अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 464 to 475
श्लोक ( Shlok ) 464
तद्वचनप्रान्ते प्रणिपत्य मुनीश्वरम् । कुमारोऽप्यभयोऽपृच्छत्स्वभवान्तरसन्ततिम् ॥ ४६४ ॥
इस प्रकार गणधरके वचन समाप्त होनेपर अभयकुमारने उठकर उन्हें नमस्कार किया और अपने भवान्तरोंका समूह पूछा ।। ४६४ ।।
“In this manner, as the Ganadhara’s discourse came to an end, Abhayakumar arose, bowed down to him in deep reverence, and asked about the succession of his own past and future lifetimes.” [464]
श्लोक ( Shlok ) 465 – 467
तदनुग्रहबुद्धयैवमाहासौ भव्यवत्सलः । इतोऽभवत्ततीयेऽत्र भवे भव्योऽपि सन्सुधीः ॥ ४६५ ॥ कश्चिद्विप्रसुतो वेदाभ्यासहेतोः परिभ्रमन् । देशान्तराणि पाषण्डिदेवतातीर्थजातिभिः ।। ४६६ ।। लोकेन च विमुद्याकुली भूतस्तत्प्रशंसनम् । तदाचरितमप्युच्चैरनुतिष्ठन्नयेच्छया ।। ४६७ ।।
भव्य जीवों पर स्नेह रखनेवाले गणधर भगवान्, अभय कुमारका उपकार करनेकी भावनासे इस प्रकार कहने लगे कि तू इस भवसे तीसरे भवमें कोई ब्राह्मणका पुत्र था और भव्य होनेपर भी दुर्बुद्धि था। वह वेद पढ़नेके लिए अनेक देशोंमें घूमता-फिरता था, पाषण्डिमूढता, देवमूढता, तीर्थमूढता, जातिमूढता और लोकमूढतासे मोहित हो व्याकुल रहता था, उन्हीं के द्वारा किये हुए कार्योंकी बहुत प्रशंसा करता था और पुण्य-प्राप्तिकी इच्छासे उन्हीं के द्वारा किये हुए कार्योंका स्वयं आचरण करता था ।। ४६५-४६७ ॥
“Out of a deep desire to benefit Abhayakumar, the Ganadhara Lord, who holds immense affection for all noble souls (Bhavya Jivas), began to speak in this manner:
‘Three lifetimes prior to your current birth, you were born as the son of a Brahmin. Even though you possessed the potential for ultimate liberation (Bhavya), you were plagued by a corrupted intellect. You wandered through many countries to study the Vedas, and lived in a state of deep distress, completely infatuated by the five kinds of delusions—namely, Pakhandi-mudhata (delusion regarding heretics), Deva-mudhata (delusion regarding deities), Teertha-mudhata (delusion regarding false places of pilgrimage), Jati-mudhata (delusion regarding caste/birth), and Loka-mudhata (delusion regarding worldly superstitions). You used to highly praise the rituals performed under the influence of these delusions and, in the hope of acquiring merit (Punya), you practiced those very rituals yourself.'” [465-467]
श्लोक ( Shlok ) 468 – 475
केनचित्पथिकेनामा जैनेन पथि स व्रजन् । पाषाणराशिसंलक्ष्य भूताधिष्ठितभूरुहः ॥ ४६८ ॥ समीपं प्राप्य भक्तयातो दैवमेतदिति “द्रुमम् । परीत्य प्राणमदृष्ट्वा तच्चेष्टां श्रावकः स्मिती ॥४६९॥ तस्यावमतिविध्यर्थं तद्रुमादात्तपल्लवैः । परिमृज्य स्वपादाक्तधूलि ते पश्य देवता ॥ ४७० ॥ नार्हतानां विधाताय समर्थेत्यवदद्विजम् । विप्रेणानु तथैवास्तु को दोषस्तव देवताम् ।। ४७१ ।। परिभूतिपदं नेष्याम्युपाध्यायस्त्वमत्र मे । इत्युक्तस्तेन तस्मात्स प्रदेशान्तरमाप्तवान् ॥ ४७२ ॥श्रावकः कपिरोमाख्यवल्लीजालं समीक्ष्य मे । दैवमेतदिति व्यक्तमुक्त्वा भक्त्या परीत्य तत् ॥ ४७३ ॥ प्रणम्य स्थितवान् विप्रोऽप्याविष्कृतरुपाज्ञकः’ । कराभ्यां तत्समुच्छिन्दन् विमृद्भश्च समन्ततः ॥४७४॥ तत्कृतासह्यकण्डूयाविशेषेणातिवाधितः । एतत्सन्निहितं देवं त्वदीयमिति भीतवान् ॥ ४७५ ॥
