अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 353 to 362
श्लोक ( Shlok ) 353
सयोगभावपर्यन्ते स्वपरार्थप्रसाधकः । परमौदारिकं देहं बिभ्रदभ्राङ्गणे बभौ ॥३५३ ॥
अब वे सयोगकेवली गुणस्थानके धारक हो गये, निज और परका प्रयोजन सिद्ध करने लगे, तथा परमौदारिक शरीरको धारण करते हुए आकाशरूपी आंगनमें सुशोभित होने लगे ॥ ३५३ ॥
“Now, He became the possessor of the Sayoga-kevali Gunasthana (the stage of omniscient spiritual development with activity), began fulfilling the spiritual purpose of both Himself and all other living beings, and while bearing a supreme, luminous physical body (Paramaudarika Sharira), He shone radiantly in the vast courtyard of the sky. || 353 ||”
श्लोक ( Shlok ) 354
चतुर्विधामरैः सार्धं सौधर्मेन्द्रस्तदागतः । तुर्यकल्यागसत्पूजाविधिं सर्वं समानात् ॥ ३५४ ॥
उसी समय सौधर्म स्वर्गका इन्द्र चारों प्रकारके देवोंके साथ आया और उसने ज्ञानकल्याणक सम्बन्धी पूजाकी समस्त विधि पूर्ण की ॥ ३५४ ॥
“At that very moment, the Indra of the Saudharma heaven arrived accompanied by all four classes of celestial deities, and systematically completed the entire ritual procedure of the Jnana-kalyanaka (the auspicious celebration of omniscience). || 354 ||”
श्लोक ( Shlok ) 355
अपापप्राप्तितन्विज्यास्थायिकातिशयोजितः । ‘परमात्मपदं प्रापत्परमेष्ठी स सन्मतिः ॥ ३५५ ॥
पुण्यरूप परमौदारिक शरीरकी पूजा तथा समवसरणकी रचना होना आदि अतिशयोंसे सम्पन्न श्रीवर्धमान स्वामी परमेष्ठी कहलाने लगे और परमात्मा पदको प्राप्त हो गये ।। ३५५ ॥
“Endowed with these divine excellences (atishayas)—such as the ritual worship of His meritorious, supreme physical body (Paramaudarika Sharira) and the celestial creation of the divine preaching assembly (Samavasarana)—the venerable Lord Vardhamana came to be revered as the Supreme Guru (Paramesthi) and attained the exalted state of the Supreme Soul (Paramatma). || 355 ||”
श्लोक ( Shlok ) 356
अथ दिव्यध्वनेर्हेतुः को भावीत्युपयोगवान् । तृतीयज्ञाननेत्रेण ज्ञात्वा मां परितुष्टवान् ॥ ३५६ ॥
तदनन्तर इन्द्रने भगवान्की दिव्यध्वनिका कारण क्या होना चाहिये इस बातका विचार किया और अवधिज्ञानसे मुझे उसका कारण जानकर वह बहुत ही संतुष्ट हुआ ॥ ३५६ ॥
“Thereafter, Indra pondered over what the catalyst for the manifestation of the Lord’s divine discourse (Divya-dhvani) ought to be, and upon discovering through his clairvoyant knowledge (Avadhi-jnana) that I was to be that cause, he was filled with profound contentment. || 356 ||”
श्लोक ( Shlok ) 357 – 358
तदैवागत्य मद्यामं गौतमाख्यं शचीपतिः । तत्र गौतमगोत्रोत्थमिन्द्रभूतिं द्विजोत्तमम् ॥ ३५७ ॥महाभिमानमादित्यविमानादेत्य भास्वरम् । शेषैः पुण्यैः समुत्पन्नं वेदवेदाङ्गवेदिनम् ॥ ३५८ ॥
वह उसी समय मेरे गाँव में आया। मैं वहाँ पर गोतमगोत्रीय इन्द्रभूति नामका उत्तम ब्राह्मण था, महाभिमानी था, आदित्य नामक विमानसे आकर शेष बचे हुए पुण्यके द्वारा वहाँ उत्पन्न हुआ था, मेरा शरीर अतिशय देदीप्यमान था, और मैं वेद-वेदाङ्गका जानने वाला था ।। ३५७-३५८ ॥
