मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 136 to 152
श्लोक ( Shlok ) 136 – 139
लोकद्वयहितो नान्यस्त्वमेवेत्यभिनन्ध तम् । दुष्पुत्र इव भोगोऽयं पापापलापकारणम् ॥ १३६ ॥इति स्वकुलयोग्याय। दत्तराज्यमहाभरः । गत्वा गणेशमभ्यर्च्य वनाद्रौ नवसंयतौ ॥ १३७ ॥मया कृतो महान् दोषः तं क्षमेथां युवामिति । निगदनावयोर्को कद्वितीयैकगुरुर्भवान् ॥१३८ ॥संयमोऽयं त्वयैवापि ताभ्यां सम्प्राप्य संस्तवम् । बहुभिर्भूभुजैः सार्द्ध व्यक्तसङ्गः स संयमम् ॥१३९॥
‘दोनों लोकोंका हित करने वाला तू ही है’ इस प्रकार मन्त्रीकी प्रशंसा कर राजाने विचार किया कि ये भोग कुपुत्रके समान पाप और निन्दा के कारण हैं। ऐसा विचार कर उसने अपने कुलके योग्य किसी पुत्रको राज्य का महान् भार सौंप दिया और वनगिरि नामक पर्वत पर जाकर गणधर भगवान्को पूजा की। वहींपर नवदीक्षित राजकुमार तथा मंत्रि-पुत्रको देखकर उसने कहा कि मैंने जो बड़ा भारी अपराध किया है उसे आप दोनों क्षमा कीजिये । राजाके वचन सुनकर नवदीक्षित मुनियोंने कहा कि आप ही हमारे दोनों लोंकोंके गुरु हैं, यह संयम आपने ही प्रदान कराया है। इस प्रकार उन दोनोंसे प्रशंसा पाकर राजाने सब परि-ग्रहका त्याग कर अनेक राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया ॥ १३६-१३९ ।।
” ‘You alone are the one who secures the welfare of both worlds.’ Praising the minister in this manner, the King reflected that these worldly pleasures, much like a wicked son, are only the cause of sin and infamy. Reflecting thus, he entrusted the heavy burden of the kingdom to a worthy son fitting for his lineage, proceeded to the mountain named Vangiri, and worshipped the Ganadhara Lord. Seeing the newly initiated prince and the minister’s son right there, he said, ‘Please forgive the immense offense that I have committed against you both.’ Hearing the King’s words, the newly initiated monks replied, ‘You alone are our preceptor for both worlds; it is you who has truly bestowed this path of self-restraint upon us.’ Receiving praise from both of them in this manner, the King renounced all worldly possessions and, along with many other kings, adopted the vows of self-restraint (asceticism).”136 – 139
श्लोक ( Shlok ) 140
प्राप्य क्रमेण ध्वस्तारिर्धातिकर्मविधातकृत् । केवलावगमज्योतिर्लोकाग्रे व्यद्युतत्तराम् ॥ १४० ॥
क्रम-क्रमसे मोह कर्मका विध्वंसकर अवशिष्ट घातिया कर्मोंका नाश किया और केवलज्ञान रूपी ज्योतिको प्राप्तकर वे लोकके अग्रभागमें देदीप्यमान होने लगे ।। १४० ।।
“Gradually destroying the Moha (deluding) Karma, they annihilated the remaining Ghatiya (destructive) Karmas; and attaining the supreme light of Kevalajnana (omniscience), they began to shine resplendently at the topmost crest of the universe (Siddhashila).”140
श्लोक ( Shlok ) 141
तौ समुत्कृष्ठचारित्रौ द्वौ खङ्ग पुरबाह्यगौ । आतापयोगमादाय तस्थतुस्त्यक्तविग्रहौ ॥ १४१ ॥
इधर उत्कृष्ट चारित्रका पालन करते हुए वे दोनों ही कुमार आतापन योग लेकर तथा शरीरसे ममत्व छोड़ कर खङ्गपुर नामक नगरके बाहर स्थित थे ॥ १४१ ॥
“Meanwhile, observing the highest form of conduct, both of those princes—having completely abandoned all attachment to the physical body and undertaking the Atapana Yoga (the austerity of exposing oneself to the scorching sun)—were stationed just outside the city named Khangapura.”141
श्लोक ( Shlok ) 142 – 144
तत्पुराधिपसोमप्रभाद्धयस्य सुदर्शना । सीता च देव्यौ तत्सूनुः सुप्रभः सुप्रभाङ्गटत् ॥ १४२ ॥पुरुषोत्तमनामा च गुणैश्च पुरुषोत्तमः । मधुसूदनमुच्छिद्य कृतदिग्जयपूर्वकम् ॥ १४३ ॥ नृखेचरसुराधीशप्रवद्धितमहोदयम् । प्रविशन्तं प्रभावन्तं नगरं पुरुषोत्तमम् ॥ १४४ ॥
उस समय खङ्गापुर नगर के राजाका नाम सोमप्रभ था। उसके सुदर्शना और सीता नामकी दो स्त्रियाँ थीं। उन दोनोंके उत्तम कान्तिवाले शरीरको धारण करने वाला सुप्रभ और गुणोंके द्वारा पुरुषोंमें श्रेष्ठ पुरुषोत्तम इस प्रकार दो पुत्र थे। इनमें पुरुषोत्तम नारायण था वह दिग्विजयके द्वारा मधुसूदन नामक प्रति नारायण को नष्ट कर नगरमें प्रवेश कर रहा था। मनुष्य विद्याधर और देवेन्द्र उसके ऐश्वर्यको बढ़ा रहे थे, उसका शरीर भी प्रभापूर्ण था ।। १४२-१४४ ॥
