चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 136 to 150
श्लोक ( Shlok ) 136 – 137
तौ दृष्ट्वा नागदत्तोऽपि युवाभ्यां सह यातवान् । किन्नायादिति भूपेन साशङ्केन जनेन च ॥ १३६ ॥ पृष्टौ सहैव गत्वासौ पृथक्क्वापि गतस्ततः । नाविद्वेति व्यधत्तां तावनुजावप्यपद्धवम् ॥ १३७ ॥
उन दोनों भाइयोंको देखकर वहाँ के राजा तथा अन्य लोगों को कुछ शङ्का हुई और इसीलिए उन सबने पूछा कि तुम दोनोंके साथ नागदत्त भी तो गया था वह क्यों नहीं आया ? इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि यद्यपि नागदत्त हमलोगोंके साथ ही गया था परन्तु वह वहाँ जाकर कहीं अन्यत्र चला गया इसलिए हम उसका हाल नहीं जानते हैं। इस प्रकार उन दोनोंने भाई होकर भी नागदत्तके छोड़नेकी बात छिपा ली ॥१३६-१३७।
Upon seeing the two brothers, the king and the local people grew suspicious, and therefore they all asked, “Nagadatta had also gone with you two; why has he not returned?” In response, they said, “Although Nagadatta went with us, he went away somewhere else after reaching there, so we do not know his whereabouts.” In this manner, despite being his brothers, the two hid the fact that they had abandoned Nagadatta. || 136-137 ||
श्लोक ( Shlok ) 138
श्रीनागदत्तमातापि व्याकुलीकृतचेतसा । शीलदर्श गुरुं प्राप्य समपृच्छत्तुजः कथाम् ॥ १३८ ॥
पुत्रके न आनेकी बात सुनकर नागदत्त की माता बहुत व्याकुल हुई और उसने श्री शीलदत्त गुरुके पास जाकर अपने पुत्रकी कथा पूछी ।। १३८ ।।
Upon hearing that her son had not returned, Nagadatta’s mother became deeply distressed. She approached the venerable preceptor Shri Sheeladatta and inquired about her son’s fate. || 138 ||
श्लोक ( Shlok ) 139 – 141
सोऽपि तत्सम्भ्रमं दृष्ट्वा कारुण्याहितमानसः । निर्विघ्नं ते तनूजो ब्राङ् मा भैषीरागमिष्यति ॥ १३९ ॥इत्याश्वासं मुनिस्तस्या व्यधात्सन्ज्ञानलोचनः । इतः श्रीनागदतोऽपि. विलोक्य जिनमन्दिरम् ॥ १४०॥किञ्चित्प्रदक्षिणीकृत्य निषीदाम्यहमित्यदः । प्रविश्य विहितस्तोत्रः सचिन्तस्तत्र संस्थितः ॥ १४१ ॥
उसकी व्याकुलता देख मुनिराजका हृदय दया से भर आया अतः उन्होंने सम्यग्ज्ञान रूपी नेत्रसे देखकर उसे आश्वासन दिया कि तू डर मत, तेरा पुत्र किसी विघ्नके बिना शीघ्र ही आवेगा। इधर नागदत्तने एक जिन मन्दिर देखकर उसकी कुछ प्रदक्षिणा दी और मैं यहाँ बैठूंगा इस विचारसे उसके भीतर प्रवेश किया। भीतर जाकर उसने भगवान्की स्तुति पढ़ी और फिर चिन्तातुर हो कर वह वहीं बैठ गया ॥ १३९-१४१ ॥
Seeing her deep distress, the holy monk’s heart filled with compassion. Discerning the truth through his vision of right knowledge (Samyag-jnana), he reassured her, saying, “Do not fear; your son will return soon, free from any harm.” Meanwhile, upon spotting a Jain temple, Nagadatta circumambulated it and stepped inside with the thought, “I shall rest here.” Going within, he recited praises to the Lord and then sat down right there, consumed by anxious thoughts. || 139-141 ||
श्लोक ( Shlok ) 142 – 143
तदा विद्याधरः कश्चित्तं दृष्ट्वा ज्ञातवृत्तकः । जैनः सवित्तं नीत्वास्माद् द्वीपमध्यान्मनोहरे ॥ १४२ ॥वनेऽवतार्य सुस्थाप्य समापृच्छयादरान्वितः । यथेष्टमगमत्सा हि धर्मवत्सलता सताम् ॥ १४३ ॥
दैवयोगसे वहीं पर एक जैनी विद्याधर आ निकला। नागदत्तको देखकर उसने उसके सब समाचार मालूम किये और फिर उसे धन सहित इस द्वीपके मध्यसे निकालकर मनोहर नामके वनमें जा उतारा । तदनन्तर उसे वहाँ अच्छी तरह ठहराकर और बड़े आदरसे पूछकर वह विद्याधर अपने इच्छित स्थानपर चला गया सो ठीक ही है क्योंकि सत्पुरुषोंकी धर्म-वत्सलता यही कहलाती है ॥१४२-१४३।।
By a stroke of destiny, a Jain Vidyadhara happened to arrive at that very place. Seeing Nagadatta, he inquired about and learned all his news, and then, carrying him along with his wealth, transported him out of the midst of that island and set him down in a beautiful forest named Manohara. Thereafter, having comfortably settled him there and taken leave with great respect, the Vidyadhara departed for his intended destination. And it is rightly said—for this is exactly what the pious affection (dharma-vatsalya) of righteous souls looks like. || 142-143 ||
श्लोक ( Shlok ) 144
तत्समीपेऽनुजा ग्रामे वसन्त्यस्यैत्य सादरम् । प्रत्यग्रहीद्धनं तत्र सोऽपि निक्षिप्य सुस्थितः ॥ १४४ ॥
उस मनोहर वनके समीप ही नन्दीभाममें नागदत्तकी छोटी बहिन रहती थी इसलिए बह वहाँ पहुँचा और अपना सब धन उसके पास रखकर अच्छी तरह रहने लगा ।। १४४ ।।
Nagadatta’s younger sister lived in Nandibhama, which was close to that beautiful Manohara forest; therefore, he arrived there, kept all his wealth with her, and began to live comfortably. || 144 ||
श्लोक ( Shlok ) 145 – 150
अथोपगम्य तं स्नेहात् स्वानुजादिसनाभयः । कुमाराभिनवां कन्यां नकुलस्याजिघृक्षुणा ॥ १४५ ॥श्रोष्ठिना वयमाहूता निस्सत्त्वाद्रिक्तपाणयः । कथं तत्र श्रजिष्याम इत्यत्याकुलचेतसः ॥ १४६ ॥अद्य सर्वेऽपि जाताः स्म इति ते न्यगदन्नसौ । तच्छ्रुत्वा साररत्नानि निजरत्नकदम्बकात् ॥ १४७॥तेभ्यो नाना मुदा दत्वा यूयमागमनं मम । ददध्वं सन्निवेद्यतां कन्यायै रत्नमुद्रिकाम् ॥ १४८ ॥इत्युक्त्वा स्वयमित्वानु शीलदत्तगुरुं मिथः । वन्दित्वा रक्षिसूनुश्च दृष्ट्वा सन्मित्रमात्मनः ॥ १४९ ॥आमूलात्कार्यमाख्याय सह तेन ततो गतः । साररत्नैर्महीपालं सानुरागं व्यलोकत ॥ १५० ॥
कुछ समय बाद उसकी बहिनके ससुर आदि बड़े स्नेहसे नागदत्तके पास आकर कहने लगे कि हे कुमार ! नई आई हुई कन्याको सेठ अपने नकुल पुत्रके लिए ग्रहण करना चाहता है इसलिए उसने हम सबको बुलाया है परन्तु निर्धन होनेसे हम सब खाली हाथ वहाँ कैसे जायेंगे ? यह विचारकर हम सभीलोग आज अत्यन्त व्याकुलचित्त हो रहे हैं। उनकी बात सुनकर नागदत्तने अपने रत्नों के समूहमेंसे निकालकर अच्छे-अच्छे अनेक रत्न प्रसन्नतासे उन्हें दिये और साथ ही यह कहकर एक रत्नमयी अंगूठी भी दी कि तुम मेरे आनेकी खबर देकर उस कन्याके लिए यह अंगूठी दे देना ! यही नहीं, नागदत्त, स्वयं भी उनके साथ गया। वहाँ जाकर उसने पहले शीलदत मुनिराजकी वन्दना की । तदनन्तर अपने मित्र कोतवालके पुत्र दृढरक्षके पास पहुँचा। वहाँ उसने प्रारम्भसे लेकर सब कथा दृढरक्षको कह सुनाई। फिर उसीके साथ जाकर अच्छे-अच्छे रत्नोंकी भेंट देकर बड़ी प्रसन्नता से राजाके दर्शन किये ।। १४५-१५० ॥
After some time, his sister’s father-in-law and others approached Nagadatta with great affection and said, “O youth! The merchant wishes to accept the newly arrived maiden for his son Nakula, and therefore he has invited all of us. However, being destitute, how can we go there empty-handed? Reflecting on this, all of us are deeply distressed today.” Hearing their words, Nagadatta joyfully selected many fine gems from his collection and gave them to them, along with a gem-studded ring, saying, “Inform them of my arrival and present this ring to the maiden!” Not only this, but Nagadatta himself accompanied them.
Upon arriving there, he first paid his respects to the holy monk Sheeladatta. Afterward, he visited his friend Dridharaksha, the son of the chief of police. There, he narrated the entire story from the very beginning to Dridharaksha. Then, accompanying him, he presented fine gems as an offering and most joyfully had an audience with the king. || 145-150 ||
श्लोक 151 से 162
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135
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