मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 82 to 92
श्लोक ( Shlok ) 82
तं वीक्ष्य न विपक्षोऽस्य तयाप्येषोऽगमल्लयम् । सम्पत्सु सर्वविद्विट्स का स्थैर्यास्था विवेकिनः ॥ ८२ ॥
उसे देखकर चक्रवर्ती विचार करने लगा कि इस बादलका यद्यपि कोई शत्रु नहीं है तो भी यह नष्ट हो गया फिर जिनके सभी शत्रु हैं ऐसी सम्पत्तियों में विवेकी मनुष्यको स्थिर रहनेकी श्रद्धा कैसे हो सकती है ? ॥ ८२ ॥
“Looking at it, the emperor (Chakravarti) began to reflect: ‘Even though this cloud had no enemies, it was still destroyed. How then can a wise, discerning person put faith in the stability of worldly wealth and prosperity, which are surrounded by enemies on all sides?’ || 82 ||”
श्लोक ( Shlok ) 83 – 84
इति चक्री समालोच्य संयमेऽभूद्रतस्तदा । सुकेतुः कुलवृद्धोऽस्य नान्ना दुश्चरितोऽब्रवीत् ॥ ८३ ॥राज्यसम्प्राप्तिकालस्ते कनीयान् नवयौवनः । भोगान् भुङ्क्ष्व न कालोऽयं तपसः किं विधीर्भवेः ॥८४॥
ऐसा विचार कर चक्रवर्ती संयम धारण करनेमें तत्पर हुआ ही था कि उसी समय उसके कुलका वृद्ध दुराचारी सुकेतु कहने लगा कि यह तुम्हारा राज्य-प्राप्तिका समय है, अभी तुम छोटे हो, नवयौवनके धारक हो, अतः भोगोंका अनुभव करो, यह समय तपके योग्य नहीं है, व्यर्थ ही निबुद्धि क्यों हो रहे हो ? ।। ८३-८४ ।।
“Reflecting thus, the emperor was just about to commit himself to self-restraint (asceticism), when at that very moment, Suketu—an elder of his lineage who was wicked in conduct—said to him: ‘This is your time to enjoy the kingdom. You are still young, in the prime of your youth; therefore, experience the pleasures of life. This is not the age for penance. Why are you needlessly losing your mind?'” || 83-84 ||
श्लोक ( Shlok ) 85
केनापि तपसा कार्य किं वृथाऽऽयासमात्रकम् । नात्र किञ्चित्फलं नैव परलोकश्च कश्चन ॥ ८५ ॥
किसी भी तपसे क्या कुछ कार्य सिद्ध होता है। व्यर्थ ही कष्ट उठाना पड़ता है, इसका कुछ भी फल नहीं होता और न कोई परलोक ही है ।॥ ८५ ॥
“Does any kind of penance ever accomplish anything? One only has to endure suffering in vain; it yields no fruit whatsoever. Furthermore, there is no such thing as an afterlife.” || 85 ||
श्लोक ( Shlok ) 86 – 88
कथन्न परलोकश्चेदभावात्परलोकिनः । पञ्चभूतात्मके काये चेतना मदशक्तिवत् ॥ ८६ ॥पिष्टकिण्वादिसंयोगे तदात्मोक्तिः खपुष्पवत् । ततः प्रेत्योपभोगादिकाङ्क्षा स्वकृतकर्मणः ॥ ८७ ॥वन्ध्यास्तनन्धयस्येव खपुष्पापीडलिप्सनम् । आग्रहोऽयं परित्याज्यो राज्यं कुरु निराकुलम् ॥ ८८ ॥
परलोक क्यों नहीं है यदि यह जानना चाहते हो तो सुनो, जब परलोकमें रहनेवाले जीवका ही अभाव है तब परलोक कैसे सिद्ध हो जावेगा ? जिस प्रकार आटा और किण्व आदिके संयोगसे मादक शक्ति उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार पञ्चभूतसे बने हुए शरीरमें चेतना उत्पन्न हो जाती है इसलिए आत्मा नामका कोई पदार्थ है ऐसा कहना आकाश-पुष्पके समान है। जब आत्मा ही नहीं है तब मरनेके बाद अपने किये हुए कर्मका फल भोगने आदिकी आकांक्षा करना वन्ध्यापुत्रके आकाश-पुष्पका सेहरा प्राप्त करनेकी इच्छाके समान है। इसलिए यह तप’ करनेका आग्रह छोड़ो और निराकुल होकर राज्य करो ॥ ८६-८८ ॥
