नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 364 to 375
श्लोक ( Shlok ) 364
कंसनाम्ना समाहूतस्तत एव ‘पुरोद्भवैः । निसर्गशौर्यदपिंष्ठः शैशवेऽपि निरर्गलः ॥३६४॥
चूँकि यह कांसकी सन्दूक में आया था इसलिए गाँवके लोगोंने इसे कंस नामसे पुकारना शुरू कर दिया। यह स्वस्वभावसे ही अपनी शूर-वीरताका घमण्ड रखता है और बचपनसे ही स्वच्छन्द प्रकृतिका है’ ।। ३६४ ॥
“‘Since he arrived in a bell-metal (Kansa) casket, the village folk began calling him by the name of Kansa. By his very nature, he harbors a deep pride in his own valor and heroism, and he has possessed a wild, unbridled disposition since childhood.’”364
श्लोक ( Shlok ) 365 – 366
इति तद्वचनं श्रुत्वा मन्जूषान्तः स्थपत्रकम् । गृहीत्वा वाचयित्वोच्चैरुग्रसेनमहीपतेः ॥३६५॥पद्मावत्याश्च पुत्रोऽयमिति ज्ञात्वा महीपतिः । विततार सुतां तस्मै राज्यार्धञ्च प्रतुष्टवान् ॥३६६॥
मण्डो-दरीके ऐसे वचन सुनकर राजा जरासन्धने सन्दूकके भीतर रखा हुआ पत्र लेकर बचवाया । उसमें लिखा था कि यह राजा उग्रसेन और रानी पद्मावतीका पुत्र है। यह जानकर सन्तुष्ट हुए राजा जरा-सन्धने कंसके लिए जीवद्यशा पुत्री तथा आधा राज्य दे दिया ।। ३६५-३६६ ।।
“Upon hearing these words from Mandodari, King Jarasandha took the letter that had been kept inside the casket and had it read aloud. It was written therein that this child was the son of King Ugrasen and Queen Padmavati. Learning of his noble royal lineage, King Jarasandha was deeply satisfied, and he duly bestowed his daughter Jivadyasha along with half of his kingdom upon Kansa.”365 – 366
श्लोक ( Shlok ) 367 – 368
कंसोऽप्युत्पत्तिमात्रेण स्वस्य नद्यां विसर्जनात् । प्रवृद्धपूर्ववैरः सन् कुपितो मधुरापुरीम् ॥ ३६७॥स्वयुमादाय बन्धस्थौ गोपुरे पितरौ न्यधात् । विचारविकलाः पापाः कोपिताः किं न कुर्वते ॥३६८॥
जब कंसने यह सुना कि उत्पन्न होते ही मुझे मेरे माता-पिताने नदीमें छोड़ दिया था तब वह बहुत ही कुपित हुआ, उसका पूव पर्यायका वैर वृद्धिंगत हो गया। उसी समय उसने मथुरापुरी जाकर माता-पिताको कैद कर लिया और दोनोंको गोपुर – नगरके प्रथम दरवाजेके ऊपर रख दिया सो ठीक ही है क्योंकिविचार रहित पापी मनुष्य कुपित होकर क्या क्या नहीं करते हैं ? ।। ३६७-३६८ ॥
“When Kansa discovered that his parents had abandoned him in the river immediately upon his birth, he flew into a terrible rage, and the deep-seated animosity from his past life flared up intensely. At that very moment, he marched into Mathurapuri, imprisoned his father and mother, and locked them away in a cell atop the main gateway (Gopura) of the city. And rightly so, for when sinful men lose all sense of reason and are consumed by fury, what atrocities are they not capable of committing?”367 – 368
श्लोक ( Shlok ) 369 – 375
