Summary of Uttar Puran Parv 63 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 63 (श्लोक 1–510) का संक्षिप्त सारांश
उत्तरपुराण के तिरसठवें पर्व में सोलहवें तीर्थंकर भगवान् शान्तिनाथ के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान, धर्मप्रभावना और निर्वाण का विस्तृत वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे मेघरथ राजा थे, जिन्होंने घनरथ तीर्थंकर से श्रावकधर्म, सम्यग्दर्शन और तीर्थंकर-नामकर्म के सोलह कारणों का उपदेश सुनकर संसार की नश्वरता का विचार किया। उन्होंने राज्य अपने पुत्र को सौंपकर छोटे भाई दृढ़रथ तथा अनेक राजाओं के साथ दीक्षा धारण की। कठोर तप और तीर्थंकर-नामकर्म की भावनाओं के प्रभाव से उन्होंने श्रेष्ठ आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की और अंत में अहमिन्द्र देव हुए।
कालान्तर में उनका जीव भरतक्षेत्र के समृद्ध कुरुजाङ्गल देश की राजधानी हस्तिनापुर में राजा विश्वसेन और रानी ऐरा के यहाँ अवतीर्ण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को भगवान् शान्तिनाथ का जन्म हुआ। देवों ने जन्मकल्याणक मनाया, इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर उनका अभिषेक किया और उनका नाम शान्तिनाथ रखा।
भगवान् शान्तिनाथ बाल्यकाल से ही असाधारण सौन्दर्य, तेज, ज्ञान और ऐश्वर्य से सम्पन्न थे। यौवन प्राप्त करने पर उनका विवाह हुआ और बाद में वे चक्रवर्ती सम्राट बने। चौदह रत्न और नौ निधियों से युक्त विशाल साम्राज्य का दीर्घकाल तक संचालन करने के पश्चात् दर्पण में दो प्रतिबिम्ब देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध हुआ। पूर्वभवों का स्मरण होने पर उन्होंने वैराग्य धारण किया और लौकान्तिक देवों के अनुरोध पर पुत्र नारायण को राज्य देकर दीक्षा ग्रहण कर ली।
सहस्राम्रवन में उन्होंने केशलोंच कर दिगम्बर मुनि की दीक्षा ली। चक्रायुध सहित एक हजार राजाओं ने भी उनके साथ संयम स्वीकार किया। कठोर तप, ध्यान और चारित्र की साधना करते हुए उन्होंने घातिया कर्मों का क्षय किया और पौष शुक्ल दशमी को केवलज्ञान प्राप्त किया। देवों ने समवसरण की रचना की, जहाँ भगवान् ने विशाल धर्मसंघ के साथ सम्यक् धर्म का उपदेश दिया। उनके संघ में हजारों मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे।
दीर्घकाल तक धर्मतीर्थ का संचालन करने के बाद जब आयु का अंतिम समय आया, तब भगवान् शान्तिनाथ सम्मेदशिखर पहुँचे। वहाँ शुक्लध्यान में स्थित होकर उन्होंने समस्त कर्मों का पूर्ण क्षय किया और सिद्धपद प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त हुए। उनके साथ चक्रायुध सहित अनेक मुनियों ने भी मोक्ष प्राप्त किया।
इस पर्व के उपसंहार में आचार्य गुणभद्र भगवान् शान्तिनाथ की महिमा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि उन्होंने अखण्ड रूप से चलने वाले मोक्षमार्ग का प्रवर्तन किया। उनके पूर्वभवों की निरन्तर आध्यात्मिक उन्नति, चक्रायुध के साथ उनका दिव्य सम्बन्ध तथा समस्त जीवों को शान्ति प्रदान करने वाला उनका जीवन आदर्श रूप में प्रस्तुत किया गया है। अतः भगवान् शान्तिनाथ की शरण और उनका ध्यान ही कल्याण, शान्ति तथा मोक्ष का श्रेष्ठ साधन बताया गया है।
श्लोक 1 से 11 सुमति के स्वयंवर और पूर्वभव का उद्घाटन
अर्द्धचक्री नारायण अनन्तवीर्य और बलभद्र अपराजित सुखपूर्वक राज्य कर रहे थे। अपराजित की पुत्री सुमति यौवन प्राप्त कर विवाह योग्य हुई। दोनों भाइयों ने उसका स्वयंवर आयोजित किया। स्वयंवर सभा में एक देवी प्रकट हुई और सुमति को स्मरण कराया कि वे दोनों पूर्व जन्म में स्वर्ग की सहचरियाँ थीं। देवी ने उनके पूर्वभवों का वृत्तांत सुनाने के लिए सुमति को एकाग्र होकर सुनने को कहा
श्लोक 12 से 22 पूर्वजन्म की कथा और मोक्ष का भविष्यवचन
