चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 26 to 41
श्लोक ( Shlok ) 26 – 31
इदञ्चावश्यकर्तव्यं कोऽप्युपायोऽत्र कथ्यताम् । सोऽपि मन्त्रिवचः श्रुत्वा तत्कार्योपायपण्डितः ॥ २६ ॥जोषमाध्वमहं कुर्वे तत्समर्थनमित्यमून् । सन्तोष्य मन्त्रिणः सोऽपि तत्स्वरूपं विलासवत् ॥ २७ ॥पट्टके सम्यगालिख्य वस्त्रेणाच्छाद्य यत्नतः । तत्पार्श्ववर्तिनः सर्वान् ‘स्वीकृत्योरकोचदानतः ॥ २८॥स्वयञ्च वोद्रको नाम वणिग्भूत्वा तदालयम् । प्राविक्षत्पट्टके रूपं कन्ये ते तत्करस्थिते ॥ २९ ॥विलोक्य भवति प्रीत्या सौरङ्गादतिसाहसान् । कुमारविहितान्मार्गाद्गत्वा किञ्चित्ततोऽन्तरे ॥ ३०॥चेलिनी कुटिला ज्येष्ठा मुक्त्वा त्वं गच्छ विस्मृता । न्यानयाभरणानीति स्वयं तेन सहागमत् ॥ ३१ ॥
यह कार्य अवश्य करना है इसलिए कोई उपाय बतलाइये । मन्त्रियोंके वचन सुनकर उस कार्य के उपाय जाननेमें चतुर अभयकुमारने कहा कि आप लोग चुप बैठिये, मैं इस कार्यको सिद्ध करता हूँ। इस प्रकार संतुष्ट कर अभयकुमारने मन्त्रियोंको बिदा किया और स्वयं एक पटियेपर राजा श्रेणिकका विलास पूर्ण चित्र बनाया। उसे वस्त्रसे ढककर बड़े यत्नसे ले गया। राजाके समीपवर्ती लोगोंको घूस दे कर उसने अपने वश कर लिया और स्वयं बोद्रक नामका व्यापारी बनकर राजा चेटकके घर में प्रवेशकिया। वहाँ वे दोनों कन्याएं वोद्रकके हाथमें स्थित पटियेपर लिखा हुआ आपका रूप देखकर आपमें प्रेम करने लगीं। कुमारने एक सुरङ्गका मार्ग पहलेसे ही तैयार करवा लिया था अतः वे कन्याएं बड़े साहसके साथ उस मार्गसे चल पड़ीं। चेलिनी कुटिल थी इसलिए कुछ दूर जानेके बाद ज्येष्ठासे बोली कि मैं आभूषण भूल आई हूँ तू जाकर उन्हें ले आ। यह कहकर उसने ज्येष्ठाको तो वापिस भेज दिया और स्वयं अभयकुमारके साथ आ गई ॥ २६-३१ ॥
” ‘This task must absolutely be accomplished, so please suggest a way.’ Hearing the words of the ministers, Abhayakumara, who was clever in finding solutions for such matters, said, ‘All of you please remain quiet, I shall accomplish this task.’ Having reassured them in this manner, Abhayakumara sent the ministers away. He then painted a luxurious and majestic portrait of King Shrenika on a wooden board. Covering it with a cloth, he carried it with great care. By bribing the people close to the king, he brought them over to his side, and disguised as a merchant named Vodraka, he entered the palace of King Chetaka. There, seeing your handsome form painted on the board held in Vodraka’s hands, both the maidens fell in love with you. Since the prince had already prepared a secret tunnel beforehand, those maidens courageously set off through that path. Chelini was cunning; therefore, after going some distance, she said to Jyeshtha, ‘I have forgotten my ornaments, you go and fetch them.’ Saying this, she sent Jyeshtha back and came along with Abhayakumara herself. // 26-31 //”
श्लोक ( Shlok ) 32 – 33
साप्याचाभरणाऽऽगस्य तामदृष्ट्वातिसन्धिता । तयाहमिति शोकार्ता निजमामीं यशस्वतीम् ॥३२॥दृष्ट्रा क्षान्ति समीपेऽस्याः श्रुत्वा धर्म जिनोदितम् । निविंद्य संसृतेर्दीक्षां प्राप पापविनाशिनीम् ॥ ३३ ॥
जब ज्येष्ठा आभूषण ले कर लौटी तो वहाँ चेलनी तथा अभयकुमारको न पाकर बहुत दुःखी हुई और कहने लगी कि चेलिनीने मुझे इस तरह ठगा है। अन्तमें उसने अपनी मामी यशस्वती नामकी आर्यिका के पास जाकर जैन धर्मका उपदेश सुना और संसारसे विरक्त हो कर पापोंका नाश करने वाली दीक्षा धारण कर ली ॥ ३२-३३ ॥
