शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222
यः कर्मव्यतिहारेण नोपकारार्णवं तरेत् । स जीवन्नपि निर्जीवो निर्गन्धप्रसवोपमः ॥ २२२ ॥
जो मनुष्य बदलेके कार्यसे उपकार रूपी समुद्रको नहीं तिरता है अर्थात् उपकारी मनुष्यका प्रत्युपकार नहीं करता है वह गन्ध रहित फूलके समान जीता हुआ भी मरेके समान है ।। २२२ ।।
“A person who does not cross the ocean of kindness by offering a reciprocal favor—that is, one who fails to repay the gratitude owed to a benefactor—is like a flower completely devoid of fragrance; though alive, such a person is no better than dead.” [222]
श्लोक ( Shlok ) 223
कृकवाकू च चेदेवमुपकारविदौ कथम् । मनुष्यो जरयत्यङ्गे न चेदुपकृतं खलः ॥ २२३ ॥
जब ये दो मुर्गे इस प्रकार उपकार मानने वाले हैं तब फिर मनुष्य अपने शरीरमें जीर्ण क्यों होता है ? यदि उसने उपकार नहीं किया तो वह दुष्ट ही है ।। २२३ ।।
“When even these two roosters possess such a profound sense of gratitude, why then does a human being allow his life to waste away in vain within his body? If a person fails to return a kindness, they are truly wicked.” [223]
श्लोक ( Shlok ) 224
कदाचित्काललाभेन नृपो घनरथाह्वयः । चोदितः स्वगतं धीमानिति देहाद्यचिन्तयत् ॥ २२४ ॥
किसी एक दिन काललब्धिसे प्रेरित हुए बुद्धिमान् राजा घनरथ अपने मनमें शरीरादिका इस प्रकार विचार करने लगे ॥ २२४ ॥
“One day, driven by the ripe arrival of his cosmic time (Kala-labdhi), the wise King Ghanaratha began to deeply contemplate the true nature of his physical body and worldly existence in this manner.” [224]
श्लोक ( Shlok ) 225
धिक्कष्टमिष्टमित्येतत् शरीरं जन्तुरावसेत् । अवस्करगृहाच्चैनं नापैत्यतिजुगुप्सितम् ॥ २२५ ॥
इस जीवको धिक्कार है। बड़े दुःखकी बात है कि यह जीव शरीरको इष्ट समझकर उसमें निवास करता है परन्तु यह इस शरीरको विष्ठाके घरसे भी अधिक घृणास्पद नहीं जानता ॥ २२५॥
“Fie upon this worldly soul! It is a matter of profound sorrow that this soul considers the body to be desirable and happily resides within it, utterly failing to realize that this physical frame is far more repulsive than a house filled with filth.” [225]
श्लोक ( Shlok ) 226
तर्पकाणि सुखान्याहुः कानि’ तान्यत्र देहिनाम् । मोहः कोऽप्यतिदुःखेषु सुखास्था पापहेतुषु ॥ २२६ ॥
जो संतोष उत्पन्न करनेवाले हों उन्हें सुख कहते हैं। परन्तु ऐसे सुख इस संसारमें प्राणियोंको मिलते ही कहाँ हैं ? यह कोई मोहका ही उदय समझना चाहिए कि जिसमें यह प्राणी पापके कारणभूत दुःखोंको सुख समझने लगता है ॥ २२६ ।।
“That which brings true contentment is defined as real happiness. Yet, where in this mundane world do living beings ever find such genuine bliss? It must be understood as nothing but the overwhelming rise of delusion (Moha-udaya) that this creature begins to mistake agonizing, sin-inducing miseries for true happiness.” [226]
श्लोक ( Shlok ) 227
जन्माद्यन्तर्मुहूर्त चेज्जीवितं निश्चितं ततः । न क्षणे च कुतो जन्मी जायेत न हिते रतः ॥ २२७ ॥
जन्मसे लेकर अन्तमुहूर्त पर्यन्त यदि जीवके जीवित रहनेका निश्चय होता तो भी ठीक है परन्तु यह क्षणभर भी जीवित रहेगा जब इस बातका भी निश्चय नहीं है तब यह जीव आत्महित करनेमें तत्पर क्यों नहीं होता ? ।। २२७ ।।
“Even if it were certain that a living being would survive for just an Antarmuhurta (a brief forty-eight-minute span) from the moment of birth, it might still offer some solace. However, when there is absolutely no certainty that this soul will survive for even a single, fleeting moment, why then does this living being not instantly dedicate itself to the realization of its soul’s true welfare?” [227]
श्लोक ( Shlok ) 228
बन्धवो बन्धनान्येते सम्पदो विपदोऽङ्गिनाम् । न चेदेवं कुतः सन्तो वनान्तं प्राक्तनाः गताः ॥ २२८॥
ये भाई-बन्धु एक प्रकारके बन्धन हैं और सम्पदाएँ भी प्राणियोंके लिए विपत्ति रूप हैं। यदि ऐसा न होता तो पहलेके सज्जन पुरुष जङ्गल के मध्य क्यों जाते ? ॥ २२८ ॥
“These brothers and kinsmen are but a form of bondage, and worldly riches are, in reality, nothing but calamity for living beings. If this were not true, why would the noble souls of the past have abandoned everything to head into the depths of the forest?” [228]
श्लोक ( Shlok ) 229
वितर्कयन्तमित्येनं प्राप्य लौकान्तिकामराः । विज्ञायावधिविज्ञानादनुवक्तु’ तदीप्सितम् ॥ २२९ ॥
इधर महाराज घनरथ ऐसा चिन्तवन कर रहे थे कि उसी समय अवधिज्ञानसे जानकर लौकान्तिक देव उनके इष्ट पदार्थका समर्थन करनेके लिए आ पहुँचे ।। २२९ ॥
“While King Ghanaratha was thus deeply immersed in these contemplations, the Laukantika deities, having perceived his detachment through their clairvoyant knowledge (Avadhijnana), arrived at that very moment to reinforce and honor his noble intent.” [229]
श्लोक ( Shlok ) 230 – 231
देव देवस्य को वक्ता देव एवावगच्छति । साधु हेयमुपादेयं चार्थमित्यादिसंस्तवैः ॥ २३० ॥स्तुत्वा सतामभिष्टुत्यमभ्यर्च्य प्रसवैनिजैः । नियोगमनुपाल्य स्वं स्वं धामैतु’ नभोऽगमन् ॥ २३१ ॥
वे कहने लगे कि हे देव ! आपके लिए हितका उपदेश कौन दे सकता है? आप स्वयं ही हेय उपादेय पदार्थको जानते हैं। इस प्रकार सज्जनोंके द्वारा स्तुति करने योग्य भगवान् घनरथकी लौकान्तिक देवोंने स्तुति की। स्वर्गीय पुष्पोंसे उनकी पूजा की, अपना नियोग पालन किया और यह सब कर वे अपने-अपने स्थान पर जानेके लिए आकाशमें जा पहुँचे ।। २३०-२३१ ॥
“They began to say, ‘O Divine One! Who possesses the wisdom to preach what is beneficial to you? You yourself are fully awakened to that which must be discarded (Heya) and that which must be embraced (Upadeya).’ In this manner, the Laukantika deities sang praises of Lord Ghanaratha, who is truly worthy of adoration by the most virtuous souls. They worshiped him with celestial blossoms, fulfilled their divine duty (Niyoga), and having done so, ascended into the skies to return to their respective abodes.” [230-231]
श्लोक 232 से 244
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221
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