देवी ने बताया कि पूर्व जन्म में वे दोनों नन्दनपुर के राजा अमितविक्रम की पुत्रियाँ धनश्री और अनन्तश्री थीं। उन्होंने धर्म ग्रहण कर व्रत एवं तप का पालन किया। वज्राङ्गद विद्याधर द्वारा अपहरण का प्रयास होने पर उन्होंने वन में संन्यास-मरण किया और देवियाँ बनीं। बाद में चारण मुनि धृतिषेण से उन्होंने अपनी मुक्ति के विषय में पूछा। मुनि ने भविष्यवाणी की कि चौथे भव में दोनों को मोक्ष प्राप्त होगा। इसी कारण देवी सुमति को वैराग्य का उपदेश देने आई थी।
श्लोक 23 से 31 सुमति का वैराग्य और अनन्तवीर्य का पुनर्जन्म
देवी के उपदेश से प्रभावित होकर सुमति ने सात सौ कन्याओं सहित आर्यिका दीक्षा ग्रहण की, कठोर तप किया और अंत में आनत स्वर्ग में देवी हुई। दूसरी ओर नारायण अनन्तवीर्य ने दीर्घकाल तक राज्य किया, किंतु पापोदय से प्रथम नरक में गया। अपराजित ने पुत्र को राज्य देकर दीक्षा धारण की और अच्युत स्वर्ग के इन्द्र बने। बाद में धरणेन्द्र के उपदेश से नरक में स्थित अनन्तवीर्य को सम्यग्दर्शन प्राप्त हुआ और अगले जन्म में वह मेघनाद नामक विद्याधर बना।
श्लोक 32 से 41 मेघनाद का संयम और वज्रायुध का जन्म
अच्युतेन्द्र बने अपराजित के जीव के उपदेश से मेघनाद को आत्मज्ञान प्राप्त हुआ और उसने दीक्षा धारण कर दीर्घकाल तक साधना की। उपसर्गों के बावजूद वह अचल रहा और अंत में अच्युत स्वर्ग का प्रतीन्द्र बना। उधर अपराजित का जीव स्वर्ग से च्युत होकर पूर्वविदेह क्षेत्र में राजा क्षेमंकर के यहाँ वज्रायुध नामक तेजस्वी पुत्र के रूप में जन्मा। उसके जन्म से समस्त राज्य में हर्ष और संतोष फैल गया तथा वह गुणों और वैभव से निरंतर विकसित होने लगा।
श्लोक 42 से 51 वज्रायुध की कीर्ति और दार्शनिक परीक्षा
वज्रायुध की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल गई। युवावस्था में वह राज्यलक्ष्मी और लक्ष्मीमती रानी से सुशोभित हुआ तथा उसके पुत्र सहस्त्रायुध और पौत्र कनकशान्त का जन्म हुआ। एक अवसर पर ऐशान स्वर्ग के इन्द्र ने उसकी सम्यग्दृष्टि की प्रशंसा की। इसे सुनकर विचित्रचूल देव ने उसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया और सौत्रान्तिक बौद्ध मत का आश्रय लेकर सभा में उपस्थित हुआ। उसने द्रव्य और पर्याय के संबंध में जटिल दार्शनिक प्रश्न उठाया।
श्लोक 52 से 61 स्याद्वाद द्वारा पर्याय-पर्यायी का समाधान
विचित्रचूल ने द्रव्य और पर्याय को भिन्न अथवा अभिन्न मानने पर अनेक तर्कदोष प्रस्तुत किए। उत्तर में वज्रायुध ने जैन स्याद्वाद का प्रतिपादन किया। उसने बताया कि व्यवहार नय से द्रव्य और पर्याय में भेद है, जबकि द्रव्यार्थिक नय से दोनों अभिन्न हैं। इस प्रकार अनेकान्त दृष्टि ही सत्य का समुचित निरूपण करती है और एकान्तवाद के दोषों से बचाती है।
श्लोक 62 से 71 बौद्ध मत का खण्डन और क्षेमंकर का वैराग्य
वज्रायुध ने बौद्धों के क्षणिकवाद और सन्तानवाद की तार्किक समीक्षा कर उनके मत की दुर्बलताओं को उजागर किया। उसके तर्कों से विचित्रचूल देव का अहंकार नष्ट हो गया और उसे सम्यग्दर्शन प्राप्त हुआ। उसने वज्रायुध की स्तुति कर स्वर्ग गमन किया। बाद में राजा क्षेमंकर को आत्मज्ञान जाग्रत हुआ और उन्होंने राज्य त्यागकर पुत्र वज्रायुध का अभिषेक किया तथा स्वयं दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 72 से 81 क्षेमंकर की तपस्या और वज्रायुध का वन-विहार
क्षेमंकर मुनि ने कठोर तप, शास्त्राध्ययन और पूर्ण संयम का पालन किया। उन्होंने ममता, अहंकार और कषायों का त्याग कर केवलज्ञान प्राप्त किया तथा दिव्यध्वनि द्वारा धर्मोपदेश दिया। उधर राजा वज्रायुध राज्य का सुचारु संचालन करते हुए अपनी रानियों के साथ चैत्र ऋतु में देवरमण वन पहुँचे और सुदर्शन सरोवर में जलक्रीड़ा करने लगे।
श्लोक 82 से 92 विद्याधर का आक्रमण और शरणागत की रक्षा
