चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन
चन्दना के जन्म और परिवार का परिचय — श्लोक 1 से 12
गौतम गणधर के पास राजा श्रेणिक ने आर्यिका चन्दना के जन्म और पूर्व जीवन की कथा पूछी। गणधर ने बताया कि सिन्धु देश की वैशाली नगरी में राजा चेटक और रानी सुभद्रा रहते थे। उनके दस पुत्र और सात पुत्रियाँ थीं। सातों पुत्रियाँ क्रमशः प्रियकारिणी, मृगावती, सुप्रभा, प्रभावती, चेलिनी, ज्येष्ठा और चन्दना थीं। इन पुत्रियों के विवाह विभिन्न प्रसिद्ध राजाओं के साथ हुए और उनके माध्यम से अनेक राजवंशों से संबंध स्थापित हुए।
ज्येष्ठा का प्रसंग और चेटक की पुत्रियों के चित्र — श्लोक 13 से 25
गान्धार के राजा सत्यक ने ज्येष्ठा से विवाह की इच्छा प्रकट की, लेकिन राजा चेटक ने उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। क्रोधित होकर सत्यक ने युद्ध किया, जिसमें उसे पराजय मिली और बाद में उसने मुनि के पास जाकर दीक्षा धारण कर ली। राजा चेटक अपनी सातों पुत्रियों के चित्र बनवाकर उनकी पूजा करता था। एक चित्र में चेलिनी की जाँघ पर बार-बार एक बिन्दु बन जाने पर चित्रकार ने उसे उसके वास्तविक चिह्न का संकेत माना। बाद में मगध के राजा श्रेणिक ने चित्र देखकर चेटक की अविवाहित पुत्रियों के प्रति आकर्षण प्रकट किया।
अभयकुमार की योजना और ज्येष्ठा का वैराग्य — श्लोक 26 से 41
अभयकुमार ने राजा श्रेणिक की इच्छा पूरी करने के लिए चतुराई से एक योजना बनाई। उसने श्रेणिक का चित्र बनवाकर व्यापारी के वेश में राजा चेटक के भवन में प्रवेश किया। उसके द्वारा दिखाए गए चित्र से प्रभावित होकर चेलिनी और ज्येष्ठा उसके साथ चल पड़ीं। चेलिनी ने छलपूर्वक ज्येष्ठा को वापस भेज दिया और स्वयं अभयकुमार के साथ चली गई। ठगी का अनुभव होने पर ज्येष्ठा अत्यंत दुःखी हुई और अपनी मामी आर्यिका यशस्वती से जैन धर्म का उपदेश सुनकर दीक्षा धारण कर ली। दूसरी ओर चेलिनी का श्रेणिक से विवाह हुआ और उसे महादेवी का पद मिला।
चन्दना का धर्मग्रहण और मनोवेग द्वारा हरण , चन्दना का भीलों के बीच जीवन और धर्मनिष्ठा— श्लोक 42 से 51
चन्दना ने आर्यिका यशस्वती के पास जाकर सम्यग्दर्शन तथा श्रावक के व्रत ग्रहण किए। एक दिन वह अशोक वन में क्रीड़ा कर रही थी, तभी विद्याधर राजा मनोवेग ने उसे देखा और उसके रूप पर मोहित हो गया। उसने छलपूर्वक चन्दना का हरण कर लिया। मनोवेगा रानी को जब इस बात का पता चला तो उसने अपने पति का पीछा किया और उसे चन्दना को छोड़ने के लिए बाध्य किया। भयभीत मनोवेग ने चन्दना को भूतरमण वन में ऐरावती नदी के किनारे छोड़ दिया।
चन्दना ने संकट की स्थिति में भी पंच-नमस्कार मंत्र का जाप करते हुए रात बिताई। अगले दिन कालक नामक भील वहाँ आया। चन्दना ने उसे अपने बहुमूल्य आभूषण देकर धर्म का उपदेश दिया। कालक उसे भीलराज सिंह के पास ले गया, लेकिन सिंह भी उसके रूप पर मोहित हो गया। उसकी माता ने उसे चन्दना के साथ अनुचित व्यवहार करने से रोका और उसे देवतुल्य समझकर छोड़ देने की सलाह दी। अंततः चन्दना सुरक्षित रही और भीलराज की माता ने कुछ समय तक उसका पालन-पोषण किया।
सेठ के घर चन्दना की परीक्षा और सहनशीलता — श्लोक 52 से 63
भीलराज ने चन्दना को अपने मित्र के माध्यम से सेठ वृषभसेन के घर पहुँचा दिया। एक दिन सेठ की सेवा करते समय चन्दना के खुले और भीगे हुए केश देखकर सेठानी भद्रा को संदेह हुआ कि उसके पति का चन्दना से कोई संबंध है। ईर्ष्या और क्रोध के कारण उसने चन्दना को साँकल से बाँध दिया तथा उसे खराब भोजन और अनेक प्रकार की यातनाएँ दीं। चन्दना ने प्रतिशोध या क्रोध करने के बजाय इन कष्टों को अपने पूर्व कर्मों का फल माना और निरंतर आत्मनिन्दा करती रही।
भगवान महावीर को आहारदान और चन्दना की मुक्ति , चन्दना के पूर्वजन्म का प्रारंभिक प्रसंग — श्लोक 64 से 72
भगवान महावीर स्वामी आहार के लिए उसी नगर में आए। चन्दना ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति से उन्हें विधिपूर्वक आहार दिया। आहारदान के समय उसकी साँकल स्वयं टूट गई और देवताओं ने उसकी भक्ति एवं दान की प्रशंसा करते हुए रत्नों और पुष्पों की वर्षा की। उसकी बहन मृगावती समाचार पाकर चन्दना को अपने घर ले गई। भद्रा सेठानी और वृषभसेन सेठ ने अपने अपराध के लिए क्षमा माँगी और चन्दना ने उन्हें क्षमा कर दिया। बाद में महावीर स्वामी के दर्शन से चन्दना में वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसने दीक्षा धारण कर तप तथा सम्यग्ज्ञान के प्रभाव से गणिनी का पद प्राप्त किया।
राजा चेटक ने चन्दना के पूर्वजन्म के विषय में प्रश्न किया। गणधर ने बताया कि पूर्व जन्म में मगध देश की वत्सा नगरी में प्रसेनिक नामक राजा के समय अग्निमित्र नामक ब्राह्मण रहता था। उसकी दो पत्नियों से शिवभूति नामक पुत्र और चित्रसेना नामक पुत्री हुई। चित्रसेना का विवाह देवशर्मा से हुआ, लेकिन पति की मृत्यु के बाद वह अपने पुत्रों के साथ अपने भाई शिवभूति के घर रहने लगी।
मिथ्या आरोप, वैर और कर्म का संबंध — श्लोक 73 से 81
चित्रसेना और उसके पुत्रों का पालन-पोषण शिवभूति करता था, जिससे उसकी पत्नी सोमिला ईर्ष्या करने लगी। शिवभूति द्वारा ताड़ना दिए जाने पर सोमिला ने क्रोध में उस पर अपनी बहन चित्रसेना के साथ अनुचित संबंध का झूठा आरोप लगाया। चित्रसेना ने भी अपमानित होकर शिवभूति से बदला लेने का निदान किया। बाद में सोमिला ने एक मुनिराज को आहार दिया और शिवभूति ने उस दान की अनुमोदना की। मृत्यु के बाद शिवभूति का जीव वंगदेश के कान्तपुर में महाबल कुमार के रूप में जन्मा।
महाबल और कनकलता का अनुचित संबंध , महाबल और कनकलता की मृत्यु —श्लोक 82 से 94
महाबल की मामा के घर पली कनकलता से पूर्व निर्धारित विवाह होना था। युवावस्था आने पर दोनों को अलग रहने के लिए कहा गया, लेकिन वे एक-दूसरे के प्रति अत्यधिक आसक्त रहे और अंततः उनका अनुचित समागम हो गया। लज्जित होकर वे कान्तपुर चले गए, परंतु माता-पिता ने उनके आचरण से दुःखी होकर उन्हें दूसरा स्थान जाकर रहने के लिए कहा। दोनों दूसरे नगर में रहने लगे और वहाँ मुनिगुप्त मुनिराज के दर्शन कर भक्तिपूर्वक पूजा तथा आहारदान किया।
महाबल को वन में एक विषैले साँप ने काट लिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। पति के मृत शरीर को देखकर कनकलता अत्यंत शोकाकुल हुई और उसकी तलवार से आत्मघात कर लिया। इस प्रसंग के माध्यम से आचार्य बताते हैं कि जब आसक्ति अपनी चरम सीमा तक पहुँच जाती है, तब मनुष्य विवेक खोकर अत्यंत दुखद कार्य कर सकता है।
