राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 105 to 123
श्लोक ( Shlok ) 105
इति कामाग्नितप्तेन तेन पापेन संसदि । स्वस्यामगार्यनार्येण दुर्जनानामियं गतिः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार कामाग्निसे सन्तप्त हुए उस अनार्य-पापी रावणने अपनी सभामें कहा सो ठीक ही है क्योंकि दुर्जन मनुष्योंका ऐसा स्वभाव ही होता है ।॥१०५ ।।
“It is but fitting that the ignoble and sinful Ravana, thus tormented by the fire of passion, spoke in this manner within his assembly; for such indeed is the very nature of wicked men.”105
श्लोक ( Shlok ) 106 – 107
नारदः पुनस्तत्र प्रदीप्तं कोपपावकम् । प्रज्वालयितुमस्येदमाचचक्षेऽतिपापधीः ॥ १०६ ॥ परिप्राप्तोदयो रामो महाराज्यपदे स्थितः । यौवराज्यपदे तस्य लक्ष्मणोऽस्थात्सहोद्भवः ॥ १०७ ॥
तदनन्तर पाप-बुद्धिका धारक नारद, रावणकी प्रज्वलित क्रोधाग्निको और भी अधिक प्रज्व-लित करनेके लिए कहने लगा कि जिसका ऐश्वर्य निरन्तर बढ़ रहा है ऐसा राम तो महाराज पदके योग्य है और भाई लक्ष्मण युवराज पदपर नियुक्त है ।। १०६-१०७ ॥
“Thereafter, Narada, harboring a sinful intellect, spoke further to inflame the blazing fire of Ravana’s wrath, saying: ‘Rama, whose sovereign power and prosperity are ever-increasing, is alone worthy of the status of Emperor, while his brother Lakshmana has been appointed to the position of Crown Prince.'”106 – 107
श्लोक ( Shlok ) 108
वाराणसीं प्रविष्टाभ्यां ताभ्यां विश्वनरेश्वराः । स्वसुतादानसम्मानिताभ्यां सम्बन्धमादधुः ॥ १०८ ॥
जबसे ये दोनों भाई बनारसमें प्रविष्ट हुए हैं तबसे समस्त राजाओंने अपनी-अपनी पुत्रियाँ देकर इनका सम्मान बढ़ाया है और इनके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लिया है ।॥ १०८ ॥
“Ever since these two brothers entered Varanasi, all the kings have enhanced their honor by offering them their daughters in marriage, thereby establishing matrimonial alliances with them.”108
श्लोक ( Shlok ) 109
ततस्ते तेन रामेण लक्ष्मणाविष्कृतौजसा । न युद्धं युज्यतेऽस्माभिस्त्यज्यतां विग्रहाग्रहः ॥ १०९ ॥
इसलिए लक्ष्मणसे जिसका प्रताप बढ़ रहा है ऐसे रामचन्द्रके साथ हमलोगोंको युद्ध करना ठीक नहीं है अतः युद्ध करनेका आग्रह छोड़ दीजिये ॥ १०९ ॥
“Therefore, it is not proper for us to wage war against Ramachandra, whose majesty and prowess are ever-exalted by Lakshmana; hence, pray abandon this insistence on war.”109
श्लोक ( Shlok ) 110 – 114
इत्येतदुक्तमाकर्ण्य कुपितस्मितमुद्वहन् । मत्प्रभावं मुने मंक्षु श्रोष्यसीति विसृज्य तम् ॥ ११० ॥मन्त्रशालां प्रविश्यात्मगतमित्थममन्यत । उपायसाध्यमेतद्धि कार्य नहि बलात्कृते ॥ १११ ॥महीयसो ऽप्युपायेन श्रीरप्याड्रियते बुधैः । इत्यतोऽमात्यमाहूय हप्तौ दशरथात्मजौ ॥ ११२ ॥जिगीषू मत्पदं दुष्टानुच्छेदाहौं कृतत्वरम् । पनी सीताभिधानाऽस्ति रामाख्यस्य दुरात्मनः ॥ ११३ ॥तामाहरिष्ये तौ हन्तु ं तदुपायं विचिन्तय । इत्यवोचस्स मारीचो विनयाकुञ्चिताञ्जलिः ॥ ११४ ॥
