Summary of Uttar Puran Parv 61 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 61 (श्लोक 1–130) का संक्षिप्त सारांश
इस पर्व में पंद्रहवें तीर्थंकर धर्मनाथ भगवान् के तीन भवों, उनके जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे सुसीमा नगरी के राजा दशरथ थे। चन्द्रग्रहण देखकर उन्हें संसार से वैराग्य हुआ, उन्होंने संयम धारण किया, तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया और सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वे रत्नपुर के राजा भानु और रानी सुप्रभा के पुत्र रूप में धर्मनाथ भगवान् के रूप में जन्मे।
धर्मनाथ भगवान् ने दीर्घकाल तक आदर्श राज्य किया। उल्कापात देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ और उन्होंने पुत्र सुधर्म को राज्य देकर एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण कर ली। कठोर तप और ध्यान के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। विशाल धर्मसंघ की स्थापना कर उन्होंने असंख्य जीवों को धर्मोपदेश दिया और अंत में सम्मेदशिखर पर मोक्ष प्राप्त किया।
इसके बाद सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण और मधुक्रीड़ प्रतिनारायण के चरित्र का वर्णन है। पूर्वजन्म में सुमित्र राजा पराजय के कारण वैराग्य तो धारण करता है, किन्तु बल की कामना रूप निदान बाँध लेता है। उसी कर्मफल से वह आगे चलकर पुरुषसिंह नारायण बनता है। दूसरी ओर नरवृषभ राजा तप के प्रभाव से सुदर्शन बलभद्र बनता है। दोनों भाई पराक्रमी होकर तीन खण्डों के अधिपति बनते हैं। युद्ध में मधुक्रीड़ प्रतिनारायण का वध होता है, किन्तु नारायण पुरुषसिंह नरकगति को प्राप्त होता है, जबकि सुदर्शन बलभद्र दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। इस प्रसंग से शुभ और अशुभ भावों के भिन्न परिणामों का प्रतिपादन किया गया है।
इसके पश्चात् तीसरे चक्रवर्ती मघवा का चरित्र आता है। पूर्वभव में नरपति राजा तप कर देवगति को प्राप्त हुआ था। बाद में मघवा चक्रवर्ती बनकर उसने छह खण्डों पर राज्य किया। अभयघोष केवली के उपदेश से उसे वैराग्य हुआ और उसने संयम धारण कर केवलज्ञान प्राप्त किया। अनेक जीवों को धर्ममार्ग का उपदेश देकर अंत में मोक्ष प्राप्त किया।
अन्तिम भाग में सनत्कुमार चक्रवर्ती का चरित्र वर्णित है। वे अनुपम रूप, वैभव और सामर्थ्य के स्वामी थे। देवों द्वारा शरीर, यौवन और सम्पत्ति की नश्वरता का स्मरण कराने पर उन्हें गहन वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की, कठोर साधना की, परिषहों को जीता, केवलज्ञान प्राप्त किया और अनेक भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। अंततः समस्त कर्मों का क्षय कर उन्होंने मोक्ष पद प्राप्त किया।
इस प्रकार पर्व 61 में धर्मनाथ तीर्थंकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा चक्रवर्ती तथा सनत्कुमार चक्रवर्ती के चरित्रों के माध्यम से वैराग्य, संयम, तप, कर्मफल और मोक्षमार्ग की महिमा का प्रतिपादन किया गया है।
श्लोक 1 से 11 : धर्मनाथ भगवान् के पूर्वभव एवं अहमिन्द्र पद
पूर्व धातकीखण्ड के पूर्वविदेह क्षेत्र में सुसीमा नगरी के राजा दशरथ चन्द्रग्रहण देखकर वैराग्य को प्राप्त हुए। उन्होंने राज्य अपने पुत्र महारथ को सौंपकर दीक्षा धारण की, सोलह कारण-भावनाओं का चिंतन किया और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध कर समाधिमरण से सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ उन्होंने महान दिव्य सुखों का उपभोग किया।
श्लोक 12 से 23 : धर्मनाथ भगवान् का गर्भ, जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन
सर्वार्थसिद्धि से च्युत होकर वह जीव रत्नपुर के राजा भानु की रानी सुप्रभा के गर्भ में अवतीर्ण हुआ। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और माघ शुक्ल त्रयोदशी को धर्मनाथ भगवान् का जन्म हुआ। इन्द्रों ने उनका जन्माभिषेक किया। उनका शरीर स्वर्ण के समान कान्तिमान, 180 हाथ ऊँचा तथा आयु दस लाख वर्ष की थी। कुमारकाल पूर्ण होने पर उन्हें राज्य प्राप्त हुआ।
श्लोक 24 से 41 : राज्य, वैराग्य एवं दीक्षा
धर्मनाथ भगवान् गुण, दानशीलता, न्यायप्रियता और लोककल्याणकारी प्रवृत्ति से युक्त आदर्श शासक थे। पाँच लाख वर्ष राज्य करने के बाद उल्कापात देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने आत्मस्वरूप का चिंतन किया और वैराग्य धारण किया। पुत्र सुधर्म को राज्य देकर एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के साथ ही उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ तथा धन्यषेण राजा ने उन्हें प्रथम आहार प्रदान किया।