“At that time, the name of the king of Khangapura city was Somaprabha. He had two wives named Sudarshana and Sita. They had two sons—Suprabha, who possessed a body of magnificent luster, and Purushottama, who was the foremost among men due to his virtues. Among them, Purushottama was the Narayana; having destroyed the Prati-Narayana named Madhusudana through his campaign of world conquest (Digvijaya), he was now making his triumphal entry into the city. Humans, Vidyadharas (celestial beings of knowledge), and Devendras (lords of the deities) were enhancing his grandeur, and his body was radiant with immense splendor.”142 – 144
श्लोक ( Shlok ) 145 – 147
चन्द्रचूलमुनिर्दृष्ट्वा निदानमकृताज्ञकः । जीवनावसितौ सम्यगाराध्योभौ चतुर्विधम् ॥ १४५ ॥सनकुमारकल्पस्य विमाने कनकप्रभे । विजयः स्वर्णचूलेऽन्यो मणिचूलो मणिप्रभे ॥ १४६ ॥जातवन्तौ तदुत्कृष्टसागरोपमितायुषौ । सुचिरं भुक्तसम्भोगौ ततश्च्युत्वेह भारते ॥ १४७ ॥
नगरमें प्रवेश करते देख अज्ञानी चन्द्रचूल मुनि (राजकुमारका जीव) निदान कर बैठा। अन्तमें जीवन समाप्त होनेपर दोनों मुनियोंने चार प्रकारकी आराधना की। उनमेंसे एक तो सनत्कुमार स्वर्गके कनकप्रभ नामक विमानमें विजय नामक देव और दूसरा मणिप्रभ विमानमें मणिचूल नामका देव हुआ। वहाँ उनकी उत्कृष्ट आयु एक सागर प्रमाण थी। चिर कालतक वहाँ के सुख भोग कर वे वहाँ से च्युत हुए ॥ १४५-१४७ ।।
“Seeing [the grand procession] entering the city, the ignorant monk Chandrachula (the soul of the prince) made a Nidana (a binding spiritual vow or desire for worldly reward). Ultimately, as their lives came to an end, both the monks performed the fourfold adoration (Aradhana). Among them, one became the deity named Vijaya in the Kanakaprabha celestial vehicle (Vimana) of the Sanatkumara heaven, while the other became the deity named Manichula in the Maniprabha celestial vehicle. There, their maximum lifespan was measured at one Sagara (an immense cosmic time unit). After enjoying the celestial pleasures there for a long time, they fell from that heavenly realm [upon the exhaustion of their life-karma].”145 – 147
श्लोक ( Shlok ) 148 – 152
वाराणसीपुराधीशो राज्ञो दशरथश्रुतेः । सुतः सुबालासंज्ञायां शुभस्वप्नपुरस्सरम् ॥ १४८ ॥कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां फाल्गुने मास्यजायत । मघायां इलभृद्धावी चूलान्तकनकामरः ॥ १४९ ॥त्रयोदशसहस्राब्दो रामनामानताखिलः । तत एव महीभत्र्तुः कैकेय्यामभवत्पुरः ॥ १५० ॥सरः सूर्येन्दुकलमक्षेत्रसिंहान् महाफलान् । स्वप्नान् संदर्थं माघस्य शुक्लपक्षादिमे दिने ॥ १५१ ॥ विशाखर्भे स चक्राक्को मणिचूलोऽमृताशनः । षड्गुणद्विसहस्त्राब्दजीवितो लक्ष्मणाह्नयः ॥ १५२ ॥
अथानन्तर इसी भरतक्षेत्रके बनारस नगरमें राजा दशरथ राज्य करते थे। उनकी सुबाला नामकी रानी थी। उसने शुभ स्वप्न देखे और उसीके गर्भसे फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीके दिन मघा नक्षत्र में सुवर्णचूल नामका देव जो कि मन्त्रीके पुत्रका जीव था, होनहार बलभद्र हुआ। उसकी तेरह हजार वर्षकी आयु थी, राम नाम था, और उसने सब लोगोंको नम्रीभूत कर रक्खा था । उन्हीं राजा दशरथकी एक दूसरी रानी कैकेयी थी। उसने सरोवर, सूर्य, चन्द्रमा, धानका खेत और सिंह ये पाँच महाफल देनेवाले स्वप्न देखे और उसके गर्भसे माघ शुक्ला प्रतिपदाके दिन विशाखा नक्षत्रमें मणिचूल नामका देव जो कि राजकुमारका जीव था उत्पन्न हुआ। उसके शरीरपर चक्रका चिह्न था, बारह हजार वर्षकी उसकी आयु थी और लक्ष्मण उसका नाम था ।। १४८-१५२ ॥
“Thereafter, in the Varanasi city of this very Bharatakshetra, King Dasharatha was ruling. He had a queen named Subala. She witnessed auspicious dreams, and from her womb—on the thirteenth day of the dark fortnight of the month of Phalguna, under the Magha constellation—the deity named Suvarnachula, who was the soul of the minister’s son, was born as the promising Balabhadra. He had a lifespan of thirteen thousand years, was named Rama, and had brought all people into submission. King Dasharatha had another queen named Kaikeyi. She saw five dreams that yield magnificent fruits: a lake, the sun, the moon, a paddy field, and a lion; and from her womb—on the first day of the bright fortnight of the month of Magha, under the Vishakha constellation—the deity named Manichula, who was the soul of the prince, was born. He bore the mark of the discus (Chakra) upon his body, had a lifespan of twelve thousand years, and Lakshmana was his name.”148 – 152
श्लोक 153 से 162
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ तीर्थकर पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ तीर्थकर, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125
मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |