नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 253 to 273
श्लोक ( Shlok ) 253
श्लाध्यमानः स्वयं केनचित्खगेन गजाधिपात् । अपास्य सहसानीतः खेचराद्रिं कृती पुरः ॥ २५३ ॥
उसी समय किसी विद्याधरने उनकी बड़ी प्रशंसा की और हाथीसे उठाकर उन पुण्यात्माको अकस्मात् ही विजयार्ध पर्वत पर पहुँचा दिया ॥ २५३ ॥
At that very moment, a certain Vidyadhara praised him immensely and, lifting that meritorious soul off the elephant, suddenly transported him to Mount Vijayardha. || 253 ||
श्लोक ( Shlok ) 254 – 266
पत्युः किन्नरगीतस्य द्वितीयां वा रतिं सतीम् । सुतामशनिवेगस्य दत्तां शल्मलिपूर्विकाम् ॥ २५४ ॥ जातां पवनवेगायामादिष्टां परिणीतवान् । तया सह स्मरस्यापि सुखं स्मर्तुमगोचरम् ॥ २५५ ॥ अनुभूय दिनान्यत्र विश्रान्तः कानिचित्पुनः । तथोपसर्तुकामं तं समीक्ष्याङ्गारवेगकः ॥ २५६ ॥ उद्धृत्याशनिवेगस्य दायादोयं नभस्तले । ज्ञात्वा दत्तान्तशाल्मल्या समुद्गीर्णासिहस्तया ॥ २५७ ॥ सोऽन्वीतस्तद्भयान्मुक्त्वा तं तस्मात्प्रपलायितः । विद्यया पर्णलव्यासौ ‘प्रियाप्रहितया तया ॥ २५८ ॥ चम्पापुरसमीपस्थसरोमध्ये शनैः शनैः । द्वीपे निपातितोऽपृच्छदेहिनस्तीरवर्तिनः ॥ २५९ ॥ द्वीपादमुस्मान्निर्गन्तुं किं तीर्थं वदतेति तान् । अवर्देस्तेऽपि किं भद्र पतितः खात्त्वमित्यमुम् ॥ २६० ॥ सम्यग्भवति विज्ञातमिति तेन सुभाषिताः । प्रहस्यानेन मार्गेण जलाश्निगर्म्यतामिति ॥ २६१ ॥ न्यदिशन्नप्रतस्तस्मात्प्रविश्य नगरं गुरुम् । दृष्ट्वा गन्धर्वविद्याया मनोहरसमाह्वयम् ॥ २६२ ॥ उपविश्य तदभ्याशे वीणावादनशिक्षकान् । तत्र गन्धर्वदशायाः स्वयंवरविधि प्रति ॥ २६३ ॥ दृष्ट्वा निगूढतज्ज्ञानो वसुदेवो विमूढवत् । अहं चैभिः सहाभ्यासं करोमीत्यात्तवल्लकिः ॥ २६४॥ भदावेवाच्छिनत्तन्त्रीं तुम्बीजं वाभिनत्फलम् । वैयास्यं पश्यतास्यालं दृष्ट्वा तं तेऽहसन् भृशम् ॥२६५॥ भर्त्ता गन्धर्वदत्तायास्त्वमेवैवं विचक्षणः । गीतवाद्यविशेषेषु सर्वानस्मान् जयेरिति ॥ २६६ ॥
वहाँ किन्नरगीत नामके नगरमें राजा अशनिवेग रहता था उसकी शाल्मलिता नामकी एक पुत्री थी जो कि पवनवेगा स्त्रीसे उत्पन्न हुई थी और दूसरी रतिके समान जान पड़ती थी । अशनिवेगने वह कन्या कुमार वसुदेवके लिए समर्पित कर दी। कुमारने भी उसे विवाह कर उसके साथ स्मरणके भी अगोचर कामसुखका अनुभव किया और कुछ दिन तक वहीं विश्राम किया । तदनन्तर जब कुमारने वहाँ से जानेकी इच्छा की तब अशनिवेगका दायाद (उत्तराधिकारी) अंगारवेग उन्हें जानेके लिए उद्यत देख उठाकर आकाशमें ले गया। इधर शाल्मलिदत्ताको जब पता चला तो उससे नंगी तलवार हाथमें लेकर उसका पीछा किया। शाल्मलिदत्ताके भयसे अंगारवेग कुमारको छोड़कर भाग गया। कुमार नीचे गिरना ही चाहते थे कि उसकी प्रिया शाल्मलिदत्ताके द्वारा भेजी हुई पर्णलध्वी नामकी विद्याने उन्हें चम्पापुरके सरोवरके मध्यमें वर्तमान द्वीप पर धीरे-धीरे उतार दिया। वहाँ आकर कुमारने किनारे पर रहनेवाले लोगोंसे पूछा कि इस द्वीपसे बाहर निकलनेका मार्ग क्या है? आप लोग मुझे बतलाइए। तब लोगोंने कुमारसे कहा कि क्या आप आकाशसे पड़े हैं ? जिससे कि निकलनेका मार्ग नहीं जानते । कुमारने उत्तर दिया कि आप लोगोंने ठीक जाना है सचमुच ही मैं आकाशसे पड़ा हूँ। कुमारका उत्तर सुनकर सब लोग हँसने लगे और ‘इस मार्गके द्वारा आप जलसे बाहिर निकल आइए’ ऐसा कह कर उन्होंने मार्ग दिखा दिया। कुमार उसी मार्गसे निकल कर नगरमें प्रवृष्ट हुए और मनोहर नामक गन्धर्वविद्या के गुरुके पास जा बैठे । गन्धर्वताको स्वयंवर में जीतनेके लिए उनके पास बहुतसे शिष्य वीणा बजाना सीख रहे थे। उन्हें देख तथा अपने वीणाविषयक ज्ञानको छिपाकर कुमार मूर्खकी तरह बन गये और कहने लगे कि मैं भी इन लोगोंके साथ वीणा बजानेका अभ्यास करता हूं। ऐसा कह कर उन्होंने एक वीणा ले ली। पहले तो उसकी तन्त्री तोड़ डाली और फिर तूंबा फोड़ दिया। उनकी इस क्रियाको देख लोग अत्यधिक हँसने लगे और कहने लगे कि इसकी धृष्टताको तो देखो। कुमार वसुदेवसे भी उन्होंने कहा कि तुम ऐसे चतुर हो, जान पड़ता है कि गन्धर्वदत्ताके तुम्हीं पति होओगे और हम सबको गाने-बजानेकी कलामें हरा दोगे ।। २५४-२६६ ।।
There, in a city named Kinnarageeta, lived King Ashanivega. He had a daughter named Shalmalidatta, who was born to his wife Pavanavega and appeared as beautiful as Rati (the goddess of love) herself. Ashanivega offered this maiden to Prince Vasudeva in marriage. Having married her, the Prince experienced pleasures of love with her that surpassed even the imagination, and he rested there for a few days.
Thereafter, when the Prince expressed his desire to leave, Ashanivega’s heir, Angaravega, seeing him prepared to depart, seized him and carried him up into the sky. Meanwhile, when Shalmalidatta found out, she pursued him with a naked sword in hand. Out of fear of Shalmalidatta, Angaravega dropped the Prince and fled. Just as the Prince was about to fall, a magical power named Parnaladhvi, sent by his beloved Shalmalidatta, gently lowered him onto an island situated in the middle of a lake in Champapur.
Arriving there, the Prince asked the people living on the shore, “What is the way to get out of this island? Please tell me.” The people then said to the Prince, “Have you fallen from the sky, that you do not know the way out?” The Prince replied, “You have guessed correctly; indeed, I have fallen from the sky.” Hearing the Prince’s reply, everyone began to laugh and showed him the way, saying, “Come out of the water through this path.”
Leaving by that path, the Prince entered the city and went to sit near a master of Gandharva (music) lore named Manohar. Many disciples were learning to play the veena under him in order to win Gandharvadatta in her Swayamvara (bride-groom choice ceremony). Seeing them, and concealing his own expertise in the veena, the Prince acted like a fool and said, “I too shall practice playing the veena with these people.” Saying this, he took a veena. First, he snapped its string, and then he broke its resonator (gourd).
Seeing this action of his, the people laughed heartily and said, “Look at his audacity!” They mockingly said to Prince Vasudeva, “You are so clever, it seems you alone will become Gandharvadatta’s husband and defeat us all in the art of singing and playing music.” || 254-266 ||
श्लोक ( Shlok ) 267
एवं तत्र स्थिते तस्मिन् धरागगनगोचराः । प्रापुर्गन्धर्वदत्तायाः स्वयंवरसमुत्सुकाः ॥ २६७ ॥
इस प्रकार कुमार वसुदेव वहाँ कुछ समय तक स्थित रहे। तदनन्तर गन्धर्वदत्ता के स्वयंवरमें उत्सुक हुए भूमिगोचरी और विद्याधर लोग एकत्रित होने लगे ॥ २६७ ॥
In this manner, Prince Vasudeva stayed there for some time. Thereafter, both the earth-dwellers (Bhumigochari) and the sky-dwellers (Vidyadharas), who were eager for Gandharvadatta’s Swayamvara, began to assemble. || 267 ||
श्लोक ( Shlok ) 268
तान्स्वयंवरशालायां बहून् जितवती स्वयम् । तदानीं गीतवादाभ्यां तत्कलारूपधारिणी ॥ २६८॥
गाने बजानेकी कलाका रूप धारण करनेवाली गन्धर्वदत्ताने स्वयंवर शालामें आये हुए बहुत से लोगोंको अपने गाने-बजाने के द्वारा तत्काल जीत लिया ॥ २६८ ॥
Gandharvadatta, who seemed to be the very embodiment of the art of music, instantly defeated the numerous suitors who had gathered in the assembly hall (Swayamvara Shala) through her exceptional singing and playing. || 268 ||
श्लोक ( Shlok ) 269
चारुदत्तादिभिः श्रोतृपदमध्यासितैः स्तुता । कलाकौशलमेतस्या विलक्षणमिति स्फुटम् ॥ २६९ ॥
वहाँ जो चारुदत्त आदि मुख्य मुख्य श्रोता बैठे थे वे सब उस गन्धर्वदत्ताकी प्रशंसा कर रहे थे और कह रहे थे कि उसका कला-कौशल बड़ा ही विलक्षण है -सबसे अद्भुत है ।। २६९ ।।
The prominent listeners gathered there, such as Charudatta and others, were all praising Gandharvadatta and saying that her artistic skill was truly extraordinary—the most wonderful of all. || 269 ||
श्लोक ( Shlok ) 270
स्वोपाध्यायं तदापृच्छय कन्याभ्यर्णमुपागतः । वसुदेवोऽभणीद्वीणां विदोषामानयन्त्विति ॥ २७० ॥
तदनन्तर वसुदेव भी अपने गुरुसे पूछकर कन्याके पास गये और कहने लगे कि ऐसी वीणा लाओ जिसमें एक भी दोष नहीं हो ॥ २७० ॥
Thereafter, having also asked his master, Vasudeva approached the maiden and said, “Bring me such a veena that does not possess even a single flaw.” || 270 ||
श्लोक ( Shlok ) 271 – 273
तेऽपि तिस्स्रश्चतस्रश्च हस्ते वीणाः समर्पयन् । तासां तन्त्रीषु ‘लोमांसं शल्यञ्चालोक्य सस्मितम् ॥ २७१॥तुम्बीफलेषु दण्डेषु शल्कपाषाणमप्यसौ । स्फुटीचकार तदृष्ट्वा त्वदिष्टा कीदृशी भवेत् ॥ २७२ ॥वीणेति कन्यया प्रोक्तो मदिष्टायाः समागमः । ईदृग्विध इति प्राह तत्रार्थाख्यानमीदृशम् ॥ २७३ ॥
लोगोंने तीन चार वीणाएँ बसुदेवके हाथमें सौंप दीं। वसुदेवने उन्हें देखकर हँसते हुए कहा कि इन वीणाओंकी ताँत में लोसि नामका दोष है और तुम्बीफल तथा दण्डोंमें शल्क एवं पाषाण नामका दोष है। उन्होंने यह कहा ही नहीं किन्तु प्रकट करके दिखला भी दिया। यह देख कन्याने कहा कि तो फिर आप कैसी वीणा चाहते हैं ? इसके उत्तर में कुमारने कहा कि मुझे जो वीणा इष्ट है उसका समागम इस प्रकार हुआ था। ऐसा कहकर उन्होंने निम्नांकित कथा सुनाई ।। २७१-२७३ ।।
The people handed three or four veenas over to Vasudeva. Looking at them, Vasudeva smiled and said, “The strings of these veenas suffer from a defect called Losi, and their gourd resonators and bridges have defects called Shalka and Pashana.” He did not merely state this, but practically demonstrated it to them as well. Seeing this, the maiden asked, “Then what kind of veena do you desire?” In response, the Prince replied, “The union of the veena that I desire came about in this manner.” Having said this, he narrated the following story. || 271-273 ||
श्लोक 274 से 283
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