जलक्रीड़ा के समय पूर्वभव का शत्रु विद्युद्दंष्ट्र विद्याधर आया। उसने सरोवर को शिला से ढक दिया और राजा को नागपाश में बाँधने का प्रयास किया, किन्तु वज्रायुध ने अपनी शक्ति से शिला को चूर-चूर कर दिया और शत्रु भाग गया। बाद में उसे नौ निधियाँ और चौदह रत्न प्राप्त हुए तथा वह चक्रवर्ती-समान वैभव से विभूषित हुआ। एक दिन उसकी सभा में भयभीत एक विद्याधर शरण लेने आया, जिसके पीछे एक क्रोधित विद्याधरी और एक वृद्ध विद्याधर भी पहुँचे।
श्लोक 93 से 102 शान्तिमती की रक्षा और पूर्वजन्म का रहस्य
वृद्ध विद्याधर वायुवेग ने बताया कि उसकी पुत्री शान्तिमती विद्या-सिद्धि के लिए गई थी, जहाँ एक दुष्ट विद्याधर ने विघ्न डालने का प्रयास किया। भयवश वह अपराधी वज्रायुध की शरण में आया था। अवधिज्ञानी वज्रायुध ने कहा कि वह इस घटना का गहरा कारण जानता है। तब उसने एक पूर्वजन्म की कथा सुनानी आरम्भ की, जिसमें राजकुमार नलिनकेतु ने कामवश होकर व्यापारी-पत्नी प्रीतिंकरा का बलपूर्वक अपहरण किया था। यही कर्म आगे चलकर वर्तमान विवाद का मूल कारण बना।
श्लोक 103 से 114 पूर्वभव का फल और शान्तिमती का वैराग्य
सुदत्त ने वैराग्य धारण कर दीक्षा ली, कठोर तप किया और ऐशान स्वर्ग में देव हुआ। वहाँ से च्युत होकर वह अजितसेन नामक पराक्रमी राजकुमार बना। दूसरी ओर नलिनकेतु ने भी आत्मज्ञान प्राप्त कर दीक्षा ग्रहण की, केवलज्ञान प्राप्त किया और मोक्ष को प्राप्त हुआ। प्रीतिंकरा ने भी आर्यिका दीक्षा लेकर तप किया, स्वर्ग में देवी हुई और पुनर्जन्म में शान्तिमती के रूप में उत्पन्न हुई। वज्रायुध द्वारा पूर्वभव का संबंध बताने पर शान्तिमती को वैराग्य हुआ, उसने संयम ग्रहण किया और अंत में ऐशान स्वर्ग में देव हुई।
श्लोक 115 से 121 कनकशान्ति का वनगमन और मुनिदर्शन
चक्रवर्ती वज्रायुध सुखपूर्वक राज्य कर रहे थे। इसी समय मेघवाहन की पुत्री कनकमाला और समुद्रसेन की पुत्री वसन्तसेना, राजा कनकशान्ति की रानियाँ थीं। एक अवसर पर कनकशान्ति अपनी पत्नियों के साथ वन-विहार के लिए गया। वहाँ उसे विमलप्रभ मुनिराज के दर्शन हुए, जो उसके जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन का कारण बने।
श्लोक 122 से 132 कनकशान्ति की दीक्षा और वज्रायुध का वैराग्य
विमलप्रभ मुनि से तत्त्वज्ञान प्राप्त कर कनकशान्ति ने तत्काल दीक्षा ग्रहण कर ली। उसकी दोनों रानियों ने भी आर्यिका दीक्षा धारण की। बाद में चित्रचूल विद्याधर ने पूर्ववैरवश उपसर्ग करना चाहा, किन्तु सफल नहीं हुआ। कनकशान्ति ने कठोर साधना करते हुए केवलज्ञान प्राप्त किया। नाती के केवलज्ञान-महोत्सव को देखकर वज्रायुध को भी वैराग्य हुआ और उन्होंने राज्य पुत्र सहस्त्रायुध को सौंपकर क्षेमंकर तीर्थंकर के समक्ष दीक्षा ले ली।
श्लोक 133 से 141 वज्रायुध और सहस्त्रायुध की तपस्या
वज्रायुध मुनिराज ने सिद्धिगिरि पर प्रतिमायोग धारण कर घोर तप किया। उनके प्रभाव से अनेक जीव धर्ममार्ग पर अग्रसर हुए। पूर्वभव के वैरी असुर भी उनका विघ्न करना चाहते थे, परन्तु देवियों ने उन्हें रोक दिया। उधर सहस्त्रायुध को भी वैराग्य हुआ और उसने राज्य त्यागकर संयम धारण किया। पिता-पुत्र दोनों ने दीर्घकाल तक तपस्या की और अंत में समाधिमरण कर सौमनस विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
श्लोक 142 से 153 मेघरथ और दृढ़रथ का जन्म तथा मुर्गों का युद्ध
सौमनस विमान से च्युत होकर वज्रायुध का जीव राजा घनरथ के यहाँ मेघरथ के रूप में और सहस्त्रायुध का जीव दृढ़रथ के रूप में उत्पन्न हुआ। दोनों राजकुमार गुण, पराक्रम और विनय से सम्पन्न थे। उनके विवाह हुए तथा पुत्र भी उत्पन्न हुए। एक दिन राजमहल में दो दासियों द्वारा लाए गए मुर्गों के बीच युद्ध कराया गया। यह हिंसक दृश्य धर्मात्माओं के लिए अनुचित था, इसलिए राजा ने इस युद्ध के वास्तविक कारण को जानना चाहा।
श्लोक 154 से 161 पुराने वैर का परिणाम
राजा के प्रश्न पर मेघरथ ने अवधिज्ञान से बताया कि ये दोनों मुर्गे पूर्वजन्म में भद्र और धन्य नामक दो भाई थे। बैल के विवाद में वे एक-दूसरे को मारकर मरे। इसके बाद वे हाथी बने और पुनः वैरवश लड़कर मरे। फिर भैंसे बने और परस्पर संघर्ष में प्राण गंवाए। इस प्रकार जन्म-जन्मांतर तक उनका वैर समाप्त नहीं हुआ और वही संस्कार वर्तमान जन्म तक चले आए।
श्लोक 162 से 171 विद्याधरों के पूर्वभव का रहस्य
मेघरथ ने आगे बताया कि ये दोनों जीव बाद में मेढ़े बने और फिर मुर्गों के रूप में जन्मे। उन्हें दो विद्याधर अपनी विद्या से लड़वा रहे थे। उन विद्याधरों का परिचय देते हुए उसने कहा कि वे गरुड़वेग राजा के पुत्र दिवितिलक और चन्द्रतिलक हैं। उन्होंने सिद्धकूट पर चारण मुनियों से अपने पूर्वभव के विषय में प्रश्न किया था। तब मुनियों ने उन्हें बताया कि वे पूर्वजन्म में अभयघोष राजा के पुत्र विजय और जयन्त थे।
श्लोक 172 से 182 अभयघोष का वैराग्य और पुनर्जन्म
मुनियों ने बताया कि अभयघोष राजा पृथिवीतिलका में आसक्त हो गए थे, जिससे उनकी रानी सुवर्णतिलका अत्यंत दुःखी हुई और उसने दीक्षा ग्रहण कर ली। बाद में अभयघोष को भी आत्मज्ञान हुआ और उन्होंने दोनों पुत्रों सहित संयम धारण कर तीर्थंकर-नामकर्म के कारणभूत सोलह भावनाओं का चिंतन किया। समाधिमरण के पश्चात वे अच्युत स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वही जीव वर्तमान में राजा घनरथ के रूप में जन्मा था।
श्लोक 183 से 192 वैर का अंत और जम्बूद्वीप का दर्शन
पूर्वभव का संबंध जानकर दोनों विद्याधरों ने राजा घनरथ और मेघरथ की पूजा की तथा दीक्षा ग्रहण कर ली। मुर्गों ने भी अपना पूर्ववैर त्याग दिया और आगे चलकर व्यन्तर देव बने। उन देवों ने मेघरथ को सम्मानपूर्वक विमान में बैठाकर मानुषोत्तर पर्वत के भीतर स्थित जम्बूद्वीप का दर्शन कराया। उन्होंने भरत, हैमवत, हरिवर्ष, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत—इन सात क्षेत्रों तथा उन्हें विभाजित करने वाले सात कुलाचल पर्वतों का परिचय दिया।
श्लोक 193 से 201 जम्बूद्वीप के पर्वत, नदियाँ और हृद
देवों ने मेघरथ को जम्बूद्वीप की भौगोलिक रचना का विस्तार से परिचय दिया। हिमवान, महाहिमवान, निषध, मेरु, नील, रुक्मी और शिखरी नामक सात कुलाचल पर्वतों का वर्णन किया। उन्होंने चौदह महानदियों तथा सोलह हृद-सरोवरों का भी परिचय कराया। प्रथम छह हृदों में श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नामक देवियाँ निवास करती हैं, जबकि शेष दस हृदों में नागकुमार देव निवास करते हैं। इस प्रकार मेघरथ को जम्बूद्वीप की अद्भुत संरचना और दिव्य वैभव का दर्शन कराया गया।
श्लोक 202 से 221 जम्बूद्वीप का विस्तृत दर्शन और देवों का सम्मान
व्यन्तर देवों ने मेघरथ को जम्बूद्वीप के पर्वतों, विभंग नदियों, बत्तीस विदेह क्षेत्रों तथा उनकी राजधानियों का विस्तार से दर्शन कराया। उन्होंने समुद्रों, वनों, मानुषोत्तर पर्वत और विविध पवित्र स्थलों का भी अवलोकन किया। मेघरथ ने अकृत्रिम जिनमन्दिरों की भक्तिपूर्वक पूजा और स्तुति की। नगर लौटने पर व्यन्तर देवों ने दिव्य आभूषणों तथा मंगलमय वचनों से उनका सम्मान किया और फिर अपने स्थान को लौट गए।
श्लोक 222 से 231 उपकार की महिमा और घनरथ का वैराग्य
ग्रन्थ में उपकार के प्रत्युपकार का महत्व बताते हुए कहा गया कि जो उपकारी का प्रतिदान नहीं करता, वह सुगन्धहीन पुष्प के समान निष्फल जीवन जीता है। इसी बीच राजा घनरथ को संसार की असारता का विचार हुआ। उन्होंने शरीर, सुख, धन और संबंधों की नश्वरता पर चिंतन किया तथा आत्मकल्याण की आवश्यकता को समझा। उनके इस वैराग्यपूर्ण भाव को जानकर लौकान्तिक देव आए, उनकी स्तुति की और संयम ग्रहण करने के संकल्प का समर्थन किया।
श्लोक 232 से 244 घनरथ का संयम और सिंहरथ का अभिमान भंग
