चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 614 to 624
श्लोक ( Shlok ) 614 – 615
इति वृद्धोक्तिमाकर्ण्य ब्राह्मणोऽयं न केवलः । कोऽपि रूपपरावृत्तिविद्यया समुपागतः ॥ ६१४ ॥इस्याकलय्य को दोषो विप्रः प्राघूणिको मम । तिष्ठत्वत्रेति तथेटिका निवारयति स्म सा ॥ ६१५ ॥
इस प्रकार वृद्ध ब्राह्मणकी बात सुनकर गुणमालाने विचार किया कि यह केवल ब्राह्मण ही नहीं है किन्तु रूपपरावर्तनी विद्याके द्वारा रूप बदल कर कोई अन्य पुरुष यहाँ आया है। ऐसा विचार कर उसने दासियोंको रोक दिया और उस ब्राह्मण से कहा कि क्या दोष है ? आप मेरे पाहुने हैं अतः इस शय्यापर बैठिये ।। ६१४-६१५ ।।
Hearing the old Brahmin’s words, Gunamala reflected, “He is not merely a Brahmin, but some other man who has come here after changing his appearance through the magical art of transformation (Rupa-paravartani Vidya).” With this thought, she restrained her maidservants and said to the Brahmin, “What harm is there? You are my guest, so please sit on this bed.” (614-615)
श्लोक ( Shlok ) 616 – 618
तश्चिशावसितौ शुद्धदेशजस्वरभेदवित् । गीतवान्मधुरं वृद्धश्चिरं श्रोत्रमनोहरम् ॥ ६१६ ॥गन्धर्वदशाकल्याणकाले सालङ्क्रियं कलम् । जीवन्धरकुमारस्य गीतं वैतच्छू तेः सुखम् ॥ ६१७ ॥इति प्रातः समुत्थाय विनयेनोपसृत्य तम् । साप्राक्षीत्केषु शास्त्रेषु प्रबोधो भवतामिति ॥ ११८ ॥
रात्रि समाप्त होनेपर शुद्ध तथा देशज स्वरके भेदोंको जाननेवाले उन वृद्ध ब्राह्मणने चिरकाल तक श्रोत्र तथा मनको हरण करनेवाले मधुर गीत गाये । गन्धर्वदत्ताके विवाहके समय जीवन्धर कुमारने जो अलंकार सहित मनोहर गीत गाये थे उन्हें सुन-कर गुणमालाको जैसा सुख हुआ था वैसा ही सुख इस वृद्धके गीत सुनकर हुआ। सबेरा होनपर गुणमालाने बड़ी विनयके साथ उसके पास जाकर पूछा कि आपको किन-किन शास्त्रोंका अच्छा ज्ञान है ? ।। ६१६-६१८ ।।
When the night drew to a close, the elderly Brahmin, who was well-versed in the distinctions of pure and regional musical notes, sang sweet songs that enchanted the ears and captivated the mind for a long time. The same intense joy that Gunamala had felt upon hearing the exquisitely ornamented and captivating songs sung by Prince Jivandhara at the time of Gandharvadatta’s wedding, she experienced once again upon hearing the songs of this old man. When morning came, Gunamala approached him with great humility and asked, “In which scriptures do you possess profound knowledge?” (616-618)
श्लोक ( Shlok ) 619 – 624
धर्मार्थकामशास्त्राणि भूयोऽभ्यस्तानि यत्नतः । तेषु धर्मार्थयोः कामशास्त्रात्फलविनिश्चयः ॥ ६१९ ॥कथं तदिति चेत्किञ्चिन्मया तत्र निरूप्यते । पञ्चेन्द्रियाणि तेषाञ्च विषयाः पञ्चधा स्मृताः ॥ ९२० ॥स्पर्शादयोऽष्टधा स्पर्शाः कर्कशायाः श्रुतोदिताः । रसोऽपि ‘वविधः प्रोक्तो मधुरादिर्मनीषिभिः ॥ ६२१॥कृतकः सहजश्चेति गन्धोऽपि द्विविधो मतः । सर्षः सुगन्धदुर्गन्धचेतनेतरवस्तुगः ॥ ६२२ ॥ रूपं पञ्चविधं श्वेतकृष्णादिप्रविभागभाक् । षड्जादयः स्वराः सप्त जीवाजीवसमुद्भवाः ॥ ६२३ ॥ इत्यष्टाविंशतिर्भूत्वा द्वैगुण्यं पुनरागताः । इष्टानिष्टविकल्पाभ्यां षट्पञ्चाशद्विकल्पनाः ॥ ६२४ ॥
इसके उत्तर में ब्राह्मणने कहा कि मैंने बड़े यत्नसे धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और कामशास्त्र का बार-बार अभ्यास किया है। उनमें धर्म और अर्थके फलका निश्चय कामशास्त्रसे ही होता है। वह किस प्रकार होता है ? यदि यह जानना चाहती हो तो मैं इसका कुछ निरूपण करता हूँ। इन्द्रियाँ पाँच हैं और उनके स्पर्श आदि विषय भी पाँच ही हैं। उनमेंसे स्पर्शके कर्कश आदि आठ भेद शास्त्रोंमें कहे गये हैं। विद्वानोंने मधुर आदिके भेदसे रस भी छह प्रकारका कहा है। सुगन्ध और दुर्गन्ध रूप चेतन अचेतन वस्तुओंमें पाया जानेवाला सब तरहका गन्ध भी कृतक और सहजके भेदसे दो प्रकारका माना गया है। श्वेत, कृष्ण आदिके भेदझे रूप पाँच तरहका कहा गया है और जीव तथा अजीवसे उत्पन्न हुए षड्र्ज आदि स्वर सात तरहके होते हैं। इस प्रकार सब मिलाकर पाँचों इन्द्रियोंके अट्ठाईस विषय होते हैं। इनमेंसे प्रत्येकके इष्ट, अनिष्टकी अपेक्षा दो-दो भेद हैं अतः सब मिलकर छप्पन हो जाते हैं ।। ६१९-६२४ ॥
In response, the Brahmin said, “With great effort, I have repeatedly studied the scriptures of righteousness (Dharmashastra), wealth (Arthashastra), and pleasure (Kamashastra). Among these, the definitive reward of righteousness and wealth is realized through the science of pleasure alone. If you wish to know how that happens, I shall explain it to you.
The senses are five, and their respective objects of experience, such as touch, are also five. Among them, the scriptures state eight varieties of touch, including rough and smooth. The learned say that taste is of six kinds, distinguished as sweet and others. All kinds of fragrance found in conscious and unconscious objects are considered to be of two types: artificial and natural. Form is said to be of five kinds, distinguished by white, black, and other colours. The musical notes, such as Shadja, produced by the animate and inanimate, are of seven types.
Thus, combining all of them, there are twenty-eight objects of the five senses. Based on whether each of these is desirable or undesirable, they are further divided into two types each, making a total of fifty-six variations.” (619-624)
श्लोक 625 से 631
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613
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