एक बार वह किसी जैनी पथिकके साथ मार्गमें कहीं जा रहा था । मार्गमें पत्थरोंके ढेरके समीप दिखाई देने वाला भूतोंका निवासस्थान स्वरूप एक वृक्ष था । उसके समीप जाकर और उसे अपना देव समझकर ब्राह्मण-पुत्रने उस वृक्षकी प्रदक्षिणा दी तथा उसे नमस्कार किया। उसकी इस चेष्टा को देखकर श्रावक हँसने लगा तथा उसका अनादर करनेके लिए उसने उस वृक्ष के कुछ पत्ते तोड़कर उनसे अपने पैरोंकी धूलि झाड़ ली और ब्राह्मणसे कहा कि देख तेरा देवता जैनियोंका कुछ भी विघात करनेमें समर्थ नहीं है। इसके उत्तर में ब्राह्मणने कहा कि अच्छा ऐसा ही सही, क्या दोष है? मैं भी तुम्हारे देवताका तिरस्कार कर लूंगा, इस विषयमें तुम मेरे गुरु ही सही। इस प्रकार कहकर वे दोनों फिर साथ चलने लगे और किसी एकस्थानमें जा पहुँचे । वहाँ करेंचकी लताओंका समूह देखकर श्रावकने कहा कि ‘यह हमारा देवता है’ यह कहकर श्रावकने उस लता-समूहकी भक्तिसे प्रदक्षिणा की, नमस्कार किया और यह सबकर वह वहीं खड़ा हो गया। अज्ञानी ब्राह्मणने कुपित होकर दोनों हाथोंसे उस लतासमूहके पत्ते तोड़ लिये तथा उन्हें मसलकर उनका रङ्ग सब शरीरमें लगा लिया। लगाते देर नहीं हीं हुई कि वह, उस करेंचके द्वारा उत्पन्न हुई असह्य खुजलीकी भारी पीड़ासे दुःखी होने लगा तथा डरकर श्रावकसे कहने लगा कि इसमें अवश्य ही तुम्हारा देव रहता है ।॥ ४६८-४७५ ।।
“Once, he was traveling somewhere along a path with a Jain traveler. Along the way, near a heap of stones, stood a tree that appeared to be the abode of ghosts. Approaching it and believing it to be his deity, the Brahmin’s son circumambulated the tree and bowed down to it.
Seeing this act of his, the Shravak (Jain layman) began to laugh. To show his disregard, the Shravak plucked a few leaves from that tree, wiped the dust off his feet with them, and said to the Brahmin, ‘Look, your deity is not capable of causing even the slightest harm to Jains.’
In response, the Brahmin said, ‘Very well, if that is so, what is the harm? I too shall show disrespect to your deity, and in this matter, you shall be my teacher.’ Saying this, both of them started walking together again and arrived at a certain place.
Seeing a dense cluster of Karanja creepers there, the Shravak said, ‘This is our deity.’ Saying this, the Shravak devotedly circumambulated the cluster of creepers, bowed down, and stood there.
The ignorant Brahmin grew angry, plucked the leaves of that cluster of creepers with both hands, crushed them, and smeared their juice all over his body. No sooner had he applied it than he began to suffer intensely from the unbearable and severe itching caused by the Karanja plant. Terrified, he said to the Shravak, ‘Surely, your deity resides in this!'” [468-475]
श्लोक 476 से 485
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463
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