घनरथ ने मेघरथ को राज्य सौंपकर दीक्षा धारण कर ली। उन्होंने मन, वचन और काया को शुद्ध बनाकर कषायों का क्षय किया और शीघ्र ही केवलज्ञान के योग्य निर्मल अवस्था प्राप्त कर ली। दूसरी ओर एक दिन मेघरथ अपनी रानियों के साथ उद्यान में बैठे थे, तभी सिंहरथ विद्याधर का विमान उनके ऊपर रुक गया। अहंकारवश वह उन्हें हटाना चाहता था, परन्तु मेघरथ ने केवल पैर के अंगूठे से उसे असहाय बना दिया। बाद में उसकी पत्नी के निवेदन पर उसे मुक्त किया गया।
श्लोक 245 से 254 सिंहरथ का पूर्वभव और वैराग्य
प्रियमित्रा के पूछने पर मेघरथ ने सिंहरथ का पूर्वभव बताया। वह पूर्व जन्म में राजा राजगुप्त था, जिसने धर्मपालन और दान के पुण्य से ब्रह्मेन्द्र पद प्राप्त किया था। उसकी पत्नी शङ्खिका भी पुण्य के प्रभाव से श्रेष्ठ जन्मों को प्राप्त हुई। पूर्वजन्म का यह वृत्तांत सुनकर सिंहरथ का अहंकार समाप्त हो गया। उसने पुत्र को राज्य देकर घनरथ तीर्थंकर के समीप दीक्षा ग्रहण कर ली और उसकी पत्नी मदनवेगा ने भी आर्यिका दीक्षा लेकर तपस्या आरम्भ कर दी।
श्लोक 255 से 271 कबूतर-गीध प्रसंग और दान का स्वरूप
एक अवसर पर मेघरथ उपवासपूर्वक धर्मोपदेश दे रहे थे। तभी एक भयभीत कबूतर उनकी शरण में आया और उसके पीछे एक भूखा गीध भी पहुँचा। गीध ने कबूतर को अपना आहार बताकर उसे सौंपने की याचना की। मेघरथ ने बताया कि दोनों पूर्वजन्म में धन के कारण लड़ने वाले भाई थे और अब अपने कर्मों के फलस्वरूप पक्षी बने हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गीध के पीछे एक देव उसकी परीक्षा लेने के लिए आया है। इसके बाद उन्होंने दान, दाता और देय के वास्तविक स्वरूप का विवेचन किया।
श्लोक 272 से 281 सच्चे दान का उपदेश और पक्षियों का उद्धार
मेघरथ ने समझाया कि आहार, औषधि, शास्त्र और अभयदान—ये चार प्रकार के श्रेष्ठ दान हैं। मांस जैसे हिंसात्मक पदार्थ न तो देय हैं, न उनके इच्छुक पात्र हैं और न उन्हें देने वाला सच्चा दाता है। इस प्रकार उन्होंने सिद्ध किया कि कबूतर को गीध को सौंपना धर्मसम्मत नहीं है। उनकी युक्तियुक्त वाणी सुनकर परीक्षा लेने वाला देव प्रसन्न हो गया और उनकी प्रशंसा कर चला गया। कबूतर और गीध भी उपदेश से प्रभावित होकर आगे चलकर व्यन्तर देव बने और मेघरथ के प्रति कृतज्ञता प्रकट की
श्लोक 282 से 293 मेघरथ और प्रियमित्रा की परीक्षा
नन्दीश्वर पूजा और प्रतिमायोग में स्थित मेघरथ की सम्यग्दृष्टि और धैर्य की प्रशंसा ईशानेन्द्र ने देवसभा में की। उनकी परीक्षा लेने के लिए दो देवियाँ आईं और विविध रूपों से उनका मन विचलित करने का प्रयास किया, किन्तु वे असफल रहीं। बाद में ईशानेन्द्र ने रानी प्रियमित्रा के अनुपम सौन्दर्य की प्रशंसा की। इसे सत्यापित करने के लिए दो देवियाँ कन्याओं का वेश धारण कर उसके पास पहुँचीं। उन्होंने उसकी रूप-शोभा को देखा और फिर यह कहकर कि सौन्दर्य भी नश्वर है, उसका वैराग्य जाग्रत किया।
श्लोक 294 से 301 प्रियमित्रा का वैराग्य और श्रावकधर्म की जिज्ञासा
देवियों के उपदेश से प्रियमित्रा को संसार की नश्वरता का बोध हुआ और उसके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। राजा मेघरथ ने उसे नित्यानित्यात्मक जगत् का तत्त्व समझाकर सांत्वना दी। कुछ समय बाद मेघरथ अपने परिवार सहित उद्यान में गए, जहाँ उन्होंने अपने पिता घनरथ तीर्थंकर के दर्शन किए। श्रद्धापूर्वक वंदना करने के बाद उन्होंने श्रावकों की आचार-पद्धति और धर्म का विवेचन सुनने की इच्छा व्यक्त की। तब घनरथ तीर्थंकर ने उपासकाध्ययन के माध्यम से श्रावकधर्म का उपदेश प्रारम्भ किया।
श्लोक 302 से 311 श्रावकधर्म की क्रियाएँ और मेघरथ का वैराग्य
घनरथ तीर्थंकर ने बताया कि श्रावकों की क्रियाएँ गर्भान्वय, दीक्षान्वय और क्रियान्वय—इन तीन प्रकार की होती हैं। गर्भान्वय की 53, दीक्षान्वय की 48 और क्रियान्वय की 7 क्रियाएँ मानी गई हैं। इनका उद्देश्य सम्यग्दर्शन की शुद्धि और मोक्षमार्ग की सिद्धि है। श्रावकधर्म का विस्तृत उपदेश सुनकर मेघरथ का चित्त अत्यन्त निर्मल हो गया। उन्होंने संसार, शरीर और भोगों की नश्वरता का चिंतन कर राज्यत्याग का निश्चय किया। छोटे भाई दृढ़रथ ने भी राज्य ग्रहण करने से इनकार कर दिया, इसलिए मेघसेन को राज्य देकर मेघरथ ने सात हजार राजाओं सहित दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 312 से 321 दर्शनविशुद्धि और उसके आठ अंग
मेघरथ मुनि ने तीर्थंकर-नामकर्म के बन्ध का कारण बनने वाली सोलह भावनाओं का चिंतन किया। इनमें प्रथम दर्शनविशुद्धि है, जिसके आठ अंग बताए गए हैं—निःशंकता, निःकांक्षितता, निर्विचिकित्सा, अमूढ़दृष्टि, उपबृंहण, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना। इनका आशय मोक्षमार्ग में दृढ़ श्रद्धा, भोगों की आकांक्षा का त्याग, मिथ्यात्व से विमुखता, आत्मधर्म की वृद्धि, धर्म की रक्षा, सहधर्मियों के प्रति प्रेम तथा जिनमार्ग के प्रभाव के प्रसार से है। इन गुणों से सम्यग्दर्शन निर्मल और दृढ़ बनता है।
श्लोक 322 से 331 तीर्थंकर-नामकर्म के सोलह कारण
घनरथ तीर्थंकर ने आगे शीलव्रतानतीचार, अभीक्ष्णज्ञानोपयोग, संवेग, त्याग, तप, साधुसमाधि, वैयावृत्त्य, अर्हद्भक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, आवश्यकापरिहाणि, मार्गप्रभावना और वात्सल्य जैसी भावनाओं का वर्णन किया। ये सभी भावनाएँ आत्मशुद्धि, धर्मरक्षा, ज्ञानार्जन, तप और भक्ति को पुष्ट करती हैं। जिनेन्द्र भगवान ने इन्हें सामूहिक अथवा पृथक् रूप से तीर्थंकर-नामकर्म के बन्ध का कारण बताया है।
श्लोक 332 से 341 मेघरथ की तपस्या और अहमिन्द्र पद की प्राप्ति
मेघरथ मुनिराज ने इन सोलह भावनाओं के द्वारा निर्मल तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया। वे विभिन्न देशों में विहार करते हुए अनेक राजाओं को धर्मोपकार का अवसर प्रदान करते रहे। अंततः दृढ़रथ के साथ नभस्तिलक पर्वत पर एक मास का प्रायोपगमन संन्यास धारण किया। शांतचित्त होकर देह त्यागने पर दोनों सौमनस स्वर्ग में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ उन्होंने अत्यन्त दिव्य सुख, अवधिज्ञान और विशिष्ट देववैभव का अनुभव किया तथा आगे एक भव लेकर मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी बने।
श्लोक 342 से 351 कुरुजाङ्गल देश का प्राकृतिक वैभव
इसके बाद भरत क्षेत्र के मध्य स्थित कुरुजाङ्गल देश का वर्णन किया गया है। यह अत्यन्त उर्वर, समृद्ध और धान्य-सम्पन्न प्रदेश था। वहाँ सुपारी, चोच, केला, आम और कटहल के वृक्ष प्रचुर मात्रा में फलते-फूलते थे। पुष्पों और फलों से लदी लताएँ तथा वृक्ष सम्पूर्ण प्रदेश की शोभा बढ़ाते थे। भूमि समतल, उपजाऊ और भयमुक्त थी। स्वच्छ जल से भरे सरोवर अनेक प्रकार के पुष्पों से सुशोभित होकर प्रदेश को स्वर्गोपम बनाते थे।
श्लोक 352 से 361 समृद्धि, सदाचार और लोककल्याण
कुरुजाङ्गल के वृक्ष और लताएँ अपने सौन्दर्य एवं उपयोगिता के कारण श्रेष्ठ राजाओं और रमणीय स्त्रियों के समान प्रतीत होते थे। वहाँ ईख की खेती, कृषि और व्यापार भरपूर था। समाज में अपराध, निर्धनता, अन्याय और दुष्टता का अभाव था। लोग मर्यादा और धर्म का पालन करते थे। समय पर वर्षा होती थी, गायें पर्याप्त दूध देती थीं और वृक्ष सदा फल-फूलों से लदे रहते थे। सम्पूर्ण प्रदेश समृद्धि, शांति और सदाचार का आदर्श उदाहरण था।
श्लोक 362 से 371 हस्तिनापुर नगरी की भव्यता
कुरुजाङ्गल देश के मध्य हस्तिनापुर नामक भव्य नगरी स्थित थी। वह विशाल परिखाओं, ऊँची प्राचीरों, गोपुरों, अट्टालिकाओं और सुन्दर राजमार्गों से युक्त थी। नगर की गलियाँ सुव्यवस्थित थीं और भवन अत्यन्त मनोहर थे। सुगन्धित वातावरण, अलंकृत राजप्रासाद और सौन्दर्य से सम्पन्न युवक-युवतियाँ उसकी शोभा बढ़ाते थे। यह नगरी भौतिक वैभव और सांस्कृतिक उन्नति का केन्द्र थी।
श्लोक 372 से 381 धर्मप्रधान समाज और राजमहलों का वैभव
हस्तिनापुर के निवासी अहिंसा को ही धर्म मानते थे। श्रावक देवपूजा, स्वाध्याय, दान और धर्मकार्य में तत्पर रहते थे। न्यायप्रिय शासन और धार्मिक वातावरण के कारण मुनिराज भी वहाँ निवास करना पसंद करते थे। नगर के उपवन नन्दनवन की शोभा को भी मात देते थे। वहाँ धन और भोग की प्रचुरता होते हुए भी त्याग और दान की भावना विद्यमान थी। नगर के मध्य स्थित राजमहल मेरु पर्वत के समान भव्य और दिव्य प्रतीत होता था।
श्लोक 382 से 393 विश्वसेन का जन्म और ऐरा के शुभ स्वप्न
हस्तिनापुर में कश्यपगोत्रीय राजा अजितसेन राज्य करते थे। उनकी रानी प्रियदर्शना से विश्वसेन का जन्म हुआ। विश्वसेन की पत्नी ऐरा अत्यन्त पुण्यशालिनी और देवियों द्वारा सेवित थी। एक रात्रि उसने तीर्थंकर-माता को प्राप्त होने वाले सोलह शुभ स्वप्न देखे। स्वप्नों के उपरान्त मेघरथ का जीव स्वर्ग से च्युत होकर उसके गर्भ में अवतीर्ण हुआ। प्रातःकाल ऐरा ने राजसभा में जाकर अपने स्वप्न राजा को सुनाए और उनके फल के विषय में पूछा।
श्लोक 394 से 404 तीर्थंकर का गर्भावतार और जन्मकल्याणक
राजा द्वारा स्वप्नों का फल विचारते ही इन्द्र और अन्य देवगण गर्भकल्याणक मनाने के लिए उपस्थित हुए। रानी ऐरा का गर्भ दिव्य प्रभाव से बढ़ने लगा और देवताओं द्वारा उसकी निरन्तर पूजा की जाने लगी। नवें महीने ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन उसने एक दिव्य पुत्र को जन्म दिया, जो तीन ज्ञानों से विभूषित और अनुपम तेज से युक्त था। देवों ने शंख, भेरी और घंटानाद से जन्मोत्सव मनाया। इन्द्राणी ने मायामयी निद्रा द्वारा जिनमाता को सुलाकर जिनबालक को इन्द्र के हाथों में सौंपा। तत्पश्चात् इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर ले जाकर क्षीरसागर के जल से उनका जन्माभिषेक किया और जन्मकल्याणक का भव्य उत्सव सम्पन्न किया।
श्लोक 405 से 412 शान्तिनाथ नामकरण और धर्म की पुनः स्थापना
इन्द्र ने जन्माभिषेक के पश्चात् केवल परम्परा के निर्वाह हेतु भगवान् को आभूषणों से अलंकृत किया, क्योंकि वे स्वयं ही समस्त आभूषणों के आभूषण थे। समस्त जीवों को शान्ति प्रदान करने वाले होने के कारण उनका नाम शान्तिनाथ रखा गया। इन्द्र ने उन्हें माता को सौंपकर जन्मकल्याणक सम्पन्न किया और देवगण अपने-अपने लोक लौट गये। धर्मनाथ तीर्थंकर के निर्वाण के बाद धर्म के विच्छेद की अवधि बीतने पर शान्तिनाथ भगवान् का अवतार हुआ, जिन्होंने पुनः धर्म की ज्योति प्रज्वलित की।
श्लोक 413 से 421 शान्तिनाथ का बाल्यकाल और दिव्य स्वरूप
भगवान् शान्तिनाथ की आयु एक लाख वर्ष, शरीर की ऊँचाई चालीस धनुष और वर्ण सुवर्ण के समान था। उनके शरीर पर अनेक शुभ चिह्न विद्यमान थे। दूसरी ओर दृढ़रथ का जीव भी पुनर्जन्म लेकर चक्रायुध के रूप में उत्पन्न हुआ। शान्तिनाथ बाल्यावस्था से ही असाधारण गुणों, सौन्दर्य, कीर्ति और वैभव से सम्पन्न थे। उनका यौवन, मुखमण्डल, केश, ललाट और भौंहें दिव्य शोभा से युक्त होकर सबको आकर्षित करती थीं।
श्लोक 422 से 431 भगवान् के मुखमण्डल और ऊर्ध्वांग की महिमा
भगवान् के नेत्र अत्यन्त विशाल और मनोहर थे, मानो नेत्रों की आदर्श परिभाषा ही उनसे बनी हो। उनके कान समस्त शास्त्रों के धारक होने योग्य थे और नासिका तेजस्विता का प्रतीक थी। कपोल, दन्तपंक्ति, अधर, चिबुक और मुखमण्डल अनुपम सौन्दर्य से युक्त थे। उनका कण्ठ दिव्यध्वनि का आधार बनने योग्य था तथा उनके कन्धे और ऊपरी अंग अलौकिक बल, सौन्दर्य और गौरव के प्रतीक थे।
श्लोक 432 से 441 वक्षस्थल से चरणों तक दिव्य लक्षण
भगवान् का वक्षस्थल विशाल, मध्यभाग सुडौल और नाभि शुभलक्षणों से युक्त थी। कमर, जंघाएँ, घुटने और चरण सभी अद्भुत समरूपता और सौन्दर्य से विभूषित थे। उनके चरणों में ऐसी दिव्यता थी कि वे समस्त इन्द्रों के लिए वन्दनीय थे। उनके प्रत्येक अंग में आध्यात्मिक महिमा और भावी तीर्थंकरत्व की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी।
