शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 332 to 341
श्लोक ( Shlok ) 332
एतद्भावनया बद्धवा तीर्थकृन्नाम निर्मलम् । येन त्रैलोक्यसङ्क्षोभस्तत् स मेघरथो मुनिः ॥ ३३२ ॥
मेघरथ मुनिराजने इन भावनाओंसे उस निर्मल तीर्थंकर नामकर्मका बन्ध किया था कि जिससे तीनों लोकोंमें क्षोभ हो जाता है ।। ३३२ ।।
“By contemplating these very reflections, the great sage Megharatha bound that pure Tirthankara Nama-Karma, the intense fruition of which causes a sublime stir across all the three worlds.”332
श्लोक ( Shlok ) 333 – 335
क्रमेण विहरन्देशान् प्राप्तवान् श्रीपुराह्वयम् । श्रीषेणस्तत्पतिस्तस्मै दत्त्वा भिक्षां यथोचितम् ॥ ३३३॥पश्चा* नन्दपुरे नन्दनाभिधानश्च भक्तिमान् । तथैव पुण्डरीकिण्यां सिंहसेनश्च शुद्धदृक् ॥ ३३४ ॥ ज्ञानदर्शनचारित्रतपसां पर्ययान् बहून् । सम्यग्वर्द्धयते प्रापुः पञ्चाश्चर्याणि पार्थिवाः ॥ ३३५
वे क्रम-क्रमसे अनेक देशोंमें विहार करते हुए श्रीपुर नामक नगर में गये। वहाँ के राजा श्रीषेणने उन्हें योग्य विधिसे आहार दिया। इसके पश्चात् नन्दपुर नगरमें नन्दन नामके भक्तिवान् राजाने आहार दिया और तदनन्तर पुण्डरीकिणी नगरीमें निर्मल सम्यग्दृष्टि सिंहसेन राजाने आहार कराया । वे मुनिराज ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तपकी अनेक पर्यायोंको अच्छी तरह बढ़ा रहे थे। उन्हें दान देकर उक्त सभी राजाओंने पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ ३३३-३३५. ।।
“Journeying progressively through various lands, the great sage (Megharatha) arrived at the city of Shripur. There, King Shrishena offered him pure food (Ahaar) with the highest devotion according to the prescribed rites. After this, in the city of Nandapur, the devout King Nandan offered him food, and subsequently, in the city of Pundarikini, King Singhasen—a man of pure, unblemished right faith (Samyag-drishti)—joyfully served him food.
The holy sage continued to magnificently elevate the various facets of his knowledge, right perception, conduct, and austerities. By offering pure food to such a venerable monk, all the aforementioned kings merited the attainment of the ‘Five Divine Wonders’ (Panchashcharya).”333 – 335
श्लोक ( Shlok ) 336 – 337
संयमस्य परां कोटिमारुह्य स मुनीश्वरः । दृढो दृढरथेनामा नभस्तिलकपर्वते ॥ ३३६ ॥ मासमात्रं परित्यज्य शरीरं शान्तकल्मषः । प्रायोपगमनेनाप्तः प्राणान्तेनाहमिन्द्रताम् ॥ ३३७ ॥
अत्यन्त धीर वीर मेघ-रथने दृढ़रथके साथ-साथ नभस्तिलक नामक पर्वतपर श्रेष्ठ संयम धारणकर एक महीने तक प्रायोप-गमन संन्यास धारण किया और अन्तमें शान्त परिणामोंसे शरीर छोड़कर अहमिन्द्र पद प्राप्त किया ॥ ३३६-३३७ ।।
“On the majestic mountain named Nabhastilaka, the exceptionally calm and courageous Megharatha, alongside Dridharatha, embraced the highest vows of self-restraint (Sanyama). He undertook the profound rite of ‘Prayopagamana Sannyasa’ (voluntary fast unto death) for one month, and ultimately, leaving his physical body with deeply serene and peaceful thoughts, attained the exalted realm of an ‘Ahamindra’ (a supreme celestial being).”336 – 337
श्लोक ( Shlok ) 338 – 341
एतौ तत्र त्रयविशत्सागरोपमजीवितौ । विधूज्ज्वलतरारत्निशरीरौ शुक्कुलेश्यको ॥ ३३८ ॥ मासैः षोडशभिः सार्द्धमा “सैनिःश्वासमीयुषौ । त्रयस्त्रिशत्सहस्राब्दैराहृतामृतभोजनौ ॥ ३३९ ॥निःप्रवीचारसौख्याढ्यौ लोकनाड्यन्तराश्रित । स्वगोचरपरिच्छेदप्रमाणावधिलोचनौ ॥ ३४० ॥तत्क्षेत्रमितवीर्याभाविक्रियौ सुचिरं स्थितौ । समनन्तरजन्माप्य मोक्षलक्ष्मीसमागमौ ॥ ३४१ ॥
वहाँ इन दोनोंकी तैंतीस सागरकी आयु थी। चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एक हाथ ऊँचा शरीर था, शुक्ल लेश्या थी, वे साढ़े सोलह माहमें एक बार श्वास लेते थे, तैंतीस हजार वर्ष बाद एक बार अमृतमय आहार ग्रहण करते थे, प्रवीचाररहित सुखसे युक्त थे, उनके अवधिज्ञान रूपी नेत्र लोकनाडी के मध्यवर्ती योग्य पदार्थोंको देखते थे, उनकी शक्ति दीप्ति तथा विक्रियाका क्षेत्र भी अवधिज्ञानके क्षेत्रके बराबर था। इस प्रकार वे वहाँ चिरकालतक स्थित रहे। वहाँ से च्युत हो एक जन्म धारणकर वे नियमसे मोक्षलक्ष्मीका समागम प्राप्त करेंगे ॥ ३३८-३४१ ॥
“In that realm, both of them possessed a lifespan spanning thirty-three Sagaras (an immense cosmic time period). Their physical bodies stood one cubit tall and gleamed as radiantly white as the moon. They possessed Shukla Leshya (the absolute highest and purest state of thought-coloration).
They breathed in only once every sixteen and a half months, and partook of nectar-like spiritual nourishment (Ahaar) just once every thirty-three thousand years. They experienced a profound, blissful state of existence entirely free from sexual desire (Pravichara-rahita). Their eyes of Avadhijnana (clairvoyant knowledge) perceived all eligible substances positioned across the Loka-Nadi (the cosmic channel). Furthermore, their power, divine splendor, and fluidic body-transformation capability (Vikriya) were vast enough to match the entire range of their clairvoyance.
In this manner, they resided there for a remarkably long duration. Upon departing from that celestial realm, they will take only one final human birth and without fail, unite with the ultimate goddess of liberation (Moksha-Laxmi).”338 – 341
श्लोक 342 से 351
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