अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 72 to 83
श्लोक ( Shlok ) 72 – 73
स्वीकृत्य प्राक्तनं वेर्ष प्रकृत्यादिप्ररूपितम् । पञ्चविंशतिदुस्तत्त्वं मूढानां मतिमानयत् ॥ ७२ ॥निष्कषायतया बद्ध्वा देवायुरभवत्सुरः । सौधर्मकल्पे तत्सौख्यमेकवार्युपमायुषा ॥ ७३ ॥
उसने वही पहला पारिव्राजकका वेष धारणकर प्रकृति आदिके द्वारा निरूपित पञ्चीस मिध्यातत्त्व मूर्ख मनुष्योंकी बुद्धिमें प्राप्त कराये अर्थात् मूर्ख मनुष्योंकी पच्चीस तत्त्वोंका उपदेश दिया। यह सब होनेपर भी उसकी कषाय मन्द थी अतः देवायुका बन्धकर सौधर्म स्वर्गमें एक सागरकी आयुवाला देव हुआ ।। ७२-७३ ।।
“Adopting that very same garb of a wandering ascetic (Parivrajaka) as before, he instilled the twenty-five false principles—characterized by Prakriti (nature) and others—into the minds of ignorant men; in other words, he preached these twenty-five false elements to foolish people. Despite all this, because his passions (kashaya) were mild, he bound the life-karma of a celestial being and was reborn in the Saudharma heaven as a deity with a lifespan of one sagaropama.” || 72-73 ||
श्लोक ( Shlok ) 74
भुक्त्वा ततः समागत्य भरते ‘सूतिकाह्वये । पुरेऽग्निभूतेर्गौतम्यामभूदग्निसहः सुतः ॥ ७४ ॥
वहाँ के सुख भोगकर वहाँ से आया और इसी भरत क्षेत्रके सूतिका नामक गाँवमें अग्निभूति नामक ब्राह्मणकी गौतमी नामकी स्त्रीसे अग्निसह नामका पुत्र उत्पन्न हुआ ।। ७४ ॥
“Having enjoyed the pleasures of that realm, he descended from there and was born as a son named Agnisaha in a village named Sutika in this very Bharata region, to a Brahmin named Agnibhuti and his wife, Gautami.” || 74 ||
श्लोक ( Shlok ) 75 – 83
परिब्राजकदीक्षायां नीत्वा कालं सपूर्ववत् । सनत्कुमारकल्पेऽल्पं देवभूयं प्रपन्नवान् ॥ ७५ ॥सप्ताब्ध्युपमितायुष्को भुक्त्वा तत्रामरं सुखम् । आयुषोऽन्ते ततश्च्युत्वा विषयेऽस्मिन् पुरेऽभवत ॥७६॥मन्दिराख्येऽग्निमित्राख्यो गौतमस्य तनूद्भवः । ‘कौशिक्यां दुःश्रुतेः पारं गत्वागत्य पुरातनीम् ॥ ७७ ॥दीक्षां माहेन्द्रमभ्येत्य ततश्च्युत्वा पुरातने । मन्दिराख्यपुरे शालङ्कायनस्य सुतोऽभवत् ॥ ७८ ॥मन्दिरायां जगत्ख्यातो भारद्वाजसमाह्वयः । त्रिदण्डमण्डितां दीक्षामभ्रूणां च समाचरन् ॥ ७९ ॥सप्ताब्ध्युपमितायुः सन् कल्पे माहेन्द्रनामनि । भूत्वा ततोऽवतीर्यात्र दुर्मार्गप्रकटीकृतेः ॥ ८० ॥फलेनाधोगतीः सर्वाः प्रविश्य गुरुदुःखभाक् । त्रसस्थावरवर्गेषु सङ्ख्यातीतसमाश्चिरम् ॥ ८१ ॥परिभ्रम्य परिश्रान्तस्तदन्ते मगधाह्वये । देशे राजगृहे जातः सुतोऽस्मिन्वेदवेदिनः ॥ ८२ ॥शाण्डिलाख्यस्य मुख्यस्य पारशा स्वसन्ज्ञया । स्थावरो वेदवेदाङ्गपारगः पापभाजनम् ॥ ८३ ॥
