चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 513 to 524
श्लोक ( Shlok ) 513
तद्दानफलमालोक्य वनराजः स्वजन्मनः । सम्बन्धं यग्रथावृत्तं स तत्सर्वमवागमत् ॥ ५१३ ॥
उस दानका फल देखकर वनराजको अपने पूर्व जन्मका सब वृत्तान्त ज्योंका त्यों याद आ गया ।। ५१३ ।।
“Seeing the fruit (result) of that charity, Vanaraja remembered the entire history of his previous birth exactly as it was.”513
श्लोक ( Shlok ) 514
बलेन महता योद्ध हरिविक्रममागतम् । यक्षस्तञ्च समादाय कुमारस्य करेऽकरोत् ॥ ५१४ ॥
उधर हरिविक्रम अपने पुत्र वनराजको कैद हुआ सुनकर बड़ी भारी सेनाके साथ युद्ध करनेके लिए आ रहा था सो यक्षने उसे भी पकड़कर जीवन्धर कुमारके हाथमें दे दिया ।। ५१४ ।।
“Meanwhile, hearing that his son Vanaraja had been imprisoned, Harivikrama was coming with a massive army to wage war; so the Yaksha captured him as well and handed him over to Prince Jivandhara.”514
श्लोक ( Shlok ) 515 – 517
वनराजस्तदाशेषं सर्वेषामित्यथाब्रवीत् । जन्मनीतस्तृतीयेहं बभूव वणिजां ‘सुतः ॥ ५१५ ॥सुवर्णतेजास्तस्माच्च मृत्वा मार्जार तांगतः । कपोतीं प्राग्भवे कन्यामिमां हंन्तुं समुद्यतः ॥ ५१६ ॥केनचिन्मुनिनाधीतचतुर्गतिगतश्रुतेः । मुक्तवैरोऽन्न भूत्वैतत्स्नेहादेनामनीनयम् ॥ ५१७ ॥
तदनन्तर वनराजने सबके सामने अपना समस्त वृत्तान्त इस प्रकार निवेदन किया कि ‘मैं इस जन्मसे तीसरे जन्ममें सुवर्णतेज नामका वैश्य-पुत्र था। वहाँ से मरकर बिलाव हुआ। उस समय इस श्रीचन्द्राका जीव कबूतरी था इसलिए इसे मारनेका मैंने उद्यम किया था। किसी समय एक मुनिराज चारों गतियोंके भ्रमणका पाठ कर रहे थे उसे सुनकर मैंने सब वैर छोड़ दिया और मरकर यह वनराज हुआ हूं। पूर्व भवके स्नेहसे ही मैंने इस श्रीचन्द्राका हरण किया था’ ।। ५१५-५१७ ।।
“Thereafter, Vanaraja related his entire history in front of everyone as follows: ‘Two births before this present one, I was the son of a Vaishya named Suvarnateja. Dying from that state, I was reborn as a wild cat. At that time, the soul of this Shrichandra was a female pigeon, and therefore I had attempted to kill her. Once, upon hearing a holy monk reciting a text on the wanderings through the four realms of existence, I abandoned all hostility, and after dying, I became this Vanaraja. It was solely due to the affection from that past life that I had abducted this Shrichandra.'”515 – 517
श्लोक ( Shlok ) 518
तदुक्त ते समाकर्ण्य नायं कन्यामनीनयत् । दर्पेण किन्तु सम्प्रीत्ये त्यवधार्य शमङ्गता ॥ ५१८ ॥
वनराजका कहा सुनकर सब लोगोंने निश्चय किया कि इसने अहंकारसे कन्याका अपहरण नहीं किया है किन्तु पूर्वभवके स्नेहसे किया है ऐसा सोचकर सब शान्त रह गये ।। ५१८ ॥
“Hearing what Vanaraja said, everyone concluded that he had not abducted the maiden out of arrogance, but rather out of the affection of a past life; thinking thus, everyone fell silent and calm.”518
श्लोक ( Shlok ) 519
पितरं वनराजस्य तञ्च निर्मुक्तबन्धनम् । कत्वा विसर्जयाञ्चक्रर्धार्मिकत्वं हि तत्सताम् ॥ ५१९ ॥
और वनराज तथा उसके पिताको बन्धनरहित कर छोड़ दिया सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंका धार्मिकपना यही है ॥ ५१९ ॥
“And having freed Vanaraja and his father from captivity, they released them; this is indeed fitting, because this is precisely the righteousness of virtuous souls.”519
श्लोक ( Shlok ) 520 – 524
ततो राज्ञः पुरं गत्वा स्थित्वा द्वित्रिदिनानि ते । गत्वा नगरशोभाख्ये श्रीचन्द्रां बन्धभागिनीम् ॥५२०॥नन्दान्याय ददुर्भूरिभूत्या यूने धनेशिने । एवं विवाहनिर्वृत्तौ हेमाभं बन्धुभिः समम् ॥ ५२१ ॥पुरं प्रत्यागमे सत्यन्धरसूनुं निवेश्य तम् । कस्यचित्सरसस्तीरे तत्रानेतुं जलं गताः ॥ ५२२ ॥परिवारजना दष्टा दुष्टैर्गन्धिलमाक्षिकैः । तद्भयाद्बोधयन्ति स्म जीवन्धरकुमारकम् ॥ ५२३ ॥तदाकर्ण्य विचिन्त्यैतत्कुमारोऽपि सविस्मयः । हेतुरस्त्यत्र कोऽपीति तज्ज्ञातुं यक्षमस्मरत् ॥ ५२४ ॥
इसके बाद वे सब लोग राजाके नगर (हेमाभनगर) में गये वहाँ दो तीन दिन ठहरकर फिर नगरशोभा, नामक नगर में गये। वहाँ कल्याण-रूप भाग्यको धारण करनेवाली श्रीचन्द्रा बड़ी विभूतिके साथ धनके स्वामी युवक नन्दाढ्यको प्रदान की। इस प्रकार विवाहकी विधि समाप्त होनेपर भाई-बन्धुओंके साथ फिर सब लोग हेमाभ नगरको लौटे। मार्गमें किसी सरोवरके किनारे ठहरे। वहाँपर परिवारके लोग जीवन्धर कुमारको बैठाकर उस सरोवरमें जल लेनेके लिए गये। वहाँ जाते ही मधु-मक्खियोंने उन लोगोंको काट खाया तब उन लोगोंने उनके भयसे लौटकर इसकी खबर जीवन्धर कुमारको दी। यह सुनकर तथा विचारकर जीवन्धर कुमार आश्चर्यमें पड़ गये और कहने लगे कि इसमें कुछ कारण अवश्य है ? कारणका पता चलानेके लिए उन्होंने उसी समय यक्षका स्मरण किया ।। ५२०-५२४ ।।
After this, all of them went to the king’s city (Hemabhagar). After staying there for two or three days, they proceeded to the city named Nagarshobha. There, Shrichandra, who possessed an auspicious fortune, was wedded with great grandeur to the young Nandadhya, the master of wealth. In this manner, upon the completion of the wedding rituals, everyone returned to Hemabh Nagar along with their kinsmen and relatives.
On their way, they stopped by the bank of a lake. Leaving Prince Jivandhara seated there, the family members went to fetch water from the lake. As soon as they approached it, they were stung by bees. Fleeing from them in fear, they returned and informed Prince Jivandhara about the incident. Hearing this and contemplating it, Prince Jivandhara was struck with wonder and remarked, “There must certainly be a reason behind this.” To uncover the cause, he immediately meditated upon and summoned the Yaksha. (520-524)
श्लोक 525 से 542
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73


