राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 43 to 64
श्लोक ( Shlok ) 43 – 45
जम्बूनामापि निर्वेदात्प्रब्रज्याग्रहणोत्सुकः । सहैवाल्पेषु वर्षेषु व्यतीतेषु वयं त्वया ॥ ४३ ॥सर्वे दीक्षां ग्रहीष्याम इति बन्धुजनोदितम् । सोऽशक्नुवनिराकर्तुमायास्यति पुरं तदा ॥ ४४ ॥मोहं विधित्सुभिस्तस्य बन्धुभिः सुखबन्धनः । ‘आरप्स्यते विवाहस्तैः श्रेयो विघ्ना हि बन्धवः ॥४५॥
उसी समय जम्बूकुमार भी विरक्त होकर दीक्षा ग्रहण करनेके लिए उत्सुक होगा परन्तु भाई-बन्धु लोग उसे समझावेंगे कि थोड़े ही वर्षोंके व्यतीत होने-पर हम लोग भी तुम्हारे ही साथ दीक्षा धारण करेंगे। भाई-बन्धुओंके इस कथनको वह टाल नहीं सकेगा और उस समय पुनः नगर में वापिस आ जावेगा। तदनन्तर भाई-बन्धु लोग उसे मोहमेंफँसानेके लिए सुखदायी बन्धन स्वरूप उसका विवाह करना प्रारम्भ करेंगे सो ठीक ही है क्योंकि भाई-बन्धु लोग कल्याणमें विघ्न्न करते ही हैं ।॥ ४३-४५ ।।
“At that very time, Jambukumar will also grow detached from the world and become eager to accept ascetic initiation (diksha). However, his kinsmen and relatives will reason with him, saying that after a few years have passed, they too will embrace initiation along with him. He will not be able to decline this plea from his relatives and will consequently return to the city. Thereupon, in order to entangle him in worldly attachment (moha), his family will begin making arrangements for his marriage as a form of pleasant bondage. This is indeed true, for worldly relatives often pose obstacles to one’s spiritual well-being. || 43–45 ||”
श्लोक ( Shlok ) 46 – 57
सुता सागरदशस्य पद्मावत्यां सुलक्षणा । पद्मश्रीरपरा श्रीर्वा कनकश्रीः शुभेक्षणा ॥ ४६ ॥सुता कुबेरदशस्य जाता कनकमालया । वीक्ष्या विनयवत्याश्च या वैश्रवणदराजा ॥ ४७ ॥विनयश्री रैदत्तस्य रूपश्रीश्च धनश्रियः । आभिः सागरदत्तादिपुत्रिकाभिर्यथाविधि ॥ ४८ ॥सौधागारे निरस्तान्धकारे सन्भणिदीप्तिभिः । विचित्ररत्नसङ्कर्णरङ्ग वल्लीविभूषिते ॥ ४९ ॥नानासुरभिपुष्पोपहाराज्ये जगतीतले । स्थास्यस्याप्तविवाहोऽयं पाणिग्रहणपूर्वकम् ॥ ५० ॥सुतो मसार्य रागेण प्रेरितो विकृतिं भजन् । स्मितहासकटाक्षेक्षणादिमान्कि भवेन वा ॥ ५१ ॥इत्यात्मानं तिरोधाय पश्यन्ती स्थास्यति लिहा । माता तस्य तदैवैकः पापिष्ठः प्रथमर्माशकः ॥ ५२ ॥सुरम्यविषये ख्यातपौदनाख्यपुरेशिनः । विद्युद्राजस्य तुग्विद्युत्प्रभो नाम ‘भटाग्रणीः ॥ ५३ ॥तीक्ष्णो विमलवत्याच क्रध्वा केनापि हेतुना । निजाग्रजाय निर्गत्य तस्मात्पञ्चशतैर्भटैः ॥ ५४ ॥विद्यच्चोराह्वयं कृत्वा स्वस्य प्राप्य पुरीमिमाम् । जाननदृश्यदेहत्वकवाटाद्घाटनादिकम् ॥ ५५ ॥चोरशास्त्रोपदेशेन तन्त्रमन्त्रविधानतः । अर्हद्दासगृहाभ्यन्तरस्थं चोरयितुं धनम् ॥ ५६ ॥प्रविश्य नष्टनिद्रान्तां जिनदासीं विलोक्य सः । निवेद्यात्मानमेवं किं विनिद्रासीति वक्ष्यति ॥ ५७ ॥
