कुन्थुनाथ तीर्थकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन पर्व 64 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 64- shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32 – 33
इत्यप्राक्षीन्नृपोऽप्यस्य भूयः स्मेरमुखोऽवदत् । भवेऽस्मिन्नैव निर्मूल्य कर्माण्याप्नोति निर्वृतिम् ॥३२॥न चेदेवं सुरेन्द्रत्वचक्रवर्तित्वगोचरम् । सुखमभ्युदयं भुक्त्वा क्रमाच्छाश्वतमेष्यति ॥ ३३ ॥
चक्रवर्ती कुन्थुनाथ हँसकर फिर कहने लगे कि ये मुनि इसी भवमें कर्मोंको नष्टकर निर्वाण प्राप्त करेंगे । यदि निर्वाण न प्राप्तकर सकेंगे तो इन्द्र और चक्रवर्तीके सुख तथा ऐश्वर्यका उपभोगकर क्रमसे शाश्वतपद-मोक्ष स्थान प्राप्त करेंगे ॥,३२-३३ ॥
“Universal Monarch Kunthunath smiled softly and replied, ‘This holy monk will destroy all his karmas and attain ultimate liberation (Nirvana) in this very lifetime. However, if he is unable to achieve absolute liberation now, he will ascend to enjoy the supreme bliss and boundless majesty of an Indra or a Chakravarti, before gradually attaining the eternal realm—the state of absolute salvation (Moksha).'”32 – 33
श्लोक ( Shlok ) 34
अपरित्यक्तसङ्गस्य भवे पर्यटनं भवेत् । इत्युच्चैर्मुक्तिसंसारकारणं परमार्थवित् ॥ ३४ ॥
जो परिग्रहका त्याग नहीं करता है उसीका संसारमें परिभ्रमण होता है। इस प्रकार परमार्थको जाननेवाले भगवान् कुन्थुनाथने मोक्ष तथा संसारके कारणोंका निरूपण किया ॥ ३४ ॥
” ‘He who does not renounce worldly possessions and attachments (Parigraha) continues to wander endlessly through the cycles of worldly existence (Samsara).’ In this manner, Lord Kunthunath—the knower of ultimate reality—clearly elucidated the true causes behind both absolute liberation and worldly bondage.” 34
श्लोक ( Shlok ) 35
कालो माण्डलिकत्वेन यावान्नीतः सुखायुषा । तावत्येव समानीय महेच्छश्चक्रवर्तिताम् ॥ ३५ ॥
उन महानुभावने सुखपूर्वक आयुका उपभोग करते हुए जितना समय मण्डलेश्वर रहकर व्यतीत किया था उतना ही समय चक्रवर्तीपना प्राप्तकर व्यतीत किया था ।। ३५ ।।
“While blissfully enjoying his grand lifespan, that great soul (Mahanubhav) spent the exact same duration of time ruling as a sovereign king (Mandaleshwar) as he did after attaining the exalted status of a universal monarch (Chakravarti).”35
श्लोक ( Shlok ) 36
विरज्य राज्यभोगेषु निर्वाणसुखलिप्सया । स्वातीतभवबोधेन लब्धबोधिर्बुधोत्तमः ॥ ३६ ॥
तदनन्तर, अपने पूर्वभव का स्मरण होनेसे जिन्हें आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया है ऐसे विद्वानोंमें श्रेष्ठ भगवान् कुन्थुनाथ निर्वाण-सुख प्राप्त करनेकी इच्छासे राज्यभोगोंमें विरक्त हो गये ॥ ३६ ॥
“Thereafter, having recalled his previous lifetimes, Lord Kunthunath—the foremost among the wise—attained deep self-realization (Atma-jnana). Desiring only the eternal bliss of absolute liberation (Nirvana), he grew entirely detached from all royal pleasures and worldly enjoyments.” 36
श्लोक ( Shlok ) 37 – 41
सारस्वतादिसंस्तोत्रमपि सम्भाव्य सादरम् । स्वजे नियोज्य राज्यस्य भारं निष्क्रमणोत्सवम् ॥३७॥स्वयं सम्प्राप्य देवेन्द्रैः शिबिकां विजयाभिधाम् । आरुह्यामरसंवाह्यां सहेतुकवनं प्रति ॥ ३८ ॥ गत्वा षष्ठोपवासेन संयमं प्रत्यपद्यत । जन्ममाः पक्षदिवसे कृत्तिकायां नृपोत्तमैः ॥ ३९ ॥ सहस्त्रेणाप तुर्यावबोधं च दिवसात्यये । पुरं हास्तिनमन्येद्युस्तस्मै गतवतेऽदित ॥ ४० ॥ आहारं धर्ममित्राख्यः प्राप चाश्वर्यपञ्चकम् । कुर्वन्नेवं तपो घोरं नीत्वा षोडशवत्सरान् ॥ ४१ ॥
सारस्वत आदि लौकान्तिक देवोंने आकर बड़े आदरसे उनका स्तवन किया। उन्होंने अपने पुत्रको राज्यका भार देकर इन्द्रोंके द्वारा किया हुआ दीक्षा-कल्याणकका उत्सव प्राप्त किया। तदनन्तर देवोंके द्वारा ले जाने योग्य विजया नामकी पालकीपर सवार होकर वे सहेतुक वनमें गये। वहाँ तेलाका नियम लेकर जन्मके ही मास पक्ष और दिनमें अर्थात् वैशाखशुक्ल प्रतिपदाके दिन कृत्तिका नक्षत्रमें सायंकालके समय एक हजार राजाओंके साथ उन्होंने दीक्षा धारण कर ली। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न हो गया। दूसरे दिन वे हस्तिनापुर गये वहाँ धर्ममित्र राजाने उन्हें आहार दान देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये । इस प्रकार घोर तपश्चरण करते हुए उनके सोलह वर्ष बीत गये ॥ ३७-४१ ॥
“The Sarasvata and other Laukantika celestial deities arrived and offered their deepest, most reverent praises to Him. Lord Kunthunath then handed over the massive responsibilities of the empire to his son, marking the commencement of his Diksha-Kalyanaka (the grand renunciation ceremony) celebrated by the Indras.
Thereafter, he ascended the magnificent palanquin named Vijaya, which was fit to be carried by the gods, and proceeded to the Sahetuka forest. There, committing himself to a strict three-day fast (Tela), on the exact same month, fortnight, and day of his birth—namely, the first day of the bright fortnight of the month of Vaishakha (Vaishakha Shukla Pratipada) under the Krittika lunar mansion (Nakshatra) at the hour of twilight—he took the vows of formal ascetic renunciation alongside one thousand kings. At that very moment, he was awakened with Manah-paryaya-jnana (the divine direct knowledge of the minds and thoughts of others).
The following day, he entered the city of Hastinapur for his first alms-round. There, King Dharmamitra reverently offered him pure food (Ahara-dana), thereby invoking the Pancha-Ascharya (the five miraculous celestial wonders). In this manner, performing intense and rigorous penances, sixteen years passed by.”37 – 41
श्लोक 42 से 50
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