“At that very moment, Indra arrived in my village. There, I lived as an exalted Brahmin named Indrabhuti of the Gautama lineage (Gotra); I was exceedingly proud, having been born into that place by the virtue of the remnant spiritual merit (punya) carried over from my previous life in the celestial realm known as the Aditya vimana. My physical form was intensely luminous, and I was thoroughly well-versed in the Vedas and their auxiliary sciences (Vedas-Vedangas). || 357–358 ||”
श्लोक ( Shlok ) 359
दृष्ट्वा केनाप्युपायेन समानीयान्तिकं विभोः । स्वपिपृच्छिषितं जीवभावं पृच्छेत्यचोदयत् ॥ ३५९ ॥
मुझे देखकर वह इन्द्र मुझे किसी उपायसे भगवान्के समीप ले आया और प्रेरणा करने लगा कि तुम जीव तत्त्वके विषयमें जो कुछ पूछना चाहते थे सो पूछ लो ॥ ३५९ ॥
“Beholding me, that Indra brought me near the Lord by employing a clever artifice, and began urging me, saying, ‘Ask whatever you have long desired to inquire regarding the true nature of the living soul element (Jiva-tattva).’ || 359 ||”
श्लोक ( Shlok ) 360 – 362
अस्ति किं नास्ति वा जीवस्तत्स्वरूपं निरूप्यताम् । इत्यप्राक्षमतो मह्यं भगवान्भव्यवत्सलः ॥ ३६० ॥अस्ति जीवः स चोपात्तदेहमात्रः सदादिभिः । किमादिभिश्च निर्देश्यो नोत्पन्नो न विनक्ष्यति ।। ३६१।। द्रव्यरूपेण पर्यायैः परिणामी प्रतिक्षणम् । चैतन्यलक्षणः कर्ता भोक्ता सर्वैकदेशवित् ।। ३६२ ॥
इन्द्रकी बात सुनकर मैंने भगवान् से पूछा कि हे भगवन् ! जीव नामका कोई पदार्थ है या नहीं ? उसका स्वरूप कहिये । इसके उत्तर में भव्यवत्सल भगवान् कहने लगे कि जीव नामका पदार्थ है और वह ग्रहण किये हुए शरीरके प्रमाण है, सत्संख्या आदि सदादिक और निर्देश आदि किमादिकसे उसका स्वरूप कहा जाता है। वह द्रव्य रूपसे न कभी उत्पन्न हुआ है और न कभी नष्ट होगा किन्तु पर्याय रूपसे प्रतिक्षण परिणमन करता है। चेतना उसका लक्षण है, वह कर्ता है, भोक्ता है, और पदार्थोंके एकदेश तथा सर्वदेशका जानकार है ॥ ३६०-३६२ ॥
“Hearing the words of Indra, I inquired of the Lord, saying, ‘O Worshipful One! Does a substance called the living soul (Jiva) truly exist or not? Pray, elucidate its intrinsic nature.’
In response, the Lord—ever compassionate toward liberated-capable souls (Bhavyas)—began to speak: ‘The substance named the living soul (Jiva) most certainly exists. Its spatial extent corresponds precisely to the dimensions of the body it occupies. Its nature is systematically expounded through the existential framework of existence-metrics (Sat, Sankhya, etc.) and analytical criteria (Nirdesha, Kim, etc.). In its essential aspect as a fundamental substance (Dravya), it was never born nor will it ever perish; yet, in its transient modes (Paryayas), it undergoes continuous transformation at every single instant. Consciousness (Chetana) is its defining characteristic; it is the active agent (Karta), the enjoyer of the fruits of its actions (Bhokta), and the knower of both the partial and complete realities of all substances.’ || 360–362 ||”
श्लोक 363 से 372
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352
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