नागदत्त का जन्म और विद्या-अध्ययन — श्लोक 95 से 101
अगले जन्म में महाबल का जीव उज्जयिनी के सेठ धनदेव और उसकी पत्नी धनमित्रा के पुत्र नागदत्त के रूप में जन्मा। धनदेव ने दूसरी स्त्री से विवाह करके धनमित्रा को छोड़ दिया, जिसके कारण वह अपने पुत्र के साथ दूसरे देश चली गई। बाद में धनमित्रा ने शील-दत्त गुरु से श्रावक के व्रत ग्रहण किए और अपने पुत्र नागदत्त को मुनिराज के संरक्षण में शास्त्र-अध्ययन के लिए सौंप दिया। नागदत्त ने अपनी बुद्धि और अध्ययन के बल पर शास्त्रों में प्रवीणता प्राप्त की, उत्तम कवि बना और शास्त्रों की व्याख्या द्वारा यश प्राप्त किया।
नागदत्त की विद्वत्ता और यश — श्लोक 102 से 113
नागदत्त अपनी विद्वत्ता, मधुर वाणी और शास्त्रों की व्याख्या के कारण विद्वान एवं श्रेष्ठ लोगों के बीच प्रसिद्ध हुआ। उसने कोटपाल के पुत्र दृढरक्ष से मित्रता की और शास्त्रों की व्याख्या करके उपाध्याय पद तथा पर्याप्त धन प्राप्त किया। उसने अपनी माता और बहिन का पालन-पोषण किया तथा अपनी बहिन का विवाह उचित कुल में कराया। बाद में उसने राजा को श्लोक सुनाकर सम्मान और धन प्राप्त किया। पिता धनदेव से अपना पैतृक हिस्सा माँगने पर उसे पलाश नगर से अपना धन प्राप्त करने के लिए भाइयों नकुल और सहदेव के साथ समुद्र यात्रा पर जाना पड़ा। यात्रा से पूर्व उसने जिनेन्द्रदेव की पूजा करने की इच्छा प्रकट की और उनकी स्तुति करते हुए यात्रा प्रारम्भ की।
पलाश नगर और पद्मलता का प्रसंग — श्लोक 114 से 122
नागदत्त पलाश नगर पहुँचा तो उसने नगर को पूर्णतः निर्जन पाया। वहाँ उसे एक कन्या मिली, जिसने बताया कि क्रोधी राक्षस के कारण नगर और उसके राजा का विनाश हो चुका था। बाद में मंत्र-सिद्ध तलवार के प्रभाव से नगर पुनः बसाया गया था। वर्तमान राजा महाबल और रानी काञ्चनलता की पुत्री पद्मलता वहाँ अकेली रह गई थी, क्योंकि उसके पिता की मंत्र-सिद्ध तलवार अलग रखने के कारण राक्षस ने उनकी हत्या कर दी थी। नागदत्त ने उस तलवार की सहायता से लौटकर आए राक्षस विद्याधर का वध कर दिया।
क्रोध के दुष्परिणाम और विद्याधर का पश्चात्ताप — श्लोक 123 से 135
राक्षस विद्याधर ने मृत्यु के समय पंच-नमस्कार मंत्र का स्मरण किया। यह सुनकर नागदत्त को अपने द्वारा किए गए हिंसक कार्य पर पश्चात्ताप हुआ। विद्याधर ने स्वीकार किया कि उसने क्रोध के वशीभूत होकर अपराध किया था। उसने बताया कि क्रोध मित्र को शत्रु बना देता है, धर्म को नष्ट करता है, राज्य और प्राणों तक का विनाश कर सकता है तथा अधोगति का कारण बनता है। उसने नागदत्त से अपने अपराध के लिए क्षमा माँगी और पूर्वकर्मों को अपने दुःख का कारण माना। पंच-नमस्कार मंत्र की भावना करते हुए वह स्वर्ग को प्राप्त हुआ। नागदत्त पद्मलता तथा धन को लेकर जहाज पर लौट आया, लेकिन उसके भाइयों नकुल और सहदेव ने ईर्ष्या एवं कपट से वापसी के समय रस्सी उसे नहीं दी और अकेले चले गए।
नागदत्त का संकट और धर्मात्मा विद्याधर की सहायता —श्लोक 136 से 150
नकुल और सहदेव ने नागदत्त के न लौटने की बात छिपाकर झूठ बोल दिया। इससे उसकी माता अत्यंत चिंतित हुई और उसने शीलदत्त गुरु से अपने पुत्र के विषय में पूछा। मुनिराज ने सम्यग्ज्ञान से स्थिति जानकर उसे आश्वस्त किया कि नागदत्त शीघ्र लौट आएगा। उधर नागदत्त ने एक जिनमंदिर में प्रवेश करके भगवान की स्तुति की और वहीं चिंतित होकर बैठ गया। संयोग से एक धर्मनिष्ठ विद्याधर वहाँ आया और नागदत्त की सहायता करके उसे धन सहित सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया। इसके बाद नागदत्त अपनी बहिन के पास पहुँचा और अपना धन उसके पास रखकर रहने लगा। जब बहिन के परिवार को विवाह के लिए धन की आवश्यकता हुई, तब नागदत्त ने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें रत्न दिए और स्वयं भी उनके साथ गया।
नागदत्त की प्रतिष्ठा और पुण्य का प्रभाव — श्लोक 151 से 162
नागदत्त ने राजा को अपनी पूरी यात्रा और अपने साथ हुए अन्याय की कथा सुनाई। राजा उसके भाइयों को दंडित करना चाहता था, लेकिन नागदत्त ने उन्हें दंड देने से रोक दिया। राजा उसकी उदारता से प्रसन्न हुआ और उसे धन देकर सेठ का पद प्रदान किया तथा पद्मलता से उसका विवाह करा दिया। राजा ने सभा में कहा कि नागदत्त अनेक संकटों से बचकर और श्रेष्ठ रत्नों को प्राप्त करके लौटा है, जो पुण्य के महान प्रभाव को दर्शाता है। पुण्य से अग्नि जल के समान, विष अमृत के समान और शत्रु मित्र के समान हो सकता है तथा निर्धन भी धनवान हो सकता है। इसलिए मनुष्य को जिनेन्द्रदेव के बताए धर्म के अनुसार आचरण करके पुण्य का संचय करना चाहिए। बाद में धनदेव ने नागदत्त से क्षमा माँगी, जिसे नागदत्त ने सहर्ष क्षमा कर दिया। सभी ने श्रावक धर्म को स्वीकार किया और दान, पूजा आदि धार्मिक कार्यों में जीवन व्यतीत करने लगे। अंततः नागदत्त ने संन्यासपूर्वक शरीर त्यागकर सौधर्म स्वर्ग प्राप्त किया।
मनोवेग का जन्म और चन्दना के प्रति आसक्ति — श्लोक 163 से 171
स्वर्ग से च्युत होकर नागदत्त का जीव विजयार्ध पर्वत के शिवंकर नगर में राजा पवनवेग और रानी सुवेगा के पुत्र मनोवेग के रूप में जन्मा। पूर्वजन्म के प्रबल स्नेह के कारण उसने चन्दना का हरण किया था, जिससे यह शिक्षा मिलती है कि अत्यधिक आसक्ति मनुष्य को कुमार्ग की ओर ले जा सकती है। मनोवेग निकटभव्य जीव था और इसी जन्म में दिगम्बर मुद्रा धारण करके मोक्ष प्राप्त करेगा। नागदत्त की बहिन अर्थस्वामिनी का जीव मनोवेगा हुआ। पलाश नगर में नागदत्त द्वारा मारा गया विद्याधर स्वर्ग से च्युत होकर राजा चेटक के रूप में जन्मा। नागदत्त की माता धनमित्रा का जीव सुभद्रा रानी और उसकी पत्नी पद्मलता का जीव चन्दना के रूप में जन्मा।
पूर्वजन्म के वैर और वर्तमान जन्म के संबंध , संसार के दुःख और मोक्षमार्ग — श्लोक 172 से 181
नकुल का जीव बाद में सिंह नामक भील बना और पूर्वजन्म के स्नेह तथा वैर के कारण चन्दना को कष्ट देने का निमित्त बना। सहदेव का जीव कौशाम्बी में मित्रवीर नामक वैश्यपुत्र हुआ और उसी ने चन्दना को वृषभसेन सेठ के पास पहुँचाया। नागदत्त के पिता धनदेव का जीव वृषभसेन सेठ बना। चित्रसेना का जीव बाद में भद्रा सेठानी के रूप में जन्मा और पूर्वजन्म के वैर के कारण उसने चन्दना को कष्ट दिया। चन्दना आगे अच्युत स्वर्ग को प्राप्त करेगी और वहाँ से लौटकर शुभ कर्मों के प्रभाव से मोक्ष प्राप्त करेगी। इस प्रकार पूर्वजन्म के स्नेह, वैर और कर्म वर्तमान जीवन के संबंधों एवं परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं।
मिथ्यादर्शन आदि कर्मबंध के कारण जीव निरंतर द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि के परिवर्तन को प्राप्त करते हुए संसार में भटकता रहता है। ये परिवर्तन जीव के लिए अत्यंत दुःखद हैं और उसे बार-बार जन्म-मरण के चक्र में डालते हैं। जब काललब्धि आदि अनुकूल निमित्त प्राप्त होते हैं, तब जीव सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप जैसे मोक्षमार्ग के साधनों को प्राप्त करता है। इनके द्वारा वह पुण्य और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करते हुए परम सुख की ओर अग्रसर होता है।
जीवन्धर मुनिराज का परिचय और विजया के स्वप्न — श्लोक 182 से 193
एक दिन राजा श्रेणिक ने अशोक वृक्ष के नीचे ध्यान में स्थित जीवन्धर मुनिराज को देखा और उनके स्वरूप से प्रभावित होकर सुधर्म गणधर से उनके विषय में पूछा। सुधर्माचार्य ने बताया कि हेमाङ्गद देश के राजपुर नगर में राजा सत्यन्धर और रानी विजया रहते थे। उनके मंत्री काष्ठाङ्गारिक और पुरोहित रुद्रदत्त थे। एक रात रानी विजया ने दो विशेष स्वप्न देखे—पहले स्वप्न में राजा ने उसे आठ घंटियों से सुशोभित अपना मुकुट दिया और दूसरे में उसने अशोक वृक्ष को काटकर उसके स्थान पर नया अशोक वृक्ष उगते देखा। राजा ने स्वप्नों का फल बताते हुए कहा कि उसके मरने के बाद रानी को ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जो आठ प्रकार के लाभ प्राप्त करके पृथ्वी का स्वामी बनेगा।
गन्धोत्कट सेठ को दीर्घायु पुत्र की भविष्यवाणी —श्लोक 194 से 201
राजा और रानी का जीवन सुखपूर्वक चल रहा था। इसी बीच एक पुण्यात्मा जीव स्वर्ग से च्युत होकर रानी विजया के गर्भ में आया। दूसरी ओर उसी नगर के धनी सेठ गन्धोत्कट ने तीन ज्ञान से युक्त मुनिराज शीलगुप्त से अपने अल्पायु पुत्रों के विषय में पूछा और दीर्घायु पुत्र की प्राप्ति की संभावना जाननी चाही। मुनिराज ने करुणापूर्वक उसे आश्वासन दिया कि उसे दीर्घायु पुत्र प्राप्त होगा।
जीवन्धर के जन्म की भविष्यवाणी और यक्षी का संकल्प — श्लोक 202 से 212
मुनिराज शीलगुप्त ने गन्धोत्कट सेठ को बताया कि उसे एक पुण्यात्मा और दीर्घायु पुत्र प्राप्त होगा, जो आगे चलकर पृथ्वी का सुख भोगकर समस्त कर्मों का नाश करते हुए मोक्ष प्राप्त करेगा। मुनिराज की यह बात सुनकर वहाँ उपस्थित पक्षी के मन में भावी राजपुत्र की माता की सहायता करने की भावना उत्पन्न हुई। उसके पुण्य के प्रभाव से प्रेरित होकर यक्षी ने गरुड़-यंत्र का रूप धारण कर राजकुल में पहुँचने का निश्चय किया। इसी बीच रुद्रदत्त पुरोहित ने राजा सत्यन्धर के विरुद्ध काष्ठाङ्गारिक मन्त्री को भड़काकर राज्य प्राप्त करने के लिए राजा की हत्या करने की सलाह दी, लेकिन मन्त्री ने उसके प्रस्ताव को अनुचित बताकर अस्वीकार कर दिया।
षड्यंत्र, राजा पर आक्रमण और काष्ठाङ्गारिक की विजय — श्लोक 213 से 222
रुद्रदत्त ने काष्ठाङ्गारिक को बताया कि राजा का होने वाला पुत्र उसके लिए प्राणघातक सिद्ध होगा। इस भय से काष्ठाङ्गारिक ने राजा की हत्या करने की योजना बनाई और दो हजार शूरवीरों को अपने पक्ष में कर लिया। राजा को षड्यंत्र का पता चलने पर उसने रानी विजया को गरुड़-यंत्र पर सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। युद्ध के समय मन्त्री के साथ आए अनेक राजा सत्यन्धर के पक्ष में हो गए और राजा ने काष्ठाङ्गारिक को पराजित कर दिया। बाद में काष्ठाङ्गारिक का पुत्र कालाङ्गारिक सेना सहित आया और अपने पिता के साथ मिलकर युद्ध किया। अंततः उन्होंने राजा सत्यन्धर की हत्या कर उसका राज्य छीन लिया।
विजया का श्मशान में पहुँचना और पुत्र-जन्म — श्लोक 223 से 241
राजा की मृत्यु से दुःखी विजया गरुड़-यंत्र पर बैठकर चली और एक भयानक श्मशानभूमि में पहुँची। यक्षी ने पूरी रात उसकी रक्षा की। उसी रात विजया ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन पति की मृत्यु और विपरीत परिस्थितियों के कारण वह पुत्र-जन्म का आनंद नहीं मना सकी। यक्षी ने उसे समझाया कि संसार की सभी वस्तुएँ अनित्य हैं; यौवन, राज्य, शरीर और प्रियजनों का संबंध स्थायी नहीं है। इसलिए बीती हुई वस्तुओं के लिए शोक करना उचित नहीं है। उसने विजया को धैर्य रखने और अपने पुण्यवान पुत्र के उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास रखने की प्रेरणा दी। उसने यह भी समझाया कि प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग गति प्राप्त करता है। यक्षी के उपदेश से विजया का शोक दूर हुआ।
जीवन्धर का गन्धोत्कट सेठ को सौंपा जाना — श्लोक 242 से 250
गन्धोत्कट सेठ अपने मृत पुत्र का शव श्मशान में रखने पहुँचा। वहाँ उसने एक नवजात बालक के रोने की आवाज सुनी और उसे देखकर समझ गया कि मुनिराज की भविष्यवाणी सत्य हुई है। विजया ने गन्धोत्कट को अपना परिचय देकर अनुरोध किया कि वह बालक का पालन-पोषण इस प्रकार करे कि उसकी वास्तविक पहचान किसी को ज्ञात न हो। गन्धोत्कट ने बालक को स्वीकार कर अपनी पत्नी सुनन्दा को सौंप दिया और उसे बताया कि यह बालक जीवित, दीर्घायु तथा पुण्यवान है। सुनन्दा ने स्नेहपूर्वक उसका पालन किया। शुभ संस्कारों के बाद सेठ ने उसका नाम जीवन्धर रखा।
विजया का आश्रमवास और जीवन्धर का बाल्यकाल — श्लोक 251 से 261
विजया गरुड़-यंत्र से दण्डक वन के तपस्वियों के आश्रम में पहुँची और अपनी पहचान छिपाकर रहने लगी। जब वह शोकाकुल होती, तब यक्षी उसे उपयुक्त धार्मिक कथाएँ सुनाकर सांत्वना देती और उसका मन धर्म की ओर लगाती थी। दूसरी ओर सत्यन्धर की अन्य रानियों से मधुर और बकुल नामक दो पुत्र हुए, जिन्हें भी धर्म का ज्ञान प्राप्त था और उनका पालन-पोषण गन्धोत्कट के यहाँ हुआ। नगर के चार प्रमुख श्रावक—विजयमात, सागर, धनपाल और मतिसागर—अपने-अपने पुत्रों देवसेन, बुद्धिषेण, वरदत्त और मधुमुख के साथ रहते थे। ये सभी बालक जीवन्धर के घनिष्ठ मित्र बने और उसके साथ ही बड़े हुए। बाद में सुनन्दा ने नन्दाढ्य नामक पुत्र को जन्म दिया।
जीवन्धर की बुद्धिमत्ता और तपस्वी से भेंट — श्लोक 262 से 273
