शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 382 से 393 | श्लोक 394 से 404 | श्लोक 405 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 431
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 432 to 441
श्लोक ( Shlok ) 432
वाहू बहुतरं तस्य भातः स्माजानुलम्बिनौ । धात्री सन्धर्तुकामौ वा केयूरादिविभूषणौ ॥ ४३२ ।।
घुटनों तक लम्बी एवं केयूर आदि आभूषणोंसे विभूषित उनकी दोनों भुजाएँ बहुत ही अधिक सुशोभित हो रही थीं और ऐसी जान पड़ती थीं मानो पृथिवीको उठाना ही चाहती हों ॥ ४३२ ।।
“Adorned with ornaments like armlets (Keyura), His two arms, reaching down to His knees, looked exceedingly beautiful, appearing as if they were eager to lift the entire Earth.”432
श्लोक ( Shlok ) 433
व्यधायि वेधसा तस्य विस्तीर्ण वक्षसः स्थलम् । असम्बाधं वसन्त्वस्मिन्निति वा बहवः श्रियः ॥४३३॥
बहुत-सी लक्ष्मियाँएक दूसरेकी बाधाके विना ही इसमें निवास कर सकें यह सोचकर ही मानो विधाताने उनका वक्षः-स्थल बहुत चौड़ा बनाया था ।। ४३३ ॥
“It was as if the Creator had made His chest so broad thinking that numerous Goddesses of Fortune (Lakshmis) could reside therein simultaneously, without causing any obstruction to one another.”433
श्लोक ( Shlok ) 434
व्याप्तमध्यमणिच्छायाहारं वक्षो व्यधात्तराम् । मध्यीकृतार्कसन्ध्यात्र हेमाद्रितटसन्निभम् ॥ ४३४ ॥
जिसके मध्यमें मणियोंकी कान्तिसे सुशोभित हार पड़ा हुआ है ऐसा उनका वक्षःस्थल, जिसके मध्यमें संध्याके लाल लाल बादल पड़ रहे हैं ऐसे हिमाचलके तटके समान जान पड़ता था ।। ४३४ ॥
“His chest, adorned with a necklace that gleamed with the radiance of precious gems, resembled the slopes of the Himalayas covered by the crimson clouds of twilight.”434
श्लोक ( Shlok ) 435
तन्मध्यं मुष्टिसम्मायि बिभर्त्यर्ध्वतनोर्भरम् । गुरुं निराकुलं तस्य तानवं तेन शोभते ॥ ४३५ ॥
मुट्ठी में समानेके योग्य उनका मध्यभाग चूंकि उपरिवर्ती शरीरके बहुत भारी बोझको बिना किसी आकुलताके धारण करता था अतः उसका पतलापन ठीक ही शोभा देता था ।। ४३५ ॥
“His waist was so slender that it could be grasped within a single fist. Yet, because it bore the heavy weight of His upper body without the slightest strain, its slimness was truly a mark of exquisite beauty.”435
श्लोक ( Shlok ) 436
गम्भीरा दक्षिणावर्ता तस्याभ्युदयसूचिनी । नाभिः सपद्मा मध्यस्था स्यात्पदं न स्तुतेः कुतः ॥४३६॥
उनकी नाभि चूँकि गम्भीर थी, दक्षिणावर्तसे सहित थी। अभ्युदय, को सूचित करने वाली थी, पद्मचिह्नसे सहित थी और मध्यस्थ थी अतः स्तुतिका स्थान – प्रशंसा-का पात्र क्यों नहीं होती ? अवश्य होती ॥ ४३६ ।।
“Since His navel was deep, turned toward the right (dakshinavarta), indicative of great prosperity, marked with the sign of a lotus, and perfectly centered, why should it not be worthy of praise? It most certainly was.”436
श्लोक ( Shlok ) 437
कटीतटी कटीसूत्रधारिणी हारिणी भृशम् । सवेदिकास्थली वास्य जम्बूद्वीपस्य भासते ॥ ४३७ ॥
करधनीको धारण करनेवाली उनकी सुन्दर कमर बहुत ही अधिक सुशोभित होती थी और जम्बूद्वीपकी वेदीसहित जगतीके समान जान पड़ती थी ॥ ४३७ ॥
“His beautiful waist, adorned with a waistband (karadhani), looked exceedingly splendid, resembling the boundary wall of Jambudvipa along with its sacrificial altar.”437
श्लोक ( Shlok ) 438
वृते लक्ष्णे सुखस्पर्शे स्तां रम्भास्तम्भसन्निभे । किन्त्वस्योरू सदादत्तफले गुरुभरक्षमे ॥ ४३८ ॥
उनके ऊरु केलेके स्तम्भके समान गोल, चिकने तथा स्पर्श करने पर सुख देने वाले थे अन्तर केवल इतना था कि केलेके स्तम्भ एक बार फल देते हैं परन्तु वे बारबार फल देते थे -और केलेके स्तम्भ बोझ धारण करनेमें समर्थ नहीं हैं परन्तु वे बहुत भारी बोझ धारण करनेमें समर्थ थे ॥ ४३८ ।।
“His thighs were as round, smooth, and pleasant to the touch as banana trunks. The only difference was that banana trunks bear fruit only once, whereas His thighs bore fruit repeatedly; furthermore, banana trunks are incapable of supporting heavy weight, but His thighs were perfectly capable of bearing an immense burden.”438
श्लोक ( Shlok ) 439
मर्यादाकारि यत्तस्मात्तदेतस्योरुजङ्ख्योः । शस्यं जानुद्वयं सद्भिः सत्क्रियं किन्न शस्यते ॥ ४३९ ॥
चूंकि उनके घुटनोंने ऊरु और जंघा दोनोंके बीच मर्यादा कर दी थी- दोनोंकी सीमा बांध दी थी इसलिए वे सत्पुरुषोंके द्वारा प्रशंसनीय थे सो ठीक ही है क्योंकि जो अच्छा कार्य करता है उसकी प्रशंसा क्यों नहीं की जावे ? अवश्य की जावे ॥ ४३९ ॥
“Since His knees established a perfect boundary and balance between His thighs and shanks, they were highly praised by virtuous men. And rightly so—for why should anyone who performs an excellent duty not be praised? They most certainly must be.”439
श्लोक ( Shlok ) 440
नमिताशेषदेवेन्द्रौ पादपद्मौ श्रिया श्रितौ । तयोरुपरि चेज्जते तस्य का वर्णना परा ॥ ४४० ॥
उनके चरणकमल समस्त इन्द्रोंको नमस्कार कराते थे तथा लक्ष्मी उनकी सेवा करती थी। जब उनके चरणकमलोंका यह हाल था तब जङ्घाएँ तो उनके ऊपर थीं इसलिए उनका और वर्णन क्या किया जाय ? ॥ ४४० ॥
“His feet, which were like lotuses, compelled all the Lords of Heaven (Indras) to bow down before them, and the Goddess of Fortune (Lakshmi) herself served them. Since such was the glory of His lotus-feet, His shanks stood even above them—what more, then, can be said in their praise?”440
श्लोक ( Shlok ) 441
गुल्फयोरिव मन्त्रस्य गूढतेव गुणोऽभवत् । फलदा सा ततः सर्वं फलकृत्वाद् गुणि स्मृतम् ॥ ४४१ ॥
जिस प्रकार मन्त्रमें गूढ़ता गुण रहता है उसी प्रकार उनके दोनों गुल्फों– एड़ीके ऊपरकी गांठोंमें गूढता गुण रहता था परन्तु उनकी यह गुणता फल देने वाली थी सो ठीक ही है क्योंकि सभी पदार्थ फलदायी होनेसे ही गुणी कहलाते हैं ।॥ ४४१ ॥
“Just as a sacred mantra possesses the quality of secrecy (gudhata), His two ankles (gulfas) also possessed the quality of being hidden or well-concealed (gudhata). However, this hidden quality of His was highly rewarding—which is only fitting, since all things are truly considered meritorious (guni) only when they yield fruitful results.”) 441
श्लोक 442 से 451
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