नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 125 to 131
श्लोक ( Shlok ) 125 – 127
देवैरन्धकवृष्टिश्च सह पूजार्थमागतः । अपृच्छदेवं देवायं देवस्ते केन हेतुना ॥ १२५ ॥महोपसर्ग पूज्यस्य कृतवानिति विस्मयात् । तदुक्त्यवसितौ व्यक्त जिनेन्द्रोऽप्येवमब्रवीत् ॥ १२६ ॥द्वीपेऽस्मिन् भारते क्षेत्रे कलिङ्गविषये पुरे । काच्यां वणिक्सुतः सूरदत्तोऽन्यश्च सुदशवाक् ॥ १२७ ॥
उस समय सब देवोंके साथ-साथ अन्धकवृष्टि भी उनकी पूजाके लिए गया था। वहाँ उसने आश्चर्यसे पूछा कि हे देव ! इस देवने पूजनीय आपके ऊपर यह महान् उपसर्ग किस कारण किया है ? अन्धकवृष्टिके ऐसा कह चुकने पर जिनेन्द्र भगवान् सुप्रतिष्ठ केवली इस प्रकार कहने लगे – इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी कलिङ्ग देशके काञ्चीपुर नगरमें सूरदत्त और सुदत्त नामके दो वैश्य पुत्र रहते थे ।। १२५-१२७ ॥
“At that time, along with all the celestial beings, Andhakavrishti also went to worship him. There, struck with wonder, he asked, ‘O Divine Master! For what reason did this deity inflict such a terrible affliction upon you, who are worthy of supreme worship?’
When Andhakavrishti had spoken thus, the Jinendra Lord Supratishtha Kevali began to speak as follows: ‘In this very Jambudvipa, within the Kalinga country of Bharatakshetra, there is a city named Kanchipur. In that city, there lived two merchant (Vaishya) sons named Suradatta and Sudatta.'” (125–127)
श्लोक ( Shlok ) 128 – 131
लङ्गाद्वीपादिषु स्वैरं समावर्ज्य निजं धनम् । पुरोऽन्यक्षिपतां गूढ प्रवेशे शुल्कभीलुकौ ॥ १२८ ॥मूले क्षुपविशेषस्यानभिज्ञानमथोऽन्यदा । कश्चिन्मद्यप्रयोगार्थ वने तद्योग्यभूरुहाम् ॥ १२९ ॥मूलान्युत्खन्य सङ्गृह्णन् विलोक्य बहु तद्धनम् । किमनेन मुधा मूलखननेनाल्पहेतुना ॥ १३० ॥सुप्रभूतमिदं लब्धं धनं दारिद्यविद्रुतिम् । विदधात्यामृतेर्भोगैरित्यादाय गतस्ततः ॥ १३१ ॥
उन दोनोंने लङ्का आदि द्वीपों में जाकर इच्छानुसार बहुत-सा धन कमाया और लौटकर जब नगरमें प्रवेश करने लगे तब उन्हें इस बातका भय लगा कि इस धन पर टैक्स देना पड़ेगा। इस भयसे उन्होंने वह धन नगरके बाहर ही किसी झाड़ीके नीचे गाड़ दिया और कुछ पहिचानके लिए चिह्न भी कर दिये। दूसरे दिन कोई एक मनुष्य मदिरा बनानेके लिए उसके योग्य वृक्षोंकी जड़ खोदता हुआ वहाँ पहुँचा। खोदते समय उसे वह भारी धन मिल गया । धन देखकर उसने विचार किया कि जिससे थोड़ा ही लाभ होता है ऐसे इन वृक्षोंकी जड़ोंके उखाड़नेसे क्या लाभ है ? मुझे अब बहुत भारी धन मिल गया है यह मेरी सब दरिद्रताको दूर भगा देगा। मैं मरण पर्यन्त इस धनसे भोगोंका सेवन करूँगा, ऐसा विचार वह सब धन लेकर चला गया ।। १२८-१३१ ।।
“They both traveled to islands like Lanka and earned a vast amount of wealth according to their desires. However, upon returning, as they were about to enter the city, they grew fearful that they would have to pay tax on this wealth. Out of this fear, they buried the treasure outside the city beneath a bush, marking the spot with certain signs for identification.
The next day, a man arrived at that very spot while digging up the roots of suitable trees to brew liquor. While digging, he chanced upon the massive wealth. Seeing the treasure, he thought to himself, ‘What is the use of uprooting these tree roots, which yield so little profit? I have now found immense wealth that will banish all my poverty. I shall enjoy life’s pleasures with this money until my death.’ Reflecting thus, he took all the treasure and departed.” ( 128–131)
श्लोक 132 से 144
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नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124
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