अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 132 to 143
श्लोक ( Shlok ) 132
श्रुत्वा यथावन्नैमित्तिकोक्तं चेतसि धारयन् । कृत्वा परशुरामोऽपि दानशालां सुभोजनाम् ॥ १३२ ॥
निमित्त ज्ञानीका कहा हुआ सुनकर परशुरामने उसका चित्तमें विचार किया और उत्तम भोजन करानेवाली दानशाला खुलवाई ।। १३२ ।।
Hearing the words of the astrologer, Parashurama pondered over them in his mind and opened an alms-house (danshala) that served excellent food. (132)
श्लोक ( Shlok ) 133 – 134
तत्परीक्षार्थमायान्तु येऽत्र विश्वणनार्थिनः । इत्याघोषयति स्मैतत् श्रुत्वा तेऽपि समागमन् ॥ १३३ ॥तेषां पात्रस्थतइन्तान् सम्प्रदर्थ्य परीक्षितुम् । तान् भोजयति भूपाले प्रत्यहं स्वनियोगिभिः ॥॥१३४ ॥
साथमें यह घोषणा करा दी कि जो भोजनाभिलाषी यहाँ आवें उन्हें पात्रमें रक्खे हुए दाँत दिखलाकर भोजन कराया जावे। इस प्रकार शत्रुकी परीक्षाके लिए वह प्रतिदिन अपने नियोगियों- नौकरोंके द्वारा अनेक पुरुषोंको भोजन कराने लगा ॥ १३३-१३४ ॥
Along with this, he made an announcement that whoever came there desiring food should be served only after being shown the teeth kept in a vessel. In this manner, to test and identify his enemy, he began to feed numerous men every day through his appointed servants. (133-134)
श्लोक ( Shlok ) 135 – 137
पितुर्भरणवृत्तान्तं स्वमातुरवबुद्धवान् । स्वचक्रेशित्वसम्प्राप्तिकालायानं च तत्त्वतः ॥ १३५ ॥ सुसिद्धमुनिनिर्दिष्टसंवृत्तात्मस्वरूपकः । परिव्राजकवेषेण स्वरहस्यार्थवेदिना ॥ १३६ ॥राजपुत्रसमूहेन सुभौमोऽध्यागमत्पुरम् । सभाग्यांश्चोदयत्येव काले कल्याणकृद्विधिः ॥ १३७ ॥
इधर सुभौमने अपनी मातासे अपने पिताके मरनेका समाचार जान लिया, वास्तवमें उसका चक्र वर्तीपना प्राप्त होनेका समय आ चुका था, अतिशय निमित्तज्ञानी सुबन्धु मुनिके कहे अनुसार उसे अपने गुप्त रहनेका भी सब समाचार विदित हो गया अतः वह परिव्राजकका वेष रखकर अपने रहस्यको समझनेवाले राजपुत्रोंके समुहके साथ अयोध्या नगरकी ओर चल पड़ा सो ठीक ही है क्योंकि कल्याणकारी दैव भाग्यशाली पुरुषोंको समय पर प्रेरणा दे ही देता है ॥ १३५-१३७ ।।
Meanwhile, Subhauma learned the news of his father’s death from his mother. In truth, the time for him to attain the status of a Chakravarti (universal monarch) had already arrived, and according to the words of the highly proficient astrologer-sage Subandhu, he also became aware of all the reasons behind his secret upbringing. Therefore, donning the garb of a wandering ascetic (parivrajaka), he set out toward the city of Ayodhya along with a group of princes who understood his secret. And this is indeed fitting, for benevolent destiny inevitably guides fortunate men with timely inspiration. (135-137)
श्लोक ( Shlok ) 138
तदा साकेतवास्तव्यदेवताक्रन्दनं महत् । महीकम्पो दिवा तारादृष्ट्यादिरभवत्पुरे ॥ १३८ ॥
उस समय अयोध्या नगरमें रहनेवाले देवता बड़े जोरसे रोने लगे, पृथिवी काँप उठी और दिनमें तारे आदि दिखने लगे ।। १३८ ॥
At that moment, the deities residing in the city of Ayodhya began to weep loudly, the earth trembled, and stars became visible even during the day. (138)
श्लोक ( Shlok ) 139 – 143
‘तथागत्य कुमारोऽसौ शालां भोक्तुमुपागतः । तमाहूय निवेश्योच्चैरासने इतभूभुजाम् ॥ १३९ ॥नियुक्ता दर्शयन्ति स्म दन्तांस्तस्यानुभावतः । ३ कलभान्नं तदासंस्ते तद्दृष्ट्वा परिचारिणः ॥ १४० ॥व्यजिज्ञपन्नृपं सोऽपि स धृत्वा नीयतामिति । समर्थान्प्राहिणोद् भृत्यांस्तेऽपि तं प्राप्य निष्ठुराः ॥१४१॥आहूतोऽसि महीशेन त्वमेह्याश्वित्युदाहरन् । नाहं यूयमिवास्यादां जीविकां तत्तदन्तिकीम् ॥ १४२ ॥किमित्येष्यामि यातेति तजितास्तत्प्रभावतः । भटा भयज्वरग्रस्ता ययुः सर्वे यथायथम् ॥ १४३ ॥
सुभौम कुमार भोजन करनेके लिए जब परशुरामकी दानशालामें पहुँचे तो वहांके कर्मचारियोंने बुलाकर उन्हें उच्च आसनपर बैठाया और मारे हुए राजाओंके संचित दाँत दिखलाये परन्तु सुभौमके प्रभावसे वे सब दाँत शालि चावलोंके भातरूपी हो गये। यह सब देखकर वहांके परिचारकोंने राजाके लिए इसकी सूचना दी। राजाने भी ‘उसे पकड़कर लाया जावे’ यह कहकर मजबूत नौकरोंको भेजा। अत्यन्त क्रूर प्रकृतिवाले भृत्योंने सुभौमके पास जाकर कहा कि तुम्हें राजाने बुलाया है अतः शीघ्र चलो। सुभौमने उत्तर दिया कि मैं तुम लोगोंके समान इससे नौकरी नहीं लेता फिर इसके पास क्यों जाऊँ ? तुम लोग जाओ’ ऐसा कहकर उसने उनकी तर्जना की, उसके प्रभावसे वे सब नौकर भयरूपी ज्वरसे ग्रस्त हो गये और सब यथास्थान चले गये ॥ १३९-१४३ ।।
When Prince Subhauma arrived at Parashurama’s alms-house (danshala) to have food, the employees there called him over, seated him on an elevated seat, and showed him the collected teeth of the slain kings. However, by the spiritual power and influence of Subhauma, all those teeth transformed into cooked Shali rice.
Seeing all this, the attendants there reported the matter to the king. The king also sent strong servants, saying, “Let him be captured and brought here.” The servants, who were of an extremely cruel nature, approached Subhauma and said, “The king has summoned you, so come quickly.”
Subhauma replied, “I do not take up employment under him like you people do, so why should I go to him? You may leave.” Saying this, he rebuked and threatened them. By his immense power, all those servants became afflicted with a fever of fear, and they all returned to their respective places. (139-143)
श्लोक 144 से 151
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