राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
पर्व 76 – श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 172 to 183
श्लोक ( Shlok ) 172 – 175
अथाख्यानमिदचैकं शृणु रुध्धाशयं स्थिरम् । नरेशो नरपालाख्यः श्वानमेकं सकौतुकः ॥ १७२ ॥मृष्टाशनेन सम्पोष्य स्वर्णाभरणभूषितम् । सदा वनविहृत्यादिगतौ कनककल्पिताम् ॥ १७३ ॥आरोप्य शिबिकामेवं मन्दबुद्धिरपालयत् । कदाचिच्छिबिकां रूढो गच्छन्कौलेयकाधमः ॥ १७४ ॥विष्टामालोक्य बालस्य लिप्सुरापतति स्म ताम् । तद्दृष्ट्वा पाकरोद्भूपो लकुटीताडनेन तम् ॥ १७५ ॥
‘अब मैं एक कथा और कहती हूँ तू चित्त स्थिर कर सुन’ यह कहकर गणिनी दूसरी कथा कहने लगी। उसने कहा कि एक नरपाल नामका राजा था। कौतुकवश उसने एक कुत्ता पाल रक्खा था। वह मीठे मीठे भोजनके द्वारा सदा उसका पालन करता था और सुवर्णके आभूषण पहिनाता था। जब वह वनविहार आदि कार्योंके लिए जाता था, तब वह मन्दबुद्धि उसे सोनेकी पालकी में बैठाकर ले जाता था। एक दिन वह नीच कुत्ता, पालकीमें बैठा हुआ जा रहा था कि अकस्मान् उसकी दृष्टि किसी बालककी विष्ठापर पड़ी। दृष्टि पड़ते ही वह, उस विष्ठाको प्राप्त करनेकी इच्छासे उसपर कूद पड़ा। यह देख राजाने उसे डण्डेसे पीटकर भगा दिया ।।१७२-१७५।।
“Saying, ‘Now I shall tell you another story, listen with a steady mind,’ the senior nun began to narrate the second tale. She said: ‘There was a king named Narapala. Out of fondness, he kept a pet dog. He always nourished it with sweet foods and adorned it with gold ornaments. Whenever he went out for excursions in the forest or similar activities, that foolish-minded king would carry the dog sitting inside a golden palanquin. One day, as that base dog was travelling while seated in the palanquin, its gaze suddenly fell upon the excrement of a child. The moment it saw it, consumed by the desire to get that excrement, it leapt out onto it. Seeing this, the king beat it with a staff and drove it away.’ || 172-175 ||”
श्लोक ( Shlok ) 176 – 183
तद्वन्मुनिश्च सर्वेषां पूजनीयः पुरातनः । त्यक्ताभिवाञ्छया भूयः सम्प्राप्नोति पराभवम् ॥ १७६ ॥हदमन्यस्कश्चित्कश्चित्पथिकः सङ्गनान्तरे । सुगन्धिफलपुष्पादिसेवयाऽऽयन् सुखं ततः ॥ १७७ ॥गत्वा विहाय सन्मार्ग महागहनसङ्कटे । दृष्ट्वा क्षुधितमत्युग्रं स चमूरं जिघांसुकम् ॥ १७८ ॥भीत्वा धावन् तदैकस्मिन् भीमकूपेऽपतद्विधीः । तत्र शीतादिभिः पापाद्दोषत्रितयसम्भवे ॥ १७९॥वाग्दृष्टिश्रुतिगत्यादिहीनं सर्पादिबाधितम् । तं तन्निर्गमनोपायमजानन्तं यदृच्छया ॥ १८० ॥कश्चिद्भिषग्वरो वीक्ष्य दययार्दीकृताशयः । निर्गमय्य ततः केनाप्युपायेन महादरात् ॥ १८१ ॥मन्त्रौषधिप्रयोगेण कृतपादप्रसारणम् । सूक्ष्मरूपसमालोकनोन्मीलितविलोचनम् ॥ १८२ ॥स्पष्टाकर्ण नविज्ञातस्वशक्तिश्रवणद्वयम् । व्यक्तवाक्प्रसरोपेतरसनं च व्यधादनु ॥ १८३ ॥
परन्तु वह अच्छा मार्ग छोड़कर महासंकीर्ण वनमें जा पहुँचा। वहाँ उसने भूखा, अतिशय दुष्ट और मारनेकी इच्छासे सामने आता हुआ एक व्याघ्र देखा । उसके भयसे वह दुर्बुद्धि पथिक भागा और भागता-भागता एक भयंकर कुऍमें जा पड़ा। वहाँ पाप-कर्म के उदयसे उसे शीत आदिके कारण बात-पित्त-कफ-तीनों दोष उत्पन्न हो गये । बोलना, देखना-सुनना तथा चलने आदिमें बाधा होने लगी । इनके सिवाय उसे सर्प आदिकी भी बाधा थी। वह पथिक उस कुएँ से निकलनेका उपाय भी नहीं जानता था। दैववश कोई एक उत्तम वैद्य वहाँ से आ निकला। उस पथिकको देखकर उसका हृदय दया से आर्द्र हो गया। उसने बड़े आदरसे किसी उपायके द्वारा उसे कुएँसे बाहर निकलवाया और मन्त्र तथा औषधिके प्रयोगसे उसे ठीककर दिया। उसके पाँव पसरने लगे, सूक्ष्मसे सूक्ष्म रूप देखनेके योग्य उसके नेत्र खुल गये, उसके दोनों कान सब बातें साफ-साफ सुनने लगे तथा उसकी जिह्वासे भी वचन स्पष्ट निकलने लगे ।। १७६-१८३ ॥
“However, abandoning the good path, he arrived in a highly dense forest. There, he saw a hungry, exceedingly ferocious tiger approaching right towards him with the intent to kill. Terrified, that foolish traveler fled, and as he ran, he fell into a fearsome well. There, due to the ripening of his past sins (Pap-Karma), he developed imbalances in all three bodily humors—wind (Vata), bile (Pitta), and phlegm (Kapha)—brought on by the severe cold and other elements. Consequently, his ability to speak, see, hear, and move became severely impaired. Besides these afflictions, he was also tormented by snakes and other creatures inside the well. Moreover, the traveler did not even know the way to escape from that well.
By chance, an excellent physician happened to pass by that place. Seeing the traveler in that condition, his heart melted with compassion. With great care and through some means, he rescued him from the well, and healed him completely using spiritual chants (Mantras) and medicinal herbs. His limbs began to stretch freely, his eyes opened with the ability to perceive the minutest of objects, his ears began to hear everything clearly, and words flowed distinctly from his tongue once more. || 176-183 ||”
श्लोक 184 से 192
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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