वहाँ भी उसने परिव्राजककी दीक्षा लेकर पहले के समान ही अपनी आयु बिताई और आयुके अन्तमें मरकर देवपदको प्राप्त हुआ। वहाँ सात सागर प्रमाण उसकी आयु थी। देवों के सुख भोगकर आयुके अन्त में वह वहाँ से च्युत हुआ और इसी भरतक्षेत्रके मंदिर नामक गाँवमें गौतम ब्राह्मणकी कौशिकी नामकी ब्राह्मणीसे अग्निमित्र नामका पुत्र हुआ। वहाँपर भी उसने वही पुरानी परिव्राजककी दीक्षा धारणकर मिथ्याशास्त्रोंका पूर्णज्ञान प्राप्त किया। अबकी बार वह माहेन्द्र स्वर्गमें देव हुआ, फिर वहाँ से च्युत होकर उसी मंदिर नामक नगर में शालङ्कायन ब्राह्मणकी मंदिरा नामकी स्त्रीसे भारद्वाज नामका जगत्प्रसिद्ध पुत्र हुआ और वहाँ उसने त्रिदण्डसे सुशोभित अखण्ड दीक्षाका आचरण किया। तदनन्तर वह माहेद्र स्वर्गमें सात सागरकी आयु वाला देव हुआ। फिर वहाँ से च्युत होकर कुमार्गके प्रकट करनेके फलस्वरूप समस्त अधोगतियोंमें जन्म लेकर उसने भारी दुःख भोगे । इस प्रकार त्रस स्थावर योनियोंमें असंख्यात वर्ष तक परिभ्रमण करता हुआ बहुत ही श्रान्त हो गया – खेद खिन्न हो गया। तदनन्तर आयुका अन्त होनेपर मगधदेशके इसी राजगृह नगर में वेदोंके जानने वाले शाण्डिल्य नामक ब्राह्मणकी पारशरी नामकी स्त्रीसे स्थावर नामका पुत्र हुआ। वह वेद वेदाङ्गका पारगामी था, साथ ही अनेक पापोंका पात्र भी था ।। ७५-८३ ।।
“There too, he initiated into the path of a wandering ascetic (Parivrajaka) and spent his life just as before. At the end of his lifespan, he passed away and attained the status of a deity, where his lifespan was seven sagaropamas. Having enjoyed the pleasures of the gods, at the end of his lifespan, he descended from that realm and was born as a son named Agnimitra in a village named Mandira in this very Bharata region, to a Brahmin named Gautama and his Brahmin wife, Kaushiki. There also, adopting that same old initiation of a wandering ascetic, he acquired complete knowledge of false scriptures. This time, he was reborn as a deity in the Mahendra heaven.
Descending from there, he was born as a world-renowned son named Bharadvaja in that very town of Mandira, to a Brahmin named Shalankayana and his wife, Mandira, and there he practiced the unbroken initiation adorned with the three staffs (tridanda). Thereafter, he became a deity in the Mahendra heaven with a lifespan of seven sagaropamas.
Subsequently, descending from that heaven, as a consequence of propagating false paths, he took birth in all the lower realms (adhogati) and suffered immense miseries. In this manner, wandering through the mobile (trasa) and immobile (sthavara) life-forms for countless years, he became exceedingly weary and deeply distressed.
Thereafter, at the end of his lifespan, he was born as a son named Sthavara in this very city of Rajagriha in the Magadha country, to a Veda-knowing Brahmin named Shandilya and his wife, Parashari. He was a master of the Vedas and Vedangas, yet at the same time, he was a vessel for numerous sins.” || 75-83 ||
श्लोक 84 से 91
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
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