नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 172 to 183
श्लोक ( Shlok ) 172
तच्छ्रुत्वा रुग्मिणी चाह कामं जाम्बवती यथा । लप्स्यते तेऽनुजं प्राच्यं तथा कुविंति सादरम् ॥ १७२ ॥
जब रुक्मिणीने यह सुना तो उसने बड़े आदरके साथ प्रद्युम्न से कहा कि तुम्हारे पूर्वभवके छोटे भाई-को जाम्बवती प्राप्त कर सके ऐसा प्रयत्न करो ।। १७२ ॥
“When Rukmini heard this, she spoke to Pradyumna with great respect, saying, ‘Please make such an effort that Jambavati may obtain your younger brother from your previous birth [as her son].'” [172]
श्लोक ( Shlok ) 173 – 175
सोप्यदान्मुद्रिकां कामरूपिणीं तामवाप्य सा । सत्यभामाकृतिं गत्वा पतिसंयोगतः सुखम् ॥ १७३ ॥क्रीडवं जाम्बवत्याप ‘शम्भवाख्यं दिवश्च्युतम् । सुभानुं सत्यभामा च जातमत्सरयोस्तयोः ॥ १७४ ॥गान्धर्वादिविवादेषु सुभानुं शम्भवोऽजयत् । सर्वत्र पूर्वपुण्यानां विजयो नैव दुर्लभः ॥ १७५ ॥
प्रद्युम्नने भी जाम्बवतीके लिए इच्छानुसाररूप बनाने वाली अंगूठी दे दी उसे पाकर जाम्बवतीने सत्यभामाका रूप बनाया और पतिके साथ संयोगकर स्वर्गसे च्युत हुए क्रीडवके जीवको प्राप्त किया, उत्पन्न होने पर उसका शम्भव नाम रक्खा गया। उसी समय सत्यभामाने भी सुभानु नामका पुत्र प्राप्त किया। इधर शम्भव और सुभानुमें जब परस्पर ईर्ष्या बढ़ी तो गान्धर्व आदि विवादोंमें शम्भवने सुभानुको जीत लिया सो ठीक ही है क्योंकि जिन्होंने पूर्वभवमें पुण्य उपार्जन किया है उन्हें सब जगह विजय प्राप्त होना कठिन नहीं है ।। १७३-१७५ ।।
“Pradyumna then gave Jambavati a ring that could alter one’s form at will. Upon receiving it, Jambavati assumed the form of Satyabhama, united with her husband, and thus conceived the soul of Kridava, who had descended from heaven. When he was born, he was named Shambhav.
At around the same time, Satyabhama also gave birth to a son named Subhanu. Later, when mutual rivalry grew between Shambhav and Subhanu, Shambhav defeated Subhanu in various competitions, such as the musical arts (Gandharva). And this is only fitting, for those who have accumulated merit (punya) in their previous births do not find it difficult to achieve victory everywhere.” [173-175]
श्लोक ( Shlok ) 176
रुक्मिणी सत्यभामा च गतमात्सर्यबन्धने । परस्परगतां प्रीतिमन्वभूतामतः परम् ॥ १७६ ॥
इसके बाद रुक्मिणी और सत्यभामा ईर्ष्या छोड़कर परस्परकी प्रीतिका अनु-भव करने लगीं ॥ १७६ ॥
“After this, Rukmini and Satyabhama cast aside their jealousy and began to experience mutual love and affection for each other.” [176]
श्लोक ( Shlok ) 177
इत्यशेषं गणेशोक्तमाकर्ण्य सकलं सदः । ननाम मुकुलीभूतकराब्जं तत्क्रमाब्जयोः ॥ १७७ ॥
इस प्रकार गणधर भगवान्के द्वारा कहा हुआ सब चरित सुनकर समस्त सभाने हाथ जोड़कर उनके चरण-कमलोंमें नमस्कार किया ।। १७७ ॥
“In this manner, having heard the entire life story as narrated by the Lord Ganadhara, the entire assembly folded their hands and bowed down in reverence at his lotus feet.” [177]
श्लोक ( Shlok ) 178 – 179
अथान्यदा जिर्न नेमिं सीरपाणिः कृताञ्जलिः । अवनम्यान्वयुंक्तैवं हरिस्नेहाचमानसः ॥ १७८ ।भगवन् वासुदेवस्य राज्यं प्राज्यमहोदयम् । प्रवर्ततेऽप्रतीपं मे ब्रहीदञ्च कियच्चिरम् ॥ १७९ ॥
अथानन्तर किसी दूसरे दिन, श्रीकृष्णके स्नेहने जिनका चित्त वशकर लिया है ऐसे बलदेवने हाथ जोड़कर भगवान् नेमिनाथको नमस्कार किया और पूछा कि हे भगवन् श्रीकृष्णका यह वैभवशाली निष्कण्टक राज्य कितने समय तक चलता रहेगा ? कृपाकर आप यह बात मेरे लिए कहिये ।। १७८-१७९ ॥
“Thereafter, on another day, Baladeva, whose heart was deeply moved by his affection for Shri Krishna, folded his hands, bowed down in reverence to Lord Neminatha, and asked, ‘O Lord! For how long will this magnificent and unopposed kingdom of Shri Krishna endure? Please, out of your grace, reveal this to me.'” [178-179]
श्लोक ( Shlok ) 180 – 183
भद्र द्वादशवर्षान्ते नश्येन्मद्यनिमित्तकम् । द्वीपायनेन निर्मूलमियं द्वारावती पुरी ॥ १८० ॥ विष्णोर्जरत्कुमारेण गत्यन्तरगतिर्भवेत् । स एष प्रथमां पृथ्वीं प्रविश्याब्ध्युपमायुषः ॥ १८१ ॥प्रान्ते तस्माद्विनिर्गत्य तीर्थेशोऽन्न भविष्यति । त्वमप्येतद्वियोगेन षण्मासकृतशोचनः ॥ १८२ ॥ सिद्धार्थसुरसम्बोधनापास्ताखिलदुःखकः । दीक्षामादाय माहेन्द्रकल्पे देवो जनिष्यसे ॥ १८३ ॥
उत्तरमें भगवान् नेमिनाथने कहा कि भद्र ! बारह वर्षके बाद मदिरा का निमित्त पाकर यह द्वारावती पुरी द्वीपायनके द्वारा निर्मूल नष्ट हो जायगी। जरत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णा का मरण होगा। यह एक सागरकी आयु लेकर प्रथमभूमिमें उत्पन्न होगा और अन्तमें वहाँ से निकलकर इसी भरत क्षत्रमें तीर्थकर होगा। तू भी इसके वियोगसे छह माह तक शोक करता रहेगा और अन्तमें सिद्धार्थदेवके सम्बोधनसे समस्त दुःख छोड़कर दीक्षा लेगा तथा माहेन्द्र स्वर्गमें देव होगा ।। १८०-१८३ ॥
“In reply, Lord Neminatha said, ‘O gentle one (Bhadra)! After twelve years, taking the consumption of liquor as the immediate cause, this city of Dvaravati will be completely destroyed by Dvaipayana. Shri Krishna’s death will come at the hands of Jaratkumara.
Krishna will then be reborn in the first hellish earth (Prathama-bhumi), with a lifespan of one Sagara. Ultimately, emerging from there, he will become a Tirthankara in this very Bharata-kshetra.
You, too, will grieve for six months over your separation from him. In the end, awakened by the counsel of Siddhartha Deva, you will renounce all sorrow, take initiation (diksha), and be reborn as a celestial being in the Mahendra heaven.'” [180-183]
श्लोक 184 से 191
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171
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