अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 172 to 184
श्लोक ( Shlok ) 172
एकोऽपि सिंहसदृशः सकलावनीशो हत्वा पितुर्वधकृतौ जमदग्निसूनू । कीर्त्या स्वया धवलिताऽखिलदिक सुभौम-श्चक्री सुदुर्नयव शानरकेऽष्टमोऽभूत् ॥ १७२ ॥
देखो, आठवाँ चक्रवर्ती सुभौम यद्यपि सिंहके समान एक था- अकेला ही था तथापि वह समस्त पृथिवीका स्वामी हुआ। उसने अपने पिताका वध करनेवाले जमदग्निके दोनों पुत्रोंको मारकर अपनी कीर्तिसे समस्त दिशाएँ उज्ज्वल कर दी थीं किन्तु स्वयं दुर्नीतिके वश पड़कर नरकमें उत्पन्न हुआ था ।।१७२।।
“Behold! Although the eighth Chakravarti, Subhauma, was solitary like a lion—all alone—yet he became the master of the entire earth. By slaying both sons of Jamadagni, who had murdered his father, he had illuminated all directions with his fame; however, falling prey to his own corrupt conduct, he himself was reborn in hell.” (172)
श्लोक ( Shlok ) 173
भूपालभूपतिरसह्यतपोविधायी शुक्लेऽभवन्महति षोडशसागरायुः । च्युत्वा ततः सकलचक्रधरः सुभौमो रामान्तकृन्नरकनायकतां जगाम ॥ १७३ ॥
सुभौम चक्रवर्तीका जीव पहले तो भूपाल नामका राजा हुआ फिर असह्य तप-तपकर महाशुक्र स्वर्गमें सोलह सागरकी आयुवाला देव हुआ। वहाँसे च्युत होकर परशुरामको मारनेवाला सुभौम नामका सकल चक्रवर्ती हुआ और अन्तमें नरकका अधिपति हुआ ॥ १७३ ॥
“The soul of Chakravarti Subhauma was first a king named Bhupala. Then, performing unbearable penance, he became a deity in the Mahashukra heaven with a lifespan of sixteen Sagara (cosmic ocean-span of years). Descending from there, he became the complete Chakravarti named Subhauma, the slayer of Parashurama, and in the end, he became an inhabitant (master) of hell.” (173)
श्लोक ( Shlok ) 174 – 178
नन्दिषेणो बलः पुण्डरीकोऽर्द्धभरताधिपः । राजपुत्राविमौ जातौ तृतीयेऽत्र भवान्तरे ॥ १७४ ॥सुकेत्वाश्रयशल्येन तपः कृत्वायुषोऽवधौ । भद्ये कल्पे समुत्पद्य ततः प्रच्युत्य चक्रिणः ॥ १७५ ॥ पश्चात्षट्छतकोट्यब्दातीतौ तत्रव भारते । राज्ञश्चक्रपुराधीशादिक्ष्वाकोर्वरसेनतः ॥ १७६ ॥वैजयन्स्यां बलो देवो लक्ष्मीमत्यामजायत । पुण्डरीकस्तयोरायुः खत्रयत्वेंन्द्रियाब्दवत् ॥ १७७ ॥षड्विंशतितनुत्सेधौ धनुषां नियतायुषोः । स्वतपःसञ्चितात्पुण्यात्काले यात्यायुषोः सुखम् ॥ १७८ ॥
अथानन्तर इन्हींके समय नन्दिषेण बलभद्र और पुण्डरीक नारायण ये दोनों ही राजपुत्र हुए हैं। इनमें से पुण्डरीकका जीव तीसरे भवमें सुकेतुके आश्रयसे शल्य सहित तप कर आयुके अन्तमें पहले स्वर्गमें देव हुआ था, वहाँसे च्युत होकर सुभौम चक्रवर्तीके बाद छह सौ करोड़ वर्ष बीत जाने पर इसी भरत क्षेत्र सम्बन्धी चक्रपुर नगरके स्वामी इक्ष्वाकुवंशी राजा बरसेनकी लक्ष्मीमती रानीसे पुण्डरीक नामका पुत्र हुआ था तथा इन्हीं राजाकी दूसरी रानी वैजयन्तीसे नन्दिषेण नामका बलभद्र उत्पन्न हुआ था। उन दोनोंकी आयु छप्पन हजार वर्षकी थी, शरीर छब्बीस धनुषः ऊँचा था, दोनों की आयु नियत थी और अपने तपसे सञ्चित हुए पुण्यके कारण उन दोनोंकी आयुका काल सुखसे व्यतीत हो रहा था ।॥ १७४-१७८ ॥
“Thereafter, during this very period, both Nandishena Balabhadra and Pundarika Narayana manifested as princes. Among them, the soul of Pundarika, in its third previous birth, had performed penance with blemish (shalya) under the refuge of Suketu, and at the end of his life, had become a deity in the first heaven.
