मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 243 to 254
श्लोक ( Shlok ) 243
अनयोरनुरूपोऽयं सङ्गमो वेधसा कृतः । इत्युक्त्वा मत्सरापेतमतुष्यद्भूपमण्डलम् ॥ २४३ ॥
‘इन दोनोंका समागम विधाताने ठीक ही किया है’ यह कहकर वहाँ जो राजा ईर्ष्या रहित थे वे बहुत ही सन्तुष्ट हुए ।। २४३ ।।
“‘The Creator (Vidhātā) has orchestrated a truly perfect union between these two!’ Saying this, the kings in the assembly who were free from jealousy and malice felt deeply satisfied and rejoiced.” ॥ 243 ॥
श्लोक ( Shlok ) 244
कल्याणविधिपर्याप्तौ स्थित्वा तत्रैव कानिचित् । दिनानि सागरः श्रीमान् सुखेन सुरुसान्वितः ॥२४४॥
विवाहकी विधि समाप्त होनेपर लक्ष्मीसम्पन्न राजा सागर सुलसाके साथ वहीं पर कुछ दिनतक सुखसे रहा ॥ २४४ ॥
“Upon the successful completion of all the sacred wedding rituals, the exceptionally majestic and prosperous King Sagara remained there in that city for several days, living in deep happiness and comfort with Sulasā.” ॥ 244 ॥
श्लोक ( Shlok ) 245 – 249
साकेतनगरं गत्वा भोगाननुभवन् स्थितः । मधुपिङ्गलसाधोश्च वर्तमानस्य संयमे ॥ २४५ ॥ पुरमेकं तनुस्थित्यै विशतो वीक्ष्य लक्षणम् । कश्चिन्नैमित्तिको यूनः पृथ्वीराज्यार्हदेहजैः ॥ २४६ ॥ लक्षणैरेष भिक्षाशी किल किं लक्षणागमैः ४ । इत्यनिन्दत्तदाकर्ण्य परोऽप्येवमभाषत ॥ २४७ ॥ एष राज्यश्रियं भुञ्जन् मृषा सगरमन्त्रिणा । कृत्रिमागममा दर्यं दूषितः सन् हिया तपः ॥ २४८ ॥ प्रपन्नवान् गते चास्मिन् सुलसां सगरोऽग्रहीत् । इति तद्वचनं श्रुत्वा मुनिः क्रोधाग्निदीपितः ॥ २४९ ॥
तदनन्तर अयोध्या नगरीमें जाकर भोगोंका अनुभव करता हुआ सुखसे रहने लगा। इधर मधुपिङ्गल साधु-संयम धारण कर रहे थे। एक दिन वे आहारके लिए किसी नगरमें गये थे। वहाँ कोई निमित्तज्ञानी उनके लक्षण देखकर कहने लगा कि ‘इस युवाके चिह्न तो पृथिवीका राज्य करनेके योग्य हैं परन्तु यह भिक्षा भोजन करनेवाला है इससे जान पड़ता है कि इन सामुद्रिक शास्त्रोंसे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है ? ये सब व्यर्थ हैं’। इस प्रकार उस निमित्तज्ञानीने लक्षणशास्त्र – सामुद्रिक शास्त्रकी निन्दा की। उसके साथ ही दूसरा निमित्तज्ञानी था वह कहने लगा कि ‘यह तो राज्यलक्ष्मीका ही उपभोग करता था परन्तु सगर राजाके मन्त्रीने झूठ झूठ ही कृतिमशास्त्र दिखलाकर इसे दूषित ठहरा दिया और इसीलिए इसने लज्जावश तप धारण कर लिया। इसके चले जानेपर सगरने सुलसाको स्वीकृत कर लिया। उस निमित्तज्ञानीके वचन सुनकर मधुपिङ्गल मुनि क्रोधाग्निसे प्रज्वलित हो गये ॥ २४५-२४९ ॥
“Thereafter, King Sagara returned to the city of Ayodhyā, where he lived in immense happiness, enjoying all kinds of worldly pleasures with Sulasā.
Meanwhile, the monk Madhupiṅgala was diligently practicing the strict self-restraint (Saṃyama) of a sage. One day, he entered a certain town to seek alms (Āhāra). Seeing him, an astrologer (Nimittajñānī) who read physical signs examined his bodily traits and remarked to others: ‘The physical signs on this young man indicate that he is worthy of ruling the entire earth! Yet, here he is, surviving on begged food. Looking at him, it seems these scriptures of physiognomy (Sāmudrika Śāstra) serve no real purpose; they are completely useless.’ In this manner, that astrologer began to criticize the science of bodily signs.
However, another astrologer who was present alongside him replied: ‘You are mistaken. This man was indeed destined to enjoy supreme royal fortune. But King Sagara’s prime minister fabricated a completely false, fake scripture to falsely label his traits as cursed. Overwhelmed by public shame because of that deceit, this prince renounced the world and took up penance. Once he was driven away, Sagara claimed Princess Sulasā for himself.’
Upon hearing the words of that second astrologer, the monk Madhupiṅgala was instantly inflamed with a blazing fire of fury (Krodhāgni).” ॥ 245-249 ॥
श्लोक ( Shlok ) 250 – 254
जन्मान्तरे फलेनास्य तपसः सगरान्वयम् । सर्वं निर्मूलयामीति विधीः कृतनिदानकः ॥ २५० ॥मृत्वासाबसुरेन्द्रस्य महिषानीक आदिमे । कक्षाभेदे चतुःषष्टिसहस्त्रासुरनायकः ॥ २५१ ॥महाकालोऽभवत्तत्र देवैरावेष्टितो निजैः । देवलोकमिमं केन प्राप्तोऽहमिति संस्मरन् ॥ २५२ ॥ ज्ञात्वा विभङ्गज्ञानोपयोगेन प्राक्तने भवे । प्रवृत्तमखिलं पापी कोपाविष्कृतचेतसा ॥ २५३ ॥ तस्मिन् मन्त्रिणि भूपे च रूढवैरोऽपि तौ तदा । अनिच्छन् हन्तुमत्युग्रं सुचिकीर्षुरहं तयोः ॥ २५४ ॥
मैं इस तपके फलसे दूसरे जन्ममें राजा सगरके समस्त वंशको निर्मूल करूँगा’ ऐसा उन बुद्धिहीन मधुपिङ्गल मुनिने निदान कर लिया । अन्तमें मरकर वे असुरेन्द्रकी महिष जातिकी सेनाकी पहिली कक्षा में चौंसठ हजार असुरोंका नायक महाकाल नामका असुर हुआ। वहाँ उत्पन्न होते ही उसे अनेक आत्मीय देवोंने घेर लिया । मैं इस देव लोकमें किस कारणसे उत्पन्न हुआ हूँ। जब वह इस बातका स्मरण करने लगा तो उसे विभङ्गावधिज्ञानके द्वारा अपने पूर्वभवका सब समाचार याद आ गया। याद आते ही उस पापीका चित्त क्रोधसे भर गया। मन्त्री और राजाके ऊपर उसका वैर जम गया । यद्यपि उन दोनोंपर उसका वैर जमा हुआ था तथापि वह उन्हें जानसे नहीं मारना चाहता था, उसके बदले वह उनसे कोई भयङ्कर पाप करवाना चाहता था ।। २५०-२५४ ।।
“The foolish monk Madhupiṅgala then made a fatal spiritual vow (Nidāna), declaring: ‘By the merit of this severe penance, I shall completely uproot and annihilate the entire lineage of King Sagara in my next birth!’
Eventually, upon his death, he was reborn as a formidable Asura named Mahākāla—the supreme commander of sixty-four thousand Asuras in the first tier of the Mahiṣa class within the demonic realm (Asurendra). Immediately upon his manifestation there, he was surrounded by numerous subordinate deities of his clan.
Wondering, ‘By what actions have I been born into this celestial realm?’, he utilized his Vibhaṅgāvadhi-jñāna (distorted clairvoyant knowledge) to recall all the events of his past life. The moment he remembered, that sinful entity’s heart was consumed by a raging fury. His deep-seated enmity against the King and the minister solidified. Yet, even though he harbored an intense grudge against the two, he did not wish to simply kill them; instead, he wanted to manipulate them into committing an unimaginably horrific sin (Pāpa).” ॥ 250-254 ॥
श्लोक 255 से 273
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242
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