Hindi Translation of Uttar puran Parv 72
श्लोक 1 से 22 : अग्निभूति-वायुभूति का सम्यक्त्व ग्रहण
अथानन्तर- तीनों जगत्की सभाभूमि अर्थात् समवसरणमें अपने पूर्वभव जानकर बुद्धिमान् बलदेवने सबको प्रकट करनेके लिए प्रद्युम्नकी उत्पत्तिका सम्बन्ध पूछा सो वरदत्त गणधर अनुग्रहकी बुद्धिसे इस प्रकार कहने लगे ॥ १-२ ॥ इसी जम्बूद्वीपके मगधदेश सम्बन्धी शालिग्राम में रहनेवाले सोमदेव ब्राह्मणकी एक अग्निला नामकी स्त्री थी ॥ ३ ॥ उन दोनोंके अग्निभूति और वायुभूति नामके दो पुत्र थे, किसी एक दिन वे दोनों पुत्र नन्दिवर्धन नामके दूसरे सुन्दर गाँवमें गये । वहाँ उन्होंने नन्दिघोष नामके वनमें, मुनि संघके आभूषणस्वरूप नन्दिद्वर्धन नामक मुनिराजके दर्शन किये ।। ४-५ ॥ उन दोनों दुष्टोंको आया हुआ देख, मुनिराजने संघके अन्य मुनियोंसे कहा कि ‘ये दोनों मिध्यात्वसे दूषित हैं और विसंवाद करनेके लिए आये हैं अतः आप लोगोंमेंसे कोई भी इनके साथ बातचीत न करें। अन्यथा इस निमित्तसे भारी उपसर्ग होगा’ ।॥ ६-७ ॥ शासन करने-बाले गुरुके इस प्रकारके वचन सुनकर सब मुनि उस समय मौन लेकर बैठ गये ॥ ८ ॥ वे दोनों ब्राह्मण सब मुनियोंको मौनी देखकर उनकी हँसी करते हुए अपने गाँवको जा रहे थे कि उन मुनियों-मेंसे एक सत्यक नाम के मुनि आहार करनेके लिए दूसरे गाँवमें गये थे और लौटकर उस समय आ रहे थे। अहंकारसे प्रेरित हुए दोनों ब्राह्मण उन सत्यक मुनिको देख उनके पास जा पहुँचे और कहने लगे कि ‘अरे नंगे ! न तो कोई आप्त है, न आगम है, और न कोई पदार्थ ही है फिर क्यों मूर्ख बनकर प्रत्यक्षको नष्ट करनेवाले इस उन्मार्गमें व्यर्थ ही क्लेश उठा रहा है’। इस प्रकार उन दोनोंने उक्त मुनिका बहुत ही तिरस्कार किया। मुनिने भी, जिनेन्द्र भगवान के मुखकमलसे निकले विवक्षित तथा अविवक्षित रूपसे अनेक धर्मोंका निरूपण करनेवाले, एवं प्रत्यक्ष सिद्ध द्रव्य तत्त्वका हेतु सहित कथन करनेवाले अतिशय उत्कृष्ट स्याद्वादका अवलम्बन लेकर उसका उपदेश देनेवाले आप्तकी प्रामाणिकता सिद्ध कर दिखाई तथा परोक्ष तत्त्वके विषयमें भी उन्हीं आप्तके द्वारा कथित आगमकी समीचीन स्थितिका निरूपण कर उन दुष्ट ब्राह्मणोंकी वाद करनेकी खुजली दूर की एवं विद्वज्जनोंकेद्वारा समर्पण की हुई उनकी विजय-पताका छीन ली। मान भंग होनेसे जिन्हें क्रोध उत्पन्न हुआ है ऐसे दोनों ही पापी ब्राह्मण’ तीक्ष्ण शस्त्र लेकर दूसरे दिन रात्रिके समय निकले। उस समय शुद्ध चित्तके धारक वही सत्यक मुनि, एकान्त स्थानमें प्रतिमा योग धारण कर विराजमान थे सो वे पापी ब्राह्मण उन्हें शस्त्रसे मारनेके लिए उद्यत हो गये। यह देखकर और यह अन्याय हो रहा है ऐसा विचारकर सुवर्णयाने क्रोधमें आकर उन दोनों ब्राह्मणोंको कीलित हुएके समान स्तम्भित कर दिया -ज्योंका त्यों रोक दिया।।९-१७।। यह देखकर उनके माता, पिता, भाई आदि सब व्याकुल होकर मुनियोंकी शरणमें आये । तब बुद्धिमान् यक्षने कहा कि ‘यदि तुम लोग हिंसाधर्मको छोड़कर जैनधर्म स्वीकृत करोगे तो इन दोनोंका छुटकारा हो सकता है’ ।। १८-१९ ।। यक्षकी बात सुनकर सब डर गये और कहने लगे कि हम लोग शीघ्र ही ऐसा करेंगे अर्थात् जैनधर्म धारण करेंगे। इतना कहकर उन लोगोंने मुनिराजकी प्रदक्षिणा दी, उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम किया और झूठमूठ ही श्रावक धर्म स्वीकृत कर लिया । तदनन्तर दोनों पुत्र जब कीलित होनेसे छूट आये तब उनके माता-पिता आदिने उनसे कहा कि अब यह धर्म छोड़ देना चाहिये क्योंकि कारण वश ही इसे धारण कर लिया था। उन पुत्रोंकी काललब्धि अनुकूल थी अतः वे अपने द्वारा ग्रहण किये हुए सन्मार्गसे विचलित नहीं हुए ॥ २०-२२ ।।
श्लोक 23 से 34 : माता-पिता की दुर्गति और पुत्रों की आध्यात्मिक उन्नति
पुत्रोंकी यह प्रवृत्ति देख, उनके माता-पिता आदि उनसे क्रोध करने लगे और मरकर पापके उदयसे दीर्घकाल तक अनेक कुगतियोंमें भ्रमण करते रहे। उधर उन दोनों ब्राह्मण-पुत्रोंने व्रतसहित जीवन पूरा किया इसलिए मरकर सौधर्म स्वर्गमें पाँच पल्यकी आयुवाले पारिषद जातिके श्रेष्ठ देव हुए ॥ २३-२४ ॥ वहाँ पर उन्होंने अनेक उत्तम सुख भोगे । तदनन्तर इसी जम्बूद्वीपके कोशल देश सम्बन्धी अयोध्या नगरीमें शत्रुओंको जीतनेवाला अरिंजय नामका पराक्रमी राजा राज्य करता था। उसी नगरीमें एक अर्हद्दास नामका सेठ रहता था उसकी स्त्रीका नाम वप्रश्री था। वे अग्निभूति और वायुभूतिक जीव पाँचवें स्वर्गसे चयकर उन्हीं अर्हद्दास और वप्रश्रीके क्रमशः पूर्णभद्र और मणिभद्र नामके पुत्र हुए। किसी एक दिन राजा अरिंजय, सिद्धार्थ नामक वनमें विराजमान महेन्द्र नामक गुरुके समीप गया। वहाँ उसने अनेक लोगोंके साथ धर्मका उपदेश सुना जिससे उसकी बुद्धि अत्यन्त पवित्र हो गई और उसने भार धारण करनेमें समर्थ अरिन्दम नामक पुत्रके ऊपर राज्य भार रखकर अर्हद्दास आदिके साथ संयम धारण कर लिया। उसी समय पूर्णभद्र नामक श्रेष्ठि-पुत्रने पूर्वज मुनिराजसे पूछा कि हमारे पूर्वभवके माता-पिता इस समय कहाँ पर हैं? उत्तरमें मुनिराज कहने लगे कि तेरे पिता सोमदेवने जिनधर्मसे विरुद्ध होकर बहुत पाप किये थे अतः वह मरकर रत्नप्रभा पृथिवीके सर्पावर्त नामके बिलमें नारकी हुआ था और वहाँ से निकलकर अब इसी नगरमें काकजंघ नामका चाण्डाल हुआ है। इसी तरह तेरी माता अनिलाका जीव मरकर उसी चाण्डालके घर कुत्ती हुआ है। मुनिराजके वचन सुनकर पूर्णभद्रने उन दोनों जीवोंको संबोधा जिससे उपशम भावको प्राप्त होकर दोनोंने विधिपूर्वक संन्यास धारण किया और उसके फलस्वरूप काकजङ्घ तो नन्दीश्वर-द्वीपमें कुबेर नामका व्यन्तर देव हुआ। और कुत्ती उसी नगरके स्वामी अरिन्दम नामक राजाकी श्रीमती नामकी रानीसे सुप्रबुद्धा नामकी प्यारी पुत्री हुई ।। २५-३४ ।।
श्लोक 35 से 46: मधु-क्रीडव का जीवन और प्रद्युम्न के जन्म का कारण