एक दिन जीवन्धर कुमार अपने मित्रों के साथ उद्यान में खेल रहा था। वहाँ आए एक तपस्वी ने उससे नगर की दूरी पूछी। जीवन्धर ने अपनी बुद्धिमत्ता से उत्तर दिया कि बालकों की क्रीड़ा देखकर नगर की निकटता का अनुमान लगाया जा सकता है, जैसे धुएँ से अग्नि का अनुमान होता है। कुमार की बुद्धि, स्वर और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर तपस्वी ने अनुमान लगाया कि वह सामान्य बालक नहीं है। उसकी परीक्षा लेने के लिए उसने जीवन्धर से भोजन की माँग की। जीवन्धर ने विनम्रतापूर्वक उसे भोजन कराने का वचन दिया और पिता के पास ले गया। पिता उसकी विनम्रता से प्रसन्न हुए और तपस्वी को भोजन कराने की अनुमति दी। भोजन गर्म होने के कारण जीवन्धर रोने लगा, तब तपस्वी ने उसे रोने से मना किया और उसकी बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की।
जीवन्धर की शिक्षा और तपस्वी का परिचय — श्लोक 274 से 290
जीवन्धर ने रोने के तीन लाभ बताते हुए अपनी बालसुलभ बुद्धिमत्ता का परिचय दिया—रोने से कफ निकलता है, आँखें स्वच्छ होती हैं और भोजन ठंडा हो जाता है। उसकी बात से माता प्रसन्न हुई और उसने उसे भोजन कराया। भोजन के बाद तपस्वी ने जीवन्धर को शिक्षा देने की इच्छा व्यक्त की। गन्धोत्कट ने अपने श्रावक धर्म के कारण तपस्वी को नमस्कार करने में संकोच किया, तब तपस्वी ने अपना परिचय दिया। उसने बताया कि वह सिंहपुर का राजा आर्यवर्मा था, जिसने वीरनन्दी मुनि से धर्म सुनकर सम्यग्दर्शन ग्रहण किया और पुत्र को राज्य देकर संयम धारण किया था, लेकिन तीव्र शारीरिक पीड़ा के कारण उसे अपना वर्तमान वेष धारण करना पड़ा। परिचय और परीक्षा के बाद गन्धोत्कट ने जीवन्धर को उसके संरक्षण में दे दिया। तपस्वी ने थोड़े ही समय में जीवन्धर को समस्त विद्याओं में निपुण बना दिया और बाद में स्वयं भी संयम धारण करके मोक्ष प्राप्त किया। इसी समय कालकूट नामक हिंसक भीलराज अपनी सेना सहित नगर के बाहर आकर गोमण्डल का हरण करने के लिए डेरा डालता है।
जीवन्धर की वीरता और नन्दाढ्य को यश प्रदान करना — श्लोक 291 से 300
कालकूट भीलराज से गायों की रक्षा करने वाले वीर को गोदावरी नामक कन्या देने की घोषणा की गई। जीवन्धर कुमार अपने मित्रों के साथ कालकूट से युद्ध करने पहुँचा। उसने धनुर्विद्या और युद्धकौशल का अद्भुत प्रदर्शन करते हुए भीलों की सेना को पराजित किया और गायों को छुड़ा लिया। विजय के बाद नगर में उसका यश फैल गया। परन्तु जीवन्धर ने स्वयं यश प्राप्त करने के बजाय अपने मित्र नन्दाढ्य को आगे किया और सभी वैश्यपुत्रों से राजा के सामने यह कहने को कहा कि गायों को छुड़ाने का कार्य नन्दाढ्य ने किया है। इस प्रकार उसने अपने पराक्रम का श्रेय मित्र को देकर गोदावरी का विवाह नन्दाढ्य से करा दिया। यह प्रसंग जीवन्धर की उदारता, मित्रवत्सलता और यश के प्रति अनासक्ति को प्रकट करता है।
गरुड़वेग का रत्नद्वीप में निवास और गन्धर्वदत्ता के विवाह की भविष्यवाणी — श्लोक 301 से 313
विजयार्ध पर्वत की दक्षिण श्रेणी में गगनवल्लभ नामक नगर में विद्याधरों का राजा गरुड़वेग राज्य करता था। भाग्यवश राज्य से वंचित होकर वह रत्नद्वीप चला गया और वहाँ रमगीय नगर बसाकर रहने लगा। उसकी पुत्री गन्धर्वदत्ता के विवाह के विषय में मन्त्री मतिसागर ने विपुलमति मुनिराज से सुनी भविष्यवाणी सुनाई कि वह राजपुर के राजा सत्यन्धर और रानी विजया के पुत्र जीवन्धर कुमार की पत्नी बनेगी। यह सुनकर गरुड़वेग को भूमिगोचरी राजकुमार के साथ संबंध होने की बात पर आश्चर्य हुआ।
जिनदत्त और गरुड़वेग के पूर्वजन्म के संबंध — श्लोक 314 से 321
मतिसागर ने बताया कि राजपुर में वृषभदत्त सेठ और उसकी पत्नी पद्मावती के पुत्र जिनदत्त से गरुड़वेग की पूर्व से घनिष्ठ मित्रता थी। दोनों में इतना स्नेह था कि शरीर के अतिरिक्त उनमें कोई भेद नहीं रह गया था। बाद में वृषभदत्त और पद्मावती ने क्रमशः मुनि और आर्यिका के रूप में दीक्षा ग्रहण कर ली। जिनदत्त ने पिता का स्थान ग्रहण कर धन-संपत्ति का उपभोग किया और व्यापार के लिए रत्नद्वीप पहुँचा। गरुड़वेग ने उसका स्वागत करके अपनी पुत्री गन्धर्वदत्ता का स्वयंवर राजपुर में कराने का अनुरोध किया।
गन्धर्वदत्ता का स्वयंवर और जीवन्धर की विजय — श्लोक 322 से 330
जिनदत्त गन्धर्वदत्ता को लेकर राजपुर पहुँचा और मनोहर वन में विशाल स्वयंवर-गृह बनवाया। अनेक विद्याधर तथा भूमिगोचरी राजकुमार स्वयंवर में उपस्थित हुए। गन्धर्वदत्ता ने सुघोषा नामक वीणा बजाकर अपनी अद्भुत संगीत-कला का प्रदर्शन किया। उसकी कला के अभिमान को दूर करने के लिए जीवन्धर कुमार स्वयंवर में आए। उन्होंने निष्पक्ष एवं संगीत-कला के विशेषज्ञ व्यक्तियों को वीणा की परीक्षा के लिए नियुक्त किया और स्वयं भी वीणाओं के दोषों की पहचान की।
जीवन्धर का संगीत-कौशल और गन्धर्वदत्ता से विवाह — श्लोक 331से 350
जीवन्धर कुमार ने गन्धर्वदत्ता की वीणा लेकर शास्त्रसम्मत, मधुर और गंभीर स्वर में संगीत प्रस्तुत किया। उनके संगीत से प्रभावित होकर गन्धर्वदत्ता ने उन्हें वरमाला पहना दी। काष्ठाङ्गारिक के पुत्र कालाङ्गारिक ने गन्धर्वदत्ता का हरण करने का प्रयास किया, लेकिन जीवन्धर ने शक्तिशाली विद्याधरों के साथ उसका सामना किया। गन्धर्वदत्ता के पिता गरुड़वेग ने मध्यस्थता करके संघर्ष को शांत कराया और विधिपूर्वक जीवन्धर तथा गन्धर्वदत्ता का विवाह सम्पन्न कराया। दोनों परस्पर प्रेम और सुखपूर्वक रहने लगे।
चूर्ण-विवाद और जीवन्धर की निष्पक्ष बुद्धिमत्ता — श्लोक 351से 365
वसन्त ऋतु में नगरवासी सुरमलय उद्यान में उत्सव मनाने पहुँचे। वहाँ सुरमञ्जरी की दासी श्यामलता चन्द्रोदय नामक सुगन्धित चूर्ण को श्रेष्ठ बता रही थी, जबकि गुणमाला की दासी विद्युल्लता सूर्योदय नामक चूर्ण को श्रेष्ठ बता रही थी। दोनों के बीच विवाद होने पर जीवन्धर कुमार ने दोनों चूर्णों की परीक्षा की और चन्द्रोदय चूर्ण को अधिक सुगन्धित सिद्ध किया। इस निष्पक्ष निर्णय से दोनों कन्याओं की पारस्परिक ईर्ष्या समाप्त हो गई। इसी अवसर पर जीवन्धर ने एक घायल कुत्ते को बचाकर उसके कानों में पंचनमस्कार मंत्र सुनाया। वह कुत्ता मरकर सुदर्शन नामक यक्ष हुआ और कृतज्ञ होकर जीवन्धर की सेवा का वचन देकर चला गया।
मदोन्मत्त हाथी का वश में करना और सुरमञ्जरी से विवाह — श्लोक 366 से 383
वन-क्रीड़ा से लौटते समय राजा का मदोन्मत्त हाथी अशनिघोष सुरमञ्जरी के रथ की ओर दौड़ा। जीवन्धर कुमार ने अपने हस्तिविज्ञान और कौशल से उसे नियंत्रित कर बाँध दिया। उनके इस पराक्रम से सुरमञ्जरी उनके प्रति आकर्षित हो गई और उसके माता-पिता ने उचित रीति से उसका विवाह जीवन्धर से कर दिया। जीवन्धर की बढ़ती वीरता और प्रतिष्ठा से काष्ठाङ्गारिक ईर्ष्या करने लगा और उसने चण्डदण्ड को जीवन्धर को मारने की आज्ञा दी। जीवन्धर ने उसे पराजित कर दिया। बाद में राजा ने बड़ी सेना भेजी, लेकिन जीवन्धर ने सैनिकों की अनावश्यक हिंसा से बचने के लिए अपने मित्र सुदर्शन यक्ष को स्मरण किया। यक्ष ने आकर उपद्रव शांत कर दिया और जीवन्धर को अपने घर ले गया।
सुदर्शन यक्ष की सहायता और चन्द्राभ नगर की यात्रा —श्लोक 384 से 391
जीवन्धर के चले जाने से उनके मित्र और संबंधी भयभीत हो गए, लेकिन गन्धर्वदत्ता ने उन्हें आश्वस्त किया कि कुमार सुरक्षित हैं और शीघ्र लौटेंगे। जीवन्धर कुछ समय सुदर्शन यक्ष के यहाँ रहे और फिर वहाँ से जाने की इच्छा व्यक्त की। यक्ष ने उन्हें इच्छित कार्य सिद्ध करने वाली तथा इच्छानुसार रूप धारण करने में सहायक अंगूठी प्रदान की और विदा किया। यात्रा करते हुए जीवन्धर चन्द्राभ नगर पहुँचे, जहाँ राजा धनपति, रानी तिलोत्तमा और उनकी पुत्री पद्मोत्तमा रहती थीं।
पद्मोत्तमा को विष से बचाना और क्षेम नगर की ओर प्रस्थान — श्लोक 392 से 403
राजकुमारी पद्मोत्तमा को एक विषैले साँप ने काट लिया। राजा धनपति ने घोषणा की कि जो व्यक्ति उसे विषमुक्त करेगा, उसे कन्या और आधा राज्य दिया जाएगा। अनेक वैद्य असफल रहे। संयोग से राजसेवकों की भेंट जीवन्धर कुमार से हुई। जीवन्धर ने यक्ष का स्मरण करके मंत्र की सहायता से राजकुमारी को विषमुक्त कर दिया। राजा उसकी प्रतिभा और राजवंशीय लक्षणों से प्रभावित हुआ और उसने अपनी पुत्री तथा आधा राज्य उसे प्रदान कर दिया। जीवन्धर कुछ समय वहाँ रहने के बाद रात्रि में चुपचाप वहाँ से निकल पड़े और क्षेम देश के क्षेम नगर पहुँचे। वहाँ उन्होंने नगर के बाहर एक मनोहर वन में अनेक शिखरों से सुशोभित जिनमंदिर देखा।
जिनमंदिर में जीवन्धर कुमार की भक्ति — श्लोक 404 से 412
जीवन्धर कुमार ने क्षेम नगर के बाहर स्थित जिनमंदिर को देखकर श्रद्धापूर्वक नमस्कार किया, तीन प्रदक्षिणाएँ दीं और जिनेन्द्र भगवान की स्तुति की। उनके आगमन के प्रभाव से चम्पक वृक्ष में फूल खिल उठे, कोकिल मधुर स्वर में गाने लगीं, सरोवर के कमल खिल गए और मंदिर के द्वार स्वयं खुल गए। इन शुभ अतिशयों को देखकर उनकी भक्ति और भी बढ़ गई। उन्होंने सरोवर में स्नान कर पुष्प एकत्र किए और विधिपूर्वक जिनेन्द्र भगवान की पूजा तथा स्तुति की। इसी समय सुभद्र सेठ की पुत्री क्षेमसुन्दरी के संबंध में पूर्व कही गई मुनिराज की भविष्यवाणी के संकेत भी प्रकट हुए।
क्षेमसुन्दरी से विवाह और धनुष-बाण की प्राप्ति — श्लोक 413 से 423
क्षेमसुन्दरी के पिता द्वारा नियुक्त लोगों ने जीवन्धर कुमार को देखकर मुनिराज की भविष्यवाणी सत्य होने की सूचना सेठ को दी। सेठ ने प्रसन्न होकर क्षेमसुन्दरी का विवाह जीवन्धर कुमार से कर दिया। उसने राजा सत्यन्धर द्वारा पूर्व में दिए गए योग्य धनुष और बाण भी उन्हें भेंट किए। कुछ समय तक क्षेम नगर में सुखपूर्वक रहने के बाद जीवन्धर कुमार धनुष-बाण लेकर सुजन देश के हेमाभ नगर पहुँचे। वहाँ राजा दृढ़मित्र की पुत्री हेमाभा के विषय में भविष्यवाणी थी कि जो धनुर्धर लक्ष्य को भेदकर बाण को वापस लौटा देगा, वही उसका पति बनेगा।
धनुर्विद्या की परीक्षा और हेमाभा से विवाह —श्लोक 424 से 440
हेमाभ नगर में अनेक धनुर्धर राजकुमार हेमाभा को प्राप्त करने के लिए उस विशेष धनुष-बाण की परीक्षा कर रहे थे। जीवन्धर कुमार ने भी परीक्षा में भाग लेकर लक्ष्य को भेद दिया और उनका बाण लक्ष्य से टकराकर वापस लौट आया। उनकी अद्भुत धनुर्विद्या देखकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने हेमाभा का विवाह जीवन्धर कुमार से कर दिया। जीवन्धर कुमार वहाँ रहकर अपने साले गुणमित्र, बहुमित्र, सुमित्र और धनमित्र आदि को विभिन्न विद्याओं में निपुण बनाने लगे। इसी समय श्रीचन्द्रा नामक कन्या को पूर्वभव के संस्कारों का अनुभव होने की भूमिका भी बनती है।
श्रीचन्द्रा का जातिस्मरण — श्लोक 441 से 454
श्रीचन्द्रा ने अपने भवन के आँगन में कबूतर-कबूतरी का जोड़ा देखा और उसे अपने पूर्वभव का स्मरण हो गया, जिससे वह मूर्च्छित हो गई। उसकी सखी अलकसुन्दरी ने कारण पूछने पर उसका पूर्वभव का सम्पूर्ण वृत्तान्त जाना। पूर्वभव में श्रीचन्द्रा अनुपमा नामक सुन्दर और गुणवती कन्या थी। उसका विवाह गुणमित्र नामक वैश्य-पुत्र से हुआ था। समुद्री यात्रा के दौरान गुणमित्र की मृत्यु हो गई और उसके वियोग में अनुपमा ने भी प्राण त्याग दिए। आगे चलकर दोनों के जीवों ने पुनः एक-दूसरे से संबंध पाया।
कबूतर-कबूतरी का जन्म और पूर्व-स्नेह — श्लोक 455 से 472
गुणमित्र का जीव पवनवेग नामक कबूतर और अनुपमा का जीव रतिवेगा नामक कबूतरी बना। दोनों ने पूर्वजन्म के स्नेह के कारण एक-दूसरे के प्रति गहरा अनुराग बनाए रखा। एक बिलाव ने कबूतरी पर आक्रमण किया, तब कबूतर ने साहसपूर्वक उसे बचाया। बाद में पवनवेग जाल में फँसकर मर गया और उसके वियोग में रतिवेगा ने भी प्राण त्याग दिए। इसी कारण वर्तमान जन्म में श्रीचन्द्रा को कबूतरों का जोड़ा देखकर पूर्वभव का स्मरण हुआ था। उसके माता-पिता ने पूर्वभव के पति की खोज करने का निश्चय किया। समाधिगुप्त मुनिराज ने बताया कि उसका पूर्वभव का पति वर्तमान में हेमाभ नगर में है।
नन्दाढ्य को पूर्वभव का स्मरण — श्लोक 473 से 492
श्रीचन्द्रा के पूर्वभव के पति की खोज के लिए नट-नटी द्वारा नृत्य का आयोजन किया गया। उसे देखकर नन्दाढ्य को भी अपने पूर्वभव का स्मरण हो गया। उसने बताया कि वह पूर्वभव में गुणमित्र था और श्रीचन्द्रा पूर्वभव की अनुपमा थी। इस रहस्य को जानकर जीवन्धर कुमार अत्यन्त प्रसन्न हुए। इसी बीच हरिविक्रम भील के पुत्र वनराज को श्रीचन्द्रा के सौन्दर्य का वर्णन सुनकर उसके प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ। पूर्वभव में वनराज ही सुवर्णतेज था, जो अनुपमा को प्राप्त नहीं कर सका था। उसी पुराने मोह के कारण उसने अपने मित्रों को भेजकर श्रीचन्द्रा का अपहरण करा लिया। श्रीचन्द्रा ने संकट की स्थिति में अपने जिनालय के दर्शन किए बिना भोजन न करने की प्रतिज्ञा कर ली।
वनराज द्वारा श्रीचन्द्रा को प्राप्त करने का प्रयास —श्लोक 493 से 501
वनराज के मित्रों ने युद्ध में श्रीचन्द्रा के भाइयों को पराजित कर उसे वनराज के पास पहुँचा दिया। वनराज ने अपनी दूतियों को भेजकर श्रीचन्द्रा को अपने प्रति आकर्षित करने का प्रयास किया। दूतियों ने उसे श्रृंगार, भोग-विलास और वनराज के वैभव का प्रलोभन दिया तथा मनुष्य-जन्म को भोगों से सार्थक करने की सलाह दी। परन्तु श्रीचन्द्रा अपने संकल्प और जिनभक्ति से विचलित नहीं हुई। वह वनराज के प्रति तनिक भी अनुरक्त नहीं हुई।
जीवन्धर कुमार द्वारा हिंसा और युद्ध का निवारण , चारण मुनिराज को आहारदान — श्लोक 502 से 512
