नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 455 | श्लोक 456 से 471
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 472 to 481
श्लोक ( Shlok ) 472
हरिर्यथेष्टमब्जानि समादाय निजद्विषः । समीपं प्रापयतानि दृष्ट्वारिं दृष्टवानिव ॥ ४७२ ॥
तदनन्तरश्रीकृष्णने इच्छानुसार कमल तोड़ कर शत्रुके पास पहुँचा दिये उन्हें देखकर शत्रुने ऐसा समझा मानों मैंने शत्रुको ही देख लिया हो।।४७२।।
“Thereafter, Shri Krishna plucked as many lotuses as he desired and had them delivered to his enemy (Kansa). Upon seeing them, the enemy felt as though he had seen his own death (or his destroyer) right before his eyes.” || 472 ||
श्लोक ( Shlok ) 473 – 474
नन्दगोपसमीपेऽस्थान्मच्छत्रुरिति निश्चयात् । कदाचिन्नन्दगोपालं मल्लयुद्धं निरीक्षितुम् ॥ ४७३ ॥ निजमल्लैः सहागच्छेदिति सन्दिशति स्म सः । सोऽपि कृष्णादिभिर्मलैः सह प्राविक्षदक्षयम् ॥४७४॥
इस घटना से राजा कंसको निश्चय होगया कि हमारा शत्रु नन्द गोप-के पास ही रहता है। एक दिन उसने नन्द गोपालको संदेश भेजा कि तुम अपने मल्लोंके साथ मल्लयुद्ध देखनेके लिए आओ। संदेश सुनकर नन्द गोप भी श्रीकृष्ण आदि मल्लोंके साथ मथुरा में प्रविष्ट हुए।।४७३-४७४।।
“From this incident, King Kansa became absolutely certain that his enemy resided with Nandagopa. One day, he sent a message to Nandagopa, saying, ‘Come with your wrestlers to watch the wrestling match.’ Upon receiving the message, Nandagopa also entered Mathura along with Shri Krishna and the other wrestlers.” || 473-474 ||
श्लोक ( Shlok ) 475 – 481
कञ्चिन्मत्तगजं वीतबन्धनं यमसन्निभम् । मदगन्धसमः कृष्टरुवद्भमरसेवितम् ॥ ४७५ ॥ ‘विनयच्युतभूपालकुमारं वा निरङ्कुशम् । रदनाघातनिभिनसुधाभवनभित्तिकम् ॥ ४७६ ॥आधावन्तं विलोक्यासौ प्रतीत्योत्पाठ्य २ भीषणम् । रदमेकं कुमारस्तं तेनैव समताडयत् ॥ ४७७ ॥ पर्यायनतितप्रेक्ष्यभ्र भङ्गा भीषणारवाः । निवर्तनैः ‘समावर्तनैः सम्भ्रमणवल्गनैः ॥ ४८४ ॥सोऽपि भीतो गतो दूरं ततस्तुष्ट्वा हरिभ्रंशम् । जयोऽनेन निमित्तेन अस्फुटं वः प्रकटीकृतः ॥ ४७८ ॥ इति गोपान् समुत्साह्य प्राविशत्कंससंसदम् । वसुदेवमहीपोऽपि कंसाभिप्रायवित्तदा ॥ ४७९ ॥स्वसैन्यं समुपायेन सन्नायैकत्र तस्थिवान् । सीरपाणिः समुत्थाय कृतदोःस्फालनध्वनिः ॥ ४८० ॥ कृष्णेन सह रङ्ग वा समन्तात्स परिभ्रमन् । कंसं नाशयितुं कालस्तवेत्याख्याय निर्गतः ॥ ४८१ ॥
नगर में घुसते ही श्रीकृष्णकी ओर एक मत्त हाथी दौड़ा। उस हाथीने अपना बन्धन तोड़ दिया था, वह यमराजके समान जान पड़ता था, मदकी गन्धसे खिंचे हुए अनेक भौंरे उसके गण्डस्थल पर लग कर शब्द कर रहे थे, वह विनय रहित किसी राजकुमारके समान निरङ्कश था, और अपने दाँतोंके आघातसे उसने बड़े-बड़े पक्के मकानोंकी दीवारें गिरा दी थीं। उस भयंकर हाथीको सामने दौड़ता आता देख श्रीकृष्णने निर्भय होकर उसका एक दाँत उखाड़ लिया और दाँतसे ही उसे खूब पीटा । अन्तमें वह हाथी भयभीत होकर दूर भाग गया। तदनन्तर ‘इस निमित्तसे आप लोगोंकी जीत स्पष्ट ही होगी’ संतुष्ट होकर यह कहते हुए श्रीकृष्णने साथके गोपालोंको पहले तो खूब उत्साहित किया और फिर कंसकी सभामें प्रवेश किया। कंसका अभिप्राय जाननेवाले राजा वसुदेव भी उस समय किसी उपायसे अपनी सेनाको तैयार किये हुए वहीं एक स्थान पर बैठे थे । बलदेवने उठकर अपनी भुजाओंके आस्फालनसे ताल ठोक कर शब्द किया और कृष्णके साथ रङ्गभूमिके चारों ओर चक्कर लगाया। उसी समय उन्होंने श्री कृष्णसे कह दिया कि ‘यह तुम्हारा कंसको मारनेका समय है’ इतना कह वे रङ्गभूमिसे बाहर निकल गये ॥ ४७५-४८१ ॥
“As soon as they entered the city, a furious, rogue elephant charged toward Shri Krishna. The elephant had broken its shackles and appeared as terrifying as Yama (the God of Death); numerous bumblebees, drawn by the scent of its musth (mada), hovered around its temples, making a buzzing sound. It was completely uncontrolled, like an undisciplined prince, and had knocked down the walls of large, solid houses with the blows of its tusks. Seeing that terrifying elephant charging directly at him, Shri Krishna fearlessly uprooted one of its tusks and beat it severely with that very tusk. Ultimately, the elephant fled far away out of fear.
Thereafter, saying with satisfaction, ‘By this omen, your victory is absolutely certain,’ Shri Krishna first greatly encouraged his fellow cowherds and then entered Kansa’s assembly. Knowing Kansa’s true intentions, King Vasudeva was also sitting nearby at a designated spot, having cleverly prepared his army by some means. Baladeva stood up, slapped his arms in a traditional wrestling challenge, making a loud sound, and circled the arena along with Krishna. At that very moment, he whispered to Shri Krishna, ‘This is your moment to slay Kansa.’ Saying this, he stepped outside the arena.” || 475-481 ||
श्लोक 482 से 491
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नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402 | श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 455 | श्लोक 456 से 471
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