अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 182 to 192
श्लोक ( Shlok ) 182
एवं वैषयिकं सौख्यमन्वभूयाप्यतृप्तवान् । श्रद्धापञ्चव्रतापेतः प्रविष्टोऽसि तमस्तमः ॥ १८२ ॥
इस प्रकार विषयसम्बन्धी सुख भोगकर भी संतुष्ट नहीं हो सका और सम्यग्दर्शन तथा पाँच व्रतोंसे रहित होनेके कारण सप्तम नरकमें प्रविष्ट हुआ ।। १८२ ।।
“In this manner, even after indulging in the vast pleasures of the senses, you could never find true contentment. Consequently, because you were devoid of right perception (Samyagdarshana) and the five spiritual vows (Vratas), you entered the depths of the seventh hell. || 182 ||”
श्लोक ( Shlok ) 183
भीमां वैतरणीं तत्र प्रज्वलद्वारिपूरिताम् । प्रवेशितोऽसि पापिष्टः प्राक्शक्तया कृतसज्जनः ॥ १८३ ॥
वहाँ खौलते हुए जलसे भरी वैतरणी नामक भयंकर नदीमें तुझे पापी नारकियोंने घुसाया और तुझे जबर्दस्ती स्नान करना पड़ा ।॥ १८३ ॥
“There, in the terrifying river named Vaitarani, which is filled with scalding, boiling water, the sinful hell-beings forced you down and compelled you to bathe against your will. || 183 ||”
श्लोक ( Shlok ) 184
ज्वलज्ज्वालाकरालो अत्थाखण्डगण्डोपलाचले । ‘प्रधावितोऽसि तदृङ्कच्छिन्नच्छिन्नाखिलाङ्गकः ॥ १८४ ॥
कभी उन नारकियोंने तुझे जिसपर जलती हुई ज्वालाओंसे भयंकर उछल-उछलकर बड़ी-बड़ी गोल चट्टानें पड़ रही थीं ऐसे पर्वतपर दौड़ाया और तेरा समस्त शरीर टांकीसे छिन्न-भिन्न हो गया ॥ १८४ ॥
“At times, those hell-beings forced you to run across a mountain upon which massive boulders, made terrifying by leaping and blazing flames, were continuously crashing down; consequently, your entire body was completely shattered and hacked to pieces, as if struck by a chisel. || 184 ||”
श्लोक ( Shlok ) 185
कदम्बवालुकातापप्लुष्टाष्टावयवोऽप्यभूः । प्रज्वलश्चितिकाक्षिप्तो भस्मसाद्भावमागतः ॥ १८५ ॥
कभी भाड़की बालूकी गर्मीसे तेरे आठों अङ्ग जल जाते थे और कभी जलती हुई चितामें गिरा देनेसे तेरा समस्त शरीर जलकर राख हो जाता था ।। १८५ ।।
“At times, the intense heat of the furnace-like sands scorched all your eight limbs, while at other times, being cast into a blazing funeral pyre reduced your entire body to ashes. || 185 ||”
श्लोक ( Shlok ) 186
तप्तायस्पिण्डनिर्घातैश्चण्डैः सब्रूणितोऽप्यभूः । निस्त्रिंशच्छदसंछन्नवनेषु भ्रान्तवान्मुहुः ॥ १८६ ॥
अत्यन्त प्रचण्ड और तपाये हुए लोहेके घनोंकी चोटसे कभी तेरा चूर्ण किया जाता था तो कभी तलवार-जैसे पत्तोंसे आच्छादित वनमें बार-बार घुमाया जाता था ॥ १८६ ॥
“At times, you were crushed into fine powder by the impacts of exceedingly fierce and white-hot iron hammers; at other times, you were repeatedly forced to wander through a forest dense with foliage as sharp as swords. || 186 ||”
श्लोक ( Shlok ) 187
नानापक्षिमृगैः कालकौलेयककुलैरलम् । परस्पराभिघातेन ताडनेन च पीडितः ॥ १८७ ॥
अनेक प्रकारके पक्षी वनपशु और कालके समान कुत्तोंके द्वारा तू दुःखी किया जाता था तथा परस्पर की मारकाट एवं ताडनाके द्वारा तुझे पीड़ित किया जाता था ।। १८७ ॥