नारदकी यह बात सुनकर रावण क्रोधित होता हुआ हँसा और कहने लगा कि हे मुने ! तुम हमारा प्रभाव शीघ्र ही सुनोगे। इतना कह कर उसने नारदको तो विदा किया और स्वयं मन्त्र-शालामें प्रवेश कर मनमें ऐसा विचार करने लगा कि यह कार्य किसी उपायसे ही सिद्ध करनेके योग्य है, बलपूर्वक सिद्ध करनेमें इसकी शोभा नहीं है। विद्वान् लोग उपायके द्वारा बड़ेसे बड़े पुरुषकी भी लक्ष्मी हरण कर लेते हैं। ऐसा विचार उसने मन्त्रीको बुलाकर कहा कि राजा दशरथके लड़के राम और लक्ष्मण बड़े अहङ्कारी हो गये हैं। वे हमारा पद जीतना चाहते हैं इसलिए शीघ्र ही उनका उच्छेद करना चाहिए । दुष्ट रामचन्द्रकी सीता नामकी स्त्री है। मैं उन दोनों भाइयोंको मारनेके लिए उस सीताका हरण करूँगा। तुम इसका उपाय सोचो। जब रावण यह कह चुका तब मारीच नामका मन्त्री विनयसे हाथ जोड़ता हुआ बोला ॥ ११०-११४ ॥
“Hearing these words of Narada, Ravana laughed in anger and said, ‘O Sage! You shall soon witness our power.’ Having said this, he dismissed Narada and entered the council chamber. There, he pondered within himself, ‘This task is worthy of being accomplished only through a clever stratagem; achieving it by mere force would lack glory. Wise men, by employing the right means, can strip even the greatest of men of their fortune.’
Reflecting thus, he summoned his minister and said, ‘Rama and Lakshmana, the sons of King Dasharatha, have become exceedingly arrogant. They wish to usurp our throne; therefore, they must be extirpated without delay. That wicked Ramachandra has a wife named Sita. In order to bring about the destruction of those two brothers, I shall abduct her. Devise a plan for this.’ When Ravana had spoken thus, the minister named Maricha, folding his hands in humility, replied:”110 – 114
श्लोक ( Shlok ) 115
शृणु भट्टारक स्वामिन् हितकार्यानुवर्तनम् । अहितप्रतिषेधश्च मन्त्रिकृत्यमिदं द्वयम् ॥११५॥
कि हे पूज्य स्वामिन् ! हितकारी कार्यमें प्रवृत्ति कराना और अहितकारी कार्यका निषेध करना मन्त्रीके यही दो कार्य हैं ।। ११५ ।।
“O venerable Lord! To encourage engagement in beneficial actions and to prohibit those that are harmful—these alone are the two primary duties of a minister.”115
श्लोक ( Shlok ) 116 – 117
भवन्निरूपितं कार्यमपथ्यमयशस्करम् । पापानुबन्धि दुःसाध्यमयोग्यं सद्विगर्हितम् ॥ ११६ ॥अन्यदाराहृतिर्नाम पातकेष्वतिपातकम् । को हि नाम कुले जातो जातुचिच्चिन्तयेदिति ॥ ११७ ॥
आपने जिस कार्यका निरूपण किया है वह अपथ्य है- अहितकारी है, अकीर्ति करनेवाला है, पापानुबन्धी है, दुःसाध्य है, अयोग्य है, सज्जनोंके द्वारा निन्दनीय है, परस्त्रीका अपहरण करना सब पापोंमें बड़ा पाप है, उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ ऐसा कौन पुरुष होगा जो कभी इस अकार्यका विचार करेगा ।। ११६-११७ ॥
“The task you have described is unwholesome—it is harmful, a source of infamy, a harbinger of sin, difficult to achieve, and utterly unworthy; it is condemned by the virtuous. The abduction of another’s wife is the greatest of all sins. What man, born of a noble lineage, would ever even entertain the thought of such an ignoble act?”116 – 117
श्लोक ( Shlok ) 118
अस्त्यन्योऽपि तदुच्छित्त्यामुपायः किमनेन ते । भवद्वंशविनाशैकहेतुना धूमकेतुना ॥ ११८ ॥
फिर उनका उच्छेद करनेके लिए दूसरे उपाय भी विद्यमान हैं अतः आपका वंश नष्ट करनेके लिए धूमकेतुके समान इस कुकृत्यके करनेसे क्या लाभ है ? ॥ ११८ ॥
“Furthermore, other expedients already exist to bring about their eradication; therefore, what is to be gained by committing this wicked deed, which, like a fateful comet, will only serve to destroy your entire lineage?”118
श्लोक ( Shlok ) 119
इत्याख्यत्सार्थकोपाख्यं तन्मारीचं वचो विधीः । नादादासन्नमृत्युत्वाद् दृष्टरिष्ट इवौषधम् ॥ ११९ ॥
इस प्रकार मारीचने सार्थक वचन कहे परन्तु जिस प्रकार निकटकालमें मरनेवाला मनुष्य औषध ग्रहण नहीं करता उसी प्रकार निर्बुद्धि रावणने उसके वचन ग्रहण नहीं किये ॥ ११९ ॥
“In this manner, Maricha spoke words fraught with deep meaning and wisdom; yet, just as a man whose death is imminent refuses to accept life-saving medicine, the witless Ravana utterly failed to heed his counsel.”119
श्लोक ( Shlok ) 120
गृहीतमेव नेत्येतन्नावादीच्चेति मन्त्रिणम् । किमनेन वृथा मन्त्रिन् वचनेनेष्टघातिना ॥ १२० ॥
वह मारीचसे कहने लगा कि ‘हम तुम्हारी बात नहीं मानते’ यही तुमने क्यों नहीं कहा ? हे मन्त्रिन् ! इष्ट वस्तुका घात करने वाले इस विपरीत वचनसे क्या लाभ है ? ॥ १२० ॥
“He began to say to Maricha, ‘Why did you not simply say, “I do not agree with your counsel”? O Minister! What is to be gained by these contrary words of yours, which serve only to obstruct my desired objective?'”120
श्लोक ( Shlok ) 121 – 124
वेत्सि चेद् ब्रूहि सीतापहरणोपायमार्य मे । एवं तेनोच्यमानोऽसौ तव चेदेष निश्चयः ॥ १२१ ॥परीक्ष्य सत्या सम्फल्या तस्यास्त्वय्यनुरक्तताम् । आनेया सा सुखेनैव स्निग्धोपायेन केनचित् ॥१२२॥विरक्ता चेत्त्वत्या देव हठादाक्षिप्यतामिति । प्रत्याह तत्समाकर्ण्य प्रशंसन्साधु साध्विति ॥ १२३ ॥तदैव कातरः सूर्पणखामाहूय केनचित् । प्रकारेण त्वया सीता मयि रक्ता विधीयताम् ॥ १२४ ॥
हे आर्य ? यदि आप सीता हरणका कोई उपाय जानते हैं तो मेरे लिए कहिये। इस प्रकार रावणके वचन सुन मारीच कहने लगा कि यदि आपका यही निश्चय है तो पहले दूतीके द्वारा इस बातका पता चला लीजिये कि उस सतीका आपमें अनुराग है या नहीं ? यदि उसका आपमें अनुराग है तो वह स्नेहपूर्ण किसी सुखकर उपायसे ही लाई जा सकती है और यदि आपमें विरक्त है तो फिर हे देव, हठ पूर्वक उसे ले आना चाहिए । मारीचके वचन सुनकर रावण उसकी प्रशंसा करता हुआ ‘ठीक-ठीक’ ऐसा कहने लगा ।।१२१-१२३ ।।
“‘O Noble One! If you know of any stratagem to abduct Sita, then reveal it to me.’ Hearing these words of Ravana, Maricha replied, ‘If this indeed is your firm resolve, then first employ a female messenger to ascertain whether that virtuous woman harbors any affection for you or not. If she possesses affection for you, she can be won over and brought here through some pleasant, loving means; however, if she is indifferent to you, then, O Lord, she must be taken by force.’ Hearing these words of Maricha, Ravana praised him and exclaimed, ‘Splendid! Quite right!’”121 – 124
श्लोक 124 से 132
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