“If you want to know why there is no afterlife, then listen: when the very soul (jiva) that is supposed to reside in the afterlife does not exist, how can an afterlife be proven? Just as an intoxicating power arises naturally from the combination of flour and fermenting yeast, consciousness is produced within a body made of the five elements. Therefore, to say that an object called ‘the soul’ exists is like speaking of a flower blooming in the sky (an absolute impossibility). When the soul itself does not exist, then yearning to reap the fruits of one’s actions after death is like a barren woman’s son wishing to wear a garland made of sky-flowers. Therefore, abandon this stubborn insistence on penance, and rule the kingdom free from anxiety.” || 86-88 ||
श्लोक ( Shlok ) 89
सत्यप्यात्मनि कौमारे सुकुमारः कथं तपः । सहसे निष्ठुरं देव अपुष्करैरपि दुष्करम् ॥ ८९ ॥
इसके सिवाय दूसरी बात यह है कि यदि किसी तरह जीवका अस्तित्व मान भी लिया जाय तो इस कुमारावस्थामें जब कि आप अत्यन्त सुकुमार हैं जिसे प्रौढ़ मनुष्य भी नहीं कर सकते ऐसे कठिन तपको किस प्रकार सहन कर सकेंगे ? ॥ ८९ ॥
“Apart from this, there is another point: even if, for the sake of argument, the existence of the soul were somehow accepted, you are currently in your youth and are exceedingly delicate. How will you be able to endure such rigorous penance—something that even mature, fully grown adults cannot perform?” || 89 ||
श्लोक ( Shlok ) 90 – 92
इत्युक्तं तदमात्यस्य स श्रुत्वा शून्यवादिनः । रूपादिरूप एवात्र भूतसङ्घोऽभिलक्ष्यते ॥ ९० ॥सुखदुःखादिसंवेद्यं चैतन्यं तद्विलक्षणम् । तद्वान् देहादिहान्योऽयं स्वसंवित्यानुभूयते ॥ ९१ ॥बुद्धिपूर्वक्रिया लिङ्गादन्यत्राप्यनुमीयते । अस्त्यात्मा भाविलोकश्च सत्त्वाचातीतसंस्मृतेः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार शून्यवादीमन्त्रीका कहा सुनकर चक्रवर्ती कहने लगा कि इस संसारमें जो पञ्चभूतोंका समूह दिखाईदेता है वह रूपादि रूप है – स्पर्श रस गन्ध और वर्ण युक्त होनेके कारण पुद्गलात्मकहै। मैं सुखी हूं मैं दुःखी हूँ इत्यादिके द्वारा जिसका वेदन होता है वह चैतन्यभूत समूहसे भिन्न है – पृथक् है। हमारे इस शरीरमें शरीरसे पृथम् चैतन्य गुण युक्तजीव नामका पदार्थ विद्यमान है इसका स्वसंवेदनसे अनुभव होता है और बुद्धिपूर्वक क्रिया देखी जाती है इस हेतुसे अन्यपुरुषोंके शरीरमें भी आत्मा है- जीव है, यहअनु-मानसे जाना जाता है। इसलिए आत्मा नामका पृथक् पदार्थ है यह मानना पड़ता है साथही पर-लोकका अस्तित्व भी मानना पड़ता है क्योंकि अतीत जन्मका स्मरण देखा जाता है।। ९०-९२ ॥
“Hearing these words from the nihilistic (Shunyavadi) minister, the emperor replied: ‘The collection of the five elements that is visible in this world possesses qualities like form, touch, taste, smell, and color; therefore, it is material (pudgalatmak). On the other hand, that which experiences “I am happy” or “I am miserable” is consciousness, which is completely distinct and separate from this material elements-group. Within this body of ours, a distinct entity named the soul (jiva), which possesses the attribute of consciousness, exists; this is directly experienced through self-awareness (svasamvedana). Furthermore, since purposeful, deliberate actions are observed, we can deduce by inference (anumana) that a soul exists in the bodies of other individuals as well. Therefore, one must accept that the soul is a distinct entity, and consequently, the existence of the afterlife must also be accepted, as the recollection of past births is a proven phenomenon.'” || 90-92 ||
श्लोक 93 से 101
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