चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 223 to 241
श्लोक ( Shlok ) 223
सविषं वाशनं मित्रं कृतप्नं वा सहिंसकम् । धर्म वाशर्मंदं राज्यं तदैयः सचिवाधमः ॥ २२३ ॥
उस नीच मन्त्री ने विष मिले हुए भोजनके समान, कृतघ्न मित्रके समान अथवा हिंसक धर्मके समान दुःख देने वाला वह राज्य प्राप्त किया था ॥२२३॥
“That wretched minister obtained the kingdom which, like poisoned food, an ungrateful friend, or a violent religion, brought nothing but misery and sorrow. || 223 ||”
श्लोक ( Shlok ) 224
अतो विजयदेवी च यन्त्रमारुह्य गारुडम् । शोकाग्निदह्यमानाङ्गी रुदन्ती यक्षिरक्षिता ॥ २२४ ॥
इधर विजया महादेवी गरुड़ यन्त्रपर बैठकर चली। शोक रूपी अग्निसे उसका सारा शरीर जल रहा था और वह रो रही थी परन्तु यक्षी उसकी रक्षा कर रही थी ॥२२४॥
“Meanwhile, Queen-Mother Vijaya traveled along, seated upon the mechanical Garuda (Garuda Yantra). Her entire body was burning with the fire of grief, and she wept bitterly, yet the Yakshi continued to protect her. || 224 ||”
श्लोक ( Shlok ) 225 – 227
ब्रणवक्त्रगलद्धारालोहिताक्रान्तशूलकैः । शूलनिर्भेदसम्भूतवेदनालुलितासुकैः ॥ २२५ ॥ कम्पमानैरधोवक्त्रैः स्तेनैर्नानाविधै रवैः । सामिदग्धं शवं वह्नेराकृष्याच्छिद्य खण्डशः ॥ २२६ ॥ कृत्तिकाभिनिशाताभिर्वाकिनीभिः समन्ततः । खादन्तीभिश्व सङ्कीर्ण पितृणामगमद् वनम् ॥ २२७ ॥
इस प्रकार चलकर वह विजया रानी उस श्मशानभूमिमें जा पहुँची जहाँ घावोंके अग्रभागसे निकलती हुई खूनकी धाराओंसे शूल भींग रहे थे, शूल छिद जाने से उत्पन्न हुई वेदनासे जिनके प्राण निकल गये हैं तथा जिनके मुख नीचेकी ओर लटक गये हैं ऐसे चोर जहाँ नाना प्रकारके शब्द कर रहे थे। कहींपर डाकिनियाँ अधजले मुरदेको अग्निमेंसे खींचकर और तीक्ष्ण छुरियोंसे खण्ड-खण्ड कर खा रही थीं। ऐसी ढाकिनियोंसे वह श्मशान सब ओरसे व्याप्त था ।। २२५-२२७ ।।
“Traveling in this manner, Queen Vijaya arrived at that cremation ground where the impaling stakes were drenched in streams of blood flowing from the tips of wounds; where thieves, whose lives had departed due to the agony caused by being pierced by stakes, were making various dreadful sounds with their heads hanging downward; and which was pervaded on all sides by female goblins (Dakinis) who, dragging half-burnt corpses out of the fire, were hacking them to pieces with sharp knives and devouring them. || 225-227 ||”
श्लोक ( Shlok ) 228
तन्त्र रात्रौ कृतारक्षा यक्ष्या विगतबाधिका । अलब्ध तनयं कान्तं द्यौरिवामृतदीधितिम् ॥ २२८ ॥
उस श्मशानमें यक्षी रातभर उसकी रक्षा करती रही जिससे उसे रञ्चमात्र भी कोई बाधा नहीं हुई। जिस प्रकार आकाश चन्द्रमाको प्राप्त करता है उसी प्रकार उस रानीने उसी रात्रिमें एक सुन्दर पुत्र प्राप्त किया ॥ २२८ ॥
“In that cremation ground, the Yakshi protected her throughout the night so that she did not experience the slightest hindrance. Just as the night sky receives the moon, the queen gave birth to a beautiful son during that very night. || 228 ||”
श्लोक ( Shlok ) 229 – 241
