चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 632 to 643
श्लोक ( Shlok ) 632 – 633
पुनः प्राक्तनरूपस्थः पुष्पशय्यामधिष्ठितः । कुरु मत्पदसंव। हमिति प्रेषयत्ति स्म ताम् ॥ ६३२ ॥ताञ्च नेहेन तत्कर्म कुर्वतीं वीक्ष्य विस्मयात् । ते राजसूनवः सर्वे तन्मन्त्रादिकमस्मरन् ॥ ६३३ ॥
तदनन्तर वह उसी ब्राह्मण का रूप धारण कर पुष्पशय्यापर बैठ गया और गुणमाला भी स्नेह वश उसके पैर दाबने लगी। यह देख, वे सब राजकुमार आश्चर्य में पड़ कर ब्राह्मण के मंत्र आदि की स्तुति करने लगे ।। ६३२-६३३ ॥
Thereafter, reassuming the form of that same Brahmin, he sat upon a bed of flowers, and Gunamala out of affection began to massage his feet. Seeing this, all those princes were struck with wonder and began to praise the Brahmin’s mystical spells and powers. (632-633)
श्लोक ( Shlok ) 634
अथ तस्माद्वनाद्नेहमागतो गुणमालया । मातुः पितुश्च जीवन्धरागतिः कथिता मिथः ॥ ६३४ ॥
इसके बाद ब्राह्मण-वेषधारी जीवन्धर कुमार वनसे अपने घर आ गये और गुणमालाने भी अपने माता-पितासे जीवन्धर कुमारके आनेका समाचार कह दिया ॥ ६३४ ॥
After this, Prince Jivandhara, disguised as the Brahmin, returned home from the forest, and Gunamala too informed her parents about the arrival of Prince Jivandhara. (634)
श्लोक ( Shlok ) 635 – 636
विवाहविधिना तौ च तां तस्याकुरुतां प्रियाम् । दिनानि कानिचित्तत्र स्थित्वा जीवन्धरस्तया ॥ ६३५ ॥सुखानि सह भुञ्जानः सर्वबन्धुसमन्वितः । जनप्रस्तूयमानोरुभाग्यो गन्धगजं गिरिम् ॥ ६३६ ॥
निदान, उसके माता-पिताने विधि-पूर्वक विवाह कर उसे जीवन्धर कुमारकी प्रिया बना दी। इसके बाद वह जीवन्धर कुछ दिन तक वहीं पर गुणमालाके साथ रहा और सब भाई-बन्धुओंके साथ सुखका उपभोग करता रहा। तदनन्तर सब लोग जिनके बड़े भारी भाग्यकी प्रशंसा कर रहे थे ऐसे, उत्कृष्ट वैभवको धारण करनेवाले जीवन्धर कुमारने विजयगिरि नामक गन्धगज पर सवार होकर चतुरङ्ग सेनाके साथ गन्धोत्कटके घरमें प्रवेश किया ।। ६३५-६३६॥
Ultimately, her parents performed the wedding rituals in accordance with the prescribed rites and made her the beloved wife of Prince Jivandhara. After this, Jivandhara stayed there with Gunamala for a few days, enjoying happiness in the company of all his brothers and kinsmen. Thereafter, possessing supreme majesty and with everyone praising his extraordinarily grand fortune, Prince Jivandhara mounted the majestic scent-elephant named Vijayagiri and entered the house of Gandhotkata accompanied by his fourfold army. (635-636)
श्लोक ( Shlok ) 637 – 643
विजयादि समारुह्य चतुरङ्गबलावृतः । गृहं गन्धोत्कटाख्यस्य प्राविशत्परमोदयः ॥ ६३७ ॥तदुत्सवं समाकर्ण्य स काष्ठाङ्गारिकः क्रुधा । पश्य वैश्यात्मजो मत्तो मनाक्च न बिभेति मत् ॥ ६३८ ॥इति प्रकाशकोपोऽभूत्तद्वीक्ष्य सचिवोत्तमाः । जीवन्धरकुमारोऽयं दैवादाविष्कृतोदयः ॥ ६३९ ॥गन्धर्वदत्तया साक्षालक्ष्म्येव समुपाश्रितः । यक्षेण कृतसंवृद्धिमित्रेणाव्यभिचारिणा ॥ ६४० ॥मधुरादिसहायैश्च सहितो ‘यत्ततो महान् । अभेद्यविक्रमस्तेन विग्रहो नैव युज्यते ॥ ६४१ ॥बलिना सह युद्धस्य हेतुः कोऽपि न विद्यते । इत्यादियुक्तिमद्वाग्भिस्तमाशु समशीशमन् ॥ ६४२ ॥इदमन्यदितः किञ्चित्प्रस्तुतं प्रतिपाद्यते । विदेहविषये ख्यातं विदेहाख्यं पुरं परम् ॥ ६४३ ॥
इस उत्सवकी बात सुनकर काष्ठाङ्गारिक बहुत कुपित हुआ। वह कहने लगा कि देखो उन्मत्त हुआ यह वैश्यका लड़का मुझसे कुछ भी नहीं डरता है। इस प्रकार कहकर वह प्रकट रीतिसे क्रोध करने लगा। यह देख, श्रेष्ठ मंत्रियोंने उसे समझाया कि ये जीवन्धर कुमार हैं, पुण्यके उदयसे इन्हें अभ्युदयकी प्राप्ति हुई है, साक्षात् लक्ष्मीके समान गन्धर्वदत्तासे सहित हैं, यक्ष रूपी अखण्ड मित्रने इनकी वृद्धि की है, मधुर आदि अनेक मित्रोंसे सहित हैं अतः महान् हैं और अजेय पराक्रमके धारक हैं इसलिए इनके साथ द्वेष करना योग्य नहीं है। फिर बलवान के साथ युद्ध करनेका कोई कारण भी नहीं है। इत्यादि युक्ति-पूर्ण वचनोंके द्वारा मन्त्रियोंने काष्ठाङ्गारिकको शीघ्र ही शान्त कर दिया ।। ६३७-६४३ ।।
Hearing about this celebration, Kashtangarika became highly infuriated. He began to say, “Look at this arrogant son of a merchant; he does not fear me in the least!” Speaking thus, he began to exhibit open rage. Seeing this, the wise ministers counselled him, saying, “He is Prince Jivandhara. Through the rise of his merits, he has attained this grand prosperity. He is accompanied by Gandharvadatta, who is like Lakshmi personified. His growth has been fostered by his steadfast friend, the Yaksha. Surrounded by numerous friends like Madhura and others, he is truly great and possesses invincible prowess. Therefore, it is not proper to harbor malice against him. Furthermore, there is no reason to wage war against someone so powerful.” Through these and other logical arguments, the ministers quickly pacified Kashtangarika. (637-643)
श्लोक 644 से 651
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631
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