अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 253 to 261
श्लोक ( Shlok ) 253 – 259
आषाढस्य सिते पक्षे षष्ठ्यां शशिनि चोत्तरा । षाढे सप्ततलप्रासादस्याभ्यन्तरवर्तिनि ॥ २५३ ॥नन्द्यावर्तगृहे रत्नदीपिकाभिः प्रकाशिते । रत्नपर्यङ्कके हंसतूलिकादिविभूषिते ॥ २५४ ॥ रौद्रराक्षसगन्धर्वयामत्रितयनिर्गमे । मनोहराख्यतुर्यस्य यामस्यान्ते प्रसन्नधीः ॥ २५५ ॥ दरनिद्रावलोकिष्ट विशिष्टफलदायिनः । स्वप्नान् षोडशविच्छिन्नान् प्रियास्य प्रियकारिणी ॥ २५६ ॥ तदन्तेऽपश्यदन्यञ्च गजं वक्त्रप्रवेशिनम् । प्रभातपटहध्वानैः पठितैर्वन्दिमागधैः ॥ २५७ ॥ मङ्गलैश्च प्रबुद्धयाशु स्नात्वा पुण्यप्रसाधना । सा सिद्धार्थमहाराजमुपगम्य कृतानतिः ॥ २५८ ॥ सम्प्राप्तार्धासना स्वप्नान्यथाक्रममुदाहरत् । सोऽपि तेषां फलं भावि यथाक्रममबुबुधत् ॥ २५९ ॥
आषाढ़ शुक्ल षष्ठी के दिन जब कि चन्द्रमा उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें था तब राजा सिद्धार्थकी प्रसन्नबुद्धि वाली रानी प्रियकारिणी, सातखण्ड वाले राजमहलके भीतर रत्नमय दीपकों से प्रकाशित नन्द्यावर्त नामक राजभवनमें हंस-तूलिका आदिसे सुशोभित रत्नोंके पलंगपर सो रही थी। जब उस रात्रिके रौद्र, राक्षस और गन्धर्व नामके तीन पहर निकल चुके और मनोहर नामक चौथे पहरका अन्त.. होनेको आया तब उसने कुछ खुली-सी नींदमें सोलह स्वप्न देखे । सोलह स्वप्नोंके बाद ही उसने मुखमें प्रवेश करता हुआ एक अन्य हाथी देखा । तदनन्तर सवेरेके समय बजने वाले नगाड़ोंकी आवाजसे तथा चारण और मागधजनोंके द्वारा पढ़े हुए मङ्गलपाठोंसे वह जाग उठी और शीघ्र ही स्नान कर पवित्र वस्त्राभूषण पहन महाराज सिद्धार्थके समीप गई। वहाँ नमस्कार कर वह महाराजके द्वारा दिये हुए अर्धासनपर विराजमान हुई और यथाक्रमसे स्वप्न सुनाने लगी। महाराजने भी उसे यथाक्रमसे स्वप्नोंका होनहार फल बतलाया ॥ २५३-२५९ ॥
On the day of Ashadha Shukla Shasthi (the sixth day of the bright half of the lunar month of Ashadha), while the moon was in the Uttarashadha constellation, King Siddhartha’s clear-minded and joyful Queen Priyakarini was sleeping on a gem-studded bed adorned with soft swan-down pillows. She was within the seven-storied palace, inside the royal residence named Nandyavarta, which was brilliantly illuminated by jewel-encrusted lamps.
When the three watches of the night—known as Raudra, Rakshasa, and Gandharva—had passed, and the beautiful fourth watch named Manohara was drawing to a close, she saw sixteen dreams in a state of semi-sleep. Immediately after these sixteen dreams, she saw yet another elephant entering her mouth.
Subsequently, at dawn, she awoke to the sounding of morning drums and the auspicious chants recited by the bards and panegyrists. She bathed quickly, put on pure clothes and ornaments, and went to Maharaja Siddhartha. There, after offering her respects, she sat upon the half-seat offered by the King and began to narrate her dreams in sequence. The Maharaja, in turn, explained the promised future fruits of each dream to her in order. || 253-259 ||
श्लोक ( Shlok ) 260 – 261
श्रुतस्वप्मफला देवी तुष्टा प्राप्तेव तत्फलम् । अथामराधिपाः सर्वे तयोरभ्येत्य सम्पदा ॥ २६० ॥कल्याणाभिषवं कृत्वा नियोगेषु यथोचितम् । देवान् देवीश्च संयोज्य स्वं स्वं धाम ययुः पृथक् ॥ २६१ ॥
स्वप्नोंका फल सुनकर वह इतनी संतुष्ट हुई मानो उसने उनका फल उसी समय प्राप्त ही कर लिया हो। तदनन्तर सब देवोंने आकर बड़े वैभवके साथ राजा सिद्धार्थ और रानी प्रियकारिणीका गर्भकल्याणक सम्बन्धी अभिषेक किया, देव और देवियोंको यथायोग्य कार्योंमें नियुक्त किया और यह सब करनेके बाद वे अलग-अलग अपने-अपने स्थानों पर चले गये ।। २६०-२६१ ॥
Hearing the interpretation of the dreams, she felt as deeply satisfied as if she had received their fruits that very moment. Thereafter, all the deities arrived with grand opulence and performed the Garbha-kalyanaka (conception auspicious ritual) ablution of King Siddhartha and Queen Priyakarini. They assigned the gods and goddesses to their respective duties and, having completed everything, departed for their own abodes. || 260-261 ||
श्लोक 262 से 270
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252
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