जब वह पूर्ण यौवनवती होकर स्वयंवर-मण्डपकी ओर जा रही थी तब उसके पूर्वजन्मके पति कुवेर नामक यक्षने उसे समझाया जिससे उसने प्रियदर्शना नामकी आर्यिकाके पास जाकर दीक्षा धारण कर ली और आयुके अन्तमें वह सौधर्म इन्द्रकी मणिचूला नामकी रूपवती देवी हुई । इधर पूर्णभद्र और उसके छोटे भाई मणिभद्रने बड़ी दृढ़तासे श्रात्रकके व्रत पालन किये, सात क्षेत्रोमें धन खर्च किया और आयुके अन्त में दोनों ही सौधर्म नामक स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए ॥ ३५-३७ ॥ वहाँ उनकी दो सागरकी आयु थी, उसके पूर्ण होने पर वे इसी जम्बूद्वीपके कुरुजांगल देश सम्बन्धी हस्तिनापुर नगरके राजा अर्हद्दा सकी काश्यपा नामकी रानीसे मधु और क्रीडत्र नामके पुत्र हुए। किसी एकदिन राजा अईद्दासने मधुको राज्य और क्रीडवको युवराज पद देकर विमलप्रभ मुनिकी निर्दोष शिष्यता प्राप्त कर ली अर्थात् उनके पास दीक्षा धारण कर ली। किसी समय अमलकण्ठ नगरका राजा कनकरथ (हेमरथ) राजा मधुकी सेवा करनेके लिए उसके नगर आया था वहाँ उसकी कनकमाला नामकी स्त्रीको देखकर राजा मधु कामसे पीड़ित हो गया। निदान उसने कनक्रमालाको स्वीकृत कर लिया – अपनी स्त्री बना लिया । इस घटनासे राजा कनकरथको बहुत निर्वेद हुआ जिससे उसने द्विजटि नामक तापसके पास व्रत ले लिये । इधर मधु और क्रीडवका काल सुखने व्यतीत हो रहा था। किसी एक दिन मधुने विमल-वाहन नामक मुनिराजसे अच्छी तरह धर्मका स्वरूप सुना, अपने दुराचारकी निन्दा की और क्रीडवके साथ-साथ संयम धारण कर लिया। आयुके अन्त में विधिपूर्वक आराधना कर मधु और क्रीडव दोनों ही महाशुक्र स्वर्गमें इन्द्र हुए। आयुके अन्त में वहाँसे च्युत होकर बड़ा भाई भधुकाजीव अपने अवशिष्ट पुण्य कर्मके उद्यसे शुभ स्वप्न पूर्णक रुक्मिणीके पुत्र उत्पन्न हुआ है सो ठीक ही है क्योंकि दुराचार के द्वारा कमाया हुआ पाप सम्यक् चारित्रके द्वारा नष्ट हो ही जाता है ॥ ३८-४६।।
श्लोक 47 से 61 : प्रद्युम्न का अपहरण और देवदत्त के रूप में पालन
इधर राजा कनकरथका जीव तपश्चरणकर धूमकेतु नामका ज्योतिषी देव हुआ था। वह बालक प्रद्युम्नके पूर्वभवमें संचित किये हुए तीव्र पापके समान जान पड़ता था। किसी दूसरे दिन वह इच्छानुसार विहार करनेके लिए आकाशमें वायुके समान वेगसे जा रहा था कि जब उसका विमान चरमशरीरी प्रद्युम्नके ऊपर पहुँचा तब वह ऐसा रुक गया मानो किन्हीं दूसरोंने उसे पकड़-कर रोक लिया हो। यह कार्य किसने किया है ? यह जाननेके लिए जब उसने उपयोग लगाया तब विभङ्गावधि ज्ञानसे उसे मालूम हुआ कि यह हमारा पूर्वजन्मका शत्रु है। जब मैं राजा कनकरथ था तब इसने दर्पवश मेरी स्त्रीका अपहरण किया था। अब इसे उसका फल अवश्य ही चखाता हूँ। ऐसा विचारकर वह वैर रूपी अग्निसे प्रज्वलित हो उठा ।। ४७-५० ।। वह अन्तःपुर में रहनेवाले लोगोंको महानिद्रासे अचेतकर बालक प्रद्युम्नको उठा लाया और आकाशमार्गसे बहुत दूर ले जाकर सोचने लगा कि मैं इसकी ऐसी दशा करूँगा कि जिससे चिरकाल तक महादुःख भोगकर प्राण छोड़ दे-मर जावे । ऐसा विचारकर वह बालकके पुण्यसे प्रेरित हुआ आकाशसे नीचे उतरा और खदिर नामकी अटवीमें तक्षक शिलाके नीचे बालकको रखकर चला गया ।। ५१-५३ ।।
उसी समय विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीके आभूषण स्वरूप मृतवती नामक देशके काल-कूट नगरका स्वामी कालसंवर नामका विद्याधर राजा अपनी काञ्चनमाला नामकी स्त्रीके साथ जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमाओंकी पूजा करनेके लिए जा रहा था ।। ५४-५५ ।। वह उस बड़ी भारी शिलाके समस्त अङ्गोंको जोरसे हिलता देख आश्चर्य में पड़ गया। सब ओर देखनेपर उसे देदीप्यमान कान्तिका धारक बालक दिखाई दिया। देखते ही उसने निश्चय कर लिया कि ‘यह सामान्य बालक नहीं है, कोई पूर्वजन्मका वैरी पापी जीव क्रोधवश इसे यहाँ रख गया है। हे प्रिये ! देख, यह कैसा बालसूर्यके समान देदीप्यमान हो रहा है। इसलिए हे सुन्दरी ! यह तेरा ही पुत्र हो, तू इसे ले ले’। इस प्रकार बालकको उठाकर विद्याधरने अपनी स्त्रीसे कहा। विद्याधरीने उत्तर दिया कि ‘यदि आप इसे युवराजपद देते हैं तो ले लूँगी’ । राजाने उसकी बात स्वीकार कर ली और रानीके कानमें पड़े हुए सुवर्णके पत्रसे ही उसका पट्टबंध कर दिया ॥ ५६-५९ ॥ इस प्रकार
राजा कालसंवर और रानी काञ्चनमालाने उस बालकको लेकर अनेक उत्सवोंसे भरे हुए अपने नगर में प्रवेश किया और बालकका विधिपूर्वक देवदत्त नाम रक्खा ।। ६० ।। उस बालकके लालन-पालन तथा लीलाके विलासोंसे जिनका चित्त प्रसन्न हो रहा है और जो सदा उत्तमोत्तम सुखोंका अनुभव करते रहे हैं ऐसे राजा-रानीका समय विना किसी छलप्ते व्यतीत होने लगो ॥ ६१ ॥
श्लोक 62 से 71 : कृष्ण-रुक्मिणी का शोक और नारद का आश्वासन
इधर जिस प्रकार दावानलसे गुलाबकी वेल जलने लगती है उसी प्रकार पुत्र-विरह के कारण रुक्मिणी शोकाग्निसे जलने लगी ॥ ६२ ॥ जिस प्रकार चारित्रहीन मनुष्यकी दद्याभावसे रहित सम्पत्ति शोभा नहीं देती, अथवा जिस प्रकार कार्य और अकार्यके विचारमें शिथिल बुद्धि सुशो-भित नहीं होती और जिस प्रकार काल पाकर जिसका पानी बरस चुका है ऐसी मेघमाला सुशोभित नहीं होती उसी प्रकार वह रुक्मिणी भी सुशोभित नहीं हो रही थी सो ठीक ही है क्योंकि प्राण निकल जानेपर शरीरकी शोभा कहाँ रहती है ? ॥ ६३-६४ ।। रुक्मिणीकी भांति श्रीकृष्ण भी पुत्रके वियोगसे शोकको प्राप्त हुए सो ठीक ही है क्योंकि जब वृक्ष और लताका संयोग रहता है तब उन्हें नष्ट करनेके लिए अलगअलग वज्रपातकी आवश्यकता नहीं रहती ।॥ ६५ ॥ जिस प्रकार प्याससे पीड़ित मनुष्यके लिए जलाशयका मिलना सुखदायक होता है और मयूरके लिए मेघका आना सुखदायी होता है उसी प्रकार श्रीकृष्णको सुख देनेके लिए नारद उनके पास आया ॥ ६६ ॥ उसे देखते ही श्रीकृष्णने बालकका सब वृत्तान्त सुनाकर कहा कि जिस किसी भी उपायसे जहाँ कहों भी संभव हो आप उस बालकी खोज कीजिये ।। ६७ ।। यह सुनकर नारद कहने लगा कि सुनो ‘पूर्व-बिदेह क्षेत्रकी पुण्डरीकिणी नगरीमें स्वयंप्रभ तीर्थकरसे मैंने बालककी बात पूछी थी । अपने प्रश्नके उत्तरमें मैंने उनकी वाणीसे बालकके पूर्व भव जान लिये हैं, वह वृद्धिका स्थान है अर्थात् सब प्रकारसे बढ़ेगा, उसे बड़ा लाभ होगा और सोलह वर्ष बाद उसका आप दोनोंके साथ समागम हो जावेगा’ । इस प्रकार नारदने जैसा सुना था वैसा श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणीको समझा दिया ॥ ६८-७० ॥ जिस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्का जन्म होते ही देवोंकी सेना तथा मनुष्य लोकमें परम हर्ष उत्पन्न होता है उसी प्रकार नारदके वचन सुनते ही रुक्मिणी तथा श्रीकृष्णको परम हर्ष उत्पन्न हुआ ।॥ ७१ ॥
श्लोक 72 से 81 : प्रद्युम्न का पराक्रम और विद्या-सिद्धि
उधर पुण्यात्मा देवदत्त (प्रद्युम्न) क्रम-क्रमसे नवयौवनको प्राप्त हुआ। किसी एक समय अतिशय बलवान् प्रद्युम्न पिताकी आज्ञासे सेना साथ लेकर अपने पराक्रमसे स्वयं ही अभिराज शत्रुके ऊपर जा चढ़ा और उसे युद्धमें प्रताप रहित बना जीतकर ले आया तथा पिताको सौंप दिया ।। ७२-७३ ।। उस समय राजा कालसंवरने, जिसका पराक्रम देख लिया है ऐसे प्रद्युम्नका श्रेष्ठ वस्तुएँ देकर बहुत भारी सन्मान किया ।॥ ७४ ॥ यौवन ही जिसका आभूषण है, जो स्वर्गले पृथिवीपर अवतीर्ण हुएके समान जान पड़ता है, और जो आभूषणोंसे अत्यन्त देदीप्यमान है ऐसे प्रद्यम्नको देखकर किसी समय राजा कालसंवरकी रानी काञ्चनमालाकी बुद्धि कामसे आक्रान्त हो गइ, वह पूर्वजन्मसे आये हुए स्नेहके कारण अनेक विकार करने लगी, तथा पापसे युक्त हो अपने मनका भाव प्रकट करती हुई कुमारसे कहने लगी कि ‘हे कुमार’ मैं तेरे लिए प्रज्ञप्ति नामकी बिद्या देना चाहती हूँ उसे तू विधि पूर्वक ग्रहण कर’। इस प्रकार माया पूर्व चेष्टासे युक्त रानीने कहा । बुद्धिमान् प्रद्युम्न्नने भी ‘हे माता ! मैं वैसा ही करूँगा’ यह कहकर बड़े हर्षले उससे वह विद्या लेली और उसे सिद्ध करनेके लिए सिद्धकूट चैत्यालयकी ओर गमन किया। वहाँ जाकर उसने चारण-ऋद्धि धारी मुनियोंको नमस्कार किया, उनसे धर्मोपदेश सुना और तदनन्तर उनके कहे अनुसार विद्या सिद्ध करनेके लिए सञ्जयन्त मुनिकी प्रतिमाका आश्रय लिया ॥ ७५-८० ।। उसने संजयन्त मुनिका पुराण सुना, उनकी प्रतिमाके चरणोंके आश्रयसे विद्या सिद्ध की और तदनन्तर हर्षित होता हुआ वह अपने नगरको लौट आया ।। ८१ ।।
