शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361 | श्लोक 362 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 393
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 394 to 404
श्लोक ( Shlok ) 394
नृपं साभिनिवेद्यात्मदृष्ट स्वमावलीं क्रमात् । तत्फलान्यप्यबोधिष्ट राज्ञः सावधिलोचनात् ॥३९४॥
उसने अपने द्वारा देखी हुई स्वप्नावली क्रम-क्रमसे राजाको सुनाई और अवधिज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले राजासे उनका फल मालूम किया ॥ ३९४ ॥
She narrated the entire sequence of the dreams she had witnessed to the king, one by one, and learned of their prophetic fruits from him, who possessed the divine eye of clairvoyance (Avadhijnana). || 394 ||
श्लोक ( Shlok ) 395
स्वर्गात्तदैव देवेन्द्राः सह देवैश्चतुर्विधैः । स्वर्गावतारकल्याणं सम्प्राप्य समुपादयन् ॥ ३९५ ॥
उसी समय चतुर्णिकायके देवोंके साथ स्वर्गसे इन्द्र आये और आकर गर्भावतारकल्याणक करने लगे ॥ ३९५ ।।
At that very moment, Lord Indra descended from heaven accompanied by the celestial gods of the four categories, and upon arriving, they began to celebrate the grand Garbha-kalyanaka—the auspicious festival commemorating the divine descent into the womb. || 395 ||
श्लोक ( Shlok ) 396 – 398
त्रिविष्टपेश्वरे गर्ने वर्द्धमाने महोदयैः । अभ्येत्य नवमं मासं माता त्रिजगदीशितुः ॥ ३९६ ॥मासान् पञ्चदश प्राप्तरत्नवृष्ठ्याऽमरार्चना । शुचौ कृष्णचतुर्दश्यां याम्ययोगे निशात्यये ॥ ३९७ ॥नन्दनं जगदानन्दसन्दोहमिव सुन्दरम् । असूतामलसद्बोधत्रितयोज्ज्वललोचनम् ॥ ३९८ ॥
उधर रानीके गर्भमें इन्द्र बड़े अभ्युदयके साथ बढ़ने लगा और इधर त्रिलोकीनाथकी माता रानी पन्द्रह माह तक देवोंके द्वारा की हुई रत्नवृष्टि आदि पूजा प्राप्त करती रही। जब नवाँ माह आया तब उसने ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशीके दिन याम्ययोगमें प्रातःकालके समय पुत्र उत्पन्न किया। वह पुत्र ऐसा सुन्दर था मानो समस्त संसारके आनन्दका समूह ही हो। साथ ही अत्यन्त निर्मल मति-श्रुत-अवधिज्ञानरूपी तीन उज्ज्वल नेत्रोंका धारक भी था ॥ ३९६-३९८ ॥
On one hand, the Lord of the Three Worlds (Indra of the spiritual realm) began to grow with immense radiance inside the queen’s womb; on the other hand, for a span of fifteen months, the mother of the Lord received grand offerings from the celestial gods, including the miraculous raining down of precious gems. When the ninth month arrived, on the fourteenth day of the dark fortnight of the month of Jyeshtha (Jyeshtha Krishna Chaturdashi), under the auspicious planetary alignment of the south (Yamya-yoga) at the hour of dawn, she gave birth to a son. That infant son was so breathtakingly beautiful that he seemed like the very personification of the entire universe’s joy gathered into one form. Furthermore, he was born already possessing three flawlessly pure, radiant eyes of divine knowledge—namely, Mati-jnana (sensory knowledge), Shruta-jnana (scriptural/artieulated knowledge), and Avadhijnana (clairvoyant perception). || 396-398 ||
श्लोक ( Shlok ) 399
शङ्खभेरीगजारातिघण्टारावावबोधिताः । जैनं ४ जन्मोत्सवं देवाः सम्भूय समवर्द्धयन् ॥ ३९९ ॥
शङ्खनाद, भेरीनाद, सिंहनाद और घंटानादसे जिन्हें जिन-जन्मकी सूचना दी गई है ऐसे चारों निकायोंके देवोंने मिल कर जिनेन्द्र भगवान्का जन्मोत्सव बढ़ाया ॥ ३९९ ॥
Upon being heralded of the Jinendra’s divine birth by the resounding blasts of conch shells, the deep thunder of war-drums, the roaring shouts of victory, and the rhythmic pealing of sacred bells, the celestial gods of all the four categories assembled together to magnify the grand birth-festival (Janma-kalyanaka) of the Lord. || 399 ||
श्लोक ( Shlok ) 400 – 404
तदा शची महादेवी प्रद्योतितदिगन्तरा । गर्भगेहं प्रविश्योच्चैर्मायानिद्रावशीकृताम् ॥ ४०० ॥जिनेन्द्रजननीमैरां कुमारसहितां ‘सतीम् । ‘परीत्य प्रप्रणम्याच्या मायाविष्कृतबालका॥ ४०१ ॥त्रिलोकमातुः पुरतो निवेश्य परमेश्वरम् । कुमारवरमादाय विश्वामरनमस्कृतम् ॥ ४०२ ॥ मृदुबाहुयुगान्नीत्या स्वपतेरकरोत्करे । ऐरावतगजस्कन्धमारोप्य मरुतां पतिः ॥ ४०३ ॥पुरेव पुरुदेवं तं सुराद्रेर्मस्तकार्पितम् । अभिषिच्याम्बुभिः क्षीरमहाम्भोनिधिसम्भवैः ॥ ४०४ ॥
उस समय दिशाओंके मध्यको प्रकाशित करने– बाली महादेवी इन्द्राणीने गर्भ-गृहमें प्रवेश किया और कुमारसहित पतिव्रता जिनमाता ऐराको मायामयी निद्राने वशीभूत कर दिया। उसने पूजनीय जिनमाताको प्रदक्षिणा देकर प्रणाम किया और एक मायामयी बालक उसके सामने रख कर जिन्हें सर्वदेव नमस्कार करते हैं ऐसे श्रेष्ठ कुमार जिन-बालकको उठा लिया तथा अपनी दोनों कोमल भुजाओंसे ले जाकर इन्द्रके हाथों में सौंप दिया। इन्द्रने उन्हें ऐरावत हाथीके कन्धे पर विराजमान किया और पहले जिस प्रकार भगवान् आदिनाथको सुमेरु पर्वतके मस्तक पर विराजमान कर क्षीर-महासागरके जलसे उनका अभिषेक किया था इसी प्रकार इन्हें भी सुमेरु पर्वतके मस्तक पर विराजमान कर क्षीर-महासागरके जलसे इनका अभिषेककिया ।।४०० -४०४ ॥
At that moment, Queen Indrani, whose radiant presence illuminated the vast expanses of all directions, entered the inner delivery chamber and placed the deeply virtuous mother, Queen Aira, under the spell of a divine, illusory sleep (Mayamayi Nidra). She circumambulated the venerable mother in deep reverence, prostrated before her, and placed an illusory infant by her side. Then, uplifting the supreme Jinendra child—whom all the gods bow down to—she carried Him gently in her soft arms and placed Him into the hands of Indra.
Lord Indra then reverently seated the infant Lord upon the shoulder of the celestial elephant, Airavata. Just as the gods had once seated Lord Adinatha upon the peak of Mount Sumeru to perform His divine bath with the sacred waters of the Milk Ocean (Kshira-Sagara), they likewise seated this infant Lord upon the crest of Mount Sumeru and performed His grand birth-anointment (Janma-Abhisheka). || 400-404 ||
श्लोक 405 से 412
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