मेरी भावना – छंद 6: व्याख्या और अर्थ
गुणीजनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे, बने जहां तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे ।
होऊं नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे, गुण-ग्रहण का भाव रहे नित दृष्टि न दोषों पर जावे ॥6॥
पिछले छंदों में मैत्री, करुणा, प्रमोद और माध्यस्थ भाव की चर्चा की गई थी। यहाँ पंडित जुगलकिशोर जी मुख्तार हमें बताते हैं कि एक श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए गुणवान व्यक्तियों के प्रति प्रेम, विनय और उनके गुणों को ग्रहण करने की भावना विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है।
ध्यान करने से पहले इस प्रकार की भावनाएं भाना अति आवश्यक बताया गया है, क्योंकि इसके बिना मन शांत और निर्मल नहीं हो सकता। जिन लोगों को भी अपना मन शांत करने की इच्छा हो, ध्यान की तैयारी करनी हो या ध्यान में बैठने के लिए मन को तैयार करना हो, वे सहजता से ‘मेरी भावना’ की इन चार भावनाओं का अपने मन में चिंतन कर सकते हैं। यदि संस्कृत की पंक्तियाँ समझ में न आएँ, तो हिंदी में भी इन भावनाओं को पढ़कर समझा जा सकता है।
ये पंक्तियाँ हमारे व्यावहारिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। यहाँ चौथी भावना के बारे में बताया गया है, जिसे आचार्यों द्वारा ‘प्रमोद भाव’ कहा गया है। इसका अर्थ है—गुणी जनों को देखकर हृदय में आदर और प्रसन्नता का प्रेम उमड़ आना।
गुणों के प्रति आदर एवं प्रेम का वास्तविक अर्थ
यह भाव हर उस आत्मा के लिए आवश्यक है जो अपने भीतर गुणों को ग्रहण करना चाहती है। हमारे भीतर गुणों के प्रति सम्मान तभी जागृत होगा, जब हम गुणवान व्यक्तियों का आदर करेंगे।
गुण बाज़ार में, घर के कमरों में या रसोईघर में नहीं मिलते; वे किसी न किसी गुणवान व्यक्ति के भीतर ही प्राप्त होते हैं। इसलिए गुणवान व्यक्तियों को देखकर मन में मुदित होना, चेहरा खिल उठना और आदर भाव से उनके गुणों को स्वीकार करने की भावना रखना ही गुणी जनों के प्रति सच्चा प्रेम-भाव है।
यहाँ प्रेम का अर्थ केवल भौतिक आलिंगन या लोक-दिखावा नहीं है। समझदार व्यक्ति के लिए प्रेम का वास्तविक तात्पर्य ‘प्रमोद भाव’ से है। प्रमोद का अर्थ है कि जब भी हमें कोई गुणी व्यक्ति दिखाई दे, तो हमारे चेहरे पर एक सहज प्रसन्नता आ जाए—चाहे हम स्वयं उस समय किसी भी परेशानी या उलझन में क्यों न पड़े हों।
गुणी जनों के दर्शन और मन की स्थिति
यदि कभी हमें किसी गुणी व्यक्ति के दर्शन हो जाएँ, तो हमारे भीतर ऐसा भाव होना चाहिए कि हम अपने सारे दुख और उलझनें भूल जाएँ तथा चेहरे पर अपने आप एक प्यारी सी मुस्कान आ जाए।
परंतु आज के समय में प्रायः ऐसा देखने को नहीं मिलता। यदि हम गुस्से में या तनाव में होते हैं, तो गुणवान व्यक्ति के सामने आने पर भी अपना मुँह बनाए रखते हैं। कई बार जब माता-पिता बच्चों से कहते हैं, “चलो बेटा, दर्शन करने चलते हैं,” तो बच्चे कह देते हैं, “मेरा मूड ठीक नहीं है, मुझे नहीं जाना।” यहाँ तक कि यदि कोई संत या गुणवान व्यक्ति घर पर आ जाएँ, तब भी वे यही कहते हैं कि आज घर में झगड़ा हो गया था या मूड खराब है, इसलिए आज आपको नहीं आना चाहिए था।
निमित्त का महत्व और अभ्यास
हमें यह बात समझनी चाहिए कि जीवन में कुछ निमित्त (उत्प्रेरक) ऐसे होते हैं, जिनके सामने आते ही हमें अपनी सारी व्यक्तिगत परेशानियों को भूल जाना चाहिए। यदि हम इस बात को एक अभ्यास (Practice) के रूप में अपना लें, तो जीवन की कई समस्याओं का समाधान सहज हो जाएगा।
