मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 204 to 211
श्लोक ( Shlok ) 204 – 207
तथा तीर्थगणाधीशशेषकेवलिसद्वपुः । संस्कारमहिताग्नीन्द्रमुकुटोत्थाग्निषु त्रिषु ॥ २०४ ॥परमात्मपदं प्राप्तान्निजान् पितृपितामहान् । उद्दिश्य भाक्तिकाः पुष्पगन्धाक्षतफलादिभिः ॥ २०५ ॥आर्योपासकवेदोक्तमन्त्रोच्चारणपूर्वकम् । दानादिसत्क्रियोपेता गेहाश्रमतपस्विनः ॥ २०६ ॥नित्यमिष्ठेन्द्रसामानिकादिमान्यपदोदिताः । लौकान्तिकाश्च भूत्वामरद्विजा ध्वस्तकल्मषाः ॥ २०७ ॥
इसके सिवाय तीर्थंकर गणधर तथा अन्य केवलियों के उत्तम शरीरके संस्कारसे पूज्य एवं अग्निकुमार इन्द्रके मुकुटसे उत्पन्न हुई तीन अग्नियाँ हैं उनमें अत्यन्त भक्त तथा दान आदि उत्तमोत्तम क्रियाओंको करनेवाले तपस्वी, गृहस्थ, परमात्मपदको प्राप्त हुए अपने पिता तथा प्रपितामहको उद्देशकर ऋपिश्रणीत वेदमें कहे मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए जो अक्षत गन्ध फल आदिके द्वारा आहुति दी जाती है वह दूसरा आर्ष यज्ञ कहलाता है। जो निरन्तर यह यज्ञ करते हैं वे इन्द्र सामानिक आदिमाननीय पदोंपर अधिष्ठित होकर लौकान्तिक नामक देव ब्राह्मण होते हैं और अन्तमें समस्त पापोंको नष्टकर मोक्ष प्राप्त करते हैं ।। २०४-२०७॥
“Furthermore, there are three sacred fires that are born from the crowns of the Agnikumāra Indras and rendered worshipful by the consecration of the supreme bodies of the Tīrthaṅkaras, Gaṇadharas, and other Kevalīs (liberated omniscient beings).
In those fires, devout and ascetic householders (Gṛhastha), who perform the highest virtuous deeds such as charity (Dāna), offer oblations of unbroken rice (Akṣata), fragrant paste (Gandha), and fruits while chanting mantras prescribed in the Vedas composed by the ancient Rishis. This offering is made with devotion, intending to honor their fathers and grandfathers who have already attained the supreme state of the Soul (Paramātmapada).
This ritual is known as the second type of sacrifice: the Ārṣa Yajña (the Rishi-sanctioned, noble sacrifice). Those who continuously perform this sacrifice sit upon highly honorable positions in heaven, such as Sāmānika (equals to Indra), and become celestial beings known as Laukāntika Devas (divine Brahmans of the cosmos). Ultimately, they destroy all their remaining karmic sins and attain absolute Liberation (Mokṣa).” ॥ 204-207 ॥
श्लोक ( Shlok ) 208 – 209
द्वितीय ‘ज्ञानवेदस्य सामान्येन सतः सदा । द्रव्यक्षेत्रादिभेदेन कर्तृणां तीर्थदेशिनाम् ॥ २०८ ॥ पञ्चकल्याणभेदेषु देवयज्ञविधानतः । चितपुण्यफलं भुक्त्वा क्रमेणाप्स्यन्ति सिद्धताम् ॥ २०९ ॥
दूसरा श्रुतज्ञानरूपी वेद सामान्यकी अपेक्षा सदा विद्यमान रहता है, उसके द्रव्य क्षेत्र आदिके भेदसे अथवा तीर्थंकरोंके पश्च कल्याणकोंके भेदसे अनेक भेद हैं, उन सबके समय जो श्री जिनेन्द्रदेवका यज्ञ अर्थात् पूजन करते हैं वे पुण्यका सञ्चय करते हैं और उसका फल भोगकर क्रम क्रमसे सिद्ध अवस्था – मोक्ष प्राप्त करते हैं ।। २०८-२०९ ॥
“Furthermore, the second type of Veda is Śrutajñāna (the scriptural wisdom transmitted through divine hearing), which from a general perspective (Sāmānya) exists eternally. This Veda has numerous sub-divisions based on variations of time, space, and circumstances (Dravya, Kṣetra, Kāla, Bhāva), or based on the Pañca-Kalyāṇaka (the five auspicious life-events) of the Tīrthaṅkaras.
Those who perform the Yajña—meaning the grand worship (Pūjana)—of Śrī Jinendra Deva (the Conqueror Lord) in accordance with these sacred scripts, accumulate immense spiritual merit (Puṇya). After experiencing the celestial fruits of that merit, they gradually ascend to the state of perfection (Siddha-avasthā) and attain absolute Liberation (Mokṣa).” ॥ 208-209 ॥
श्लोक ( Shlok ) 210
यागोऽयमृषिभिः प्रोक्तो यत्यगारिद्वयाश्रयः । आद्यो मोक्षाय साक्षात्स्यात्स्यात्परम्परया परः ॥२१०॥
इस प्रकार ऋषियोंने यह यज्ञ मुनि और गृहस्थके आश्रमसे दो प्रकारका निरूपण किया है इनमेंसे पहला मोक्षका साक्षात् कारण है और दूसरा परम्परासे मोक्षका कारण है ।। २१० ।।
“In this manner, the ancient Rishis (seers) have described this Yajña as being of two distinct types based on the stages of life (Āśramas): that of the Monk (Muni) and that of the Householder (Gṛhastha). Out of these two, the first one (the Monk’s internal sacrifice) is the direct cause of Liberation (Mokṣa), while the second one (the Householder’s ritual worship) is the indirect or sequential (Paramparā) cause of Liberation.” ॥ 210 ॥
श्लोक ( Shlok ) 211
एवं परम्परायातदेव यज्ञविधिष्विह । द्विलोकहितकृत्येषु वर्तमानेषु सन्ततम् ॥ २११ ॥
इस प्रकार यह देवयज्ञकी विधि परम्परासे चली आई है, यही दोनों लोकोंका हित करनेवाली है और यही निरन्तर विद्यमान रहती है ।। २११ ॥
“This very method of divine sacrifice (Deva-Yajña) has descended through an unbroken, eternal tradition. This alone is the true benefactor of both the worlds (the present earthly life and the afterlife), and this alone exists eternally.” ॥ 211 ॥
श्लोक 212 से 222
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203
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