मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 43 to 52
श्लोक ( Shlok ) 43
तदा धुमुनयः प्राप्य प्रस्तुतस्तुतिविस्तराः १ । अनुमत्य मतं तस्य ययुः खेन तिरोहिताः ॥ ४३ ॥
उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर विस्तारके साथ उनकी स्तुति की, उनके दीक्षा लेनेके विचारका अनुमोदन किया और यह सब कर वे आकाश-मार्गसे अदृश्य हो गये ॥ ४३ ॥
“At that very moment, the Laukāntika deities descended, offered elaborate praises to the Lord, and wholeheartedly expressed their devout approval of his decision to embrace monastic initiation (Dīkṣā). Having performed this sacred duty, they vanished through the pathways of the sky.” ll 43 ll
श्लोक ( Shlok ) 44
तीर्थकृत्स्वपि केषाञ्चिदेवासीदीदृशी मतिः । दुष्करो त्रिषयत्यागः कौमारे महतामपि ॥ ४४ ॥
अन्य साधारण मनुष्योंकी बात जाने दो तीर्थंकरोंमें भी किन्हीं तीर्थंकरोंकी ही ऐसी बुद्धि होती है सो ठीक ही है क्योंकि कुमारावस्थामें विषयोंका त्याग करना महापुरुषोंके लिए भी कठिन कार्य है ।॥ ४४ ॥
“Let alone ordinary human beings, even among the Tirthankaras, only a select few possess such intellect (or wisdom). This is indeed fitting, for renouncing worldly pleasures during youth is an incredibly arduous task, even for great men. || 44 ||”
श्लोक ( Shlok ) 45 – 48
इति भक्त्या कृतालापा नभोभागे परस्परम् । परनिः क्रान्तकल्याणमहाभिषवणोत्सवम् ॥ ४५ ॥सोत्सवाः प्रापयन्ति स्म कुमारममरेश्वराः । कुमारोऽपि जयन्ताभिधानं यानमधिष्ठितः ।॥ ४६ ॥गत्वा श्वेतवनोद्यानमुपवासद्वयान्वितः । स्वजन्ममासनक्षत्रदिनपक्षसमाश्रितः ॥ ४७ ।।कृतसिद्धनमस्कारः परित्यक्तोपधिद्वयः । सायाद्धे त्रिशतैर्भूपैः सह सम्प्राप्य संयमम् ॥ ४८ ॥
इस प्रकार भक्तिपूर्वक आकाश में वार्तालाप करते एवं उत्सवसे भरे इन्द्रोंने मल्लिनाथ कुमारको दीक्षाकल्याणकके समय होनेवाला अभिषेक-महोत्सव प्राप्त कराया – उनका दीक्षाकल्याणक-सम्बन्धी महाभिषेक किया तथा मल्लिनाथ कुमार भी जयन्त नामक पालकी पर आरूढ़ होकर श्वेतवनके उद्यानमें पहुँचे। वहाँ उन्होंने दो दिन के उपवासका नियम लेकर अपने जन्मके ही मास नक्षत्र दिन और पक्षका आश्रय ग्रहण कर अर्थात् अगहन सुदी एकादशीके दिन अश्विनी नक्षत्रमें सायंकालके समय सिद्ध भगवान्को नमस्कार किया, बाह्याभ्यन्तर- दोनों प्रकारके परिग्रहोंका त्याग कर दिया और तीन सौ राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया ।। ४५-४८ ॥
“In this manner, while conversing devoutly in the sky and filled with celebratory joy, the Indras solemnized the Grand Abhisheka (consecration ceremony) pertaining to the Diksha Kalyanaka (initiation auspicious event) for Prince Mallinatha. Thereafter, Prince Mallinatha, ascending the palanquin named Jayanta, arrived at the Shvetavana garden. There, observing the vow of a two-day fast and choosing the exact month, lunar asterism (Nakshatra), day, and fortnight of his birth—that is, in the evening of Agahan Sudi Ekadashi under the Ashwini Nakshatra—he bowed to the Siddha Bhagavans, renounced both external and internal attachments, and embraced self-restraint (Sanyama) along with three hundred kings. || 45-48 ||”
श्लोक ( Shlok ) 49 – 50
संयमप्रत्ययोत्पन्नचतुर्थज्ञानभास्वरः । मार्गोऽयमिति सञ्चिन्त्य सम्यग्ज्ञानप्रचोदितः ॥ ४९ ॥मिथिलां प्राविशत्तस्मै नन्दिषेणनराधिपः । प्रदाय प्रासुकाहारं प्राप द्युन्नद्युतिः शुभम् ॥ ५० ॥
वे उसी समय संयमके कारण उत्पन्न हुए मनःपर्ययज्ञानसे देदीप्यमान हो उठे । ‘यह सनातन मार्ग है’ ऐसा विचार कर सम्यग्ज्ञानसे प्रेरित हुए महामुनि मल्लिनाथ भगवान् पारणाके दिन मिथिलापुरीमें प्रविष्ट हुए। वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले नन्दिषेण नामके राजाने उन्हें प्रासुक आहार देकर शुभ पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। ४९-५० ।।
“At that very moment, they/He shone brilliantly with the Manahparyaya Jnana (mind-reading knowledge) born out of their self-restraint. Reflecting that ‘this is the eternal path’ and inspired by right knowledge (Samyag-jnana), the great ascetic Lord Mallinatha entered the city of Mithilapuri on the day of breaking the fast (Parana). There, King Nandishena, who possessed a golden complexion, offered them pure and suitable food (Prasuka Ahara) and thereby attained the five auspicious wonders (Panchashcharya). || 49-50 ||”
श्लोक ( Shlok ) 51 – 52
“दिनषट्के गते तस्य छाग्द्मस्थ्ये प्राक्तने वने । अधस्तरोरशोकस्य त्यक्ताहद्वितयाद् गतेः ॥ ५१ ॥पूर्वाहे जन्मनीवात्राप्यस्य सत्सु दिनादिषु । घातित्रितयनिर्णाशात्केवलावगमोऽभवत् ॥ ५२ ॥
छद्मस्थावस्थाके छह दिन व्यतीत हो जानेपर उन्होंने पूर्वोक्त वनमें अशोक वृक्षके नीचे दो दिनके लिए गमनागमनका त्याग कर दिया-दो दिनके उपवासका नियम ले लिया। वहीं पर जन्मके समान शुभ दिन और शुभ नक्षत्र आदिमें उन्हें प्रातःकालके समय ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन घातिया कर्मोंका नाश होनेसे केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ।॥ ५१-५२ ॥
“When six days of the state of non-omniscience (Chadmasthavastha) had passed, He ceased all movement for two days beneath the Ashoka tree in the aforementioned forest, taking the vow of a two-day fast. There, on an auspicious day and under an auspicious lunar asterism (Nakshatra) identical to those of His birth, in the morning hours, He attained omniscience (Kevalajnana) due to the absolute destruction of the three destructive karmas: Jnanavarana (knowledge-obscuring), Darshanavarana (perception-obscuring), and Antaraya (obstructing) karmas. || 51-52 ||”
श्लोक 53 से 62
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