श्लोक 42 से 52 : केवलज्ञान, धर्मप्रवर्तन और मोक्ष
एक वर्ष की साधना के पश्चात् धर्मनाथ भगवान् ने सप्तच्छद वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके विशाल तीर्थ में असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा देव-देवी सम्मिलित थे। उन्होंने धर्म का व्यापक उपदेश दिया। अंत में सम्मेदशिखर पर आठ सौ नौ मुनियों सहित शुक्लध्यान द्वारा समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया।
श्लोक 53 से 61 : धर्मनाथ भगवान् की स्तुति एवं सुमित्र राजा का पराभव
देवों ने निर्वाणोत्सव मनाया और धर्मनाथ भगवान् की स्तुति की। तत्पश्चात् उनके तीर्थकाल में सुदर्शन बलभद्र और पुरुषसिंह नारायण का प्रसंग प्रारम्भ होता है। राजगृह के राजा सुमित्र अत्यन्त अभिमानी और बलवान थे, किन्तु राजसिंह नामक राजा से मल्लयुद्ध में पराजित होकर उनका अभिमान चूर हो गया। इस अपमान से व्यथित होकर उन्होंने राज्य त्याग दिया।
श्लोक 62 से 71 : सुमित्र और नरवृषभ के पूर्वभव
सुमित्र ने कृष्णाचार्य से दीक्षा ली और कठोर तप किया, किन्तु मन में पराजय का क्लेश बना रहा। उन्होंने अगले जन्म में महान बल प्राप्त करने की इच्छा रूप निदान बाँधा और माहेन्द्र स्वर्ग के देव बने। दूसरी ओर नरवृषभ राजा ने वैराग्य लेकर दिगम्बर दीक्षा धारण की और सहस्त्रार स्वर्ग में देव हुए। बाद में वही क्रमशः पुरुषसिंह नारायण और सुदर्शन बलभद्र के रूप में जन्मे।
श्लोक 72 से 81 : मधुक्रीड़ प्रतिनारायण के साथ युद्ध
सुदर्शन बलभद्र और पुरुषसिंह नारायण दोनों भाइयों ने परस्पर प्रेमपूर्वक राज्य किया। हस्तिनापुर के राजा मधुक्रीड़ ने उनसे कर की माँग की। इससे विवाद उत्पन्न हुआ और युद्ध छिड़ गया। दीर्घ संघर्ष के बाद पुरुषसिंह नारायण ने मधुक्रीड़ का वध कर दिया और दोनों भाइयों ने तीन खण्डों पर राज्य स्थापित किया।
श्लोक 82 से 90 : बलभद्र का मोक्ष और मघवा चक्रवर्ती का पूर्वभव
पुरुषसिंह नारायण मृत्यु के बाद सातवें नरक में गया। उसके वियोग से सुदर्शन बलभद्र ने धर्मनाथ भगवान् की शरण लेकर दीक्षा ग्रहण की और मोक्ष प्राप्त किया। इसके बाद तीसरे चक्रवर्ती मघवा का चरित्र आरम्भ होता है। पूर्व जन्म में वे नरपति नामक राजा थे, जिन्होंने तप करके मध्यम ग्रैवेयक में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।
श्लोक 91 से 101 : मघवा चक्रवर्ती का वैराग्य और केवलज्ञान
देवलोक से च्युत होकर नरपति का जीव अयोध्या में मघवा चक्रवर्ती के रूप में जन्मा। उन्होंने छह खण्डों पर राज्य किया और चक्रवर्ती वैभव का उपभोग किया। अभयघोष केवली के उपदेश से उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। पुत्र को राज्य देकर उन्होंने संयम धारण किया, घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान प्राप्त कर धर्म का प्रचार किया।
श्लोक 102 से 112 : मघवा का मोक्ष और सनत्कुमार चक्रवर्ती का उदय
मघवा चक्रवर्ती ने अंततः समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। उनके पश्चात् अयोध्या के राजा अनन्तवीर्य के यहाँ सनत्कुमार चक्रवर्ती का जन्म हुआ। वे अनुपम सौन्दर्य, वैभव और साम्राज्य के स्वामी बने। उनकी रूप-सम्पदा की चर्चा स्वर्ग तक पहुँची और दो देव उनके दर्शन के लिए पृथ्वी पर आए।
श्लोक 113 से 121 : सनत्कुमार का वैराग्य और संयम जीवन
देवों ने सनत्कुमार को स्मरण कराया कि रूप, यौवन और सम्पत्ति नश्वर हैं तथा रोग, जरा और मृत्यु से कोई नहीं बच सकता। यह सुनकर उन्हें गहन वैराग्य हुआ। उन्होंने पुत्र देवकुमार को राज्य देकर शिवगुप्त जिनेन्द्र के समक्ष दीक्षा ग्रहण की। वे अट्ठाईस मूलगुणों और अनेक उत्तरगुणों से विभूषित आदर्श मुनि बने।
श्लोक 122 से 130 : सनत्कुमार की साधना, केवलज्ञान और मोक्ष
सनत्कुमार मुनि ने महान क्षमा, समता, वैराग्य और तप का पालन किया। उन्होंने परिषहों और उपसर्गों को जीतकर अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त कीं तथा क्षपकश्रेणी पर आरूढ़ होकर केवलज्ञान प्राप्त किया। अनेक जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देने के बाद उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर अविनाशी मोक्ष प्राप्त किया। पर्व के अंत में धर्मनाथ तीर्थ के अन्तर्गत धर्मनाथ भगवान्, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के चरित्रों का समापन किया गया है।
पर्व 62
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