40 ||
श्लोक ( Shlok ) 41 – 43
सप्तविंशतिवाराशिमेयायुर्दिव्यभोगभाक् । ततश्च्युतोऽस्मिन् द्वीपेऽसौ जम्बूभूरुहभूषिते ॥ ४१ ॥कौशले विषयेऽयोध्यानगरे काश्यपान्वये । इक्ष्वाकुवंशजातस्य वज्रबाहुमहीभृतः ॥ ४२ ॥सुतो देव्यां प्रभङ्कर्यामानन्दाख्योऽजनि प्रियः । स सम्प्राप्तमहामाण्डलिकस्थानो महोदयः ॥ ४३ ॥
वहाँ वह सत्ताईस सागरकी आयु तक दिव्य भोग भोगता रहा। आयुके अन्तमें वहाँ से च्युत होकर इसी जम्बूद्वीपके कौसल देश देश सम्बन्धी अयोध्या नगरमें काश्यप गोत्री इक्ष्वाकुवंशी राजा वज्रबाहु और रानी प्रभंकरीके आनन्द नामका प्रिय पुत्र हुआ। बड़ा होनेपर वह महावैभवका धारक मण्डलेश्वर राजा हुआ ।। ४१-४३ ।।
In that celestial realm, he continued to enjoy divine pleasures for a vast lifespan of twenty-seven Sagaras. Upon the completion of his lifespan, he descended from heaven and was reborn in this very Jambudvipa, in the famous city of Ayodhya within the Kousala country. He was born as the beloved son, named Ananda, to King Vajrabahu—who belonged to the Ikshvaku dynasty and Kashyapa clan (Gotra)—and Queen Prabhankari. Upon reaching adulthood, he became a Mandaleshwar (a powerful sovereign ruler) of immense wealth and majesty. || 41-43 ||
श्लोक 44 से 53
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पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32
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