“You were grievously tormented by diverse species of vicious birds, wild beasts of the forest, and predatory hounds that resembled Death (Kala) personified; furthermore, you were continuously afflicted by the relentless mutual slaughter, carnage, and violent beatings inflicted by your fellow denizens. || 187 ||”
श्लोक ( Shlok ) 188
बद्धो बहुविधैर्बन्धैनिष्ठुरं निष्ठुराशयैः । कर्णोष्ठनासिकादीनां छेदनैर्बाधितो भृशम् ॥ १८८ ॥
दुष्ट आशयवाले नारकी तुझे बड़ी निर्दयताके साथ अनेक प्रकारके बन्धनोंसे बाँधते थे और कान ओठ तथा नाक आदि काटकर तुझे बहुत दुःखी करते थे ॥ १८८ ॥
“The malevolent hell-beings bound you with various kinds of fetters with utter ruthlessness, and caused you immense agony by severing your ears, lips, nose, and other limbs. || 188 ||”
श्लोक ( Shlok ) 189
पापैः समानशूलानामारोपणमवापिथ । एवं बहुविधं दुःखमवशोऽनुभवंश्चिरम् ॥ १८९ ॥
पापी नारकी तुझे कभी अनेक प्रकारके तीक्ष्ण शूलोंपर चढ़ा देते थे। इस तरह तूने परवश होकर वहाँ चिरकाल तक बहुत प्रकारके दुःख भोगे ।। १८९ ।।
“At times, the sinful hell-beings impaled you upon various kinds of razor-sharp spikes; in this manner, rendered utterly helpless and subject to the will of your tormentors, you endured manifold miseries there for an exceptionally long duration. || 189 ||”
श्लोक ( Shlok ) 190
प्रलापाक्रन्दरोदादिवानिरुद्धहरिद्वथा । शरणं प्रार्थयन्दैन्यादप्राप्यातीव दुःखितः ॥ १९० ॥
वहाँ तूने प्रलाप आक्रन्द तथा रोना आदिके शब्दोंसे व्यर्थ ही दिशाओंको व्याप्त कर बड़ी दीनतासे शरणकीप्रार्थना की परन्तु तुझे कहीं भी शरण नहीं मिली जिससे अत्यन्त दुःखी हुआ ।॥ १९० ॥
“There, filling the horizons in vain with your lamentations, frantic shrieks, and weeping, you pleaded for refuge with utter helplessness; yet, you found no sanctuary anywhere, which left you completely broken and consumed by the deepest agony. || 190 ||”
श्लोक ( Shlok ) 191 – 192
म्वायुरन्ते विनिर्याय ततो भूत्वा मृगाधिपः । श्रुत्पिपासादिभिर्वातातपवर्षादिभिश्च धिक् ॥ १९१ ॥’बाध्यमानः पुनः प्राणिहिंसया मांसमाहरन् । क्रूरः पापं समुच्चित्य पृथिवीं प्रथमामगाः ॥ १९२ ॥
अपनी आयु समाप्त होनेपर तू वहाँ से निकलकर सिंह हुआ और वहाँ भी भूख-प्यास वायु गर्मी वर्षा आदि की बाधासे अत्यन्त दुःखी हुआ। वहाँ तू प्राणिहिंसा कर मांसका आहार करता था इसलिए क्रूरताके कारण पापका संचयकर पहले नरक गया ॥ १९१-१९२ ॥
“Upon the expiration of your life span in that realm, you emerged from there and were reborn as a lion; even in that animal existence, you were grievously afflicted by the hardships of hunger, thirst, harsh winds, scorching heat, and torrential rains. In that state, you subsisted on a diet of flesh by slaughtering living beings; consequently, due to such unbridled cruelty, you accumulated immense negative karma (Papa) and descended into the first hell. || 191–192 ||”
श्लोक 193 से 202
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