“When Jyeshtha returned with the ornaments and did not find Chelini and Abhayakumara there, she became deeply distressed and said, ‘Chelini has deceived me in this manner.’ In the end, she went to her maternal aunt, an Aryika (Jain nun) named Yashasvati, listened to the teachings of Jainism, and becoming detached from the worldly life, took initiation (diksha) which destroys all sins. // 32-33 //”
श्लोक ( Shlok ) 34
भवतापि महाप्रीत्या चेलिनीयं यथाविधि । गृहीतानुमहादेवी पट्टबन्धात्सुतोष सा ॥ ३४ ॥
आपने भी बड़ी प्रीतिसे विधिपूर्वक चेलनाके साथ विवाह कर उसे महादेवीका पट्ट बाँधा जिससे वह बहुत ही सन्तुष्ट हुई ।॥ ३४ ॥
“You too, with great affection and according to the prescribed rituals, married Chelana and consecrated her as the chief queen (Mahadevi), which left her deeply satisfied. // 34 //”
श्लोक ( Shlok ) 35
चन्दना च यशस्वत्या गणिन्याः सन्निधौ स्वयम् । सम्यक्त्वं श्रावकाणाञ्च प्रतान्यादा सुव्रता ॥ ३५ ॥
इधर उत्तम व्रत धारण करने वाली चन्दना ने स्वयं यशस्वती आर्यिकाके समीप जाकर सम्यग्दर्शन और श्रावकोंके व्रत ग्रहण कर लिये ॥ ३५ ॥
“Meanwhile, Chandana, who observed noble vows, personally went to the Aryika Yashasvati and accepted the right faith (Samyagdarshana) and the vows of a layperson (Shravaka). // 35 //”
श्लोक ( Shlok ) 36 – 41
ततः खगाद्र्यवाक्श्रेणीसुवर्णाभपुरेश्वरः । मनोवेगः खगाधीशः स मनोवेगया समम् ॥ ३६ ॥स्वच्छन्दं चिरमाक्रीड्य प्रत्यायाँश्चन्दनां वने । अशोकाख्ये समाक्रीडमानां परिजनैः सह ॥ ३७ ॥विलोक्यानङ्ग निर्मुकशरजर्जरिताङ्गकः । प्रापय्य स्वप्रियां गेहं रूपिणी विद्यया स्वयम् ॥ ३८ ॥विकृत्य रूपं स्वं तत्र निधाय हरिविष्टरे । अशोकवनमभ्येत्य गृहीत्वा चन्दनां द्रुतम् ॥ ३९ ॥प्रत्यागतो मनोवेगाप्येतं विहितवञ्चनम् । शास्वा कोपारुणीभूतविभीषणविलोचना ॥ ४०॥ तां विद्यादेवतां वामपादेनाक्रम्य सावधीत् । कृतागृहासा सा विद्याप्यगात्सिंहासनाचदा ॥ ४१ ॥
किसी एक समय वह चन्दना अपने परिवारके लोगोंके साथ अशोक नामक वनमें क्रीड़ा कर रही थी। उसी समय दैवयोग से विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीके सुवर्णाभ नगरका राजा मनोवेग विद्याधर अपनी मनोवेगा रानीके साथ स्वच्छन्द क्रीडा करता हुआ वहाँ से निकला और क्रीड़ा करती हुई चन्दनाको देखकर कामके द्वारा छोड़ हुए बाणोंसे जर्जरशरीर हो गया। वह शीघ्र ही अपनी स्त्रीको घर भेजकर रूपिणी विद्यासे अपना दूसरा रूप बनाकर सिंहासनपर बैठा आया और अशोक वनमें आकर तथा चन्दनाको लेकर शीघ्र ही वापिस चला गया। उधर मनोवेगा उसकी मायाको जान गई जिससे क्रोधके कारण उसके नेत्र लाल हो कर भयंकर दिखने लगे। उसने उस विद्या देवताको बायें पैरकी ठोकर देकर मार दिया जिससे वह अट्टहास करती हुई सिंहासनसे उसी समय चली गई ।। ३६-४१ ॥
“At one time, Chandana was playing with her family members in a forest named Ashoka. At that very moment, by a stroke of fate, Manovega, a Vidyadhara king of Suvarnabha city on the southern range of Mount Vijayardha, passed by that way while sporting freely with his queen Manovega. Seeing Chandana playing, his body became completely pierced by the arrows shot by Kama (the god of love). He quickly sent his wife home, assumed a duplicate form using the Vidyā of illusion (Rupini Vidya), and sat on the throne. Then, returning to the Ashoka forest, he abducted Chandana and swiftly departed. Meanwhile, Queen Manovega figured out his illusion, causing her eyes to turn red with rage, making her look terrifying. She kicked that illusory deity with her left foot and destroyed it, after which she left the throne at that very moment, laughing out loud. // 36-41 //”
श्लोक 42 से 51
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25
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