आज के समय में केवल लॉकडाउन ही नहीं, बल्कि नौकरी, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक संबंधों से जुड़ी कई तरह की विकट परेशानियां सामने आ रही हैं। इन सब के बीच हमें अपने मन को इन पावन भावनाओं के साथ जोड़ना होगा। भले ही हम कितने भी दुखी क्यों न हों, लेकिन जैसे ही किसी गुणी व्यक्ति के दर्शन हों, हमें अपने चित्त को प्रसन्न कर लेना चाहिए।
अभिव्यक्ति और एकाग्रता (Face is the Index of the Mind)
जब आप किसी गुणवान व्यक्ति के दर्शन कर रहे हों या प्रवचन सुन रहे हों, तो आपके चेहरे के भाव ऐसे होने चाहिए कि वक्ता को लगे कि आप बातों को सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं और सीख रहे हैं। यह अत्यंत व्यावहारिक और आवश्यक बात है।
कुछ लोग कहते हैं, “महाराज जी, हमारा चेहरा भले ही गंभीर रहे, लेकिन हम भीतर से प्रसन्न रहते हैं।” परंतु यह संभव नहीं है (That’s not possible)। यदि हृदय में प्रसन्नता होगी, तो वह चेहरे पर अवश्य झलकेगी, क्योंकि चेहरा ही मन का दर्पण होता है (Face is the index of the heart)।
आपकी आँखें और चेहरे के हाव-भाव यह स्पष्ट बता देते हैं कि आप पूरी एकाग्रता से सुन रहे हैं या आपका ध्यान कहीं और भटक रहा है। जब आप तल्लीन होकर सुनते हैं, तब मन में यह आनंदप्रद भाव आता है कि “आज मुझे बहुत श्रेष्ठ ज्ञान सुनने को मिल रहा है,” और यही सच्ची प्रसन्नता का आधार बनता है।
आदर भाव और सौभाग्य की अनुभूति
प्रमोद भाव मन में तभी जागृत होता है जब आपके भीतर गुणी जनों के प्रति निष्कपट आदर और आनंद की भावना हो। जब ऐसा आदर भाव होगा और कभी किसी गुणीजन या मुनि महाराज के अचानक दर्शन हो जाएँगे, तो आप अपने सौभाग्य की सराहना करेंगे कि—“महाराज! मैं बहुत समय से आपके दर्शनों की प्रतीक्षा कर रहा था, आज अचानक दर्शन हो गए, यह मेरा बड़ा सौभाग्य है।”
यह ‘मेरी भावना’ केवल पढ़ने के लिए नहीं है, यह तो प्रत्येक व्यक्ति का अपना व्यक्तिगत भाव होना चाहिए। जब आपके भीतर ऐसी भावनाएं जागृत होने लगेंगी, तो मन के थोड़ा भी डिस्टर्ब होने पर यदि ऐसा शुभ संयोग बन जाएगा, तो आप अपने सारे दुखों को भूलकर स्वतः ही प्रसन्नता की स्थिति (State of Happiness) में आ जाएँगे।
प्रसन्नता का अभ्यास और सकारात्मकता
आज के दौर में केवल सकारात्मक सोचने से काम नहीं चलता, बल्कि यह एक संकल्प होना चाहिए कि जब भी गुणी जनों के दर्शन होंगे, हम अवश्य प्रसन्न होंगे। जब-जब हमें गुणवान व्यक्तियों का समागम मिले, तब-तब हमें आनंद का अनुभव होना चाहिए, क्योंकि इसी प्रसन्नता से जीवन में वास्तविक परिवर्तन आता है।
यदि कभी मन उदास भी हो और आप कृत्रिम रूप से भी चेहरे पर प्रसन्नता लाने का प्रयास करेंगे, तो धीरे-धीरे भीतर का दुख दूर होने लगेगा। और यदि वास्तव में मन से प्रसन्नता आ जाए, तो फिर कहना ही क्या! आज हम चाहे किसी भी कठिन परिस्थिति से गुजर रहे हों, मन का शांत और खुश रहना अत्यंत आवश्यक है।
चिंता ही मनुष्य की मुस्कान को गायब कर देती है। यदि आप अभ्यास करेंगे, तो ‘मेरी भावना’ का यह पाठ आपके जीवन में सदा खुश रहने का सबसे बड़ा माध्यम बन जाएगा।
‘गुणी’ और ‘गुण’ का वास्तविक अर्थ
हमें यह भी समझना होगा कि वास्तव में ‘गुणी’ किसे कहते हैं।
यदि आप ‘गुण’ शब्द का अंग्रेजी अनुवाद डिक्शनरी में खोजेंगे, तो आपको इसका अर्थ ‘Merit’ (मेरिट) मिलेगा। अक्सर लोग कहते हैं कि “मेरा बेटा मेरिट लिस्ट में आ गया है।” लेकिन व्यावहारिक रूप से Merit का अर्थ ‘गुण’ ही होता है, और De-merits का अर्थ ‘दोष’ होता है।
जीवन की असली परीक्षा केवल अंकों (Numbers) की नहीं होती, बल्कि हमारे भीतर के सद्गुणों की होती है। जब हमारे भीतर की योग्यता और गुणवत्ता बाहर आती है, तभी वास्तव में गुणों का विकास होता है।
गुण शब्द की क्षेत्रीय अभिव्यक्ति और वास्तविक अर्थ
दक्षिण भारत (जैसे कर्नाटक या महाराष्ट्र क्षेत्र) की ओर जब बच्चों को परीक्षाओं में अंक प्राप्त होते हैं, तो वहाँ सामान्य भाषा में उन्हें ‘नंबर’ न कहकर ‘गुण’ कहा जाता है। अर्थात् हमारे भीतर की जो योग्यता या गुणवत्ता सामने आती है और जिसे देखकर लोग प्रसन्न होते हैं, वही गुण है।
लेकिन आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से ‘गुण’ का अर्थ केवल शैक्षणिक अंकों तक सीमित नहीं है।
गुणी व्यक्ति की पहचान
आध्यात्मिक संदर्भ में गुणी व्यक्ति वह कहलाता है जो:
- सदाचारी और शाकाहारी हो: जिसका आचरण और खान-पान शुद्ध हो।
- विनम्र और शिष्ट हो: जो बड़े-बड़े कार्य करने के बाद भी अहंकार से रहित रहकर स्वयं को लघु समझे और अपने से बड़ों के प्रति सदैव नम्र रहे।
- कलह-रहित स्वभाव का हो: जिसके मन में किसी से भी झगड़ा या विवाद करने की भावना न हो।
आज के समय में एक सबसे बड़ा गुण यह भी है कि व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्न रहे और विपरीत से विपरीत स्थितियों में भी चिड़चिड़ा (Irritated) न हो। यदि आपको ऐसा कोई सकारात्मक व्यक्ति (Positive Person) मिले, तो उसकी प्रशंसा करें और उससे सीखें। जब आप ऐसे व्यक्तियों का आदर करेंगे और उन्हें अपना आदर्श बनाएँगे, तो वे सद्गुण धीरे-धीरे आपके भीतर भी विकसित होने लगेंगे।
10 लक्षण धर्म ही वास्तविक गुण हैं
हमारे जीवन में सदाचार, शिष्टाचार, नम्रता, क्षमा और मृदुता का स्वभाव अत्यंत उपयोगी है। जैन दर्शन में बताए गए दस लक्षण धर्म (उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य) वास्तव में मनुष्य के सबसे श्रेष्ठ गुण ही हैं।
दुर्भाग्य से हम इन्हें केवल दसलक्षण पर्वों के दौरान ही याद करते हैं, व्यावहारिक जीवन में गुण के रूप में नहीं देखते।
- क्षमा (Forgiveness): दूसरों को भूल मानकर क्षमा कर देना एक बहुत बड़ी मानवीय गुणवत्ता है।
- विनम्रता (Humility): अहंकार रहित होकर सरलता और संतोष के साथ जीना ही वास्तविक महानता है।
जिस व्यक्ति के भीतर क्षमा, मृदुता (कोमलता), आर्जव (सरलता), शौच (पवित्रता/अलोभ) और संतोष जैसे गुण दिखाई दें, वही वास्तव में ‘गुणी जन’ हैं। ऐसे गुणवान व्यक्तियों को देखकर हमारे मन में स्वाभाविक रूप से प्रसन्नता और आदर का भाव जागृत होना चाहिए।
प्रसन्नता का वास्तविक स्रोत और आत्म-विकास
प्रसन्न होने के लिए किसी बाहरी उपकरण या बिजली के कनेक्शन की आवश्यकता नहीं होती। यदि हमें यह समझ में आ जाए कि गुणी जनों का समागम ही वास्तविक प्रसन्नता का कारण है, तो हमारे भीतर स्वतः ही खुशी का संचार होने लगेगा।
जब हम गुणवान व्यक्तियों के प्रति आदर और उल्लास व्यक्त करते हैं, तो हम भी भीतर से गुणी बनने लगते हैं। यही कारण है कि ‘मेरी भावना’ में कहा गया है: “गुणी जनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे।”
प्रेम उमड़ने का वात्सल्यमयी उदाहरण
‘प्रेम उमड़ने’ का भाव समझना हो, तो किसी माँ और उसके छोटे बच्चे (जैसे गाय और बछड़े या किसी अन्य पशु) के वात्सल्य को देखें।
जब बछड़ा दूर से पुकारता है और माँ दौड़कर उसके पास जाती है, उसे दुलारती है, चाटती है और गोदी में लेती है—वही सहज और निष्कपट भाव प्रेम का उमड़ना कहलाता है। गुणी जनों को देखकर भी हमारे हृदय में ऐसा ही आदरयुक्त और आह्लादकारी प्रेम उमड़ना चाहिए।
गुणी जनों की खोज और संगति
आप सोच सकते हैं कि ऐसे गुणी जन कहाँ मिलेंगे?
दस धर्मों (क्षमा, मार्दव, आर्जव आदि) को अपने जीवन में धारण करने वाले ये गुणी जन:
- कोई सामान्य सदाचारी गृहस्थ हो सकते हैं।
- अविरत सम्यग्दृष्टि या व्रती जन हो सकते हैं।
- निष्परिग्रही महाव्रती संत (मुनिराज) हो सकते हैं।
जब हम ऐसे गुणवानों को देखते हैं और उनके प्रति मन में प्रमोद भाव लाते हैं, तो हमारे भीतर भी उनके जैसा चरित्र और गुण धारण करने की भावना जागृत होती है। दुनिया में द्वेष रखने वाले बहुत मिल जाएँगे, किंतु हमें गुणी जनों के प्रति केवल प्रेम, स्नेह और आदर का भाव ही रखना चाहिए।
बने जहाँ तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे।
गुणी जनों को देखकर केवल प्रसन्न होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यदि अवसर मिले और उनकी निकटता प्राप्त हो, तो निष्काम भाव से उनकी सेवा-वैयावृत्ति भी करनी चाहिए।
सेवा करते समय शरीर से पसीना बह सकता है या शारीरिक परिश्रम हो सकता है, परंतु मन सदैव प्रसन्न और तृप्त रहना चाहिए। शरीर का कष्ट तो क्षणिक है, किंतु सत्पुरुषों की सेवा से प्राप्त हुआ आत्मिक आनंद और पुण्य का फल अमूल्य होता है।
सेवा में शारीरिक कष्ट और आत्मिक आनंद
सेवा करते समय शारीरिक श्रम और थकान होना स्वाभाविक है। गर्मी का मौसम हो या कोई मेहनत का कार्य, पसीना तो बहेगा ही। परंतु वह पसीना कोई व्यर्थ की थकान नहीं, बल्कि सेवा के आनंद का अमृत है।
यदि सेवा करते हुए शरीर थक भी जाए (Exhaust हो जाए), तो भी मन में यह परम संतोष होना चाहिए कि—“आज मुझे सत्पुरुषों की सेवा का जो सुख और अवसर मिला, वह हर किसी को सहजता से नहीं मिलता।”
यदि आप शारीरिक कष्ट की परवाह न करके मन की प्रसन्नता पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तो शरीर की थकान आपको कभी दुखी नहीं कर सकेगी।
माता-पिता में सद्गुणों की पहचान
अक्सर बच्चे अपने ही घर में माता-पिता के सद्गुणों को नहीं देख पाते। वे सोचते हैं कि माता-पिता में कौन से विशेष गुण हैं? परंतु यदि आप गौर से देखें, तो उनके भीतर:
- सज्जनता और सरलता का भाव होता है।
- आपका ध्यान और देखभाल (Care) रखने की अटूट भावना होती है।
- वे आपको बार-बार दुलारते हैं, सही-गलत का मार्गदर्शन करते हैं और आपकी सुरक्षा के लिए हर संभव प्रयास करते हैं।
यदि हम अपने घर के इन प्राथमिक गुणी जनों के प्रति आदर भाव नहीं रखेंगे, तो हमारे भीतर एक बहुत बड़ा दुर्गुण—कृतघ्नता—पैदा होने लगेगा।
होऊँ न कृतघ्नी कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।
कृतज्ञता (Gratitude) बनाम कृतघ्नता
आचार्यों ने कृतघ्नता से बचने की प्रेरणा दी है:
- कृतघ्नता (Ingratitude): जिन लोगों ने हमारे जीवन में उपकार किए हैं, उनकी अच्छाइयों और उपकारों को भूल जाना, उनके प्रति वैर-भाव रखना या उनके बारे में बुरा सोचना कृतघ्नता है।
- कृतज्ञता (Gratitude): जिन्होंने हमारे ऊपर थोड़ा सा भी उपकार किया है, उनके उपकार को विनम्रता से स्वीकार करना, याद रखना और उनके प्रति आदर भाव रखना कृतज्ञता (Attitude of Gratitude) कहलाता है।
जब वह व्यक्ति विदेश में माँ के हाथ की रोटी को याद करता है, तब उसके भीतर कृतज्ञता का भाव जागृत होता है। उसे अनुभव होता है कि चाहे वह रोटी कितनी भी साधारण क्यों न थी, वह माँ के प्रेम, स्नेह और अपनत्व से बनी हुई थी। उस समय समझ में आता है कि वास्तव में रोटी केवल भोजन नहीं थी, बल्कि प्रेम का प्रतीक थी।
इसी प्रकार जीवन की प्रत्येक वस्तु का अपना महत्व और अपना स्थान है। आज उसकी उपयोगिता हमें समझ में आए या न आए, लेकिन समय आने पर उसका वास्तविक मूल्य अवश्य ज्ञात होता है।
इसलिए पंडित जी का संदेश है कि हमें हर परिस्थिति में कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए। कभी भी कृतघ्न नहीं बनना चाहिए। जीवन में जो कुछ भी हमें प्राप्त हुआ है—चाहे वह व्यक्ति हो, वस्तु हो, अवसर हो या परिस्थिति—उसके प्रति आभार व्यक्त करना सीखना चाहिए।
अपने जीवन में कृतज्ञता का अभ्यास करें
यदि हम अपने जीवन पर गंभीरता से विचार करें, तो पाएँगे कि हमारा अस्तित्व असंख्य लोगों के सहयोग का परिणाम है। माता-पिता, गुरु, परिवार, मित्र, समाज और अनगिनत ऐसे लोग, जिनसे हम कभी मिले भी नहीं, किसी-न-किसी रूप में हमारे जीवन को बेहतर बनाने में योगदान देते हैं।
इसीलिए समय-समय पर अपने आप से यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए—
मैं किन-किन लोगों के प्रति कृतज्ञ हूँ, और क्यों?
एक उपयोगी अभ्यास यह हो सकता है कि अपनी डायरी में उन सभी व्यक्तियों के नाम लिखें, जिनके कारण आपका जीवन किसी न किसी रूप में समृद्ध हुआ है। प्रत्येक नाम के सामने यह भी लिखें कि आप उनके प्रति कृतज्ञ क्यों हैं। यह छोटा-सा अभ्यास हमारे भीतर विनम्रता, संवेदनशीलता और आभार की भावना को गहरा करता है।
धन्यवाद व्यक्त करने की आदत
पंडित जी हमें यही प्रेरणा देते हैं कि हम कभी कृतघ्न न बनें, बल्कि अपने जीवन में कृतज्ञता को निरंतर व्यक्त करते रहें।
हमारे मुख से समय-समय पर “धन्यवाद” शब्द निकलता रहे। यह धन्यवाद केवल उन लोगों के लिए नहीं होना चाहिए जिन्होंने हमारे लिए बड़े कार्य किए हैं, बल्कि उन सभी निमित्तों के प्रति भी होना चाहिए, जिनके सहयोग से हम आज इस स्थान तक पहुँच पाए हैं। जीवन में हमारी प्रत्येक उपलब्धि के पीछे अनेक लोगों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान होता है। इसलिए सफलता का श्रेय केवल स्वयं को देना उचित नहीं है। जो व्यक्ति अपने सहयोगियों, मार्गदर्शकों और शुभचिंतकों के प्रति आभार व्यक्त करना सीख लेता है, उसका व्यक्तित्व और भी अधिक विनम्र, समृद्ध और प्रेरणादायक बन जाता है।
कृतज्ञता: एक अत्यंत दुर्लभ गुण
आचार्य पूज्यपाद स्वामी ने ‘सर्वार्थसिद्धि’ ग्रंथ में कृतज्ञता को एक अत्यंत दुर्लभ गुण बताया है।
छहढाला आदि ग्रंथों में भी उल्लेख आता है कि जिस प्रकार स्थावर (एकेंद्रिय जीव) पर्याय से निकलकर त्रस (स्थावर से उच्च) पर्याय प्राप्त करना अत्यंत दुर्लभ है, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर सद्गुणों में ‘कृतज्ञता का गुण’ प्रकट होना उससे भी अधिक दुर्लभ है।
आज के समय में व्यक्ति बहुत जल्दी कृतघ्न हो जाता है—ज़रा सी बात पर माता-पिता, गुरुजनों या सहयोगियों से रुष्ट हो जाता है और उनके किए गए वर्षों के उपकारों को पल भर में भूल जाता है। इसलिए हमें सदैव कृतज्ञ बनने का अभ्यास करना चाहिए।
कृतज्ञता की दुर्लभता और पारिवारिक जीवन
आज के दौर में ज़रा सी बात पर लोग अपने गुरुजनों, माता-पिता या आदरणीय जनों से रुष्ट हो जाते हैं और शत्रुओं जैसा व्यवहार करने लगते हैं। इसीलिए आचार्यों ने कहा है कि जीवन में ‘कृतज्ञता’ का आना अपने आप में एक बहुत बड़ी दुर्लभ उपलब्धि है।
बचपन में माता-पिता बच्चे का कितना ध्यान रखते हैं, कितनी सेवा और परिश्रम करते हैं! दिनभर दादा, पापा, मम्मी, चाचा, मामा—घर के सभी सदस्य बच्चे को खिलाने और दुलारने में अपना समय और स्नेह समर्पित कर देते हैं। परंतु वही बच्चा जब बड़ा हो जाता है, तो कभी-कभी अपने परिजनों और माता-पिता को कुछ नहीं समझता, उनका अपमान करता है और उनकी बात नहीं मानता। यह व्यवहार कृतघ्नता की पराकाष्ठा है।
आधुनिक शिक्षा और वास्तविक योग्यता (Merit)
आजकल बच्चे माता-पिता से यहाँ तक कह देते हैं—“आपने मेरे लिए किया ही क्या है? मेरे दोस्त के माता-पिता ने तो उसके लिए कितना कुछ कर दिया!”
माता-पिता अपनी क्षमता से बढ़कर अच्छे स्कूलों में पढ़ाते हैं, बड़ी-बड़ी कोचिंग दिलाते हैं, दिन-रात मेहनत करके सब कुछ न्योछावर कर देते हैं; फिर भी ऐसा सुनने को मिलता है। इसका मुख्य कारण यह है कि हमने बच्चों को केवल परीक्षाओं में ‘मेरिट’ (Merit) लाना सिखाया, लेकिन वास्तविक मानवीय गुणों (Merits) की शिक्षा नहीं दी।
आजकल केवल अंक (Marks) बढ़ रहे हैं, परंतु उनके साथ अहंकार और ईर्ष्या भी बढ़ती जा रही है। वास्तविक गुणवत्ता तब बढ़ती है जब हम गुणी जनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना सीखते हैं।
द्रोह न मेरे उर आवे – द्रोह (प्रतिशोध) से मुक्ति
यहाँ ‘द्रोह’ का अर्थ है—प्रतिशोध, वैर या बदला लेने की भावना। किसी का बुरा सोचना, किसी का अहित चाहना, किसी को नीचे गिराने की योजना बनाना या बदले की भावना से प्रेरित होकर उसके साथ अनुचित व्यवहार करना—यही द्वेष है।
अक्सर ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति ने हमारे साथ भले ही हज़ार अच्छे कार्य किए हों, लेकिन यदि कभी गलती से एक बात प्रतिकूल हो गई, तो हम उसके सारे उपकारों को भूलकर मन में द्वेष और बदला लेने की भावना बैठा लेते हैं।
यदि व्यक्ति अपने भीतर यह गुण विकसित कर ले कि—“चाहे जो हो जाए, मुझे किसी के प्रति द्वेष या द्रोह नहीं रखना है, बल्कि यह याद रखना है कि उसने अतीत में मेरे लिए कितना भला किया है,” तो जीवन अत्यंत शांत और सुखद हो जाएगा। हे भगवान! मेरे हृदय में किसी भी व्यक्ति के प्रति द्वेष का भाव कभी उत्पन्न न हो।
इसी भावना के कारण समाज में देशद्रोह, गुरुद्रोह, माता-पिता के प्रति विद्रोह, मित्र-द्रोह और परिवार में कटुता जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। पंडित जी की प्रार्थना है कि जिन लोगों ने हमारे जीवन को सँवारा, जिन्होंने हमें आगे बढ़ाया और जिनके सहयोग से हम आज यहाँ तक पहुँचे हैं, उनके प्रति हमारे मन में कभी भी विरोध या द्वेष का भाव न आए। यदि हम अपने माता-पिता की अपेक्षा के अनुरूप सेवा न भी कर सकें, तो कम-से-कम उनके प्रति सम्मान और सद्भाव अवश्य बनाए रखें। यदि हम अपने समाज, राष्ट्र, धर्म या शासन के लिए कोई विशेष कार्य न कर सकें, तो भी उनके प्रति नकारात्मकता और विरोध का भाव कभी न रखें।
हर व्यक्ति के जीवन में यह संकल्प होना चाहिए कि—
“मैं किसी का हित न कर सकूँ, तो कम-से-कम किसी का अहित भी न करूँ।”
राजा और कड़वे फल का प्रेरक प्रसंग
इस संदर्भ में एक सुंदर दृष्टांत आता है:
एक बार एक राजा अपने मंत्रियों के साथ जंगल में वन-विहार के लिए गया। घूमते-घूमते जब सभी को तीव्र भूख लगी, तो वे एक आम के वृक्ष के पास पहुँचे। राजा की सेवा करते हुए मंत्री ने तुरंत वृक्ष से एक फल तोड़ा और राजा को खाने के लिए भेंट कर दिया। मंत्री ने वृक्ष से फल तोड़कर राजा को भेंट किया। राजा ने जब उसका एक टुकड़ा खाया, तो मंत्री ने पूछा, “राजन! फल कैसा है?”
राजा बोले, “अति मधुर! बहुत ही स्वादिष्ट फल है।”
राजा उसे आनंदपूर्वक खाते रहे। मंत्री को उत्सुकता हुई, उसने कहा, “महाराज, थोड़ा मुझे भी दीजिए, मुझे भी भूख लगी है।” राजा ने देने में थोड़ा संकोच किया कि मैं ही खा लेता हूँ, परंतु मंत्री के आग्रह पर उसने बचा हुआ फल मंत्री को दे दिया।
मंत्री ने जैसे ही फल का टुकड़ा मुँह में रखा, वह अत्यंत कड़वा निकला! मंत्री चकित होकर बोला, “राजन! यह क्या बात हुई? यह फल तो अत्यंत कड़वा है और आप इसे किसी मिष्टान्न की तरह आनंद से खाए जा रहे थे! आपने मुझसे झूठ क्यों कहा?”
राजा ने मुस्कुराकर जो उत्तर दिया, वह गुणी व्यक्ति के विवेक को दर्शाता है। राजा ने कहा:
“हे मंत्री! तुम वर्षों से निष्ठापूर्वक मेरी सेवा करते आए हो। रोज़ मुझे तरह-तरह के मधुर और उत्तम फल ला कर देते हो। यदि आज तुम्हारे हाथों से लाया हुआ कोई एक फल कड़वा निकल भी गया, तो यह मेरा शिष्टाचार नहीं है कि मैं उस कड़वे फल को फेंक दूँ या तुम्हें बुरा-भला कहूँ। तुमने प्रेम से दिया, इसलिए तुम्हारे पिछले वर्षों के उपकारों को याद रखते हुए यह कड़वा फल भी मेरे लिए मिष्टान्न बन गया।”
जीवन में सद्गुणों (Merits) का वास्तविक महत्व
इसी को कहते हैं ‘गुणवान व्यक्ति की सोच’। यदि ऐसा भाव हमारे मन में आ जाए, तो हम पारिवारिक और व्यावसायिक—दोनों जीवन बहुत आनंद से जी सकते हैं।
चाहे आप किसी कंपनी में नौकरी कर रहे हों या घर-परिवार में रह रहे हों, यह गुण हर स्थान पर आवश्यक है। केवल परीक्षाओं या प्रतियोगिताओं की ‘मेरिट लिस्ट’ में आ जाने से जीवन सफल नहीं होता। आज बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारी (IAS) भी तनावग्रस्त होकर आत्मघाती कदम उठा लेते हैं; ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि उनके पास शैक्षणिक योग्यता तो होती है, परंतु मन के भीतर सद्गुणों की ‘मेरिट’ नहीं होती।
शैक्षणिक योग्यता अलग बात है और आत्मा व मन के भीतर इन गुणों का प्रस्फुटन होना बिल्कुल अलग बात है। यह बदलाव ‘मेरी भावना’ का निरंतर चिंतन करने और अभ्यास में लाने से ही आता है।
द्वेष और वैर-भाव से मुक्ति
किसी के प्रति भी अपने मन में द्वेष या वैर-भाव नहीं रखना चाहिए। वैर रखने का सीधा अर्थ है—अपने संसार को बढ़ाना और आने वाले जन्म-जन्मांडों के लिए अपने कर्मों को बिगाड़ना।
जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों—किसी ने आपकी संपत्ति हड़प ली हो, या कभी माता-पिता ने ही घर से बाहर निकाल दिया हो (यद्यपि माता-पिता सदैव पूजनीय होते हैं, किंतु संसार में तरह-तरह की परिस्थितियाँ बनती हैं)—फिर भी बच्चे को अपने मन में उनके प्रति कृतज्ञता ही रखनी चाहिए।
आपको अपने शुभ कर्मों और पुण्य के उदय से जो मिलना है, वह अवश्य मिलेगा। बिना वजह संबंधों को बिगाड़कर या भीतर द्वेष भाव पालकर जन्म-जन्मांतर की दुश्मनी मोल नहीं लेनी चाहिए।
बड़ा दिल (उदारता) और क्षमा का भाव
द्वेष और वैर-भाव से बचकर जीने के लिए ‘बड़ा कलेजा’ (उदार हृदय) चाहिए। यह गुण हर किसी में सहजता से प्रकट नहीं होता।
जिस व्यक्ति के पास उदार और पवित्र दिल होता है, उसी के पास सही अर्थों में विवेकपूर्ण दिमाग भी होता है। दिल और दिमाग अलग-अलग नहीं हैं—जब दिल में सद्भावना और क्षमा होती है, तो बुद्धि भी सही दिशा में विचार करती है।
यदि जीवन में कभी आपके साथ किसी ने अन्याय भी किया हो या हक न दिया हो, फिर भी यदि आप अपने भीतर बदला लेने की भावना नहीं रखते, तो आपकी इस उच्च मानसिकता और धर्म-भाव से इतना पुण्य और आत्मबल संचित होता है कि आप जीवन में जिस भी क्षेत्र में कार्य करेंगे, वहाँ आपको सफलता और तरक्की प्राप्त होगी।
आधुनिक जीवन की विडंबना और मानसिक अवसाद
आज समाज में चारों ओर छोटी-छोटी बातों पर विवाद, कलह और यहाँ तक कि अत्यंत दुखद हिंसक घटनाएँ देखने को मिलती हैं। पढ़े-लिखे, संपन्न और प्रतिष्ठित परिवारों में भी ऐसे तनाव और आत्महत्याएँ देखने को मिलती हैं।
केवल किताबी पढ़ाई पर्याप्त नहीं: उच्च शिक्षा या बड़ा पद पा लेना ही जीवन जीने की कला नहीं है। जब व्यक्ति के भीतर सहनशीलता, कृतज्ञता और क्षमा जैसे जीवन-मूल्य नहीं होते, तो ज़रा सा तनाव या मान-प्रतिष्ठा का डर उसे मानसिक रूप से तोड़ देता है।
अहंकार और दूरी: आज बच्चे बड़े होते ही माता-पिता से कहने लगते हैं—“यह मेरी पर्सनल लाइफ है, आप इसमें दखल न दें। मैं वयस्क (Adult) हो चुका हूँ, मुझे मत सिखाएँ।”
बचपन में जिस माँ-बाप ने हाथों से गंदगी साफ की, रोते हुए को चुप कराया और हर कदम पर सहारा दिया, उनकी ममता को भूलकर ऐसा कहना उनके हृदय पर गहरा आघात पहुँचाता है।
गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे।
गुण ग्रहण का भाव और राम-दशरथ का आदर्श ‘मेरी भावना’ की यह पंक्ति हमें सिखाती है कि हमारी दृष्टि दूसरों के दोष ढूँढने में नहीं, बल्कि उनके गुणों को अपनाने में होनी चाहिए।
प्रभु राम का अनुकरणीय उदाहरण
हम राम-राम तो जपते हैं, परंतु उनके जीवन के आदर्शों को अपने व्यवहार में नहीं उतारते:
जब महाराज दशरथ ने राम को राजा बनाने की घोषणा के बाद एक ही रात में 14 वर्ष का वनवास दे दिया, तब राम चाहते तो तर्क कर सकते थे, विद्रोह कर सकते थे या पिता के निर्णय पर सवाल उठा सकते थे।
परंतु राम ने एक क्षण के लिए भी पिता के प्रति द्वेष या अन्याय का भाव नहीं लाया। उन्होंने हंसते-हंसते राजपाट छोड़कर वन गमन स्वीकार किया।
यही वास्तविक ‘गुण ग्रहण’ और ‘पित्र-भक्ति’ का पराकाष्ठा रूप है। पिता या परिस्थिति का क्या दोष था, उसे देखने के बजाय राम ने केवल अपने कर्तव्य और आदर भाव को सर्वोपरि रखा।
यदि हम भी अपनी दृष्टि को दूसरों के दोषों से हटाकर उनके गुणों की ओर मोड़ लें, तो जीवन से सारा तनाव और वैर स्वतः समाप्त हो जाएगा।
एक सुंदर प्रसंग इस भावना को स्पष्ट करता है।
कहा जाता है कि एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपने साथियों के साथ भ्रमण कर रहे थे। मार्ग में उन्हें एक अत्यंत बीमार और गंदगी से लथपथ कुत्ता दिखाई दिया। उसके शरीर से दुर्गंध आ रही थी। साथ चल रहे व्यक्ति ने उसे देखकर घृणा व्यक्त करते हुए कहा, “यह कितना गंदा और घिनौना है!”
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले—
“देखो, इसके दाँत कितने सुंदर और चमकदार हैं।”
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जहाँ सामान्य व्यक्ति केवल दोष देखता है, वहीं श्रेष्ठ दृष्टि वाला व्यक्ति उसी स्थान पर कोई-न-कोई गुण खोज लेता है।
हर व्यक्ति में कोई न कोई गुण अवश्य होता है
हमें अपने मन में यह बात स्थिर कर लेनी चाहिए कि संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्णतः दोषों से भरा हुआ नहीं होता।
कोई निर्धन हो सकता है, रोगी हो सकता है, क्रोधी हो सकता है, कंजूस हो सकता है, स्वार्थी या अनेक दुर्गुणों से युक्त हो सकता है; फिर भी उसके भीतर कोई-न-कोई सद्गुण अवश्य होता है। हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि बार-बार उसी गुण को देखने की आदत विकसित करें। जब हमारी दृष्टि गुणों पर टिकेगी, तब दोष अपने-आप गौण हो जाएँगे। यही गुण-ग्राहक दृष्टि आत्मविकास की सबसे बड़ी पहचान है।
बड़ा दिल (उदारता) और क्षमा का भाव
वैर-भाव और द्वेष से मुक्त होकर जीने के लिए एक उदार हृदय (बड़ा कलेजा) होना आवश्यक है। जब दिल में पवित्रता और आदर का भाव होता है, तो बुद्धि भी सद्मार्ग पर चलती है। यदि जीवन में कभी आपके साथ किसी ने अन्याय किया हो या अधिकार न दिया हो, तब भी यदि आप बदला लेने की भावना नहीं रखते, तो उस क्षमा-भाव से इतना पुण्य और आत्मबल संचित होता है कि आपके हर कार्य सिद्ध होने लगते हैं।
आधुनिक समाज, अहंकार और रिश्तों में दूरी
आज चारों ओर छोटी-छोटी बातों पर तनाव, विवाद और पारिवारिक कलह बढ़ते जा रहे हैं। उच्च शिक्षित और प्रतिष्ठित परिवारों में भी सहनशीलता और कृतज्ञता के अभाव में मानसिक अवसाद देखने को मिलता है। अक्सर बच्चे बड़े होते ही माता-पिता से कह देते हैं:
“यह मेरी लाइफ है, आप इसमें दखल न दें। मुझे मत सिखाएँ, मैं वयस्क (Adult) हूँ और अपने निर्णय खुद ले सकता हूँ।”
बचपन में जिस माता-पिता ने दिन-रात एक करके सेवा की, रोते हुए संभाला और हर खुशी दी, उनके प्रति ऐसी भाषा बोलना उनके हृदय पर गहरा आघात पहुँचाती है। यह व्यवहार कृतघ्नता की श्रेणी में आता है।
गुण ग्रहण का भाव और प्रभु राम का आदर्श
राम के जीवन का सबसे बड़ा आदर्श यही है कि जब महाराज दशरथ के वचन पर एक ही रात में उनका राज्याभिषेक रोककर 14 वर्ष का वनवास तय हुआ, तब राम ने पिता के इस निर्णय को अन्याय नहीं माना। उन्होंने किसी प्रकार का विद्रोह या शिकायत किए बिना सहर्ष वनवास स्वीकार किया।
यदि घर-परिवार में माता-पिता से कोई निर्णय विषम भी हो जाए, तो उनकी परिस्थिति को समझना चाहिए, न कि उनके प्रति द्वेष या शत्रुता का भाव पालना चाहिए।
मानसिक सुदृढ़ता और ध्यान (Meditation) का महत्व
दूसरों के दोष न देखकर केवल गुण देखने की दृष्टि विकसित करने के लिए शारीरिक बल (Gym) से अधिक मानसिक और आत्मिक बल की आवश्यकता है। मानसिक रूप से सुदृढ़ बनने का सबसे श्रेष्ठ मार्ग ध्यान और शुभ भावनाओं का बारंबार चिंतन करना है।
‘मेरी भावना’ पर आधारित ध्यान साधना
सुखासन में सीधे बैठें और ज्ञान मुद्रा धारण करें।
- तीन बार ॐ अर्हम् नमः का उच्चारण करें
- गहरी-लंबी सांस लें और मन को शांत एवं निश्चिंत करें
- अपने हृदय के पास दोनों हाथ जोड़कर यह भाव भाएँ
गुणी जनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे। बने जहाँ तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे॥
होऊँ न कृतघ्नी कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे। गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे॥
दैनिक संकल्प
- मैं अपने से बड़ों और गुरुजनों के उपकार को सदैव स्मरण में रखूँगा।
- मेरी दृष्टि किसी के दोषों पर न जाकर केवल उनके गुणों पर जाएगी।
- जिन्होंने बचपन से मेरे ऊपर उपकार किए हैं, मैं उनके प्रति सदैव हृदय से कृतज्ञ रहूँगा।
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