नाभूदस्यास्ततोऽल्पोऽपि पुत्रोत्पत्तिसमुत्सवः । शोकः प्रत्युत सम्भूतो विलोमविधिवर्धितः ॥ २२९ ॥ सद्यो यक्षी च सुस्थाप्य समन्तान्मणिदीपिकाः । शोकाकुलां विलोक्यैनां दावालीडलतोपमाम् ॥२३०॥ सर्वस्थानानि दुःस्थानि गस्वर्यो यौवनश्रियः । विध्वंसी बन्धुसम्बन्धो जीवितं दीपसञ्चलम् ॥ २३१ ॥ कायः सर्वाशुचिप्रायो हेयोऽयमिह धीमताम् । राज्यं सर्वजगत्पूज्यं विद्यदुद्योतसन्निभम् ॥ २३२ ॥ पर्यायेष्वेव सर्वेषां प्रीतिः सर्वेषु वस्तुषु । तेऽवश्यं नश्वरास्तस्मात्प्रीतिः पर्यन्ततापिनी ॥ २३३ ॥ सत्यप्यर्थे रतिर्न स्यात् स्वयं वासति चेप्सिते । सति स्वस्मित्रतौ चासौ त्रयाणां वा स्थिते क्षतिः ॥ २३४॥ यस्य निष्क्रममाक्रम्य विश्वं विज्ञप्तिरीक्षते । नेक्षितं स्थास्नु तेनापि कापि किञ्चित्कदाचन ॥ २३५ ॥ सत्सु भाविषु च प्रीतिरस्ति चेदस्तु वस्तुषु । वृथा प्रथयति प्रीतिं विनष्टेषु सुधीः स कः ॥ २३६ ॥इति संसारसद्भावं विचिन्त्य विजये प्रिये । शुचं मा गा व्यतीतेषु कृथाः प्रीतिञ्च मा वृथा ॥ २३७ ॥श्रीमानामुक्तिपर्यत सुतोऽयमुदितोदितः । निइत्यारातिदुर्वृत्तं मोदं ते जनयिष्यति ॥ २३८ ॥ जाहि चित्तं समाधेहि योग्यमाहारमाहर । किं वृथानेन शोकेन धिग्देहक्षयकारिणा ॥ २३९ ॥गत्यन्तरेऽपि ते भर्ता न हि शोकेन लभ्यते । गतयो भिन्नवर्मानः कर्मभेदेन देहिनाम् ॥ २४० ॥इत्यादियुक्तिमद्वाग्भिः संविधाय विशोकिकाम् । पार्श्वे तस्याः स्वयं सास्थात्सतां सौहार्दमीदृशम् ॥२४१॥
उस समय विजया महारानीको पुत्र उत्पन्न होनेका थोड़ा भी उत्सव नहीं हुआ था किन्तु भाग्यकी प्रतिकूलतासे बढ़ा हुआ शोक ही उत्पन्न हुआ था। यक्षीने सब ओर शीघ्र ही मणिमय दीपक रख दिये और दावानलसे झुलसी हुई लत्ताके समान महारानीको शोकाकुल देखकर निम्न प्रकार उपदेश दिया। वह कहने लगी कि इस संसारमें सभी स्थान दुःखसे भरे हैं, यौवनकी लक्ष्मी नश्वर है, भाई-बन्धुओंका समागम नष्ट हो जाने वाला है, जीवन दीपकके समान चञ्चल है, यह शरीर समस्त अपवित्र पदार्थोंसे भरा हुआ है अतः बुद्धिमान् पुरुषोंके द्वारा हेय है-छोड़ने योग्य है। जिसकी समस्त संसार पूजा करता है ऐसा यह राज्य बिजलीकी चमकके समान है। सब जीवोंकी समस्त वस्तुओंकी पर्यायोंमें ही प्रीति होती है परन्तु वे पर्याय अवश्य ही नष्ट हो जाती हैं इसलिए उनमें की हुई प्रीति अन्तमें सन्ताप करने वाली होती है। अनिष्ट पदार्थके रहते हुए भी उसमें प्रीति नहीं होती और इष्ट पदार्थके रहते हुए उस पर अपना अधिकार नहीं होता तथा अपने आपमें प्रीति होनेपर पदार्थ, इष्टपना एवं अधिकार इन तीनोंकी ही स्थितिका क्षय हो जाता है। जिनका ज्ञान बिना किसी क्रमके एक साथ समस्त पदार्थोंको देखता है उन्होंने भी नहीं देखा कि कहीं कोई पदार्थ स्थायी रहता है। यदि विद्यमान और होनहार वस्तुओंमें प्रेम होता है तो भले ही हो परन्तु जो नष्ट हुई वस्तुओंमें भी प्रेम करता है उसे बुद्धिमान् कैसे कहा जा सकता है ? इसलिए हे विजये ! संसारके स्वरूपका विचारकर शोक मत कर, और अतीत पदार्थो में व्यर्थ ही प्रीति मत कर । तेरा यह पुत्र बहुत ही श्रीमान् है और मोक्ष प्राप्ति पर्यन्त इसका अभ्युदय निरन्तर बढ़ता ही रहेगा। यह दुराचारी शत्रुको नष्टकर अवश्य ही तुझे आनन्द उत्पन्न करेगा। तू स्नान कर, चित्तको स्थिर कर और योग्य आहार ग्रहण कर। शरीरका क्षय करने वाला यह शोक करना वृथा है, इस शोकको धिक्कार है, शोक करनेसे इस पर्यायकी बात तो दूर रही, दूसरी पर्यायमें भी तेरा पति तुझे नहीं मिलेगा क्योंकि अपने-अपने कर्मोंमें भेद होनेसे जीवोंकी गतियाँ भिन्न-भिन्न हुआ करती हैं। इत्यादि युक्ति भरे वचनों से यक्षीने विजया रानीको शोक रहित कर दिया । इतना ही नहीं वह स्वयं रात्रिभर उसके पास ही रही सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंकी मित्रता ऐसी ही होती है १॥ २२९ -२४१ ।।
