अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन
श्लोक 1 से 11 : मंगलाचरण, महापुराण की महिमा एवं कथा का उद्देश्य
आचार्य भगवान महावीर की स्तुति करते हुए उनके केवलज्ञान, शांति और वीतरागता का गुणगान करते हैं। वे बताते हैं कि महापुराण संसार-सागर से पार कराने वाला दिव्य ग्रंथ है। कथा और कथावाचक दोनों तभी श्रेष्ठ माने जाते हैं जब वे दोषरहित हों। सच्ची कथा वही है जिसके श्रवण से जीव को हेय और उपादेय का विवेक प्राप्त हो तथा धर्ममार्ग की प्रेरणा मिले।
श्लोक 12 से 22 : पुरूरवा भील का धर्म ग्रहण और देवगति
सागरसेन मुनिराज वन में भटकते हुए पुरूरवा भील के समीप पहुँचे। प्रारम्भ में पुरूरवा उन्हें हिंसा करने के लिए उद्यत हुआ, परन्तु अपनी पत्नी के समझाने पर उसने मुनिराज को प्रणाम किया और उनके उपदेश से प्रभावित होकर मधु आदि तीन प्रकार के त्याग का व्रत धारण किया। उसने जीवनभर श्रद्धापूर्वक व्रत का पालन किया और मृत्यु के पश्चात् सौधर्म स्वर्ग में देव के रूप में उत्पन्न हुआ।
श्लोक 23 से 31 : कोसल देश का आदर्श स्वरूप
भरत क्षेत्र के कोसल देश का वर्णन आदर्श राज्य के रूप में किया गया है। वहाँ किसी प्रकार का भय, अभाव, अत्याचार या दुःख नहीं था। लोग संतुष्ट, सदाचारी और धर्मनिष्ठ थे। भूमि, पर्वत, वन और सरोवर प्राकृतिक सौन्दर्य एवं समृद्धि से परिपूर्ण थे तथा सम्पूर्ण राज्य में शांति और सदाचार का वातावरण विद्यमान था।
श्लोक 32 से 41 : अयोध्या (विनीता) नगरी का वैभव
कोसल देश के मध्य स्थित विनीता (अयोध्या) नगरी इन्द्र द्वारा निर्मित दिव्य नगरी थी। वहाँ जिनपूजा, शिक्षा, धर्म, सम्यक् आचरण और समृद्धि का अद्भुत संगम था। प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान, धर्म और सदाचार से युक्त था। नगर की व्यवस्था, सुरक्षा तथा नागरिकों का उच्च चरित्र उसे स्वर्ग के समान गौरवशाली बनाते थे।
श्लोक 42 से 51 : भरत चक्रवर्ती और मरीचि का जन्म
अयोध्या के अधिपति भरत चक्रवर्ती अपने तेज, पराक्रम और महान गुणों से समस्त राजाओं एवं देवों द्वारा सम्मानित थे। उनकी पत्नी अनन्तमति से मरीचि नामक ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ। भगवान ऋषभदेव की दीक्षा के समय मरीचि ने भी वैराग्य धारण कर दीक्षा ग्रहण की और प्रारम्भ में कठोर तप एवं परीषहों का धैर्यपूर्वक पालन किया।
श्लोक 52 से 61 : मरीचि का मिथ्यात्व और परिव्राजक मत की स्थापना
दीर्घकाल तक तप करने के पश्चात् मरीचि तप के कष्टों को सहन नहीं कर सका। वनदेवताओं के संकेत पर उसने दिगम्बर मुनि-वेष छोड़कर परिव्राजक दीक्षा धारण कर ली। उसने तीर्थंकर की दिव्यध्वनि सुनने के बाद भी सम्यक् धर्म स्वीकार नहीं किया और अपने पृथक मत की स्थापना करने का अभिमान पाल लिया। इस प्रकार मिथ्यात्व और मान के प्रभाव से वह असत्य मार्ग पर स्थिर रहा।
श्लोक 62 से 71 : मिथ्यादर्शन का प्रचार और पुनर्जन्म
