चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 493 to 501
श्लोक ( Shlok ) 493
सखायौ वनराजस्य विनिर्जित्य नृपात्मजौ। नीत्वा तां निजमित्राय ददतुः प्राप्तसम्मदौ ॥ ४९३ ॥
इधर वनराजके मित्र श्रीषेण और लोहजङ्घने युद्धमें राजाके पुत्रोंको हरा दिया और बहुत ही प्रसन्न होकर वह कन्या वनराजके लिए सौंप दी ।। ४९३ ॥
“Meanwhile, Vanaraja’s friends, Shrishena and Lohajangha, defeated the king’s sons in battle and, filled with great joy, handed the maiden over to Vanaraja. ।। 493 ।।”
श्लोक ( Shlok ) 494 – 497
सुविरक्तां वनेशोऽसौ प्रत्यात्मानं विबुध्य ताम् । प्रौढास्तद्योजनोपाये स्वाः समाहूय दूतिकाः ॥ ४९४ ॥कुरुते मां मयि प्रीतामुपायैरित्यभाषत । ताश्च तत्प्रेषणं लब्ध्वा श्रीचन्द्राभ्याशमागताः ॥ ४९५ ॥सामभेदविधामशाः प्रवेष्टुं हृदयं शनैः । किमेवं तिष्ठसि स्नाहि परिधत्स्व विभूषणैः ॥ ४९६ ॥अलक्कुरु स्रजं धेहिं मुंश्वाहारं मनोहरम् । ब्रूहि विस्त्रब्धमस्माभिः श्रीचन्द्रे सुखसङ्कथाम् ॥ ४९७ ॥
जब वनराजने देखा कि श्रीचन्द्रा मुझसे विरक्त है तब उसने उसके साथ मिलानेवाले उपाय करनेमें चतुर अपनी दूतियाँ बुलाकर उनसे कहा कि तुम लोग किसी भी उपायसे इसे मुझपर प्रसन्न करो । वनराजकी प्रेरणा पाकर वे दूतियाँ श्रीचन्द्राके पास गईं और साम-भेद आदि अनेक विधानोंको जाननेवाली वे दूतियाँ धीरे-धीरे उसके हृदय में प्रवेश करनेके लिए कहने लगीं कि ‘हे श्री चन्द्रे ! तू इस तरह क्यों बैठी है ? स्नान कर, कपड़े पहिन, आभूषणोंसे अलंकार कर, माला। धारण कर, मनोहर भोजन कर और हम लोगोंके साथ विश्वास पूर्वक सुखकी कथाएँ कह ।। ४९४-४९७॥
“When Vanaraja saw that Shrichandra was detached and indifferent towards him, he called his female messengers (emissaries), who were clever in employing methods of reconciliation, and said to them, ‘By any means possible, please make her well-disposed toward me.’ Driven by Vanaraja’s instigation, those messengers, well-versed in various strategies like conciliation and division (Sama and Bheda), approached Shrichandra. Seeking to gradually win over her heart, they began saying, ‘O Shrichandra! Why do you sit like this? Take a bath, wear fine clothes, adorn yourself with ornaments, put on a garland, enjoy delightful food, and confide in us by sharing tales of happiness.’ ।। 494-497 ।।”
श्लोक ( Shlok ) 498
मनुष्यजन्म सम्प्राप्तं दुःखेनानेकयोनिषु । दुर्लभं भोगवैमुख्यादेतन्मानीनशो वृथा ॥ ४९८ ॥
अनेक योनियोंमें परि-भ्रमण करते-करते यह दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाया है इसलिए इसे भोगोपभोगकी विमुखतासे व्यर्थ ही नष्ट मत कर ।। ४९८ ॥
“After wandering through countless births and life-forms, this rare human birth has been attained; therefore, do not let it go to waste in vain by turning away from pleasures and enjoyments. ।। 498 ।।”
श्लोक ( Shlok ) 499
वनराजात्परो नास्ति वरो रूपादिभिर्गुणैः । लोकेऽस्मिन्लोचने सम्यक्तवोन्मील्य न पश्यसि ॥ ४९९ ॥
इस संसार में रूप आदि गुणोंकी अपेक्षा वनराजसे बढ़कर दूसरा वर नहीं है यह तू अपने नेत्र अच्छी तरह खोलकर क्यों नहीं देखती है ? ॥ ४९९॥
“In this world, there is no other groom superior to Vanaraja in terms of beauty and other virtues; why do you not open your eyes wide and see this clearly? ।। 499 ।।”
श्लोक ( Shlok ) 500 – 501
लक्ष्मीरिवादिचक्रेशं भूषेवाभरणद्रुमम् । सम्पूर्णेन्दुमिव ज्योत्स्ना वनराजमुपाश्रय ॥ ५०० ॥ प्राप्य चूडामणि मूढः को नामात्रावमन्यते । इत्यन्यैश्च भयप्रायैर्वचनैरकदर्शयन् ॥ ५०१ ॥
जिस प्रकार भरत चक्रवर्तीके साथ लक्ष्मी रहती थी, आभूषण जातिके वृक्षोंके समीप शोभा रहती है और पूर्ण चन्द्रमाके साथ चाँदनी रहती है उसी प्रकार तू वनराजके समीप रह। चूड़ामणि रत्नको पाकर ऐसा कौन मूर्ख होगा जो उसका तिरस्कार करता हो, इस प्रकारके तथा भय देनेवाले और भी वचनोंसे उन दूतियोंने श्रीचन्द्राको बहुत तङ्ग किया ॥ ५००-५०१ ॥
“Just as Goddess Lakshmi resides with Bharata Chakravarti, radiance dwells near the wishing-trees (Kalpavrikshas) that yield ornaments, and moonlight accompanies the full moon, in the same way, you should remain by the side of Vanaraja. Who could be such a fool that, upon obtaining the crest-jewel (Chudamani), would reject it? With these kinds of persuasive words, as well as others meant to induce fear, those female messengers distressed Shrichandra greatly. ।। 500-501 ।।”
श्लोक 502 से 512
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492
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