शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 475 | श्लोक 476 से 491
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 492 to 501
श्लोक ( Shlok ) 492
मनःपर्ययसद्बोधसहस्राणां चतुष्टयम् । शून्यद्वयचतुःपक्षलक्षिताः पूज्यवादिनः ॥ ४९२ ॥
चार हजार मनःपर्यय ज्ञानी और दो हजार चार सौ पूज्यवादी उनके साथ थे ॥ ४९२ ॥
“Four thousand sages possessed of mind-reading knowledge (Manahparyaya Jnana) and two thousand four hundred revered logicians/debaters (Vadi) were present with Him.”492
श्लोक ( Shlok ) 493 – 495
ते द्विषष्टिसहस्त्राणि सर्वेऽपि मुनयो मताः । आर्यिका हरिषेणाद्याः खद्धयत्रिखषड्मिताः ॥ ४९३ ॥ श्रावकाः सुरकीर्त्याद्या लक्षद्वयनिरूपिताः । अर्हहास्यादिकाः प्रोक्ताः श्राविका द्विगुणास्ततः ॥४९४॥ देवा देव्योऽप्यसङ्ख्यातास्तिर्यक्जाः सङ्ख्ययामिताः । इति द्वादशभिः सार्द्ध गणैः सद्धर्ममादिशत् ॥४९५॥
इस प्रकार सब मिलाकर बासठ हजार मुनिराज थे, इनके सिवाय साठ हजार तीन सौ हरिषेणा आदि आर्यिकाएँ थीं, सुरकीर्तिको आदि लेकर दो लाख श्रावक थे, अर्हद्दासीको आदि लेकर चार लाख श्राविकाएँ थीं, असंख्यात देव-देवियाँ थीं और संख्यात तिर्यश्च थे। इस प्रकार बारह गणोंके साथ-साथ वे समीचीन धर्मका उपदेश देते थे ॥ ४९३-४९५ ॥
“In this manner, there were sixty-two thousand ascetics (Munirajas) in total. Apart from them, there were sixty thousand three hundred Aryikas (nuns) led by Harishena; two lakh Shravakas (laymen) led by Surakirti; and four lakh Shravikas (laywomen) led by Arhaddasi.
Additionally, there were innumerable (Asankhyata) gods and goddesses, and a numerable (Sankhyata) number of animals (Tiryancha). Accompanied by these twelve assemblies (Barah Gana), the Lord delivered His divine discourses on the Righteous Path (Samichin Dharma).” 493 – 495
श्लोक ( Shlok ) 496
विहरन्मासमात्रायुः सम्मेदाचलमागतः । व्यपेतव्याहृतिर्योगमास्थायाचलितं विभुः ॥ ४९६ ॥
विहार करते-करते जब एक माहकी आयु शेष रह गई तब वे भगवान् सम्मेदशिखर पर आये और विहार बन्द कर वहाँ अचल योगसे विराजमान हो गये ॥ ४९६ ॥
“As He continued His holy wanderings (Vihara), upon realizing that only one month remained of His earthly lifespan, the Lord arrived at Mount Sammed Shikhar; there, He ceased all movement and seated Himself in absolute, unmoving meditative absorption (Achala Yoga).”496
श्लोक ( Shlok ) 497 – 499
ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां पूर्वरात्रेः कृतक्रियः । तृतीयशुक्रुध्यानेन रुद्योगो विबन्धनः ॥ ४९७ ॥ * अकारपञ्चकोच्चा रमात्रकाले वियोगकः । चतुर्थशुक्लध्यानेन निराकृततनुत्रयः ॥ ४९८ ॥ अगाद्भरणिनक्षत्रे लोकार्य गुणविग्रहः । अतीतकाले ताः सिद्धा यत्रानन्ता निरन्जनाः ॥ ४९९ ॥
ज्येष्ठ कृण चतुर्दशीके दिन रात्रिके पूर्व भागमें उन कृतकृत्य भगवान् शांतिनाथने तृतीय शुक्तध्यानके द्वारा समस्त योगोंका निरोध कर दिया, बन्धका अभाव कर दिया और अकार आदि पाँच लघु अक्षरोंके उच्चारणमें जितना काल लगता है उतने समय तक अयोगकेवली अवस्था प्राप्त की। वहीं चतुर्थ शुक्लध्यानके द्वारा वे तीनों शरीरोंका नाश कर भरणी नक्षत्रमें लोकके अग्रभाग पर जा विराजे । उस समय गुण ही उनका शरीर रह गया था। अतीत कालमें गये हुए कर्ममलरहित अनंत सिद्ध जहाँ विराजमान थे वहीं जाकर वे विराजमान हो गये ॥ ४९७-४९९ ॥
“In the early part of the night on the fourteenth day of the dark fortnight of the month of Jyeshtha (Jyeshtha-Krishna-Chaturdashi), the Lord Shantinath—having accomplished all that was to be achieved—completely restrained all activities of mind, speech, and body (Yogas) and eradicated all remaining karmic bondage through the third stage of pure meditation (Tritiya Shukla-dhyana).
For a duration lasting no longer than the utterance of five short vowels (such as ‘a’, ‘i’, ‘u’, ‘ri’, ‘lri’), He attained the state of Ayoga-Kevali (omniscience beyond all activity). Then, utilizing the fourth stage of pure meditation (Chaturtha Shukla-dhyana), He utterly dissolved the three bodies (gross, luminous, and karmic) and, under the Bharani constellation, ascended to abide at the absolute apex of the universe (Loka-agra-bhaga).
At that moment, divine attributes alone remained as His form. He established Himself precisely where the infinite, stainless Siddhas of the past reside in eternal bliss.”497 – 499
श्लोक ( Shlok ) 500
चतुर्विधामराः सेन्द्राः निस्तन्द्रा रुन्द्रभक्तयः । कृत्वान्त्येष्टि तदागत्य स्वं स्वमावासमाश्रयन् ॥५००॥
उसी समय इन्द्र सहित, आलस्यरहित और बड़ी भक्तिको धारण करनेवाले चार प्रकारके देव आये और अन्तिम संस्कार-निर्वाणकल्याणककी पूजा कर अपने-अपने स्थान पर चले गये ।। ५०० ।।
“At that very moment, led by Indra, the four classes of celestial beings (Chaturnikaya Deva) arrived—utterly free of lethargy and filled with profound devotion. Having performed the final rites and worship of the Nirvana-Kalyanaka (the auspicious celebration of ultimate liberation), they returned to their respective heavenly abodes.” 500
श्लोक ( Shlok ) 501
चक्रायुधादयोप्येवमाध्यायान्त्यतनुत्रयम् । हित्वा नव सहस्त्राणि निवृतिं यतयोऽगमन् ॥ ५०१ ॥
चक्रायुधको आदि लेकर अन्य नौ हजार मुनिराज भी इस तरह ध्यान कर तथा औदारिक तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंको छोड़ कर निर्वाणको प्राप्त हो गये ।। ५०१ ॥
“Led by Chakrayudha, the other nine thousand ascetics (Munirajas) also meditated in this very manner, and casting off the three bodies—the physical (Audarika), the luminous (Taijasa), and the karmic (Karmana)—attained ultimate liberation (Nirvana).”501
श्लोक 502 से 510
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