श्लोक 442 से 451 चरणवैभव, तेज और कीर्ति
भगवान् के चरणों, अँगुलियों और नखों का वर्णन अत्यन्त मंगलकारी रूप में किया गया है। उनके चरण मानो जीवों को स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले थे। उनका तेज सूर्य और चन्द्रमा की उपमा से भी परे था। उनकी कान्ति और कीर्ति जन्म से पूर्व ही लोकव्यापी हो चुकी थी। उनका वचन सिंहनाद के समान प्रभावशाली और शत्रुओं के अहंकार को नष्ट करने वाला था।
श्लोक 452 से 462 राज्यप्राप्ति, चक्रवर्ती पद और वैराग्य की भूमिका
यौवन प्राप्त करने पर उनका विवाह अनेक गुणसम्पन्न राजकन्याओं से हुआ। उन्होंने दीर्घकाल तक राजवैभव और भोगों का उपभोग किया। बाद में पिता विश्वसेन ने उन्हें राज्य सौंप दिया। समय आने पर चौदह रत्न और नौ निधियाँ प्रकट हुईं तथा वे चक्रवर्ती सम्राट बने। पच्चीस हजार वर्ष तक साम्राज्य का संचालन करने के बाद एक दिन दर्पण में दो प्रतिबिम्ब देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध हुआ और वैराग्य जागृत हो गया।
श्लोक 463 से 475 वैराग्य, दीक्षा और संयम ग्रहण
पूर्वभवों का स्मरण होने पर भगवान् ने समझ लिया कि सम्पत्ति, शरीर, आयु और सांसारिक सम्बन्ध सभी नश्वर हैं। तभी लौकान्तिक देवों ने उन्हें धर्मतीर्थ के प्रवर्तन का समय उपस्थित होने का संकेत दिया। उन्होंने पुत्र नारायण को राज्य देकर दीक्षा ग्रहण करने का निश्चय किया। इन्द्र ने उनका दीक्षाभिषेक किया। सहस्राम्रवन में पहुँचकर उन्होंने केशलोंच किया, दिगम्बर मुद्रा धारण की, सामायिक चारित्र और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। उनके साथ चक्रायुध सहित एक हजार राजाओं ने भी संयम धारण किया।
श्लोक 476 से 491 तप, केवलज्ञान और समवसरण की स्थापना
दीक्षा के बाद भगवान् शान्तिनाथ ने कठोर तप द्वारा कषायों का क्षय किया और पृथ्वी को पवित्र बनाया। सहस्राम्रवन में नन्द्यावर्त वृक्ष के नीचे गहन ध्यान करते हुए उन्होंने क्रमशः मोहनीय तथा अन्य घातिया कर्मों का नाश किया। सोलह वर्षों की छद्मस्थ अवस्था के पश्चात् पौष शुक्ल दशमी को उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवगणों ने समवसरण की रचना की और भगवान् के समक्ष असंख्य जीव धर्मश्रवण के लिए उपस्थित हुए। उनके समवसरण में छत्तीस गणधर तथा विशाल मुनिसंघ विद्यमान था।
श्लोक 492 से 501 धर्मसंघ, निर्वाण और मोक्षप्राप्ति
भगवान् शान्तिनाथ के संघ में हजारों केवलज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, ऋद्धिधारी मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे। वे बारह गणों सहित धर्म का प्रचार करते हुए विहार करते रहे। आयु के अन्त में वे सम्मेदशिखर पहुँचे और वहाँ शुक्लध्यान में स्थित होकर समस्त कर्मों का क्षय कर सिद्धपद को प्राप्त हुए। उनके निर्वाणकल्याणक का उत्सव देवों ने श्रद्धापूर्वक मनाया। चक्रायुध सहित नौ हजार मुनियों ने भी उसी समय मोक्ष प्राप्त किया।
श्लोक 502 से 510 शान्तिनाथ की महिमा और उपसंहार
शान्तिनाथ भगवान् ने समस्त कर्मों का उच्छेद कर अनन्त ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य से सम्पन्न सिद्धपद प्राप्त किया। उनके पूर्वभवों की महान आध्यात्मिक प्रगति का वर्णन करते हुए ग्रन्थकार बताते हैं कि वे अनेक जन्मों में क्रमशः उन्नति करते हुए अन्ततः सोलहवें तीर्थंकर बने। चक्रायुध भी अनेक भवों की साधना के पश्चात् उनके प्रमुख गणधर बनकर मोक्ष को प्राप्त हुए। भगवान् शान्तिनाथ द्वारा प्रवर्तित मोक्षमार्ग अखण्ड रूप से चलता रहा और इसलिए उन्हें इस युग का आद्यगुरु कहा गया। अन्त में आचार्य गुणभद्र इस पर्व का समापन करते हुए शान्तिनाथ भगवान् की शरण ग्रहण करने का उपदेश देते हैं।
पर्व 64
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