श्लोक 82 से 91 : काञ्चनमाला का आरोप और कालसंवर का भ्रम
विद्या सिद्ध होनेसे उसके शरीरकी शोभा दूनी हो गई थी अतः उसे देखकर रानी काञ्चनमाला कामसे कातर हो उठी। उसने अनेक उपायोंके द्वारा कुमारसे प्रार्थना की परन्तु महाबुद्धिमान् कुमारने उसकी इच्छा नहीं की। जब उसे इस बातका पता चला कि यह कुमार पुरुषव्रत सम्पन्न है और हमारे सहवासके योग्य नहीं है तब उसने अपने पति कालसंवरसे कहा कि यह कुमार कुचेष्टा युक्त है अतः जान पड़ता है कि यह कुलीन नहीं है – उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ नहीं है। विचार रहित कालसंवरने स्त्रीकी धातका विश्वास. कर लिया । उसने उसी समय विद्युदंष्ट्र आदि अपने पाँच सौ पुत्रोंको बुलाकर एकान्तमें आज्ञा दी कि ‘यह देवदत्त अपनी दुष्टताके कारण एकान्तमें बध करनेके योग्य है अतः आप लोग इसे किसी उपायसे प्राणरहित कर डालिये’। इस प्रकार विद्याधरोंके राजा कालसंवरसे आज्ञा पाकर वे पाँच सौ कुमार अत्यन्त कुपित हो उठे। वे पहले ही उसे मारनेके लिए परस्पर सलाह कर चुके थे फिर राजाकी आज्ञा प्राप्त हो गई। ‘ऐसा ही करूँगा’ यह कहकर उन्होंने पिताकी आज्ञा शिरोधार्य की और सबकेसब उसे पूरा करनेकी इच्छा करते हुए नगरसे बाहर निकल पड़े। यही आचार्य कहते हैं वि जिस प्रकार हिंसा प्रधान शास्त्रसे, नीति रहित राज्यसे और मिथ्या मार्गमें स्थित तपसे निश्चित हानि होती है उसी प्रकार दुष्ट स्त्रीसे निश्चित ही हानि होती है ।। ८२-८८ ॥ दोषोंके विकारोंस् युक्त स्त्रियाँ मनुष्यकी स्थिर बुद्धिको चञ्चल बना देती हैं, सीधीको कुटिल बना देती है औ देदीप्यमान बुद्धिको ढक लेती हैं ।॥ ८९ ॥ ये पापिनी स्त्रियाँ अपने पतियोंके प्रति उसी समर सन्तुष्ट हो जाती हैं और उसी समय क्रोध करने लगती हैं और इनके ऐसा करनेमें लाभ वा हानि इन दोके सिवाय अन्य कुछ भी कारण नहीं है ॥ ९० ॥ संसारमें ऐसा कोई कार्य बाकी नहीं जिस् खोटी स्त्रियाँ नहीं कर सकती हों। हाँ, पुत्रके साथ व्यभिचारकी इच्छा करना यह एक कार्य बार्क था परन्तु काञ्चनमालाने वह भी कर लिया ॥ ९१ ॥
श्लोक 92 से 101 : विचारपूर्वक निर्णय लेने की शिक्षा
जिन किन्हीं स्त्रियोंमें व्रत शील आदि सस्क्रिया। रहती हैं वे भी शुद्धिको प्राप्त नहीं होतीं फिर जिनमें सत्क्रियाएँ नहीं हैं वे अपनं अशुद्धताके परम प्रकर्षको क्यों न प्राप्त हों ? ॥ ९२ ॥ जिस प्रकार कमलके पत्तोंपर पार्न स्थिर नहीं रहता उसी प्रकार इन स्त्रियोंका चित्त भी किन्हीं पुरुषोंपर स्थिर नहीं ठहरता । वह स्पर्शकरके भी स्पर्श नहीं करनेवालेके समान उनसे पृथक् रहता है ॥ ९३ ॥ सब स्त्रियोंके सब दोषोंसे भरेभाव दुर्लक्ष्य रहते हैं- कष्टसे जाने जा सकते हैं। ये सन्निपातके समान दुःसाध्य तथा बहुत भारी मोह उत्पन्न करनेवाले होते हैं ॥ ९४॥ कौन किसके प्रति किस कारणसे क्या कहता है!’ इस बातका विचार कार्य करनेवाले मनुष्यको अवश्य करना चाहिए ।
क्योंकि जो इस प्रकारका विचार करता है वह इस लोक तथा परलोक सम्बन्धी कर्मोंमें कभी प्रतारणाको प्राप्त नहीं होता – उगाया नहीं जाता ॥ ९५ ॥ ‘यह वक्ता प्रामाणिक वचन बोलता है या नहीं’ इसबातकी परीक्षा विद्वान् पुरुषको उसके आचरण अथवा ज्ञानसे स्पष्ट ही करना चाहिए ।। ९६ ।।
नयोंके जाननेवाले मनुष्यको पहले यह देखना चाहिये कि इसमें यह बात संभव है भी या नहीं ?
इसी प्रकार जिसे लक्ष्यकर वचन कहे जानें पहिले उसके आचरणसे उसकी परीक्षा कर लेनी चाहिए।विचार कर कार्य करनेवाले मनुष्यको शब्द अथवा अर्थके द्वारा कहे हुए पदार्थका ‘यह विश्वासकरनेके योग्य है अथवा नहीं’ इस प्रकार स्पष्ट ही परीक्षा कर लेनी चाहिए ॥९७-९८।। ‘यह जो कहरहा है सो भयसे कह रहा है, या स्नेहसे कह रहा है, या लोभसे कह रहा है, या मात्सर्यसे कह रह।है, या क्रोधसे कह रहा है, या लज्जासे कह रहा है, या अज्ञानसे कह रहा है, या जानकर कह रहहै, और या दूसरोंकी प्रेरणासे कह रहा है, इस प्रकार बुद्धिमान् मनुष्यको निमित्तोंकी परीक्ष करनी चाहिए । जो मनुष्य इस प्रकार प्रवृत्ति करता है वह विद्वानोंमें भी विद्वान् माना जाता है ॥ ९९-१०० ।। ‘अच्छी और बुरी आज्ञा देनेमें जो शिष्ट (उत्तम) पुरुष भी भूलकर जाते हैं वह चड़े कष्टकी बात है’ यह बात दुष्टा स्त्री अपने स्त्रीस्वभाव के कारण नहीं समझ पाती है ।। १०१ ।।
श्लोक 102 से 111 : प्रद्युम्न की अद्भुत वीरता और दिव्य उपहार
अथानन्तर- वे विद्युदंष्ट्र आदि पाँच सौ राजकुमार प्रद्युम्नको उत्साहित कर उसी समय विहार करनेके लिए बनकी ओर चल दिये। वहाँ जाकर उन्होंने प्रद्यम्नके लिए अग्निकुण्ड दिखाकर म्हा कि जो इसमें कूदते हैं वे निर्भय कहलाते हैं। उनकी बात सुनकर प्रद्युम्न निर्भय हो उस अग्नि-कुण्ड में कूद पड़ा। सो ठीक ही है क्योंकि भाग्यसे प्रेरित हुआ बुद्धिमान् मनुष्य किसी कार्यका विचार नहीं करता ।। १०२-१०३ ॥ उस कुण्डमें कूदते ही वहाँकी रहनेवाली देवीने उसकी अगवानी की तथा सुवर्णमय वस्त्र और आभूषणादि देकर उसकी पूजा की। इस तरह देवीके द्वारा पूजित होकर प्रद्युम्न उस कुंडसे बाहर निकल आया ॥ १०४॥ इस घटनासे उन सबको आश्चर्य हुआ तदनन्तर वे दुष्ट उसे उत्साहितकर फिरके चले और मेष के आकार के दो पर्वतों के बीचमें उसे घुसा दिया ॥ १०५ ॥ वहाँ दो पर्वत मेषका आकार रख दोनों ओरते उस पर गिरने लगे तब भुजाओंसे सुशो-भित प्रद्युम्न्न उन दोनों पर्वतोंको रोककर खड़ा हो गया। यह देख वहाँ रहनेवाली देवीने संतुष्ट होकर उसे मकरके चिह्नसे चिह्नित रत्नमयी दो दिव्य कुण्डल दिये। वहांसे निकलकर प्रद्युम्न, भाइयोंके आदेशानुसार बराह पर्वतकी गुफामें घुसा। वहाँ एक वराह नामका भयंकर देव आया नो प्रद्युम्नने एक हाथसे उसकी दाढ़ पकड़ ली और दूसरे हाथसे उसका मस्तक ठोकना शुरू किया इस तरह वह दोनों जबड़ोंके बीचमें लीलापूर्वक खड़ा हो गया। रुक्मिणीके पुत्र प्रद्युम्नकी चेष्टा देखकर वहां रहनेवाली देवीने उप्ते विजयघोष नामका शङ्ख और महाजालमें दो वस्तुएँ दी। सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यात्मा जीवोंको कहाँ लाभ नहीं होता है ? ।। १०६-११० ।।
इसी तरह उसने काल नामक गुहामें जाकर महाकाल नामक राक्षसको जीता और उससे वृषभ नामका रथ तथा रत्नमय कवच प्राप्त किया ।॥ १११ ॥
श्लोक 112 से 123 : विद्याओं और दिव्य आयुधों की प्राप्ति
आगे चलकर किसी विद्याधरने किसी विद्याधरको दो वृक्षोंके बीच में कीलित कर दिया था वह प्रद्युम्नको दिखाई दिया, वह कीलित हुआ विद्याधर असह्य वेदनासे दुःखी हो रहा था। यद्यपि उसके पास वन्धनसे छुड़ानेवाली गुटिका थी परन्तु कीलित होनेके कारण वह उसका उपयोग नहीं कर सकता था। उसे देखते ही प्रद्युन्न उसकेपास गया और उसके संकेतको समझ गया। उसने विद्याधरके पासकी गुटिका लेकर उसकी आँखों पर फेरा और उसे बन्धनसे मुक्त कर दिया। इस तरह उपकार करनेवाले प्रद्युम्नने उस विद्याधरसे सुरेन्द्र जाल, नरेन्द्र जाल, और प्रस्तर नामकी तीन विद्याएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर- वह प्रद्युम्न्न, सहस्त्र-वक्त्र नामक नागकुमारके भवनमें गया वहाँ उसने शङ्ख बजाया जिससे नाग और नागी दोनों ही बिलले बाहर आये और प्रसन्न होकर उन्होंने उसके लिए मकरचिह्नले चिह्नित ध्वजा, चित्रवर्ण नामका धनुष, नन्दक नामका खङ्ग और कामरूपिणी नामकी अंगूठी दी। वहाँ से चलकर उसने एक कैथका वृक्ष द्दिलाया जिसके उसपर रहनेवाली देवीसे आकाशमें चलनेवाली दो अमूल्य पादुकाएँ प्राप्त कीं ।। ११२-११७ ।। वहाँसे चलकर सुवर्णार्जुन नामक वृत्तके नीचे पहुँचा और वहाँ पश्च्च फणवाले नाग-राजके द्वारा दिये हुए तपन, तापन, मोदन, विलापन और मारण नामके पांच वाण उस पुण्यात्माको प्राप्त हुए ।। ११८-११९॥ तदनन्तर वह क्षीरवनमें गया वहाँ सन्तुष्ट हुए मर्कट देवने उसे मुकुट, औषधिमाला, छत्र और दो चमर प्रदान किये ॥ १२० ॥ इसके बाद वह कदम्बमुखी नामकी बावड़ीमें गया और वहाँ के देवसे एक नागपाश प्राप्त किया। तदनन्तर इसकी वृद्धिको नहीं सहनेवाले सत्र विद्याधरपुत्र इसे पातालमुखी बावड़ी में ले जाकर कहने लगे कि जो कोई इसमें कूदता है वह सबका राजा होता है। नीतिका जाननेवाला प्रद्युम्न उन सबका अभिप्राय समझ गया इसलिए उसने प्रज्ञप्ति विद्याको अपना रूप बनाकर बावड़ी में कुदा दिया और स्वयं अपने आपको छिपाकर वहीं खड़ा हो गया ।। १२१-१२३ ।। जब उसे यह मालूम हुआ कि ये सब बड़ी-बड़ी शिलाओं के द्वारा मुझे मारना चाहते थे तब वह क्रोधसे संतप्त हो उठा, उसने उसी समय विद्युदंष्ट्र आदि शत्रुओंको नागपाशसे मजबूतीके साथ बांधकर तथा नीचेकी ओर मुख कर उसी बावड़ीमें लटका दिया और ऊपरसे एक शिला ढक दी। उन सब भाइयोंमें ज्योतिप्रभ सबसे छोटा था सो प्रद्युम्नने उसे समाचार देनेके लिए नगरकी ओर भेज दिया और स्वयं वह उसी शिलापर बैठ गया सो ठीक ही है क्योंकि पापी मनुष्य अपने पापसे पराभवको प्राप्त करते ही हैं ।। १२४-१२६ ।।
श्लोक 124 से 141 : शत्रुओं की पराजय और द्वारका की ओर प्रस्थान
अथानन्तर – प्रद्युम्नने देखा कि इच्छानुसार चलनेवाले नारदजी आकाश-स्थलसे अपनी ओर आ रहे हैं ।। १२७ ।। वह उन्हें आता देख उठकर खड़ा हो गया उसने विधिपूर्वक उनकी पूजा की, उनके साथ बातचीत की तथा नारदने उसका सब वृत्तान्त कहा। उसे सुनकर प्रद्युम्न बहुतसंतुष्ट हुआ और उसपर विश्वास कर वहीं बैठ गया। शत्रुकी सेनाका आगमन देखकर वह आश्चर्य में पड़ गया । थोड़े ही देर बाद, जिस प्रकार वर्षा ऋतुमें बादलोंका समूह सूर्यको घेर लेता है उसी प्रकार अकस्मात् विद्याधर राजाकी सेनाने प्रद्युम्नको घेर लिया परन्तु प्रद्युम्ननेयुद्ध कर उन कालसंवर आदि समस्त विद्याधरोंको पराजित कर दिया। तदनन्तर- उसने राजा कालसंवरके लिए उनके पुत्रोंका समस्त वृत्तान्त सुनाया, शिला हटाकर नागपाश दूर किया और सबको बन्धन रहित किया, इसी तरह नारदके आनेका कारण भी विस्तारके साथ कहा। तत्पश्चात् वह राजा कालसंबर की अनुमति लेकर वृषभ नामक रथपर सवार हो नारदके प्रति रवाना हुआ। बीचमें नारदजीके द्वारा कहे हुए अपने पूर्वभवोंका सम्बन्ध सुनता हुआ वह हस्तिनापुर जा पहुंचा। वहां के राजा दुर्योधनकी जलधि नामकी रानीसे उत्पन्न हुई एक उदधिकुमारी नामकी उत्तम कन्या थी। भानुकुमारको देनेके लिए उसका महाभिषेक रूप उत्सव हो रहा था। उसे देख प्रद्युम्नने प्रस्तर विद्यासे उत्पन्न एक शिलाके द्वारा नारदजीको तो रथपर ही ढक दिया और आप स्वयं रथसे उतर कर पृथिवी तलपरं आ गया और उन लोगोंकी बहुत प्रकारकी हँसी कर वहाँ से आगे बढ़ा ।। १२८-१३६ ।। चलते-चलते वह मथुरा नगरके बाहर पहुँचा, वहाँपर पाण्डव लोग अपनी प्यारी पुत्री भानुकुमारको देनेके लिए जा रहे थे उन्हें देख, उसने धनुष हाथमें लेकर एक भीलका रूप धारण कर लिया और उन सबका नाना प्रकारका तिरस्कार किया। तदनन्तर वहाँ से चलकर द्वारिका पहुँचा ।। १३७-१३८ ।। वहाँ उसने नारदजीको तो पहलेके ही समान विद्याके द्वारा रथपर अवस्थित रक्खा और स्वयं अकेला ही नीचे आया । वहाँ आकर उसने विद्याके द्वारा एक वानरका रूप बनाया और नन्दन वनके समान सत्यभामाका जो वन था उसे तोड़ डाला, वहाँकी बावड़ीका समस्त पानी अपने कमण्डलुमें भर लिया। फिर कुछ दूर जाकर उसने अपने रथमें उल्टे मेढे तथा गधे जोते और स्वयं मायामयी रूप धारण कर लिया ॥ १३९-१४१ ॥
श्लोक 142 से 153 : रुक्मिणी से पुनर्मिलन
इस क्रियाप्से उसने नगरके गोपुरमें आने जानेवाले लोगोंको खूब हँसाया । तदनन्तर नगरके भीतर प्रवेश किया ॥ १४२ ॥ और अपनी विद्याके बलसे शाल नामक वैद्यका रूप बनाकर घोषणा करना शुरू कर दी कि मैं कटे हुए कानोंका जोड़ना आदि कर्म जानताहूँ ।। १४२-१४३ ।। इसके बाद भानुकुमारको देनेके लिए कुछ लोग अपनी कन्याएँ लाये थे उनके पास जाकर उसने उनकी अनेक प्रकार से हँसी की। पञ्चात् एक ब्राह्मणका रूप बनाकर सत्यभामाके महलमें पहुंचा वहाँ भोजनके समय जो ब्राह्मण आये थे उन सबको उसने अपनी धृष्टतासे बाहर कर दिया और स्वयं भोजन कर दक्षिणा ले ली ।। १४४-१४५ ॥ तदनन्तर क्षुल्लकका वेष रखकर अपनी माता रुक्मिणीके यहाँ पहुंचा और कहने लगा कि हे सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाली ! मैं भूखा हूँ, मुझे अच्छी तरह भोजन करा । इस तरह प्रार्थना कर अनेक तरहके भोजन खाये परन्तु तृप्तिको प्राप्त नहीं हुआ तब फिर व्याकुलताको प्रकट करता हुआ कहने लगा कि हे देवि ! मुझे संतुष्ट कर, पेट भर भोजन दे ! तदनन्तर उसके द्वारा दिये हुए महामोदक खाकर संतुष्ट हो गया। भोजनके पश्चात् वह कुछ शान्तचित्त होकर वहीं पर सुखसे बैठ गया ।। १४६-१४८ ।। उसी समय रुक्मिणीने देखा कि असमयमें ही चम्पक तथा अशोकके फूल फूल गये हैं और साराका सारा वन भ्रमरों तथा कोकि-लाओंके मनोहर कूजनसे शब्दायमान हो रहा है। यह देख वह आश्रर्यसे चकित बड़े हर्षसे पूछने लगी कि हे भद्र ! क्या आप मेरे पुत्र हैं और नारदके द्वारा कहे हुए समय पर आये हैं। माताका ऐसा प्रश्न सुनते ही प्रद्युम्न्नने अपना असली रूप प्रकट कर दिया और उसके चरण-नखोंकी किरण रूप मंजरीको शिरपर रखकर उसे अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। माताके साथ भोजन किया, उसकी इच्छानुसार बाल-कालकी क्रीड़ाओंसे उसे परम प्रसन्नता प्राप्त कराई और पूर्व जन्ममें उपार्जित अपूर्व पुण्य कर्मके उद्यके समान वहीं ठहर गया ।। १४९-१५३ ।।
श्लोक 154 से 161 : सत्यभामा की शर्त और प्रद्युम्न की चतुरता
उसी समय एक नाई रुक्मिणीके पास आया और कहने लगा कि श्रीकृष्णके प्रश्न करनेपर श्रीविनयन्धर नामके मुनिराजसे सत्यभामा और तुम दोनोंने अपने पुत्रकी उत्पत्ति जानकर परस्पर शर्तकी थी कि हम दोनोंमें जिसके पहले पुत्र होगा वह पुत्र, अपने विवाहके समय दूसरीके शिरके बाल हरणकर स्नान करेगा। इसलिए हे देवी ! आप उस शर्तका स्मरणकर भानुकुमारके स्नानके लिए अपने केश मुझे दीजिये। आज विवाहके दिन सत्यभामाने मुझे शीघ्र ही भेजा है’। नाईकी बात सुनकर प्रद्युम्नने मातासे पूछा कि ‘यह क्या बात है?’ वह कहने लगी कि ‘तुम्हारा और भानुकुमारका जन्म एक साथ हुआ था। हम दोनोंने श्रीकृष्णको दिखानेके लिए तुम दोनोंको भेजा था परन्तु उस समय वे सो रहे थे इसलिए तू उनके चरणोंके समीप रख दिया गया था और वहउनके शिरके समीप रखा गया था। जब वे जागे तो उनकी दृष्टि सबसे पहले तुझपर पड़ी इसलिए उन्होंने तुझे ही जेठापन प्रदान किया था – तू ही बड़ा है यह कहा था’। माताके वचन सुनकर प्रद्युम्नने उस नाईको विकृतिकी खान बना दी – उसकी बुरी चेष्टा कर दी और उसके साथ जो सेवक आये थे उन सबको नीचे शिरकर गोपुरमें उल्टा लटका दिया तथा श्रीकृष्णका रूप बनाकर उनके विदूषकको खूब डाटा । तदनन्तर मार्गमें सो रहा और जगानेपर अपने पैर लम्बेकर जर नामक प्रतीहारीको खूब ही धौंस दी ।॥१५४-१६१।।
श्लोक 162 से 171 : पिता से मिलन और विवाह
फिर मेषका रूप बनाकर बाबा वासुदेवको टक्कर द्वारा गिरा दिया और सिंह बनकर बलभद्रको निगलकर अदृश्य कर दिया। तदनन्तर-माताके पास आकर बोला कि ‘हे माता ! तू यहीं पर सुखसे रह’ यह कहकर उसने अपनी विद्यासे ठीक रुक्मिणी के ही समान मनोहर रूप बनाया और उसे विमानमें बैठाकर शीघ्रतासे बलभद्र तथा कृष्णके पास ले जाकर बोला कि मैं रुक्मिणीको हरकर ले जा रहा हूं, यदि सामर्थ्य हो तो छुड़ा लो ! यह सुनकर असमयमें आये हुए यमराजको उपमा धारण करनेवाले श्रीकृष्ण भी उसे छुड़ानेके लिए सामने जा पहुँचे परन्तु भीलका रूप धारण करनेवाले प्रद्युम्न्नने नरेन्द्रजाल नामक विद्याकी मायासे उन्हें जीत लिया और इस तरह वह शत्रु रहित होकर खड़ा रहा ।। १६२-१६५ ॥ उसी समय नारदने आकर हँसते हुए, बलभद्र तथा श्रीकृष्णसे कहा कि जिसे अनेक विद्याएँ प्राप्त हैं ऐसे पुत्रका आज आप दोनोंको दर्शन हो रहा है ।। १६६ ।। उसी समय प्रद्युम्नने भी अपना असली रूप प्रकट कर दिया तथा बलभद्र और श्रीकृष्णको उनके चरण-कमलोंमें अपना शिर झुकाकर नमस्कार किया ।। १६७ ॥ तदनन्तर चक्रवर्ती श्रीकृष्ण महाराजने बड़े प्रेमसे प्रद्युम्नका आलिंगन किया, उसे अपने हाथीके स्कन्धपर बैठाया और फिर बड़े प्रेमसे नगर में प्रवेश किया ॥ १६८ ॥ वहाँ जाकर प्रद्युम्नने अपने पुण्योदयसे, सत्यभामाके पुत्र भानुकुमारके लिए जो कन्याएँ आई थी उनके साथ सर्वकी सम्मतिसे विवाह किया ॥ १६९ ॥ इस प्रकार काल सुखसे बीतने लगा। किसी एक दिन सबने सुना कि प्रद्युम्नका पूर्वजन्मका भाई स्वर्गसे आकर श्रीकृष्णका पुत्र होगा। यह सुनकर सत्यभामाने अपने पतिसे याचना की कि जिस प्रकार वह पुत्र मेरे ही उत्पन्न हो ऐसा प्रयत्न कीजिये ।। १७०-१७१ ।।
श्लोक 172 से 183 : शम्भव का जन्म और नेमिनाथ की भविष्यवाणी
जब रुक्मिणीने यह सुना तो उसने बड़े आदरके साथ प्रद्युम्न्नसे कहा कि तुम्हारे पूर्वभवके छोटे भाई-को जाम्बवती प्राप्त कर सके ऐसा प्रयत्न करो ।। १७२ ॥ प्रद्युम्नने भी जाम्बवतीके लिए इच्छानुसाररूप बनाने वाली अंगूठी दे दी उसे पाकर जाम्बवतीने सत्यभामाका रूप बनाया और पतिके साथ संयोगकर स्वर्गसे च्युत हुए क्रीडवके जीवको प्राप्त किया, उत्पन्न होने पर उसका शम्भव नाम रक्खा गया। उसी समय सत्यभामाने भी सुभानु नामका पुत्र प्राप्त किया। इधर शम्भव और सुभानुमें जब परस्पर ईर्ष्या बढ़ी तो गान्धर्व आदि विवादोंमें शम्भवने सुभानुको जीत लिया सो ठीक ही है क्योंकि जिन्होंने पूर्वभवमें पुण्य उपार्जन किया है उन्हें सब जगह विजय प्राप्त होना कठिन नहीं है ।। १७३-१७५ ।। इसके बाद रुक्मिणी और सत्यभामा ईर्ष्या छोड़कर परस्परकी प्रीतिका अनु-भव करने लगीं ॥ १७६ ॥ इस प्रकार गणधर भगवान्के द्वारा कहा हुआ सब चरित सुनकर समस्त सभाने हाथ जोड़कर उनके चरण-कमलोंमें नमस्कार किया ।। १७७ ॥
अथानन्तर किसी दूसरे दिन, श्रीकृष्णके स्नेहने जिनका चित्त वशकर लिया है ऐसे बलदेवने हाथ जोड़कर भगवान् नेमिनाथको नमस्कार किया और पूछा कि हे भगवन् श्रीकृष्णका यह वैभवशाली निष्कण्टक राज्य कितने समय तक चलता रहेगा ? कृपाकर आप यह बात मेरे लिए कहिये ।। १७८-१७९ ॥ उत्तरमें भगवान् नेमिनाथने कहा कि भद्र ! बारह वर्षके बाद मद्रिाका निमित्त पाकर यह द्वारावती पुरी द्वीपायनके द्वारा निर्मूल नष्ट हो जायगी। जरत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णाका मरण होगा। यह एक सागरकी आयु लेकर प्रथमभूमिमें उत्पन्न होगा और अन्तमें वहाँ से निकलकर इसी भरत क्षत्रमें तीर्थकर होगा। तू भी इसके वियोगसे छह माह तक शोक करता रहेगा और अन्तमें सिद्धार्थदेवके सम्बोधनसे समस्त दुःख छोड़कर दीक्षा लेगा तथा माहेन्द्र स्वर्गमें देव होगा ।। १८०-१८३ ॥
श्लोक 184 से 191 : वैराग्य, दीक्षा और मोक्ष
वहांपर सात सागरकी उत्कृष्ट आयु पर्यन्त भोगोंका उपभोगकर इसी भरत क्षेत्रमें तीर्थंकर होगा तथा कर्मरूपी शत्रुओंको जलाकर शरीरसे मुक्त होगा ॥ १८४ ॥ श्री तीर्थंकर भगवान्का यह उपदेश सुनकर द्वीपायन तो उसी समय संयम धारणकर दूसरे देशको चला गया तथा जरत्कुमार कौशाम्बीके वनमें जा पहुँचा। जिसने पहले ही नरकायुका बन्ध कर लिया था ऐसे श्रीकृष्णने सम्यग्दर्शन प्राप्तकर तीर्थंकर प्रकृतिके बन्धमें कारणभूत सोलह कारण भावनाओंका चिन्तवन किया तथा स्त्री बालक आदि सबके लिए घोषणा कर दी कि मैं तो दीक्षा लेनेमें समर्थ नहीं हूं परन्तु जो समर्थ हों उन्हें मैं रोकता नहीं हूं ॥ १८५-१८७ ॥ यह सुनकर प्रद्युम्न आदि पुत्रों तथा रुक्मिणी आदि देवियोंने चक्रवर्ती श्रीकृष्ण एवं अन्य बन्धुजनोंसे पूछकर उनकीआज्ञानुसार संयम धारण कर लिया ।। १८८ ॥ द्वीपायन द्वारिका-दाहका निदान अर्थात् कारण था. जब वहांसे अन्यत्र चला गया तब जाम्बवतीके पुत्र शम्भव तथा प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्धने भी संयम धारण कर लिया और प्रद्युम्नमुनिके साथ गिरनार पर्वतकी ऊँची तीन शिखरोंपर आरूढ होकर सब प्रतिमा योगके धारक हो गये ।। १८९-१९० ॥ उन तीनोंने शुक्तध्यानको पूराकर घातिया कर्मोंका नाश किया और नव केवललब्धियाँ पाकर मोक्ष प्राप्त किया ॥ १९१ ।।
श्लोक 192 से 201 : नेमिनाथ का विहार और द्रौपदी प्रसंग का आरम्भ
अथानन्तर-किसी दूसरे दिन भगवान् नेमिनाथने वहाँ से विहार किया। उस समय पुण्यकी घोषणा करनेवाले यक्षके द्वारा धारण किया हुआ धर्मचक्र उनके आगे चल रहा था, पैर रखनेकी जगह तथा आगे और पीछे अलग-अलग सात सात कमलोंके द्वारा उनकी शोभा बढ़ रही थी, छत्र आदि आठ प्रातिहार्य अलग सुशोभित हो रहे ये, आकाशमार्गमें चलनेवाले समस्त देव तथा विद्याधर उनकी सेवा कर रहे थे, देव और विद्याधरोंके सिवाय अन्य शिष्य जन पृथिवीपर ही उनके पीछे-पीछे जा रहे थे, पवन-कुमार देवोंने पृथिवीकी सब धूली तथा कण्टक दूर कर दिये थे और मेघकुमार देवोंने सुगन्धित जल बरसाकर भूमिको उत्तम बना दिया था, इत्यादि अनेक आश्चर्योंसे सम्पन्न एवं समस्त प्राणियोंका मन हरण करनेवाले भगवान् नेमिनाथ धर्मामृतकी वर्षा करते हुए समस्त देशोंमें विहार करनेके बाद पल्लव देशमें पहुँचे ।। १९२-१९६ ।।
आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि यहाँ पर ग्रन्थके विस्तारसे डरनेवाले शिष्योंकी आयु और बुद्धिके अनुरोधसे पाण्डवोंका भी कुछ वर्णन किया जाता है ।॥ १९७ ॥ कम्पिला नामकी नगरीमें राजा द्रुपद राज्य करता था उसकी देवीका नाम दृढरथा था और उन दोनोंके द्रौपदी नामकी पुत्री थी। वह द्रौपदी स्त्रियोंमें होनेवाले समस्त गुणोंसे प्रशंसनीय थी तथा सबको प्यारी थी। उसे पूर्ण यौवनवती देखकर पिताने मन्त्रचर्चाके द्वारा मन्त्रियोंसे पूछा कि यह कन्या किसे देनी चाहिये । मन्त्रियोंने कहा कि यह कन्या अतिशय बलवान् पाण्डवोंके लिए देनी चाहिये ।। १९८-२०० ॥ पाण्डवोंकी प्रशंसा करते हुए मन्त्रियोंने कहा कि राजा दुर्योधन इनका जन्मजात शत्रु है उसने इन लोगोंको मारनेके लिए किसी उपायसे लाक्षाभवन (लाखके बने घर) में प्रविष्ट कराया था ।।२०१।।
श्लोक 202 से 211 : द्रौपदी का स्वयंवर और अर्जुन का वरण
परन्तु अपने पुण्यके उद्यसे प्रेरित हुए ये लोग दुर्योधनकी यह चालाकी जान गये इसलिए जलमें खड़े हुए किसी वृक्षके नीचे रहनेवाले पिशाचको स्वयं हटाकर भाग गये और अपने कुटुम्बी जनोंसेप्राप्त दुःखका अनुभव करनेके लिए देशान्तरको चले गये हैं। इधर गुप्तचरके मुखसे इनके विषयकी यह बात सुनी गई है कि पोदनपुरके राजा चन्द्रदत्त और उनकी रानी देविलाके इन्द्रवर्मा नामक पुत्रको पाण्डवोंने समस्त कलाओं और गुणोंमें निपुण बनाया है तथा उसकी प्रतिद्वन्द्वी स्थूग-गन्धको नष्टकर उसके लिए राज्य प्रदान किया है। सो वे पाण्डव यहाँ भी अवश्य ही आवेंगे । अतः अपने लिए द्रौपदीका स्वयंबर करना चाहिए क्योंकि ऐसा करनेसे किसीके साथ विरोध नहीं होगा । मन्त्रियोंके उक्त वचन सुनकर राजाने बसन्त ऋतुमें स्वयंवर-मण्डप बनवाया जिसमें सब राजा लोग आये । पाण्डव भी आये, उनमें भीम तो भोजन बनाने तथा मदोन्मत्त हाथीको हाथसे ताड़ित करनेसे प्रकट हुआ, अर्जुन मत्स्यभेद तथा धनुष चढ़ानेके साहससे प्रसिद्ध हुआ एवं अन्य लोग नारदके आगमनसे प्रकट हुए। जब सब लोग निश्चित रूपसे स्वयंवर-मण्डपमें आकर विराज-मान हो गये तब अर्हन्त भगवान्की महा पूजाकर रत्नोंसे सजी हुई द्रौपदी स्वयंवर-मंडपमें प्रविष्ट हुई । सिद्धार्थ नामक पुरोहित कुल-रूप आदि गुणोंका वर्णन करता हुआ समस्त राजाओंका अनु-क्रमसे परिचय दे रहा था। क्रम-क्रमसे द्रौपदी समस्त राजाओंको उल्लंघन करती हुई आगे बढ़ती गई। अन्तमें उसने अपनी निर्मल मालाके द्वारा अर्जुनको सन्मानित किया ।। २०२-२११ ।।
श्लोक 212 से 222 : पाण्डवों का राज्यसुख और नेमिनाथ की भविष्यवाणी की सिद्धि
यह देखकर द्रुपद आदि उप्रवंशमें उत्पन्न हुए राजा कुरुवंशी तथा अन्य अनेक राजा ‘यह सम्बन्ध अनुकूल सम्बन्ध है’ यह कहते हुए संतोषको प्राप्त हुए ॥ २१२ ॥ इस प्रकार अनेक कल्याणोंको प्राप्तकर वे पाण्डव अपने नगरमें गये और सुख पूर्वक बड़े लम्बे समयको क्षणभरके समान व्यतीत करने लगे ।। २१३ ।।तदनन्तर अर्जुनके सुभद्रासे अभिमन्यु नामका पुत्र हुआ और द्रौपदीके अनुक्रमसे पाञ्चाल नामके पाँच पुत्र हुए ॥ २१४ ।। यहाँ युधिष्विरका राजा दुर्योधनके साथ जुआ खेला जान्म, भुजंगशैल नामक नगरीमें कीचकोंका मारा जाना, पाण्डवका विराट नगरीके राजा विराटका सेवक बनकर रहना, अर्जुनके द्वारा राजा विराटकी बहुत भारी गायोंके समूहका लौटाया जाना, तथा अर्जुनके अनुज सहदेव और नकुलके द्वारा उसी सुख-सम्पन्न राजा विराटकी कुछ गायोंका वापिस लौटाना, आदि जो घटनाएँ हैं उनका आगमके अनुसार पुराणके जाननेवाले लोगोंको विस्तारसे कथन करना चाहिए ।। २१५-२१७ ।। अथानन्तर-कुरुक्षेत्रमें पाण्डवोंका कौरवोंके साथ युद्ध हुआ उसमें युधिष्ठिरदुर्योधन राजाको जीतकर समस्त देशका स्वामी हो गया और छोटे भाइयों के साथ विभागकर राज्यलक्ष्मीका उपभोग करता हुआ सबको प्रसन्न करने लगा ।। २१८-२१९ ॥ इस प्रकार वे सब पांडव अपने द्वारा किये हुए पुण्य कर्मके उदयसे उत्पन्न सम्पूर्ण सुखका बिना किसी आकुलताके निरन्तर उपभोग करने लगे ।। २२० ।। तदनन्तर – ‘द्वारावती जलेगी, कौशाम्बी-वनमें जरत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णकी मृत्यु होगी और उनके बड़े भाई बलदेव संयम धारण करेंगे’ इस प्रकार द्वारावतीमें नेमिनाथ भगवान्ने जो कुछ कहा था वह सब वैसा ही हुआ सो ठीक ही है क्योंकि जिनेन्द्र भगवान् अन्यथावादी नहीं होते हैं ।॥२२१-२२२ ।।
श्लोक 223 से 234 : पाण्डवों द्वारा पूर्वभव का प्रश्न और नागश्री का पाप
आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि वैसे लोकोत्तर पुरुषोंकी वैसी दशा हुई इसलिए अशुभ कर्मोंकी गतिको बार-बार धिक्कार हो और निश्चयसे इसीलिए बुद्धिमान् पुरुष इन कर्मोंको निर्मूल करते हैं -उखाड़ कर नष्ट कर देते हैं ।। २२३ ।। मथुराके स्वामी पाण्डव, यह सब समाचार सुनकर वहाँ आये । वे सब, स्वामी श्रीकृष्ण तथा अन्य बन्धुजनोंके वियोगसे बहुत विरक्त हुए और राज्य छोड़कर मोक्षके लिए महाप्रस्थान करने लगे। उन भक्त लोगोंने नेमिनाथ भगवान्के पास जाकर उस समयके योग्य नमस्कार आदि सत्कर्म किये तथा संसारसे भयभीत होकर अपने पूर्वाभव पूछे। उत्तर में अचिन्त्य वैभवके धारक भगवान् भी इस प्रकार कहने लगे ॥ २२४-२२६ ।। उन्होंने कहा कि इसी जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्र सम्बन्धी अङ्गदेशमें एक चम्पापुरी नामकी नगरी है उसमें कुरुगंशी राजा मेघवाहन राज्य करता था। उसी नगरी में एक सोमदेव नामका ब्राह्मण रहता था उसकी ब्राह्मणीका नाम सोमिला था । उन दोनोंके सोमदत्त, सोमिल और सोमभूति ये वेदांगोंके पारगामी परम ब्राह्मण तीन पुत्र हुए थे। इन तीनों भाइयोंके मामा अग्निभूति थे उसकी अग्निला नामकी स्त्रीसे धनश्री, मित्रश्री और नागश्री नामकी तीन प्रिय पुत्रियाँ उत्पन्न हुई थीं। अग्निभूति और अग्निलाने शुभलक्षणोंवाली ये तीनों कन्याएँ अपने तीनों भानेजोंके लिए यथा क्रमसे दे दीं ।। २२७-२३० ।। तदनन्तर-बुद्धिमान् सोमदेवने किसी कारणसे विरक्त होकर जिन-दीक्षा ले ली। किसी एक दिन भिक्षाके समय धर्मरुचि नामके तपस्वी मुनिराजको अपने घरमें प्रवेश करते देखकर दयालुता वश सोमदत्तने उनका पडिगाहन किया और छोटे भाईकी पत्नीसे कहा कि हे नागश्री ! तू इनके लिए बड़े आदरके साथ भिक्षा दे दे । नागश्रीने मनमें सोचा कि ‘यह सदा सभी कार्यके लिए मुझे ही भेजा करता है’ यह सोचकर वह बहुत ही क्रुद्ध हुई और उसी क्रुद्धावस्थामें उसने उन तपस्वी मुनिराजके लिए विष मिला हुआ आहार दे दिया जिससे संन्यास धारण कर तथा चारों आराधनाओं की आराधना कर उक्त मुनिराज सर्वार्थसिद्धि नामक अनुत्तर विमानमें जा पहुंचे ॥ २३१-२३४ ।।
श्लोक 235 से 248 : दीक्षा, पुण्यफल और सुकुमारी का दुःखमय जीवन
जब सोमदत्त आदि तीनों भाइयोंको नागश्रीके द्वारा किये हुए इस अकृत्यका पता चला तो उन्होंने वरुणार्यके समीप जाकर मोक्ष प्रदान करनेवाली दीक्षा धारण कर ली ।॥ २३५॥ यह देख, नागश्रीको छोड़कर शेष दो ब्राह्मणियोंने भी गुणवती आर्यिकाके समीप संयम धारण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि सज्जन और दुर्जनोंका चरित्र ऐसा ही होता है ॥ २३६ ॥ इस प्रकार ये पाँचों ही जीव, आयुके अन्तमें आराधनाओंकी आराधना कर आरण और अच्युत स्वर्गमें बाईस सागरकी आयु-बाले सामानिक देव हुए ॥ २३७ ॥ वहाँ उन्होंने चिरकाल तक प्रवीचार सहित भोगोंका उपभोग किया । इधर नागश्री भी पापके कारण पाँचवें नरकमें पहुँची, वहाँ के दुःख भोगकर आयुके अन्तमें निकली और वहाँ से च्युत होकर स्वयंप्रभ द्वीपमें दृष्टिविष नामका सर्प हुई। फिर मरकर दूसरे नरक गई वहाँ तीन सागरकी आयु पर्यन्त दुःख भोगकर वहाँ से निकली और दो सागर तक त्रस तथा स्थावर योनियोंमें भ्रमण करती रही। इस प्रकार संसार-सागर में भ्रमण करते-करते जब उसके पापका उदय कुछ मन्द हुआ तब चम्पापुर नगर में चाण्डाली हुई ॥ २३८-२४१ ॥ किसी एक दिन उसने समाधिगुप्त नामक मुनिराजके पास जाकर उन्हें नमस्कार किया, उनसे धर्म-श्रवण किया, और मधु-मांसका त्याग किया । इनके प्रभावसे वह मरकर उसी नगर में सुबन्धु सेठकी धनदेवी स्त्रीसे अत्यन्त दुर्गन्धित शरीरवाली पुत्री हुई। माता-पिताने उसका ‘सुकुमारी’ यह सार्थक नाम रक्खा । इसी नगरमें एक धनदत्त नामका सेठ रहता था उसकी अशोकदत्ता स्त्रीसे जिनदेव और जिनदत्त नामके दो पुत्र हुए थे। जिनदेवके कुटुम्बी लोग उसका विवाह सुकुमारीके साथ करना चाहते थे परन्तु जब उसे इस बातका पता चला तो वह सुकुमारीकी दुर्गन्धतासे घृणा करता हुआ सुव्रत नामक मुनिराजका शिष्य हो गया अर्थात् उनके पास उसने दीक्षा धारण कर ली ।। २४२-२४६ ॥ तदनन्तर छोटे भाई जिनदत्तको उसके बन्धुजनोंने बार-बार प्रेरणा की कि बड़े लोगोंकी कन्याका अपमान करना ठीक नहीं है। इस भयसे उसने उसे विवाह तो लिया परन्तु क्रुद्ध सर्पिणीके समान वह कभी स्वप्नमें भी उसके पास नहीं गया। इस प्रकार पतिके विरक्त होनेसे सुकुमारी अपनी पुण्यहीनताकी सदा निन्दा करती रहती थी ॥ २४७-२४८ ॥
श्लोक 249 से 259 : सुकुमारी का वैराग्य और द्रौपदी के रूप में जन्म
किसी दूसरे दिन उसने उपवास किया, उसी दिन उसकेघर अन्य अनेक आर्यिकाओंके साथ सुव्रता और क्षान्ति नामकी आर्यिकाएँ आईं उसने उन्हें वन्दना कर प्रधान आर्यिकासे पूछा कि इन दोनों आर्यिकाओंने किस कारण दीक्षा ली है ? यह बात आप मुझसे कहिए। सुकुमारीका प्रश्न सुनकर क्षान्ति नामकी आर्यिका कहने लगी कि हे शुभ नाम-वाली ! सुन, ये दोनों ही पूर्वजन्ममें सौधर्म स्वर्गके इन्द्रोंकी विमला और सुप्रभा नामकी प्रिय देवियां थीं। किसी एक दिन ये दोनों ही सौधर्म इन्द्रके साथ जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेके लिए नन्दीश्वर द्वीपमें गई थीं। वहां इनका चित्त विरक्त हुआ इसलिए इन दोनोंने परस्पर ऐसा विचार स्थिर किया कि हम दोनों इस पर्यायके बाद मनुष्य पर्याय पाकर तप करेंगी। आयुके अन्त में वहांसे च्युत होकर ये दोनों, साकेत नगरके स्वामी श्रीषेण राजाकी श्रीकान्ता रानीसे हरिषेणा और श्रीषेणा नामकी पुत्रियां हुई हैं। यौवन अवस्था प्राप्तकर ये दोनों विवाहके लिए स्वयम्बर-मंडपके भीतर खड़ी थीं कि इतनेमें ही इन्हें अपने पूर्वभव तथा पूर्वभवमें की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण हो आया। उसी समय इन्होंने समस्त बन्धुवर्ग तथा राजकुमारोंका त्यागकर दीक्षा धारण कर ली। इस प्रकार क्षान्ति आर्यिकाके वचन सुनकर सुकुमारी बहुत विरक्त हुई और अपने कुटुम्बीजनोंकी संमति लेकर उसने उन्हीं आर्यिकाके पास दीक्षा धारण कर ली। किसी दूसरे दिन वनमें वसन्तसेना नामकी वेश्या आई थी, उप्ते बहुतसे व्यभिचारी मनुष्य घेरकर उससे प्रार्थना कर रहे थे। यह देखकर सुकुमारीने निदान किया कि मुझे भी ऐसा ही सौभाग्य प्राप्त हो । आयुके अन्त में मरकर वह, पूर्वजन्ममें जो सोमभूति नामका ब्राह्मण था और तपञ्चरणके प्रभावसे अच्युत स्वर्गमें देव हुआ था उसकी देवी हुई ॥ २४९-२५९ ॥
श्लोक 260 से 271 : पाण्डवों का संयम और अन्तिम साधना
वहांकी उत्कृष्ष्ट आयु बिताकर उन तीनों भाइयोंके जीव वहांसे च्युत होकर रत्नत्रयके समान तुम प्रसिद्ध पुरुषार्थके धारक युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन हुए हो । तथा धनश्री और मित्रश्रीके जीव प्रशंसनीय पराक्रमके धारक नकुल एवं सहदेव हुए हैं। इनकी कान्ति चन्द्रमा और सूर्यके समान है। सुकुमारीका जीव काम्पिल्य नगर में वहांके राजा द्रपद और रानी दृढरथाके द्रौपदी नामकी पुत्री हुई है। इस प्रकार नेमिनाथ भगवान्के द्वारा कहे हुए अपने भवान्तर सुनकर पाण्डवोंने अनेक लोगोंके साथ संयम धारण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंका बन्धुपना यही है। गुणरूपी आभूषणको धारण करनेवाली कुन्ती सुभद्रा तथा द्रौपदीने भी राजिमति गणिनीके पास उत्कृष्ट दीक्षा धारण कर ली। अन्तमें तीनोंके जीव सोलहवें स्वर्गमें उत्पन्न हुए और वहांसे च्युत होकर निःसन्देह समस्त कर्ममलसे रहित हो मोक्षप्राप्त करेंगे । जिन्हें अनेक उत्तमोत्तम ऋद्धियाँ प्राप्त हुई हैं और जो अतिशय भक्तिसे युक्त हैं ऐसे पाँचों पाण्डव कितने ही वर्षों तक नेमिनाथ भगवान्के साथ विहार करते रहे और अन्तमें शत्रुञ्जय पर्वतपर जाकर आतापन योग लेकर विराजमान हो गये । दैवयोगसे वहां दुर्योधनका भानजा ‘कुर्यवर’ आ निकला वह अतिशय दुष्ट था, पाण्डवोंको देखते ही उसे अपने मामा के वधका स्मरण हो आया जिससे क्रुद्ध होकर उस पापीने उनके शरीरोंपर अग्निप्से तपाये हुए लोहे के मुकुट आदि आभूषण रखकर उपसर्ग किया। उन पाँचों भाइयों में कुन्तीके पुत्र युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन तो क्षपकश्रेणी चढ़कर शुक्लत ध्यान रूपी अग्निके द्वारा कर्मरूपी ईन्धनको जलाते हुए मुक्त अवस्थाको प्राप्त हुए और नकुल तथा सहदेव सर्वार्थसिद्धि विमानमें उत्पन्न हुए । इधर भट्टारक नेमिनाथ स्वामी भी गिरनार पर्वतपर जा विराजमान हुए ।। २६०-२७१ ।।
श्लोक 272 से 281 : भगवान नेमिनाथ का निर्वाण और महान व्यक्तियों के पूर्वभव
उन्होंने छह सौ निन्यानवे वर्ष नौ महीना और चार दिन विहार किया। फिर विहार छोड़कर पांच सौ तैंतीस मुनियोंके साथ एक महीने तक योग निरोधकर आषाढ शुक्ल सप्तमीके दिन चित्रा नक्षत्रमें रात्रिके प्रारम्भमें ही चार अघातिया कर्मोंका नाशकर मोक्ष प्राप्त किया ।। २७२-२७४ ॥ उसी समय इन्द्रादि देवोंने आकर बड़ी भक्तिसे विधिपूर्वक उनके पंचम कल्याणका उत्सव किया और तदनन्तर वे सब अपने-अपने स्थानको चले गये ।। २७५ ।। जो दूरसे ही आकाशमें अपनी-अपनी सवारियोंसे नीचे उतर पड़े हैं, जिन्होंने शीघ्र ही अपने मस्तक झुका लिये हैं, जिनके मुख स्तुतियोंके पढ़नेसे शब्दायमान हो रहे हैं, जिन्होंने दोनों हाथ जोड़ लिये हैं और जिनका चित्त अत्यन्त स्थिर है ऐसे इन्द्र आदि श्रेष्ठदेव जिनके चरणों में नमस्कार करते हैं तथा जिन्होंने अपने तेजसे हृदयका समस्त अन्धकार नष्ट कर दिया है ऐसे श्रीमान् नेमिनाथ भगवान् केवलज्ञानकी प्राप्तिके लिए हम सबका शीघ्र ही कल्याण करें ।॥ २७६ ।। श्रीनेमि-नाथ भगवान्का जीव पहले चिन्तागति विद्याधर हुआ, फिर चतुर्थ स्वर्गमें देव हुआ, वहाँ से आकर अपराजित राजा हुआ, फिर अच्युत स्वर्गका इन्द्र हुआ, वहाँ से आकर सुप्रतिष्ठ राजा हुआ, फिर जयन्त विमानमें अहमिन्द्र हुआ और उसके बाद इसी जम्बूद्वीपमें महान् वैभवको धारण करनेवाला, हरिवंशरूपी आकाशका निर्मल चन्द्रमास्वरूप नेमिनाथ तीर्थकर हुआ ।॥ २७७ ॥ यद्यपि भगवान् नेमिनाथकी वह लक्ष्मी थी कि जिसके द्वारा उनके चरणकमलोंकी समस्त देव पूजा करते थे, उनकी वह कुमारावस्था थी कि जिसका सौन्दर्यरूपी ऐश्वर्य अपरिमित था, और वह कन्या राजीमति थी कि जिसकी अत्यन्त स्तुति हो रही थी तथापि इन बुद्धिमान् भगवान्ने इन सबको जीर्ण तृणके समान छोड़कर संयम धारण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि ऐसा क्या कारण है कि जिससे भगवान् नेमि-नाथ धर्मचक्रके चारों ओर नेमिपनाको चक्रधारापनाको धारण न करें ? ॥ २७८ ॥ बलदेवका जीव पहले सुभानु हुआ था, फिर पहले स्वर्गमें देव हुआ, वहाँ से च्युत होकर विद्याधरोंका राजा हुआ, फिर चतुर्थ स्वर्गमें देव हुआ, इसके बाद शङ्ख नामका सेठ हुआ, फिर महाशुक्र स्वर्गमें देव हुआ, फिर नौवाँ बलभद्र हुआ, उसके बाद देव हुआ, और फिर तीर्थकर होगा ॥ २७९ ॥ कृष्णका जीव पहले अमृतरसायन हुआ, फिर तीसरे नरकमें गया, उसके बाद संसार-सागर में बहुत भारी भ्रमण कर यक्ष नामका गृहस्थ हुआ फिर निर्नामा नामका राजपुत्र हुआ, उसके बाद देव हुआ और उसके पश्चात् बुरा निदान करनेके कारण अपने शत्रु जरासन्धको मारनेवाला, चक्ररत्नका स्वामी कृष्ण नामका नारायण हुआ, इसके बाद प्रथम नरकमें उत्पन्न होनेके कारण बहुत दुःखोंका अनुभव कर रहा है और अन्त में वहाँ से निकलकर समस्त अनर्थोका विघात करनेवाला तीर्थंकर होगा ॥ २८०-२८१ ॥
श्लोक 282 से 288 : कर्मफल का उपदेश और पर्व का उपसंहार
कृष्णके जीवने चाण्डाल अवस्थामें मुनिके साथ द्रोह किया था इसलिए वह दुर्बुद्धि नरक गया और उन्ती कारणसे तपश्चरणके द्वारा राज्यलक्ष्मी पाकर अन्तमें उसके विनाशको प्राप्त हुआ इसलिए आचार्य कहते हैं कि परिग्रहका त्याग करनेवाले मुनियोंका पाप-बुद्धिसे थोड़ा भी अपकार मत करो ॥ २८२ ॥ जिस प्रकार सिंह हरिणको मार डालता है उसी प्रकार जिसने चाणूर मल्लको मार डाला था, जिस प्रकार वज्र कंस (कांसे) के टुकड़े-टुकड़े कर डालता है उसी प्रकार जिसने कंसके (मथुराके राजाके) टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे और जिसप्रकार मृत्यु बालकका हरण कर लेती है उसी प्रकार जिसने युद्धमें शिशुपालका हरण किया था- उसे पराजित किया था। ऐसा श्रीकृष्ण नारायण भला प्रतापी मनुष्योंमें सबसे मुख्य क्यों न हो ? ॥ २८३ ॥ जिस प्रकार सिंह बलवान् हाथीको जीतकर गरजता है उसी प्रकार शूरवीरताके सागर श्रीकृष्णने अतिशय बलवान् जरासन्धको जीतकर गरजना की थी, इन्होंने अपने समस्त शत्रुओंको जीत लिया था इसलिए ये विश्वविजयी कहलाये थे तथा जिस प्रकार इन्होंने बाल अवस्था में गायोंकी रक्षा की थी इसलिए गोप कहलाये थे उसी प्रकार इन्होंने तरुण अवस्थामें भी हाथमें केवल एक दण्ड धारणकर किसीके द्वारा अविजित इस तीन खण्डकी अखण्ड भूमिकी रक्षा की थी इसलिए बादमें भी वे गोप (पृथिवीके रक्षक) कहलाते थे ॥ २८४ ॥ देखो, कहाँ तो श्रीकृष्णको बड़े-बड़े समस्त शत्रुओंका नाश करनेसे उस आश्चर्यकारी लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई थी और कहां समस्त जगत्से जुदा रहकर निर्जन वनमें उनका समूल नाश हुआ सो ठीक ही है क्योंकि इस संसार में अपने किये हुए कर्मोंके अनुसार किसे क्या नहीं प्राप्त होता है? यथार्थमें संसाररूपी चक्र पहियेकी हालकी तरह घूमा ही करता है ।। २८५ ॥ देखो, श्रीकृष्णने पहले नरक आयुका बन्ध कर लिया था और उसके बाद सम्यग्दर्शन तथा नीर्थंकर नाम-कर्म प्राप्त किया था इसीलिए उन्हें राज्यका भार धारण करनेके बाद नरक जाना पड़ा। आचार्य कहते हैं कि हे बुद्धिमान् जन ! यदि आप लोग सुखके अभिलाषी हैं तो पद-पदपर आयु बन्धके लिए अखण्ड प्रयत्न करो अर्थात् प्रत्येक समय इस बातका बिचार रक्खो कि अशुभ आयुका बन्ध तो नहीं हो रहा है ।। २८६ ।। इन्हीं नेमिनाथ भगवान्के तीर्थमें ब्रह्मदत्त नामका बारहवाँ चक्रवर्ती हुआ था वह ब्रह्मा नामक राजा और चूड़ादेवी रानीका पुत्र था, उसका शरीर सात धनुष ऊँचा था और सात सौ वर्षकी उसकी आयु थी। वह सब चक्रवर्तियोंमें अन्तिम चक्रवर्ती था- उसके बाद कोई चक्रवर्ती नहीं हुआ ।। २८७-२८८ ॥
इस प्रकार आर्ष नाममे प्रसिद्ध, भगवद् गुणभद्राचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमे नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म नामक बलभद्र, कृष्ण नामक अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन करने वाला बहत्तरत्राँ पर्व समाप्त हुआ ।
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena