राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 382 to 391
श्लोक ( Shlok ) 382
धर्मपापे ‘विमुच्यान्यद्वितयं कारणं वदन् । को विधीयसनी नोचेनिर्पूणो नास्तिकोऽथवा ॥ ३८२॥
यदि यह मूर्ख, व्यसनी, निर्दय, अथवा नास्तिक नहीं है तो धर्म और पापको छोड़कर सुख और दुःखका कारण कुछ दूसरा ही है ऐसा कौन कहेगा ? ॥ ३८२ ॥
“Unless someone is a fool, an addict, merciless, or an atheist, who else would say that the cause of happiness and sorrow is something other than righteousness (Dharma) and sin (Paap)? ॥ 382 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 383
धीमानुदीक्षते अपश्यन् जन्मनोऽस्य हिताहिते । भाविनस्ते प्रपश्यन्तः स्युर्न धीमरामाः कथम् ॥३८३॥
जो केवल इसी जन्मके हित अहितको देखता है वह भी बुद्धिमान् कहलाता है फिर जो आगामी जन्मके भी हित-अहितका विचार रखते हैं वे अत्यन्त बुद्धिमान् क्यों नहीं कहलावें? अर्थात् अवश्य ही कहलावें ।। ३८३।।
“One who looks out for what is beneficial and harmful only in this current life is also called wise; therefore, why should those who reflect upon what is beneficial and harmful for their upcoming births as well not be called exceptionally wise? That is to say, they must certainly be called so! ॥ 383 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 384
इति मत्वा जिनप्रोक्तं असमादाय शुयुधीः । स्वर्गापवर्गसौख्याय यतेताविष्कृतोद्यमः ॥ ३८४ ॥
ऐसा मानकर शुद्ध बुद्धिके धारक पुरुषको चाहिये कि वह जिनेन्द्रदेवके द्वारा कहा हुआ व्रत लेकर उद्यम प्रकट करता हुआ स्वर्ग और मोक्ष के सुख प्राप्त करनेके लिए प्रयत्न करे ।। ३८४।॥
“Acknowledging this truth, a person possessing pure intellect should accept the vows enunciated by the Lord of Conquerors (Jinendradev) and, manifesting sincere effort, strive to attain the bliss of heaven and liberation (Moksha). ॥ 384 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 385 – 386
अथ प्रियङ्कराख्याय साभिषेकं स्वसम्पदम् । बसुन्धरातुजे प्रीतिङ्करोऽदत्त विरक्तधीः ॥ ३८५ ॥पुत्य राजगृहं सार्थ बहुभिर्भूत्यबान्धवैः । भगवत्पार्श्वमासाथ संयमं प्राप्तवानयम् ॥ ३८६ ॥
तदनन्तर विरक्त बुद्धिको धारण करनेवाले प्रीतिंकरने अपनी स्त्री वसुन्धराके पुत्र प्रियङ्करके लिए अभिषेकपूर्वक अपनी सब सम्पदाएँ समर्पित कर दीं और अनेक सेवक तथा भाई-बन्धुओंके साथ राजगृह नगरमें भगवान महावीर स्वामीके पास आकर संयम धारण किया है ॥ ३८५-३८६॥
“Thereafter, Pritinkar, who had developed a deeply detached intellect, formally anointed and transferred all his wealth and kingdom to Priyankar—his son born of his wife Vasundhara. Then, accompanied by numerous servants, relatives, and kinsmen, he approached Lord Mahavir Swami in the city of Rajgriha and embraced spiritual restraint (renunciation). ॥ 385-386 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 387 – 388
निश्चयव्यवहारात्मसारनिर्वाणसाधनम् । त्रिरूपमोक्षसन्मार्गभावनं तद्वलोदयात् ॥ ३८७ ॥निहत्य घातिकर्माणि प्राप्यानन्तचतुष्टयम् । अघातीनि च विध्वस्य पारमात्म्यं प्रयास्यति ॥ ३८८ ॥
निश्चय और व्यवहार रूप मोक्षका साधन, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप मोक्षमार्गकी भावना ही है। सो इसके बलसे ये प्रीतिंकर मुनिराज घातिया कर्मोंको नष्ट कर अनन्तचतुष्टय प्राप्त करेंगे और फिर अघातिया कर्मों को नष्ट कर परमात्म-पद प्राप्त करेंगे ॥ ३८७-३८८ ॥
“The means to attain liberation (Moksha) from both the ultimate (Nishchaya) and conventional (Vyavahara) perspectives is solely the contemplation of the path to liberation, which comprises right faith, right knowledge, and right conduct. By the strength of this contemplation, this great ascetic Pritinkar Muniraj will destroy the destructive karmas (Ghatiya Karmas) to attain the fourfold infinite splendors (Ananta Chatusthaya), and subsequently destroy the non-destructive karmas (Aghatiya Karmas) to achieve the supreme state of Godhood (Paramatma-pada). ॥ 387-388 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 389
इति श्रीमद्ङ्गणाधीशनिदेशान्मगधेश्वरः । प्रीतवानभिवन्द्यायान्मन्वानः स्वकृतार्थताम् ॥ ३८९ ॥
इस प्रकार श्रीमान् गणधरदेवकी कही कथासे राजा श्रेणिक बहुत ही प्रसन्न हुआ तथा उन्हें नमस्कार कर अपने आपको कृतार्थ मानता हुआ नगर में चला गया ।॥३८९।।
“In this manner, King Shrenik was highly delighted by the narrative narrated by the illustrious Ganadharadeva; bowing down to him and considering himself deeply blessed, he returned to the city. ॥ 389 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 390 – 391
अथान्यदा महाराजः श्रेणिकः क्षायिकी दृशम् । दधनत्वा गणाधीशं कुड्मलीकृतहस्तकः ॥ ३९० ॥शेषावसर्पिणीकालस्थिति निरवशेषतः । आगाभ्युत्सर्पिणीकालस्थितिमप्यनुयुक्तवान् ॥ ३९१ ॥
अथानन्तर किसी दूसरे दिन क्षायिक सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले राजा श्रेणिकने हाथ जोड़कर गणधरदेवको नमस्कार किया तथा उनसे बाकी बची हुई अपसर्पिणी कालकी स्थिति और आनेवाले उत्सर्पिणी कालकी समस्त स्थिति पूछी ॥ ३९०-३९१ ॥
“Thereafter, on another day, King Shrenik, who possessed destruction-born right conviction (Kshayika Samyagdarshana), bowed to Ganadharadeva with folded hands and enquired about the remaining duration of the current descending era (Avasarpini Kala) as well as the entire duration and sequence of the upcoming ascending era (Utsarpini Kala). ॥ 390-391 ॥”
श्लोक 392 से 401
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111| श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73 | पर्व 74
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73 | पर्व 74