इसी नगरमें सागरदत्त सेठकी पद्मावती श्रीसे उत्पन्न हुई उत्तम लक्षणोंवाली पद्मश्री नामकी कन्या है जोकि दूसरी लक्ष्मीके समान जान पड़ती है। इसी प्रकार कुबेरदत्त सेठकी कनकमाला स्त्रीसे उत्पन्न हुई शुभ नेत्रोंवाली कनकश्री नामकी कन्या है। इसके अतिरिक्त वैश्रवणदत्त सेठकी विनयवती स्त्रीसे उत्पन्न हुई देखनेके योग्य विनयश्री नामकी पुत्री है और इसके सिवाय धनद्रत सेठकी धनश्री स्त्रीसे उत्पन्न हुई रूपश्री नामकी कन्या है। इन चारों पुत्रियोंके साथ उसका विधि पूर्वक विवाह होगा । तदनन्तर पाणिग्रहण पूर्वक जिसका विवाह हुआ है ऐसा जम्बूकुमार, उत्तम मणिमय दीपकोंके द्वारा जिसका अन्धकार नष्ट हो गया है, जो नाना प्रकारके रत्नोंके चूर्णसे निर्मित रङ्गावलीसे सुशोभित है और अनेक प्रकारके सुगन्धित फूलोंके उपहारसे सहित है ऐसे महलके भीतर पृथिवी तलपर बैठेगा। ‘मेरा यह पुत्र रागसे प्रेरित होकर विकार भावको प्राप्त होता हुआ मन्द मुसकान तथा कटाक्षावलोकन आदिसे युक्त होता है या नहीं’ यह देखनेके लिए उसकी माता स्नेह वश अपने आपको छिपाकर वहीं कहीं खड़ी होगी। उसी समय सुरम्य देशके प्रसिद्ध पोदनपुर नगरके स्वामी विद्युद्राजकी रानी विमलमता से उत्पन्न हुआ विद्युत्प्रभ नामका चोर आवेगा। वह विद्युत्प्रभ महापापी तथा नम्बर एकका चोर होगा, शूरवीरोंमें अग्रेसर तथा तीक्ष्ण प्रकृतिका होगा। वह किसी कारण वश अपने बड़े भाईसे कुपित होकर पाँच-सौ योद्धाओंके साथ नगरसे निकलेगा और विद्युच्चोर नाम रखकर इस नगरी-में आवेगा। वह चोर शास्त्रके अनुसार तन्त्र-मन्त्र के विधानसे अदृश्य होकर किवाड़ खोलना आदि सब कार्योंका जानकार होगा और सेठ अर्हद्दासके घरके भीतर रखे हुए धनको चुरानेके लिए इसीके घर आवेगा। वहाँ जम्बूकुमारकी माताको निद्रारहित देखकर वह अपना परिचय देगा और कहेगा कि तू इतनी रात तक क्यों जाग रही है ? ।। ४६-५७ ॥
“In this very city, there is a daughter named Padmashri—endowed with excellent virtues and appearing like a second goddess Lakshmi—born to Seth Sagardatta and his wife Padmavati. Similarly, born to Seth Kuberadatta and his wife Kanakamala, there is a beautiful-eyed daughter named Kanakashri. In addition, born to Seth Vaishravanadatta and his wife Vinayavati, there is a daughter named Vinayashri who is truly a sight to behold; and furthermore, born to Seth Dhanadatta and his wife Dhanashri, there is a daughter named Rupashri. He will be wedded to these four daughters in accordance with traditional rites.
Thereafter, having taken their hands in marriage, Jambukumar will sit on the floor inside a palace where darkness has been dispelled by excellent jewel-studded lamps, which is adorned with colorful patterns made from various gemstone powders, and is fragrant with offerings of diverse aromatic flowers. Driven by maternal affection, his mother will hide herself nearby and stand watching, curious to see: ‘Does this son of mine, stirred by passion, yield to desire and engage in gentle smiles and amorous glances?’
