मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 12 to 23
श्लोक ( Shlok ) 12 – 13
सोऽपि तत्तत्त्वसद्भावमवगम्य यथोदितम् । निविंद्य संसृतेर्येष्ठपुत्र राज्यं नियोज्य तत् ॥ १२ ॥ग्रन्थद्वयपरित्यागे पटुश्चटुलमाययौ । संयमं बहुभिः सार्द्ध मूर्धन्यैरूर्ध्वगामिभिः ॥ १३ ॥
राजा हरिवर्मा भी मुनिराजके द्वारा कहे हुए तत्त्वके सद्भावको ठीक-ठीक समझकर संसारसे विरक्त हो गये। उन्होंने अपना राज्य बड़े पुत्रके लिए देकर बाह्याभ्यन्तरके भेदसे दोनों प्रकारके परिग्रहका त्याग कर दिया और शीघ्र हीस्वर्ग अथवा मोक्ष जानेवाले राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया ।। १२-१३ ।।
“Having precisely understood the true nature of the ultimate truths (Tattva) expounded by the holy ascetic, King Harivarma became entirely detached from worldly existence. Handing over his kingdom to his eldest son, he renounced both forms of possession—the external and the internal. Without delay, he embraced the path of self-restraint (Sanyam) alongside other kings who were destined for heaven or ultimate liberation (Moksha).”12 – 13
श्लोक ( Shlok ) 14
भवादीधरदेकादशाङ्गानि गुरुसङ्गमात् । अबध्नात्तीर्थकृद्गोत्र श्रद्धाशुद्ध्यादिभावनः ॥ १४ ॥
उन्होंने गुरुके समागमसे ग्यारह अंगोंका अध्ययन किया और दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओंका चिन्तवन कर तीर्थंकर गोत्रका बन्ध किया ।॥ १४ ॥
“In the holy company of his preceptor (Guru), he thoroughly studied the eleven primary scriptures (Angas). By continuously contemplating and meditating upon the sixteen auspicious reflections, beginning with the purity of right faith (Darshan-Vishuddhi), he bound the Tirthankara-Gotra (the karmic lineage of a Tirthankara).”
श्लोक ( Shlok ) 15
चिरमेवं तपः कृत्वा प्रान्ते स्वाराधनाविधिः । भविष्यत्पञ्चकल्याणः प्राणतेन्द्रोऽभवद्विभुः ॥ १५ ॥
इस तरह चिर कालतक तपकर आयुके अन्त में समाधिमरणके द्वारा, जिसके आगे चलकर पाँच कल्याणक होनेवाले हैं ऐसा प्राणत स्वर्गका इन्द्र हुआ ।। १५ ।।
“In this manner, having performed rigorous penance for a very long time, he embraced Samadhimarana (peaceful, meditative death) at the end of his lifespan. Consequently, he was reborn as the Indra (the celestial lord) of the Pranata heaven—destined to be revered through the five supreme auspicious events (Pancha Kalyanaka) in his subsequent life.”15
श्लोक ( Shlok ) 16 – 17
सागरोपमविंशत्यामितायुः शुक्ललेश्यकः । सार्द्धरत्नित्रयोत्सेधो मासैर्दशभिरुच्छ्वसन् ॥ १६ ॥संवत्सरसहस्त्राणां विंशत्यामाहिताहृतिः । मनाग्मनः प्रवीचारभोगोऽष्टद्धिसमन्वितः ॥ १७ ॥
वहाँ बीस सागर प्रमाण उसकी आयु थी, शुक्ल लेश्या थी, साढे तीन हाथ ऊंचा शरीर था, वह दश माहमें एक बार श्वास लेता था, बीस हजार वर्षमें एक बार आहार ग्रहण करता था, मन-सम्ब-न्धी थोड़ासा कामभोग करता था, और आठ ऋद्धियोंसे सहित था ।। १६-१७ ।।
“There, his lifespan was of twenty Sagara (an immense cosmic time unit), his aura was of the purest white complexion (Shukla Leshya), and his body stood three and a half cubits (Hath) tall. He took a single breath once every ten months and partook of food only once every twenty thousand years. He indulged minimally in mental sensory pleasures and was endowed with the eight supernatural faculties (Riddhis).”16 – 17
श्लोक ( Shlok ) 18 – 19
आपञ्चमावनेरात्मगोचरव्या वृतावधिः । तत्क्षेत्रमितशक्त्यादिश्चिरं तत्रान्वभूत् सुखम् ॥ १८ ॥तस्मिन् षण्मासशेषायुष्यागमिष्यति भूतलम् । जन्मगेहाङ्गणं तस्य रत्नवृप्ठ्याचितं सुरैः ॥ १९ ॥
पाँचवीं पृथ्वी तक उसके अवधिज्ञानका विषय था और उतनी ही दूर तक उसकी दीप्ति तथा शक्ति आदिका संचार था। इस प्रकार वह वहाँ चिरकाल तक सुखका उपभोग करता रहा। जब उसकी आयु छह-माहकी बाकी रह गई और वह वहाँ पृथिवी तलपर आने वाला हुआ तब उसके जन्मगृहके आंगनकी देवोंने रत्नवृष्टिके द्वारा पूजा की ।। १८-१९ ।।
“The range of his clairvoyant knowledge (Avadhijnana) extended down to the fifth hellish earth, and his divine radiance, power, and influence reached just as far. In this manner, he continued to enjoy celestial bliss there for an immense period.
When only six months of his lifespan remained and his descent to the earthly realm was imminent, the heavenly deities worshipped the courtyard of his destined birthplace by showering it with precious gems.”18 – 19
श्लोक ( Shlok ) 20
अत्रैव भरते ‘राजा पुरे राजगृहाद्धये । सुमित्रो मगधाधीशो हरिवंशशिखामणिः ॥ २० ॥
इसी भरतक्षेत्रके मगधदेशमें एक राजगृह नामका नगर है। उसमें हरिवंशका शिरोमणि सुमित्र नामका राजा राज्य करता था ॥ २० ॥
“In the Magadha country of this very Bharatkshetra (the region of Bharat), there is a magnificent city named Rajgriha. Ruling over that city was a king named Sumitra, who was the crest-jewel of the Harivamsa lineage.”20
श्लोक ( Shlok ) 21 – 23
गोत्रेण काश्यपस्तस्य देवी सोमाह्वया सुरैः । पूजिता श्रावणे मासि नक्षत्रे श्रवणे दिने॥ २१ ॥ स्वमान् कृष्णद्वितीयायां स्वर्गावतरणोन्मुखे । प्राणताधीश्वरेऽपश्यत् षोडशेष्टार्थसूचकान् ॥ २२ ॥ गजराजं च वक्त्रं स्वं प्रविशन्तं प्रभाविनम् । तेनैव परितोषेण प्रबुद्धा शुद्धवेषधृत् ॥ २३ ॥
वह काश्यपगोत्री था, उसकी रानीका नाम सोमा था, देवो ने उसकी पूजा की थी। तदनन्तर श्रावण कृष्ण द्वितीयाके दिन श्रवण नक्षत्रमें जब पूर्वोक्त प्राण-तेन्द्र स्वर्गसे अवतार लेनेके सन्मुख हुआ तब रानी सोमा ने इष्ट अर्थको सूचित करने वाले सोलह स्वप्न देखे और उनके बाद ही अपने मुँहमें प्रवेश करता हुआ एक प्रभाववान् हाथी देखा। इसी हर्षसे वह जाग उठी और शुद्ध वेषको धारणकर राजाके पास गई। वहाँ फल सुननेकी इच्छासे उसने राजाको सब स्वप्न सुनाये ॥ २१-२३ ॥
“He belonged to the Kashyapa lineage (Gotra), and his queen’s name was Soma, who was deeply revered by the heavenly deities. Thereafter, on the second day of the dark fortnight of the month of Shravana (Shravana Krishna Dvitiya), under the Shravana lunar mansion (Nakshatra), when the aforementioned Indra of the Pranata heaven was on the verge of descending, Queen Soma witnessed sixteen dreams indicating highly desirable and auspicious outcomes. Immediately following these, she saw a majestic and radiant elephant entering her mouth.
Awakening filled with immense joy, she adorned herself in pure vestments and went to the King. There, desiring to know the fruits of her visions, she narrated all the dreams to him.”21 – 23
श्लोक 24 से 33
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