“At that moment, Queen Vijaya experienced not the slightest celebration upon the birth of her son; rather, due to the adversity of fate, only intensified grief arose within her. The Yakshi quickly placed gem-studded lamps all around, and seeing the Queen-Mother overwhelmed with sorrow like a creeper scorched by a forest fire, she gave her the following discourse.
She began to say, ‘In this world, all realms are filled with suffering, the fortune of youth is transient, the company of kinsmen and brothers is destined to perish, life is as fickle as a flickering lamp, and this body is filled with all kinds of impure substances, making it fit to be renounced by wise men. This kingship, which the entire world worships, is like a flash of lightning. All living beings form an attachment only to the transient states (Paryayas) of things, but those states are bound to perish; therefore, the attachment formed toward them ultimately results in deep torment. Even when an undesirable object exists, one has no love for it; and while a desirable object exists, one has no true control over it. Furthermore, when one is anchored in self-love, the very existence of the object, its desirability, and one’s control over it—all three come to an end. Even the Omniscient Lords, whose knowledge perceives all substances simultaneously and without sequence, have never seen any object remain permanent anywhere. If one feels love for existing and future things, so be it; but how can a person who clings to past things that have already been destroyed be called wise?
Therefore, O Vijaya! Reflecting upon the true nature of this world, do not grieve, and do not harbor vain attachments for things that are gone. This son of yours is exceedingly glorious, and his prosperity will continuously increase until he attains final liberation (Moksha). He will surely destroy the wicked enemy and bring you boundless joy. Now, bathe, compose your mind, and take suitable nourishment. This grief, which wastes the body away, is futile—fie upon this sorrow! By grieving, leave alone this lifetime, you will not find your husband even in your next birth, for the destinies of living beings vary according to the differences in their respective karmas.’
With these and other reason-filled words, the Yakshi relieved Queen Vijaya of her grief. Not only this, she herself remained by her side throughout the night. This is indeed fitting, for such is the friendship of the righteous. || 229-241 ||”
श्लोक 242 से 250
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