राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 442 से 453 | श्लोक 454 से 470 | श्लोक 471 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 508 | श्लोक 509 से 522
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 523 to 533
श्लोक ( Shlok ) 523 – 528
एकादश सह श्रीमद्धर्मसेनेन धीमता । द्वादशाङ्गार्थकुशला दशपूर्वधराश्च ते ॥ ५२३ ॥भव्यानां कल्पवृक्षाः स्युजिनधर्मप्रकाशकाः । ततो नक्षत्रनामा च जयपालश्च पाण्डुना ॥ ५२४ ॥द्रुमसेनोऽनुकंसार्यो विदितैकादशाङ्गकाः । सुभद्रश्च यशोभद्रो यशोबाहुः प्रकृष्टधीः ॥ ५२५ ॥ लोहनामा चतुर्थः स्यादाचाराङ्गविदस्त्वमी । जिनेन्द्रवदनोद्ङ्गीर्ण पावनं पापलोपनम् ॥ ५२६ ॥श्रुतं तपोभृतामेषां प्रणेष्यति परम्परा । शेषैरपि श्रुतज्ञानस्यैको देशस्तपोधनैः ॥ ५२७ ॥ जिनसेनानुगैर्वीरसेनैः प्राप्तमहद्धिभिः । समाप्ते दुष्षमायाः प्राक्प्रायशो वर्तयिष्यते ॥ ५२८ ॥
ये ग्यारह मुनि भव्यों के लिए कल्पवृक्षके समान तथा जैनधर्मका प्रकाश करनेवाले होंगे। उनके बाद नक्षत्र, जयपाल, पाण्डु, ध्रुवसेन और कंसार्य ये ग्यारह अङ्गोंके जानकार होंगे। इनके बाद सुभद्र, यशोभद्र, प्रकृष्ट बुद्धिमान्, यशोबाहु और चौथे लोहाचार्य ये चार आचाराङ्गके जानकार होंगे। इन सब तपस्वियोंकी यह परम्परा जिनेन्द्रदेवके मुखकमल निकले हुए, पवित्र तथा पापोंका लोप करनेवाले शास्त्रोंका प्ररूपण करेंगे। इनके बाद बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंको धारण करनेवाले जिनसेन, वीरसेन आदि अन्य तपस्वी भी श्रुतज्ञानके एकदेशका प्ररूपण करेंगे। प्रायः कर श्रुतज्ञानका यह एकदेश दुःषमा नामक पञ्चम कालके अन्त तक चलता रहेगा ।। ५२३-५२८ ॥
These eleven sages will be like wish-fulfilling trees (kalpavriksha) for the worthy souls (bhavya jivas) and will illuminate the path of Jainism. Following them, Nakshatra, Jayapal, Pandu, Dhruvasena, and Kansarya will be the knowers of the eleven limbs of the scriptures (Angas). After them, Subhadra, Yashobhadra, the highly intelligent Yashobahu, and Lohacharya IV—these four will be the knowers of the Acharanga (the first limb of the Jain scriptures).
This entire lineage of ascetics will expound the sacred scriptures that emerged from the lotus-like mouth of Jinendradeva, which are pure and eliminate all sins. Following them, other great ascetics possessing immense spiritual powers (riddhis), such as Jinasena and Virasena, will continue to expound a portion of this scriptural knowledge (shrutajnana). This partial scriptural knowledge will generally continue to exist until the very end of the fifth era (Pancham Kala), known as Dushama. || 523-528 ||
श्लोक ( Shlok ) 529 – 533
भरतः सागराख्योऽनु सत्यवीर्यो जनैः स्तुतः । महीशो मित्रभावाह्नो मित्रवीर्योऽर्यमद्युतिः ॥ ५२९ ॥धर्मदानादिवीयौं च मघवान् बुद्धवीर्यकः । सीमन्धरस्निपृष्ठाख्यः स्वयम्भूः पुरुषोत्तमः ॥ ५३० ॥पुण्डरीकान्तपुरुषो दशः सत्यादिभिः स्तुतः । कुनालः पालकः पृथ्थ्याः पतिर्नारायणो नृणाम् ॥ ५३१ ॥सुभौमः सार्वभौमोऽजितञ्जयो विजयाभिधः । उग्रसेनो महासेनो जिनस्त्वं श्रेणिकेत्यमी ॥ ५३२ ॥सर्वे क्रमेण श्रीमन्तो धर्मप्रश्नविदां वराः । चतुर्विंशतितीर्थेशां सन्ततं पादसेविनः ॥ ५३३ ॥
भरत, सागर, मनुष्यों के द्वारा प्रशंसनीय सत्यवीर्य, राजा मित्रभाव, सूर्यके समान कांतिवाला मित्रवीर्य, धर्मवीर्य, दानवीर्य, मघवा, बुद्धवीर्य, सीमन्धर, त्रिपृष्ठ, स्वयम्भू, पुरुषोत्तम, पुरुषपुण्डरीक, प्रशंसनीय सत्य-दत्त, पृथिवीका पालक कुनाल, मनुष्योंका स्वामी नारायण, सुभौम, सार्वभौम, अजितञ्जय, विजय, उप्रसेन, महासेन और आगे चलकर जिनेन्द्रका पद प्राप्त करनेवाला तू, गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! ये सभी पुरुष श्रीमान् हैं, धर्म सम्बन्धी प्रश्न करनेवालों में श्रेष्ठ हैं, और निरन्तर चौबीस तीर्थंकरोंके चरण कमलोंकी सेवा करनेवाले हैं ।। ५२९-५३३ ।।
Bharata, Sagara, Satyavirya who is praised by mankind, King Mitrabhava, Mitravirya who possesses brilliance like the sun, Dharmavirya, Danavirya, Maghava, Buddhavirya, Seemandhara, Triprishta, Svayambhu, Purushottama, Purushapundarika, the commendable Satyadatta, Kunala the protector of the earth, Narayana the lord of men, Subhauma, Sarvabhauma, Ajitanjaya, Vijaya, Ugrasena, Mahasena, and you, who shall attain the status of a Jinendra in the future—Gautama Swami says to King Shrenika, “O Shrenika! All these men are glorious, foremost among those who inquire about the Dharma, and are constant worshippers of the lotus feet of the twenty-four Tirthankaras.” || 529-533 ||
श्लोक 534 से 543
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391| श्लोक 392 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 430 | श्लोक 431 से 441 | श्लोक 442 से 453 | श्लोक 454 से 470 | श्लोक 471 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 508 | श्लोक 509 से 522
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