राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 65 to 72
श्लोक ( Shlok ) 65 – 72
कुमारः श्रूयतां कश्चिदेकदा स्वेच्छया चरन् । गिरेः क्रमेलकः स्वादु तृणं तुङ्गात्प्रदेशतः ॥ ६५ ॥ पतन्मधुरसोन्मिश्रमास्वाद्य सकृदुत्सुकः । ताहगेवाहरिष्यामीत्येतत्पाताभिवाञ्छया ॥ ६६ ॥ तृणान्तरोपयोगादिपराङ्मुखतया स्थितः । मृतस्तथैव त्वं चैतान् भोगान् भोक्तुमुपस्थितान् ॥ ६७ ॥ अनिष्छन् स्वर्गभोगार्थी भविता रहितो धिया । इत्यैकागारिकप्रोक्तं तदाकर्ण्य र्वाणग्वरः ॥ ६८ ॥ प्रतिवक्ता स तं चोरं स्पष्टदृष्टान्तपूर्वकम् । नरः कश्चिन्महादाहज्वरेण परिपीडितः ॥ ६९ ॥ नदीसरस्तटाकादिपयः पीत्वा मुहुर्मुहुः । तथाप्यगततृष्णः किं तृणाप्रस्थाम्बुबिन्दुना ॥ ७० ॥तृप्तिं प्राप्नोत्यसौ वायं जीवो दिव्यसुखं चिरम् । भुक्त्वाऽप्रतृप्तः स्वप्नेऽपि गजकणोस्थिरात्मना ॥ ७१ ॥सुखेनासाधुनानेन कथं तृप्तिमवाप्नुयात् । इति तद्वाचमाकर्ण्य चारोऽनुव्याहरिष्यति ॥ ७२ ॥
वह कहेगा कि हे कुमार ! सुनिये, किसी समय कोई एक ऊँट स्वेच्छासे मीठे तृण चरता हुआ पहाड़के निकट जा पहुँचा। जहाँ वह चर रहा था वहाँकी घास ऊँचे स्थानसे पड़ते हुए मधुके रससे मिल जानेके कारण मीठी हो रहा थी। उस ऊँटने एक बार वह मीठी घास खाई तो यही संकल्प कर लिया कि मैं ऐसी ही घास खाऊँगा। इस संकल्पसे वह मधुके पड़नेकी इच्छा करने लगा तथा दूसरी घासके उपभोग आदिसे विरक्त होकर वहीं बैठा रहा तदनन्तर भूखसे पीड़ित हो मर गया। इसी प्रकार हे कुमार ! तू भी इन उपस्थित भोगोंकी उपेक्षा कर स्वर्गके भोगोंकी इच्छा करता है सो तू भी उसी ऊँटके समान बुद्धिसे रहित है। इस प्रकार विद्युच्चोरके द्वारा कही हुई ऊँटकी कथा सुनकर वैश्यशिरोमणि जम्बूकुमार एक स्पष्ट दृष्टान्त देता हुआ उस चोरको उत्तर देगा कि एक मनुष्य महादाह करनेवाले ज्वरसे पीड़ित था, उसने नदी, सरोवर तथा ताल आदिका जल बार-बार पिया था तो भी उसकी प्यास शान्त नहीं हुई थी सो क्या तृणके अग्रभाग पर स्थित जलकी बूँदसे उसकी तृप्ति हो जावेगी ? इसी प्रकार इस जीवने चिरकाल तक स्वर्गके सुख भोगे हैं फिर भी यह तृप्त नहीं हुआ सो क्या हाथी के कानके समान चञ्चल इस वर्तमान सुखसे यह तृप्त हो जायगा ? इस प्रकार जम्बूकुमारके वचन सुनकर विद्युच्चोर फिर कहेगा ।। ६५-७२ ।।
He will say, “O Prince! Listen. Once upon a time, a certain camel, wandering at its own will, reached near a mountain while grazing on sweet grass. The grass in that area where he was grazing had become sweet because it was mixed with honey dripping from a high place. Once that camel tasted that sweet grass, he resolved that he would only eat such grass. With this resolution, he began to long for the dripping of honey, and becoming detached from consuming any other grass, he kept sitting right there; subsequently, afflicted by hunger, he died. Similarly, O Prince! You too are ignoring these pleasures present before you and desiring the pleasures of heaven; thus, you too are devoid of intellect, just like that camel.”
Hearing this story of the camel told by the thief Vidyucchora, Jambukumar, the crest-jewel among the Vaishyas, giving a clear illustration, will reply to the thief, “A man was suffering from a severe, burning fever. He drank the water of rivers, lakes, and ponds repeatedly, yet his thirst was not quenched. So, will he be satisfied by a drop of water resting on the tip of a blade of grass? Similarly, this soul has enjoyed the pleasures of heaven for a very long time, yet it has not been satisfied. So, will it be satisfied by this present happiness, which is as fleeting as the flickering ear of an elephant? Hearing these words of Jambukumar, the thief Vidyucchora will speak again.” || 65-72 ||
श्लोक 73 से 81
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
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