Descending from there, after six billion (six hundred crore) years had elapsed since the time of Chakravarti Subhauma, he was born as a son named Pundarika to Queen Lakshmimati, the consort of King Barasena of the Ikshvaku dynasty, who was the ruler of Chakrapur city in this very Bharata-kshetra. Similarly, from the same king’s second queen, Vaijayanti, the Balabhadra named Nandishena was born. The lifespan of both was fifty-six thousand years, their body height was twenty-six Dhanushas, their lifespans were predetermined, and due to the merit accumulated through their past penances, the span of their lives was passing in great happiness.” (174–178)
श्लोक ( Shlok ) 179
अन्यदोपेन्द्रसेनाख्यमहीडिन्द्रपुराधिपः । पद्मावतीं सुतां स्वस्य पुण्डरीकाय दत्तवान् ॥ १७९ ॥
किसी एक दिन इन्द्रपुरके राजा उपेन्द्रसेनने अपनी पद्मावती नामकी पुत्री पुण्डरीकके लिए प्रदान की ।। १७९ ॥
“One day, King Upendrasena of Indrapur offered his daughter, named Padmavati, in marriage to Pundarika.” (179)
श्लोक ( Shlok ) 180 – 184
अथ दर्पी दुराचारः सुकेतुः प्राक्तनो रिपुः । निजोपार्जितकर्मानुरूपेण भवसन्ततौ ॥ १८० ॥भ्रान्त्वा क्रमेण सञ्चित्य शुभं तदनुरोधतः । भूत्वा चक्रपुराधीशो वशीकृतवसुन्धरः ॥ १८१ ॥ग्रीष्मार्कमण्डलाभत्वादसोढा परतेजसाम् । तद्विवाहश्रुतेः क्रुद्धः सन्नद्धाशेषसाधनः ॥ १८२ ॥निशुम्भो मारकोऽरीणां नारकेभ्योऽपि निर्दयः । ‘प्रास्थिताखण्डविक्रान्तः पुण्डरीकं जिघांसुकः ॥१८३॥युद्धवा बहुविधेनामा तेनोद्यत्तेजसा चिरम् । तञ्चक्राशनिघातेन घातितासुरयादधः ॥ १८४ ॥
अथानन्तर पहले भवमें जो सुकेतु नामका राजा था वह अत्यन्त अहङ्कारी दुराचारी और पुण्डरीकका शत्रु था। वह अपने द्वारा उपार्जित कर्मोंके अनुसार अनेक भवोंमें घूमता रहा। अन्तमें उसने क्रम-क्रमसे कुछ पुण्यका सञ्चय किया था उसके अनुरोधसे वह पृथिवीको वश करनेवाला चक्रपुरका निशुम्भ नामका अधिपति हुआ। उसकी आभा ग्रीष्म ऋतुके सूजेके मण्डलके समान थी। वह इतना तेजस्वी था कि दूसरेके तेजको बिलकुल ही सहन नहीं करता था। जब उसने पुण्डरीक और पद्मावतीके विवाहका समाचार सुना तो वह बहुत ही कुपित हुआ। उसने सब सेना तैयार कर ली, वह शत्रुओं को मारने वाला था, नारकियों से भो कहीं अधिक निर्दय था, और अखण्ड पराक्रमी था। पुण्डरीकको मारनेकी इच्छासे वह चल पड़ा। जिसका तेज निरन्तर बढ़ रहा है ऐसे पुण्डरीकके साथ उस निशुम्भने चिरकाल तक बहुत प्रकारका युद्ध किया और अन्तमें उसके चक्ररूपी वज्रके घातसे निष्प्राण होकर वह अधोगतिमें गया-नरकमें जाकर उत्पन्न हुआ ।। १८०-१८४ ॥
“Thereafter, he who was King Suketu in the previous birth—exceedingly arrogant, wicked, and an enemy of Pundarika—had been wandering through numerous births in accordance with the karmas accumulated by him. Eventually, through the gradual accumulation of some merit (punya), and driven by its consequence, he became the sovereign ruler of Chakrapur named Nishumbha, who brought the entire earth under his subjection. His brilliance was like the disc of the summer sun. He was so intensely majestic that he could not tolerate the glory of anyone else at all.
When he heard the news of the marriage of Pundarika and Padmavati, he became furious. He readied his entire army; he was a slayer of enemies, far more merciless than even the denizens of hell, and possessed unbroken prowess. He set out with the intent to kill Pundarika. With that Pundarika, whose glory was continuously increasing, Nishumbha fought many kinds of battles for a long time, and finally, struck dead by the blow of Pundarika’s discus-like thunderbolt (Chakra-rupi Vajra), he went to the lower realm—reborn in hell.” (180–184)
श्लोक 185 से 192
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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