At that very moment, a thief named Vidyutprabha will arrive. He is the son of Queen Vimalamati and King Vidyudraja, the ruler of Podanpur, a famous city in the beautiful Suramya region. This Vidyutprabha will be a great sinner and a master thief, foremost among warriors and of a fierce disposition. Having become enraged at his elder brother for some reason, he will leave his city along with five hundred warriors, adopt the name ‘Vidyut-chor’ (the lightning thief), and arrive in this city. Skilled in the occult sciences, charms, and spells (tantra-mantra), he will be well-versed in vanishing from sight and opening locked doors. He will enter the house of Seth Arhaddasa with the intent to steal the wealth kept inside. Finding Jambukumar’s mother awake there, he will introduce himself and ask, ‘Why are you staying awake so late into the night?’ || 46–57 ||”
श्लोक ( Shlok ) 58 – 64
सूनुर्ममैक एवायं प्रातरेव तपोवनम् । अहं “गमीति सङ्कल्प्य स्थितस्तेनास्मि शोकिनी ॥ ५८ ॥धीमानसि यदीमं स्त्वं व्यावयस्वाग्रहात्ततः । उपायैश्च ते सर्व धनं दास्याम्यभीप्सितम् ॥ ५९ ॥इति वक्त्री भवेत्सापि सोऽपि सम्प्रतिपद्य तत् । एवं सम्पन्नभोगोऽपि किलैष विरिरंसति ॥ ६० ॥धियां धनमिहाहतुं प्रविष्टमिति निन्दनम् । स्वस्य कुर्वन्गताशङ्कः सम्प्राप्यानु तदन्तिकम् ॥ ६१ ॥कन्यकानां कुमारं तं तासां मध्यमधिष्ठितम् । विजम्भमाणसद्बुद्धिं पञ्जरस्थमिवाण्डजम् ॥ ६२ ॥जाललग्नैणपोतं वा भद्रं वा कुञ्जराधिपम् । अपारकर्दमे मनं सिंहं वा लोहपअरे ॥ ६३ ॥ निरुद्धं लब्धनिर्वेगं प्रत्यासन्नभवक्षयम् । विद्युच्चोरः समीक्ष्यैवं वक्तोष्ट्राख्यानकं सुधीः ॥ ६४ ॥
इसके उत्तर में जिनदासी कहेगी कि ‘मेरे यही एक पुत्र है और यह भी संकल्प कर बैठा है कि मैं सवेरे ही दीक्षा लेनेके लिए तपोवनको चला जाऊँगा’ इसीलिए मुझे शोक हो रहा है। यदि तू बुद्धिमान् है और किन्हीं उपायोंसे इसे इस आग्रहसे बुढ़ाता है-इसका दीक्षा लेनेका आग्रह दूर करता है तो आज मैं तुझे तेरा मनचाहा सब धन दे दूँगी। जिनदासीकी बात सुनकर विद्युच्चोरने यह कार्य करना स्वीकृत किया । तदनन्तरवह विचार करने लगा कि देखा यह जम्बूकुमार सब प्रकारकी भोग-सामग्री रहते हुए भी विरक्त होना चाहते हैं और मैं यहाँ धन चुरानेके लिए प्रविष्ट हुआ हूँ मुझे धिक्कार हो। इस प्रकार अपनी निन्दा करता हुआ वह विद्युच्चोर निःशङ्क होकर, कन्याओंके बीच में बैठे हुए जीवन्धर कुमारके समीप पहुँचेगा। उस समय जिसे सद्बुद्धि उत्पन्न हुई है ऐसा जम्बूकुमार, उन कन्याओंके बीचमें बैठा हुआ ऐसा जान पड़ता था मानो पिंजरेके भीतर बैठा हुआ पक्षी ही हो अथथा जालमें फँसा हुआ हरिणका बच्चा ही हो अथवा बहुत भारी कीचड़में फँसा हुआ उत्तम जातिवाला गजराज ही हो, अथवा लोहेके पिंजरे में रुका हुआ सिह ही हो। वह अत्यन्त विरक्त था और उसके संसार भ्रमणका क्षय अत्यन्त निकट था। ऐसे उस जम्बूकुमारको देखकर बुद्धिमान् विद्युच्चोर ऊँटकी कथा कहेगा ।। ५८-६४॥
“In response, Jindasi will say, ‘He is my only son, and he has firmly resolved that he will leave for the penance-forest tomorrow morning to accept ascetic initiation (diksha). That is why I am grieving. If you are wise and can somehow dissuade him from this stubborn resolve—removing his desire for renunciation—I will give you all the wealth your heart desires today.’ Hearing Jindasi’s words, Vidyut-chor agreed to undertake this task.
Thereafter, he began to reflect: ‘Look at this Jambukumar, who wishes to renounce the world despite possessing every material pleasure, while I have entered here merely to steal wealth. Fie upon me!’ Reaffirming his self-reproach, the thief Vidyut-chor will fearlessly approach Jambu Swami, who sits in the midst of the young brides. At that moment, Jambukumar, endowed with right understanding, appeared in the midst of those girls like a bird trapped inside a cage, or a fawn caught in a net, or a noble elephant stuck in deep mire, or a lion confined within an iron cage. He was deeply detached, and the end of his wandering in the cycle of transmigration (samsara) was exceedingly near. Beholding Jambukumar in such a state, the intelligent Vidyut-chor will narrate the allegory of the camel. || 58–64 ||”
श्लोक 65 से 72
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
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वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42
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