चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 351 to 365
श्लोक ( Shlok ) 351 – 353
कुमारदत्तवैश्यस्य विमलायां सुताभवत् । गुणमालामला तस्याश्चेटकी पटुभाषिणी ॥ ३५१ ॥ विद्युल्लताभिधा चूर्णवासोऽयं षट्पदावृतः । वर्यः सूर्योदयो नाम नेदृक्स्वर्गेऽपि विद्यते ॥ ३५२ ॥ इति विद्वत्सभामध्ये भूयः स्वस्वामिनीगुणम् । विद्योतयन्ती बभ्राम सुभ्रूर्गर्वग्रहाहिता ॥ ३५३ ॥
उसी नगर में एक कुमारदत्त नामका सेठ रहता था । उसकी विमला स्त्रीसे अत्यन्त निर्मल गुणमाला नामकी पुत्री हुई थी। गुणमालाकी विद्युल्लता नामकी दासी थी जो बात-चीत करनेमें बहुत ही चतुर थी। अच्छी भौंहों को धारण करने वाली तथा अभिमान रूपी पिशाचसे प्रती वह विद्युल्लता विद्वानोंकी सभा में बार-बार अपनी स्वामिनीके गुणोंको प्रकाशित करती और यह कहती हुई घूम रही थी कि यह सूर्योदय नामका श्रेष्ठ चूर्ण है और इतना सुगन्धित है कि इस पर भौंरे आकर पड़ रहे हैं ऐसा चूर्ण स्वर्गमें भी नहीं मिल सकता है ।। ३५१-३५३ ।।
In that very same city lived a merchant named Kumardatta. From his wife, Vimla, was born a daughter named Gunmala, who possessed exceptionally pure virtues. Gunmala had a maid named Vidyullata, who was highly skilled and clever in conversation. Adorned with beautiful eyebrows yet possessed by the demon of pride, Vidyullata would repeatedly praise her mistress’s virtues in assembly after assembly of scholars. She would go around proclaiming, “This is the excellent powder called Suryodaya. It is so fragrant that even bumblebees are flocking to it; such a powder cannot be found even in heaven.” ।। 351-353 ।।
श्लोक ( Shlok ) 354 – 357
एवं तयोः समुद्भूतमात्सर्याहितचेतसोः । विवादे सति तद्विद्यावेदिनस्तत्परीक्षितुम् ॥ ३५४ ॥ अभूवन्नक्षमास्तत्र जीवन्धरयुवेश्वरः । परीक्ष्य तत्स्वयं सम्यक्छ्रेष्ठश्चन्द्रोदयोऽनयोः ॥ ३५५ ॥प्रत्ययः कोऽस्य चेद्वयक्तं दर्शयामीति तद्वयम् । अवष्टभ्य स्वहस्ताभ्यां विचिक्षेप ततो द्रुतम् ॥३५६॥ चन्द्रोदयमलिब्रातो गन्धोत्कर्षात्परीतवान् । दृष्ट्वा सर्वेऽपि तत्रस्थास्तत्तमेवास्तुवन्विदः ॥ ३५७ ॥
इस दोनों दासियोंमें जब परस्पर विवाद होने लगा और इस विद्याके जानकार लोग जब इसकी परीक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सके तब वहीं पर खड़े हुए जीवन्धर कुमारने स्वयं अच्छी तरह परीक्षा कर कह दिया कि इन दोनों चूर्ण मेिं चन्द्रोदय नामका चूर्ण श्रेष्ठ है। ‘इसका क्या कारण है ? यदि आप यह जानना चाहते हैं तो मैं यह अभी स्पष्ट रूपसे दिखाता हूँ’ ऐसा कह कर जीवन्धर कुमारने उन दोनों चूर्णों को दोनों हाथों से लेकर ऊपरकी फेंक दिया। फेंकते देर नहीं लगी कि सुगन्धिकी अधिकताके कारण भौरोंके समूहने चन्द्रोदय चूर्णको घेर लिया । यह देख, वहाँ जो भी विद्वान् उपस्थित थे वे सब जीवन्धर कुमारकी स्तुति करने लगे ।।३५४-३५७॥
When a dispute arose between the two maids and the experts of this art were unable to test and judge the mixtures, Jivandhara Kumar, who was standing right there, tested them thoroughly himself. He declared that among the two powders, the one named Chandrodaya was superior.
“What is the reason for this? If you wish to know, I shall demonstrate it clearly right now,” Jivandhara Kumar said. He then took both powders in his hands and threw them up into the air. No sooner had he thrown them than a swarm of bumblebees surrounded the Chandrodaya powder, drawn by its superior fragrance. Seeing this, all the scholars present there began to praise Jivandhara Kumar. ।। 354-357 ।।
श्लोक ( Shlok ) 358
तदा प्रभृति ते कन्ये परस्परनिबन्धनम् । विद्याविहितसङ्घर्ष त्यजतः ‘स्मास्तमत्सरे ॥ ३५८ ॥
उस समयसे उन दोनों कन्याओंने विद्यासे उत्पन्न होनेवाली परस्परकी ईर्ष्या छोड़ दी और दोनों ही मात्सर्यरहित हो गई ॥ ३५८ ॥
“From that time on, both those maidens gave up their mutual jealousy arising from their learning, and both became entirely free from envy.”358
श्लोक ( Shlok ) 359 – 365
अथात्र नागरेष्वात्मवान्छया क्रीडनं वने । कुर्वत्स्वेकं समालोक्य कुक्कुरं खलबालकाः ॥ ३५९॥भर्त्सयन्ति स्म चापल्यात्सोऽपि धावन् भयाकुलः । ह्रदे निपत्य तत्रैव प्राणमोक्षोन्मुखोऽभवन् ॥३६० । भृत्यैस्ततस्तमानाय्य जीवन्धरकुमारकः । कर्णौ तस्य नमस्कारपदैः सम्पर्यपूरयत् ॥ ३६१ ॥ प्रतिगृह्य नमस्कारं चन्द्रोदयगिरावभूत् । यक्षः सुदर्शनो नाम स्मृतपूर्वभवस्तदा ॥ ३६२ ॥ प्रत्यागत्य कुमारं तं त्वत्प्रसादान्मयेदृशी । लब्धा विभूतिरित्युच्चैः स्तुत्या सम्पाद्य विस्मयम् ॥ ३६३ ॥ सर्वेषां दिव्यभूषाभिः कृतवित्तमपूजयत् । इतः प्रभृत्यहं स्मर्यो व्यसनोत्सवयोस्त्वया ॥ ३६४ ॥ कुमारेति उतमभ्यर्थ्य स्वं धामैव जगाम सः । अकारणोपकाराणामवश्यंभावि तत्फलम् ॥ ३६५ ॥
तदनन्तर – उधर नगरवासी लोग वनमें अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे इधर कुछ दुष्ट बालकोंने एक कुत्ताको देखकर चपलता वश मारना शुरू किया । भयसे व्याकुल हो कर वह कुत्ता भागा और एक कुण्डमें गिरकर मरणोन्मुख हो गया। जब जीवन्धर कुमारने यह हाल देखा तो उन्होंने अपने नौकरोंसे उस कुत्तेको वहाँ से निकलवाया और उसके दोनों कान पञ्चनमस्कार मन्त्रसे भर दिये । नमस्कार मन्त्रको ग्रहण कर वह कुत्ता चंद्रोदय पर्वत पर सुदर्शन नामका यक्ष हुआ। पूर्व भवका स्मरण होते ही वह जीवन्धर कुमारके पास वापिस आया और कहने लगा कि मैंने यह उत्कृष्ट विभूति आपके ही प्रसादसे पाई है। इस प्रकार दिव्य आभूषणोंके द्वारा उस कृतज्ञ यक्षने सबको आश्चर्यमें डालकर जीवन्धर कुमारकी पूजा की और कहा कि हे कुमार ! आजसे लेकर दुःख और सुखके समय आप मेरा स्मरण करना। इस प्रकार कुमारसे प्रार्थना कर वह अपने स्थान पर चला गया। आचार्य कहते हैं कि बिना कारण ही जो उपकार किये जाते हैं उनका फल अवश्य होता है ।। ३५९-३६५ ॥
Thereafter—while the townspeople were enjoying themselves in the forest according to their wishes, a few mischievous boys saw a dog and, out of sheer recklessness, began to beat it. Terrified and distressed, the dog fled, fell into a pond, and was on the verge of death. When Prince Jivandhara witnessed this situation, he had his servants pull the dog out of the water and filled its ears with the sacred Pancha-Namaskara mantra. Upon receiving the holy mantra, the dog passed away and was reborn as a Yaksha named Sudarshana on Mount Chandrodaya.
Recalling his past life, the Yaksha returned to Prince Jivandhara and said, “I have attained this magnificent, divine opulence solely through your grace.” In this manner, adorned with celestial ornaments, the grateful Yaksha amazed everyone, paid homage to Prince Jivandhara, and said, “O Prince! From this day forward, whether in times of sorrow or joy, please remember me.” Having made this request to the prince, he returned to his abode. The Acharya states: acts of benevolence performed without any selfish motive never fail to bear fruit. 359 – 365
श्लोक 366 से 383
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350
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