चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 644 to 651
श्लोक ( Shlok ) 644 – 647
गोपेन्द्रो भूपतिस्तस्य पाता पातितविद्विषः । तुक्पृथिव्यादिसुन्दर्या राज्यां रत्नवती सती ॥ ६४४ ॥चन्द्रकव्यधने दक्षं मालयालक्करोग्यहम् । नेच्छाम्यन्यं पर्ति कञ्चिदकरोदिति सङ्गरम् ॥ ६४५ ॥तज्ज्ञात्वास्याः पिता चापवेदवेद्युदितोदितः । जीवन्धरोऽद्य तत्कन्यामिमां तत्सन्निधिं नये ॥ ६४६ ॥इप्ति राजपुरं गत्वा सकन्यः सहसाधनः । घोषणां कारयामास स्वयंवरविधिं प्रति ॥ ६४७ ॥
सुधर्माचार्य राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि अब इससे भिन्न एक दूसरी प्रकृत कथा और कहता हूं। विदेह देशमें एक विदेह नामका प्रसिद्ध नगर है। राजा गोपेन्द्र उसकी रक्षा करते हैं, शत्रुओंको नष्ट करनेवाले राजा गोपेन्द्रकी रानीका नाम पृथिवी सुन्दरी है और उन दोनोके एक रत्नवती नामकी कन्या है। रत्नवतीने प्रतिज्ञा की थी कि जो चन्द्रक वेधमें चतुर होगा मैं उसे ही मालासे अलंकृत करूँगी – अन्य किसी पुरुषको अपना पति नहीं बनाऊँगी। कन्याकी ऐसी प्रतिज्ञा जानकर उसके पिताने विचार किया कि इस समय धनुर्वेदको जाननेवाले और अतिशय ऐश्वर्यशाली जीवन्धर कुमार ही हैं अतः उनके पास ही यह कन्या लिये जाता हूँ। ऐसा विचार कर वह राजा कन्याको साथ लेकर अपनी सब सेनाके साथ-साथ राजपुर नगर पहुँचा और वहाँ जाकर उसने स्वयंवर विधि की घोषण करा दी ।। ६४४-६४७॥
Sudharmacharya says to King Shrenika, “Now I shall narrate another contextually relevant story that is different from this one. In the Videha country, there is a famous city named Videha. King Gopendra protects it. The queen of King Gopendra, who destroys his enemies, is named Prithivi Sundari, and the two have a daughter named Ratnavati. Ratnavati had taken a vow, ‘I will bestow the garland only upon the man who is expert in piercing the Chandraka (crescent/moon-shaped target); I will accept no other man as my husband.’
Learning of his daughter’s vow, her father reflected, ‘At present, Prince Jivandhara is the only one who is well-versed in the science of archery and possesses extraordinary majesty. Therefore, I shall take this maiden to him.’ With this thought, the king took his daughter along and, accompanied by his entire army, reached the city of Rajapura, where he personally had the announcement for the Swayamvara (bridegroom-choice ceremony) proclaimed.” (644-647)
श्लोक ( Shlok ) 648
तद्घोषणां समाकण्र्ण्य सर्वे भूखेचरेश्वराः । कन्यापरिग्रहायायान्मंक्षु राजपुरं प्रति ॥ ६४८ ॥
उस घोषणाको सनकर सभी भूमिगोचरी और विद्याधरराजा उस कन्याके साथ विवाह करनेके लिए राजपुर नगर में जा पहुँचे ।। ६४८ ॥
Upon hearing that announcement, all the terrestrial and Vidyadhara (celestial/magical) kings arrived in the city of Rajapura to marry that maiden. (648)
श्लोक ( Shlok ) 649 – 651
स्वयंवरविधौ तस्मिश्चन्द्रकव्यधने नृपान् । स्खलितांस्तान्बहून्वीक्ष्य जीवन्धरकुमारकः ॥ ६४९ ॥कृतसिद्धनमस्कारः स्वगुरोश्चार्यवर्मणः । विधाय विनयं बालभानुर्वोदयशैलगः ॥ ६५० ॥स्थित्वा विभास्वरस्तस्मिश्चक्रे स्खलनवजितम् । कृतवेधो व्यधात्सिंहनादं नादितदिक्तटम् ॥ ६५१ ॥
स्वयंवरके समय उस चन्द्रक यन्त्रके वेधनेमें अनेक राजा स्खलित हो गये चूक गये। उन्हें देख, जीवन्धर कुमार उठे । सबसे पहले उन्होंने सिद्ध परमेष्ठीको नमस्कार किया, फिर अपने गुरु आर्यवर्माकी विनय की और फिर जिस प्रकार बालसूर्य उद्याचलकी शिखरपर आरूढ़ होता है उसी प्रकार उस चक्र पर आरूढ़ हो गये । उस समय वे अतिशय देदीप्यमान हो रहे थे, उन्होंने बिना किसी भूलके चन्द्रक-यन्त्रका वेध कर दिया। और दिशाओंके तट तक गूँजनेवाला सिंहनाद किया ॥ ६४९-६५१ ।।
During the Swayamvara, many kings faltered and missed their mark while trying to pierce the Chandraka mechanism. Seeing them fail, Prince Jivandhara stood up. First, he bowed to the Siddha Paramesthi (the liberated supreme souls), then he paid his respects with great humility to his preceptor Aryavarma, and finally, just as the rising sun ascends the peak of the eastern mountain, he mounted the platform. Radiating brilliant splendor at that moment, he flawlessly pierced the Chandraka mechanism and let out a lion-like roar that echoed to the very ends of the horizon. (649-651)
श्लोक 652 से 663
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643
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