अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 144 to 151
श्लोक ( Shlok ) 144
श्रुत्वा परशुरामस्तत्कुद्ध्वा सन्नद्धसाधनः । समागतस्तदालोक्य सुभौमोऽभिमुखं ययौ ॥ १४४ ॥
यह सुनकर परशुराम बहुत कुपित हुआ। वह युद्धके सब साधन तैयार कर आ गया । उसे आया देख सुभौम भी उसके सामने गया ॥ १४४ ॥
“Hearing this, Parashurama became very angry. He prepared all his weapons of war and arrived. Seeing him arrive, Subhauma also went out to face him.”144
श्लोक ( Shlok ) 145 – 149
बलं परशुरामः स्वं तेन योद्धं ‘सहादिशत् । जन्मप्रभृति तत्पाता भरतव्यन्तराधिपः ॥ १४५ ॥रक्षित्वाऽस्थात्कुमारं तं तस्मात्तस्याग्रतो बलम् । स्थातुमक्षममालोक्य स्वयं गजमचोदयत् ॥ १४६ ॥सहसैव सुभौमस्याप्यभवद् गन्धवारणः । चक्रं च सन्निधौ दिव्यं सार्वभौमत्वसाधनम् ॥ १४७ ॥ सहस्त्रदेवतारक्ष्यं किन्न स्यात् सम्मुखे विधौ । वारणेन्द्रं समारुह्य पूर्वाद्रिमिव भास्करः ॥ १४८ ॥सहस्त्रारं करे कृत्वा कुमारश्चक्रमाबभौ । तं दृष्ट्वा रुष्टवान् हन्तुं जामदग्न्योऽभ्युपागमत् ॥ १४९ ॥
परशुरामने उसके साथ युद्ध करनेके लिए अपनी सेनाको आज्ञा दी। परन्तु भरतक्षेत्रके अधिपति जिस व्यन्तरदेवने जन्मसे लेकर सुभौमकुमारकी रक्षा की थी उसने उस समय भी उसकी रक्षा की अतः परशुरामकी सेना उसके सामने नहीं ठहर सकी। यह देखकर परशुरामने सुभौमकी ओर स्वयं अपना हाथी बढ़ाया परन्तु उसी समय सुभौमके भी एक गन्धराज-मदोन्मत्त हाथी प्रकट हो गया। यही नहीं, एक हजार देव जिसकी रक्षा करते हैं और जो चक्रवर्तीपनाका साधन है ऐसा देवोपनीत चक्ररत्न भी पास ही प्रकट हो गया सो ठीक ही है क्योंकि भाग्यके सन्मुख रहते हुए क्या नहीं होता ? जिस प्रकार पूर्वाचल पर सूर्य आरूढ़ होता है उसी प्रकार उस गजेन्द्रपर आरूढ़ होकर सुभौमकुमार निकला। वह हजार आरे-वाले चक्ररत्नको हाथमें लेकर बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा था। उसे देखकर परशुराम बहुत ही कुपित हुआ और सुभौमको मारनेके लिए सामने आया ।। १४५-१४९ ॥
Parashurama ordered his army to wage war against him. However, the Vyantara Deva (a celestial deity) who ruled over Bharatakshetra and had protected Prince Subhauma since birth, protected him at that moment as well; hence, Parashurama’s army could not stand against him. Seeing this, Parashurama himself advanced his elephant toward Subhauma, but at that very instant, an intoxicated, majestic elephant (Gandharaja) manifested for Subhauma as well. Not only that, the divine Chakra-ratna (the sacred discus)—which is protected by a thousand deities and serves as the ultimate instrument of a Chakravarti (universal ruler)—also appeared nearby. And this is only fitting, for what is impossible when fortune smiles upon someone?
Just as the sun rises upon the eastern mountain, Prince Subhauma emerged, mounted upon that king of elephants. He looked extraordinarily radiant, holding the thousand-spoked Chakra-ratna in his hand. Seeing him, Parashurama grew immensely furious and advanced forward to slay Subhauma.” (145–149)
श्लोक ( Shlok ) 150
चक्रेण तं कुमारोऽपि लोकान्तरमजीगमत् । अकरोच्चान्यसैन्यस्य तदैवाभयघोषणाम् ॥ १५० ॥
सुभौम कुमारने भी चक्र-द्वारा उसे परलोक भेज दिया – मार डाला तथा वाकी बची हुई सेनाके लिए उसी समय अभय-घोषणा कर दी ।। १५० ।।
“Prince Subhauma, too, sent him to the other world—slew him—using the Chakra (divine discus), and immediately made a proclamation of fearlessness (amnesty) for the remaining army.” (150)
श्लोक ( Shlok ) 151
अरेशतीर्थसन्तानकाले द्विशतकोटिषु । स द्वात्रिंशत्सु जातेऽभूत्सुभौमो वत्सरेष्वयम् ॥ १५१ ॥
श्री अरनाथ तीर्थंकरके बाद दो सौ करोड़ बत्तीस वर्ष व्यतीत हो जानेपर सुभौम चक्रवर्तीउत्पन्न हुआ था ।। १५१ ॥
“Two hundred crore and thirty-two years (2,000,032,000 years) after the time of Lord Aranatha Tirthankara, the Chakravarti Subhauma was born.” (151)
श्लोक 152 से 161
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143
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