अथ स्वपुरमानीय वसुदेवमहीपतिम् । देवसेनसुतामस्मे देवकीमनुजां निजाम् ॥३६९॥विभूतिमद्वितीयैवं काले कंसस्य गच्छति । अन्येद्युरतिमुक्ताख्यमुनिभिक्षार्थमागमत् ॥३७०॥राजगेहं समीक्ष्यैनं हासाज्जीवद्यशा मुदा । देवकी पुष्पजानन्दवस्त्रमेशवानुजा ॥ ३७१॥स्वस्थाश्चेष्टितमेतेन प्रकाशयति ते मुने । इत्यवोचत्तदाकर्ण्य सकोपः सोऽपि गुप्तिभित् ॥३७२॥सुतोऽस्यास्तव भतारं भाव्यवश्यं हनिष्यति । इत्यवोचत्ततः क्रुध्वा सा तद्वत्रं द्विधा व्यधात् ॥३७३॥पतिमेव न ते तेन पितरञ्च हनिष्यति । इत्युक्ता सा पुनः क्रुध्वा पादाभ्यां ‘तद्व्यमर्दयत् ॥ ३७४॥तद्विलोक्य मुनिर्देवकीसुतः सागरावधिम् । पालयिष्यति भूनारीं नारी वेत्यब्रवीत्स ताम् ॥ ३७५॥
तदनन्तर कंस राजा बसुदेवको अपने नगरमें ले आया और उन्हें उसने बड़ी विभूतिके साथ राजा देवसेनकी पुत्री तथा अपनी छोटी बहिन देवकी समर्पित कर दी। इस प्रकार कंसका समय सुखसे व्यतीत होने लगा। किसी दूसरे दिन अतिमुक्त मुनि भिक्षाके लिए राजभवनमें आये। उन्हें देख हँसीसे जीवद्यशा वड़े हर्षसे कहने लगी कि ‘हे मुने ! यह देवकीका ऋतुकालका वस्त्र है, यह आपकी छोटी बहिन इस वस्त्रके द्वारा अपनी चेष्टा आपके लिए दिखला रही है’। जीवद्यशाके उक्त वचन सुनकर मुनिका क्रोध भड़क उठा। वे वचनगुप्तिको भङ्ग करते हुए बोले कि इस देवकीका जो पुत्र होगा वह तेरे पतिको अवश्य ही मारेगा। यह सुनकर जीवद्यशाको भी क्रोध आ गया और उसने उस वस्त्रके दो टुकड़े कर दिये। तब मुनिने कहा कि वह न केवल तेरे पतिको मारेगा किन्तु तेरे पिताको भी मारेगा। यह सुनकर तो उसके क्रोधका पार ही नहीं रहा। अबकी बार उसने उस वस्त्रको पैरोंसे कुचल दिया। यह देख मुनिने कहा कि देवकीका पुत्र स्त्रीकी तरह समुद्रान्त पृथिवी रूपी स्त्रीका पालन करेगा ।। ३६९-३७५ ।।
“Thereafter, King Kansa brought Vasudeva to his own city and, with great pomp and splendor, offered him the hand of Devaki—who was the daughter of King Devasen and Kansa’s own younger sister. In this manner, Kansa began to spend his days in comfort and happiness.
On another day, the sage Atimukta arrived at the royal palace seeking alms (Bhiksha). Upon seeing him, Jivadyasha (Kansa’s wife) mockingly and with great glee said, ‘O Holy Monk! This is Devaki’s menstrual cloth. Through this garment, your younger sister is revealing her playful intentions toward you.’
Hearing these words from Jivadyasha, the sage’s wrath flared up. Breaking his vow of speech restraint (Vachana-Gupti), he proclaimed, ‘The son born to this very Devaki shall surely slay your husband!’ Hearing this, Jivadyasha too was consumed by anger and ripped the cloth into two pieces. At that, the sage declared, ‘He will not only kill your husband but your father as well!’
Upon hearing this, her fury knew no bounds. This time, she trampled the cloth under her feet. Seeing this, the sage prophesied, ‘Like a husband to a wife, Devaki’s son shall rule over and protect the entire earth right up to the shores of the ocean.'”369 – 375
श्लोक 376 से 392
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नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363
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