हरिविक्रम ने श्रीचन्द्रा की मानसिक स्थिति समझकर उसे अपनी पुत्रियों के संरक्षण में रख दिया। दूसरी ओर दृढ़मित्र आदि ने सेना एकत्र करके वनराज के नगर को घेर लिया। युद्ध की संभावना देखकर जीवन्धर कुमार ने विचार किया कि युद्ध से अनेक जीवों की हिंसा होगी, इसलिए इसका कोई लाभ नहीं है। उन्होंने सुदर्शन यक्ष का स्मरण किया। यक्ष ने बिना किसी हिंसा के श्रीचन्द्रा को जीवन्धर कुमार के पास पहुँचा दिया और इस प्रकार युद्ध टल गया। वनराज ने फिर भी युद्ध की इच्छा नहीं छोड़ी, इसलिए यक्ष ने उसे पकड़कर जीवन्धर कुमार को सौंप दिया। जीवन्धर कुमार ने उसे बंदी बनाया और अपनी सेना के साथ सेनारम्य सरोवर के किनारे ठहर गए।
सेनारम्य सरोवर के किनारे जीवन्धर कुमार को एक चारण मुनिराज के दर्शन हुए। उन्होंने श्रद्धापूर्वक मुनिराज का स्वागत किया, नमस्कार किया और भक्तिभाव से उन्हें योग्य आहार प्रदान किया। इस उत्तम आहारदान से जीवन्धर कुमार ने महान पुण्य अर्जित किया और उसके प्रभाव से उन्हें पाँच आश्चर्य प्राप्त हुए।
वनराज का पूर्वभव-स्मरण और कर्म-संबंध — श्लोक 513 से 524
चारण मुनिराज को आहारदान के पुण्यफल से वनराज को अपने पूर्वजन्मों का स्मरण हो गया। उसने बताया कि वह पूर्वभव में सुवर्णतेज था, फिर बिलाव बना और उस समय श्रीचन्द्रा के जीव को कबूतरी के रूप में मारने का प्रयास किया था। बाद में मुनिराज के उपदेश से उसके वैरभाव का नाश हुआ और वह वनराज के रूप में उत्पन्न हुआ। पूर्वभव के स्नेह के कारण ही उसने श्रीचन्द्रा का हरण किया था। यह सुनकर सभी ने उसके प्रति वैरभाव छोड़ दिया और उसे तथा उसके पिता हरिविक्रम को बंधनमुक्त कर दिया। बाद में श्रीचन्द्रा का विवाह नन्दाढ्य से कर दिया गया। मार्ग में मधुमक्खियों द्वारा परिवार के लोगों को परेशान किए जाने की घटना से जीवन्धर कुमार को किसी गहरे कारण का संदेह हुआ और उन्होंने यक्ष का स्मरण किया।
विद्याधर द्वारा पूर्वभव का रहस्योद्घाटन — श्लोक 525 से 542
यक्ष ने सरोवर के रक्षक विद्याधर को जीवन्धर कुमार के सामने उपस्थित किया। उसने बताया कि पूर्वभव में वह जातिभट नामक व्यक्ति था और जीवन्धर कुमार के पूर्वभव के संबंध में मुनिराज से सुनकर उनके दर्शन की इच्छा से इस सरोवर की रक्षा करता था। उसने जीवन्धर कुमार के पूर्वभव का वर्णन करते हुए बताया कि वे जयद्रथ नामक राजकुमार थे। एक बार उन्होंने कौतूहलवश हंस के बच्चे को उसके माता-पिता से अलग कर दिया और उनके सेवक ने हंस के पिता को मार दिया। माता की फटकार से जयद्रथ को अपने कार्य पर पश्चात्ताप हुआ और उसने हंस के बच्चे को उसकी माता से मिला दिया। इस कर्म के कारण वर्तमान जीवन में उन्हें लंबे समय तक अपने परिवार से वियोग सहना पड़ा। बाद में जयद्रथ को वैराग्य हुआ, उन्होंने राज्य त्यागकर तप धारण किया और पुण्य के फल से स्वर्ग प्राप्त किया। इस रहस्य को जानकर जीवन्धर कुमार ने विद्याधर का सम्मान किया।
मित्रों का जीवन्धर कुमार की खोज में प्रस्थान — श्लोक 543 से 552
जयद्रथ ने तप के प्रभाव से स्वर्ग में दीर्घकाल तक सुख भोगा और बाद में पुण्य-पाप के उदय से वर्तमान जन्म प्राप्त किया। जीवन्धर कुमार अपने परिवार और प्रियजनों के साथ हेमाभ नगर लौटकर सुखपूर्वक रहने लगे। दूसरी ओर नन्दाढ्य के राजपुर से चले जाने के बाद उसके मित्रों ने गन्धर्वदत्ता से दोनों भाइयों का समाचार पूछा। गन्धर्वदत्ता ने उन्हें बताया कि दोनों भाई सुजन देश के हेमाभ नगर में सुखपूर्वक रह रहे हैं। यह सुनकर मित्रों को उनसे मिलने की इच्छा हुई और वे अपने संबंधियों से विदा लेकर उनकी खोज में निकल पड़े।
दण्डक वन में विजया से भेंट — श्लोक 553 से 571
जीवन्धर कुमार के मित्र यात्रा करते हुए दण्डक वन पहुँचे और तपस्वियों के आश्रम में विश्राम किया। वहाँ उनकी भेंट महादेवी विजया से हुई। उनका परिचय सुनकर विजया को अनुभव हुआ कि ये सभी उसके पुत्र जीवन्धर कुमार के परिवार से संबंधित हैं। उसने उनसे अनुरोध किया कि वे जीवन्धर कुमार को भी वहाँ लेकर आएँ। आगे मार्ग में मित्रों का भीलों से संघर्ष हुआ और उन्होंने अपने पराक्रम से उन्हें पराजित किया। बाद में वे हेमाभ नगर पहुँचे, जहाँ कुछ भीलों द्वारा सेठों को लूटा जा रहा था। उन्होंने इसकी सूचना जीवन्धर कुमार को दी। जीवन्धर कुमार ने भीलों को पराजित कर लूटा हुआ धन सेठों को वापस दिलाया। मित्रों द्वारा छोड़े गए बाणों को देखकर उन्होंने उन्हें पहचान लिया और सभी मित्रों का पुनर्मिलन हुआ। इसके बाद वे सब जीवन्धर कुमार को साथ लेकर लौटे और दण्डक वन में विजया से उनका मिलन हुआ। पुत्र को देखकर विजया का वर्षों का दुःख दूर हो गया और उसने प्रेमपूर्वक उसे आशीर्वाद दिया।
माता विजया द्वारा प्रतिशोध की प्रेरणा — श्लोक 572 से 583
जीवन्धर कुमार और विजया के मिलन के समय सुदर्शन यक्ष भी वहाँ पहुँचा और जैनधर्म के वात्सल्य से सभी का आदर-सत्कार किया। उसने मधुर और तत्त्वपूर्ण वचनों द्वारा माता-पुत्र के दुःख को दूर किया। इसके बाद विजया ने जीवन्धर कुमार को बताया कि उसके पिता सत्यन्धर की हत्या करके काष्ठाङ्गारिक ने राजसिंहासन प्राप्त किया है, इसलिए वह उनका शत्रु है। उसने पुत्र को पिता का राज्य पुनः प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। जीवन्धर कुमार ने क्रोध को नियंत्रित करते हुए विचार किया कि उचित समय और साधनों के बिना किया गया पराक्रम सफल नहीं होता। इसलिए उन्होंने तत्काल प्रतिशोध न लेकर उचित समय की प्रतीक्षा करने का निश्चय किया। उन्होंने विजया को आश्वासन दिया कि समय आने पर नन्दाढ्य को सेनापति बनाकर सेना भेजेंगे और स्वयं राजपुर की ओर चले गए।
जीवन्धर कुमार का गुप्त रूप से राजपुर प्रवेश — श्लोक 584 से 602
जीवन्धर कुमार ने अपने सेवकों को अलग-अलग मार्ग से नगर में भेजकर अपने आगमन को गुप्त रखा और विद्यामयी अंगूठी के प्रभाव से वैश्य का रूप धारण कर राजपुर में प्रवेश किया। वे सागरदत्त सेठ की दुकान पर बैठ गए। उनके वहाँ बैठने से सेठ को अनेक रत्न और दुर्लभ वस्तुएँ प्राप्त होने लगीं। सेठ ने उन्हें विशेष पुरुष मानकर अपनी पुत्री विमला का विवाह उनसे कर दिया। विवाह के बाद जीवन्धर कुमार ने कुछ समय वहाँ रहकर परिव्राजक का रूप धारण किया और काष्ठाङ्गारिक की सभा में पहुँचे। उन्होंने राजा से भोजन माँगा और भोजन करके वहाँ से चले गए। बाद में उन्होंने वशीकरण चूर्ण, अंजन आदि औषधियों का प्रचार किया। लोगों ने उनके वृद्ध रूप को देखकर उनका उपहास किया और गुणमाला को वश में करने की चुनौती दी। उन्होंने चुनौती स्वीकार की और गुणमाला के घर पहुँच गए।
गुणमाला के सामने वृद्ध ब्राह्मण का रहस्य — श्लोक 603 से 613
गुणमाला ने वृद्ध ब्राह्मण का उचित सत्कार किया और उससे उसके आने-जाने का उद्देश्य पूछा। उसके उत्तरों पर उपस्थित लोग हँसने लगे, लेकिन ब्राह्मण ने वृद्धावस्था की स्वाभाविकता बताते हुए उन्हें उचित उत्तर दिया। गुणमाला ने उसका सम्मान करते हुए उसे भोजन कराया और जाने के लिए कहा। ब्राह्मण ने जाने के बजाय उसकी शय्या पर बैठने का प्रयास किया, जिससे दासियाँ उसे हटाने लगीं। तब गुणमाला ने उसकी बातों और व्यवहार पर ध्यान देकर समझ लिया कि यह कोई साधारण वृद्ध ब्राह्मण नहीं, बल्कि रूप बदलकर आया हुआ कोई अन्य पुरुष है। उसने दासियों को रोक दिया और अतिथि का सम्मान करते हुए उसे शय्या पर बैठने की अनुमति दे दी।
जीवन्धर कुमार का संगीत और इन्द्रिय-विषयों का विवेचन —श्लोक 614 से 624
रात्रि में वृद्ध ब्राह्मण ने शुद्ध एवं देशज स्वरों से अत्यन्त मधुर गीत गाए। उसके संगीत को सुनकर गुणमाला को वही आनंद हुआ जो पहले जीवन्धर कुमार के गीत सुनकर हुआ था। प्रातः उसने विनयपूर्वक ब्राह्मण से उसके शास्त्रज्ञान के विषय में पूछा। उसने धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और कामशास्त्र के अध्ययन की बात कही और पाँच इन्द्रियों तथा उनके विषयों का विवेचन किया। स्पर्श, रस, गंध, रूप और शब्द—इन पाँच इन्द्रिय-विषयों के विभिन्न भेद बताए गए। प्रत्येक विषय के इष्ट और अनिष्ट भेदों को मिलाकर कुल छप्पन इन्द्रिय-विषयों का वर्णन किया गया।
श्लोक 625 से 631 : गुणमाला को उपदेश एवं वास्तविक रूप का प्रकटन
पुण्य के प्रभाव से ही इष्ट विषयों की प्राप्ति होती है और निषिद्ध विषयों का त्याग ही सच्चा धर्म है। ब्राह्मण रूपधारी जीवन्धर कुमार गुणमाला को विषयों के दोषों से अवगत कराते हैं, जिससे प्रभावित होकर गुणमाला उनकी शिष्या बन जाती है। तत्पश्चात, वन में एकान्त के समय ब्राह्मण अपना वास्तविक जीवन्धर रूप प्रकट करता है और प्राचीन कथाओं के माध्यम से गुणमाला का संशय दूर कर उसमें विश्वास उत्पन्न करता है।
श्लोक 632 से 643 : गुणमाला से विवाह एवं मन्त्रियों द्वारा काष्ठाङ्गारिक का निवारण
जीवन्धर कुमार के वास्तविक परिचय एवं आगमन का समाचार पाकर गुणमाला के माता-पिता विधि-पूर्वक उनका विवाह संपन्न कराते हैं। इसके बाद जीवन्धर कुमार गजराज पर सवार होकर चतुरंगिणी सेना के साथ गन्धोत्कट के भवन में प्रवेश करते हैं। इस अभ्युदय से क्रोधित काष्ठाङ्गारिक को उसके बुद्धिमान मन्त्री समझाते हैं कि जीवन्धर महान, पुण्यात्मा और अजेय हैं, अतः उनसे बैर करना विनाशकारी होगा।
श्लोक 644 से 651 : रत्नवती का स्वयंवर एवं चन्द्रक-यन्त्र वेध
विदेह नगर के राजा गोपेन्द्र की पुत्री रत्नवती की प्रतिज्ञा के अनुसार चन्द्रक-यन्त्र का वेध करने वाले से ही उसका विवाह होना निश्चित होता है। स्वयंवर में अनेक राजाओं के असफल होने के पश्चात, जीवन्धर कुमार सिद्ध परमेष्ठी तथा अपने गुरु को प्रणाम कर चक्र पर आरूढ़ होते हैं और सुगमता से यन्त्र का वेध कर सिंहनाद करते हैं।
श्लोक 652 से 663 : स्वयंवर की सफलता एवं सामन्तों को सन्देश
रत्नवती जीवन्धर कुमार के गले में वरमाला पहनाती है, जिससे सज्जन पुरुष प्रसन्न होते हैं। काष्ठाङ्गारिक और उसके दुष्ट सहयोगी ईर्ष्यावश युद्ध द्वारा कन्या के अपहरण का प्रयास करते हैं। यह देखकर जीवन्धर कुमार अपने पिता सत्यन्धर के सामन्तों के पास दूत भेजकर काष्ठाङ्गारिक के छल-कपट और राजा की हत्या का स्मरण कराते हुए उस कृतघ्न के विनाश का आह्वान करते हैं।
श्लोक 664 से 671 : युद्ध में काष्ठाङ्गारिक का वध एवं राज्याभिषेक
सत्यन्धर के निष्ठावान सामन्त जीवन्धर कुमार से आ मिलते हैं। भीषण युद्ध में जीवन्धर कुमार विजयगिरि हाथी पर सवार होकर अशनिवेग हाथी पर आरूढ़ शत्रु काष्ठाङ्गारिक को मार गिराते हैं और उसकी भयभीत सेना को अभयदान देते हैं। तत्पश्चात जिनेन्द्र पूजन एवं मांगलिक विधानों के बीच जीवन्धर कुमार का राज्याभिषेक संपन्न होता है तथा गन्धर्वदत्ता को महारानी का पट्टबंध बाँधा जाता है।
श्लोक 672 से 682 : माता विजया से मिलाप एवं सर्व-त्याग पूर्वक दीक्षा
नंदाढ्य आदि भाई माता विजया और अन्य रानियों को ले आते हैं, जिसके बाद जीवन्धर महाराज न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए धर्म ध्यान में समय व्यतीत करते हैं। सुरमलय उद्यान में मुनिराज से तत्त्वज्ञान प्राप्त करने तथा अशोक वन में बंदरों के युद्ध को देखकर उत्पन्न विरक्ति के पश्चात, वे अपने पुत्र वसुन्धर को राज्य सौंपकर महावीर भगवान के समीप समस्त परिग्रह का त्याग कर मुनि दीक्षा धारण कर लेते हैं।
श्लोक 683 से 691: रानियों की दीक्षा, जीवन्धर स्वामी का मोक्ष-योग एवं कर्म-विपाक
गन्धर्वदत्ता आदि आठों रानियाँ माता विजया के साथ चन्दना आर्यिका के समीप संयम धारण करती हैं। सुधर्माचार्य राजा श्रेणिक को बताते हैं कि श्रुतकेवली जीवन्धर मुनि आगे चलकर विपुलाचल पर्वत से मोक्ष प्राप्त करेंगे। अंत में यह सन्देश दिया गया है कि पूर्वभव में हंस के बच्चे को माता-पिता से अलग करने के पाप के कारण ही जीवन्धर को अपने परिवार से वियोग सहना पड़ा था, अतः जीवों को पाप कर्मों से सदा दूर रहना चाहिए।
पर्व 74 – श्लोक 486 से 502 | श्लोक 503 से 513 | श्लोक 514 से 521 | श्लोक 522 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 549
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 1 to 12
श्लोक ( Shlok ) 1 – 2
अथान्येद्युः समासीनं गणेन्द्रं विपुलाचले । श्रेणिकः प्रीणिताशेषभव्यं सुव्यक्ततेजसम् ॥ १ ॥गणिन्याश्चन्दनार्यायाः सम्बन्धमिह जन्मनः । अन्वयुक्त गणी चैवमाहाहितमहर्दिकः ॥ २ ॥
अथानन्तर- किसी दूसरे दिन समस्त भव्य जीवोंको प्रसन्न करनेवाले और प्रकट तेजके धारक गौतम गणधर विपुलाचंल पर विराजमान थे। उनके समीप जाकर राजा श्रेणिकने समस्त आर्यिकाओंकी स्वामिनी चन्दना नामकी आर्यिकाकी इस जन्मसम्बन्धी कथा पूछी सो अनेक बड़ी बड़ी ऋद्धियोंको धारण करने वाले गणधर देव इस प्रकार कहने लगे ॥ १-२ ।।
Thereafter, on another day, Gautama Gandhara—who delights all noble, liberated souls (bhavya jivas) and possesses manifest splendor—was seated on Mount Vipulachal. King Shrenika approached him and inquired about the present-life story of the Aryika named Chandana, who was the leader of all the female ascetics (aryikas).
Thereupon, the Gandhara Deva, endowed with numerous great supernatural powers (riddhis), began to speak as follows.1 – 2
श्लोक ( Shlok ) 3 – 5
सिन्ध्वाख्यविषये भूभृद्वैशाली नगरेऽभवत् । चेटकाख्योऽतिविख्यातो विनीतः परमाईतः ॥ ३ ॥तस्य देवी सुभद्राख्या तयोः पुत्रा दशाभवन् । धनाख्यौ दशभङ्गान्तावुपेन्द्रोऽन्यः सुदशवाक् ॥ ४॥सिंहभद्रः सुकम्भोजोऽकम्पनः सपतङ्गकः । प्रभञ्जनः प्रभासश्च धर्मा इव सुनिर्मलाः ॥ ५ ॥
सिन्धु नामक देशकी वैशाली नगरीमें चेटक नामका अतिशय प्रसिद्ध, विनीत और जिनेन्द्र देवका अतिशय भक्त राजा था। उसकी रानीका नाम सुभद्रा था। उन दोनोंके दश पुत्र हुए जो कि धनदत्त, धनभद्र, उपेन्द्र, सुदत्त, सिंहभद्र, सुकुम्भोज, अकम्पन, पतङ्गक, प्रभञ्जन और प्रभास नामसे प्रसिद्ध थे तथा उत्तम क्षमा आदि दश धर्मोंके समान जान पड़ते थे ।। ३-५ ।।
In the city of Vaishali within the country named Sindhu, there ruled a highly renowned, humble king named Chetak, who was a devout devotee of Jinendra Deva. His queen was named Subhadra.
To them were born ten sons—celebrated by the names Dhanadatta, Dhanabhadra, Upendra, Sudatta, Singhabhadra, Sukumbhoja, Akampana, Patangaka, Prabhanjana, and Prabhasa—who appeared personified like the ten virtues of supreme forgiveness (Uttam Kshama) and the rest.3 – 5
श्लोक ( Shlok ) 6 – 8
सप्तर्धयो वा पुष्यश्च ज्यायसी प्रियकारिणी । ततो मृगावती पश्चात्सुप्रभा च प्रभावती ॥६ ॥ चेलिनी पञ्चमी ज्येष्ठा षष्ठी चान्त्या च चन्दना । विदेहविषये कुण्डसम्शायां पुरि भूपतिः ॥ ७ ॥नाथो नाथकुलस्यैकः सिद्धार्थाख्यस्त्विसिद्धिभाक् । तस्य पुण्यानुभावेन ‘प्रियासीत्प्रियकारिणी ॥ ८ ॥
इन पुत्रोंके सिवाय सात ऋद्धियोंके समान सात पुत्रियां भी थीं। जिनमें सबसे बड़ी प्रियकारिणी थी, उससे छोटी मृगावती, उससे छोटी, सुप्रभा, उससे छोटी प्रभावती, उससे छोटी चेलिनी, उससे छोटी ज्येष्ठा और सबसे छोटी चन्दना थी। विदेह देशके कुण्डनगर में नाथ वंशके शिरोमणि एवं तीनों सिद्धियोंसे सम्पन्न राजा सिद्धार्थ राज्य करते थे। पुण्यके प्रभाव से प्रियकारिणी उन्हीं की स्त्री हुई थी ।। ६-८ ॥
In addition to these sons, they also had seven daughters who were like the personification of the seven supernatural powers (riddhis). Among them, the eldest was Priyakarini; younger to her was Mrigavati; younger still was Suprabha; below her was Prabhavati; younger to her was Chelini; younger still was Jyeshtha; and the youngest of all was Chandana.
Meanwhile, in Kundanagar of the Videha country, King Siddhartha—the crest-jewel of the Natha dynasty and endowed with the three regal achievements (siddhis)—held sway. By the influence of meritorious past deeds (punya), Priyakarini became his queen.6 – 8
श्लोक ( Shlok ) 9
विषये वत्सवासाख्ये कौशाम्बीनगराधिपः । सोमवंशे शतानीको देव्यस्यासीन्मृगावती ॥ ९ ॥
वत्सदेशकी कौशाम्बी नगरी में चन्द्रवंशी राजा शतानीक रहते थे। मृगावती नामकी दूसरी पुत्री उनकी स्त्री हुई थी। ॥ ९॥
In the city of Kaushambi of the Vatsa country lived King Shataneeka, who belonged to the Lunar dynasty (Chandravanshi). Mrigavati, the second daughter, became his queen.
श्लोक ( Shlok ) 10 – 12
दशार्णविषये राजा हेमकच्छपुराधिपः । सूर्यवंशाम्बरे राजसमो दशरथोऽभवत् ॥ १० ॥तस्याभूत्सुप्रभा देवी भास्वतो वा प्रभामला । कच्छाण्यविषये रोरुकाख्यायां पुरि भूपतिः ॥ ११ ॥महानुदयनस्तस्य प्रेमदाऽभूत्प्रभावती । प्राप शीलवतीख्यातिं सा सम्यक्छीलधारणात् ॥ १२ ॥
दशार्ण देशके हेमकच्छ नामक नगरके स्वामी राजा दशरथ थे जो कि सूर्यवंश रूपी आकाशके चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे। सूर्यकी निर्मलप्रभाके समान सुमना नामकी तीसरी पुत्री उनकी रानी हुई थी, कच्छदेशकी रोरुका नामक नगरीमें उदयन नामका एक बड़ा राजा था। प्रभावती नामकी चौथी पुत्री उसीकी हृदयवल्लभा हुई थी। अच्छी तरह शीलव्रत धारण करनेसे इसका दूसरा नाम शीलवती भी प्रसिद्ध हो गया था ।। १०-१२ ।।
In the country of Dasharna, the lord of the city named Hemakachha was King Dasharatha, who appeared like the moon in the sky of the Solar dynasty (Suryavansha). Suprabha (here mentioned as Sumana), the third daughter, who was like the pure radiance of the sun, became his queen.
Furthermore, in the city of Roruka in the Kachha country, there was a great king named Udayana. Prabhavati, the fourth daughter, became the beloved of his heart. On account of her flawless observance of the vows of chastity (sheela-vrata), she also became widely renowned by her second name, Sheelavati. 10 – 12
श्लोक 13 से 25
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475 | श्लोक 476 से 485 | श्लोक 486 से 502 | श्लोक 503 से 513 | श्लोक 514 से 521 | श्लोक 522 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 549
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