मरीचि बाह्य तप और आडम्बर का प्रदर्शन करता रहा, किन्तु सम्यग्ज्ञान से रहित होने के कारण उसके विचार तत्त्वाभास मात्र थे। उसने कपिल आदि शिष्यों को अपने कल्पित सिद्धान्तों का उपदेश दिया। मृत्यु के पश्चात् वह अनेक बार देव और ब्राह्मण कुलों में जन्म लेकर पुनः उसी परिव्राजक मत का प्रचार करता रहा, जिससे उसका संसार-चक्र निरन्तर चलता रहा।
श्लोक 72 से 83: अनेक जन्मों में मिथ्यामार्ग और दुःखद परिणाम
पुष्यमित्र, अग्निसह, अग्निमित्र, भारद्वाज तथा स्थावर आदि अनेक जन्मों में भी उसने परिव्राजक मत का ही प्रचार किया। मिथ्याशास्त्रों के प्रसार के कारण उसे देवगति तो प्राप्त हुई, किन्तु बाद में अधोगतियों में भी जन्म लेना पड़ा और उसने असंख्य वर्षों तक विविध योनियों में दुःख भोगे। अंततः वह पुनः राजगृह में स्थावर नामक ब्राह्मण के रूप में जन्मा।
श्लोक 84 से 91 : विश्वनन्दी और विश्वभूति का वैराग्य
स्थावर सम्यग्दर्शन से रहित होने के कारण उसका ज्ञान, तप और साधना निष्फल रहे। आगे चलकर वह विश्वनन्दी के रूप में उत्पन्न हुआ। उसी समय राजा विश्वभूति ने संसार की नश्वरता का अनुभव कर अपने छोटे भाई को राज्य तथा पुत्र को युवराज पद देकर स्वयं तीन सौ राजाओं के साथ दिगम्बर दीक्षा ग्रहण की और दीर्घकाल तक कठोर तप एवं समता का पालन किया।
श्लोक 92 से 102 : विशाखनन्द की ईर्ष्या और अन्याय
एक दिन विश्वनन्दी अपने उद्यान में विहार कर रहा था। उसे देखकर चचेरे भाई विशाखनन्द के मन में उस उद्यान को प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। उसके पिता ने पुत्रमोहवश छलपूर्वक विश्वनन्दी को युद्ध के बहाने राज्य से बाहर भेज दिया और उसकी अनुपस्थिति में वह उद्यान विशाखनन्द को दे दिया। इस प्रकार लोभ और पक्षपात के कारण अन्यायपूर्ण निर्णय लिया गया, जो आगे के संघर्ष का कारण बना।
श्लोक 103 से 111 : विश्वनन्दी का क्षमाभाव और वैराग्य
विश्वनन्दी को जब ज्ञात हुआ कि उसके चाचा ने छलपूर्वक उसका उद्यान अपने पुत्र विशाखनन्द को दे दिया है, तब वह अत्यन्त क्रोधित होकर लौट आया। उसने अपने बल से कैंथा का वृक्ष उखाड़ दिया और पत्थर का स्तम्भ भी तोड़ डाला, जिससे विशाखनन्द भयभीत होकर भागने लगा। किन्तु उसे भयभीत देखकर विश्वनन्दी के हृदय में करुणा जागृत हुई। उसने न केवल उसका अपराध क्षमा कर दिया, बल्कि अपना उद्यान भी उसे सौंप दिया। इसके बाद संसार की नश्वरता का विचार कर सम्भूत गुरु के समीप दिगम्बर दीक्षा ग्रहण कर ली। इस घटना से विशाखभूति को भी अपने अपराध का पश्चात्ताप हुआ और उसने संयम धारण कर प्रायश्चित्त किया।
श्लोक 112 से 122 : उपहास, निदान और त्रिपृष्ठ के रूप में जन्म
विश्वनन्दी कठोर तप करते हुए मथुरा पहुँचे, जहाँ अत्यन्त दुर्बल अवस्था में एक गाय के धक्के से गिर पड़े। वहाँ उपस्थित विशाखनन्द ने उनके पूर्व पराक्रम का उपहास किया। इस उपहास से मुनि के मन में क्षणिक कषाय उत्पन्न हुई और उन्होंने मन ही मन उसके दुष्परिणाम की भावना कर ली। अंततः निदान सहित संन्यास के कारण वे महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए और विशाखभूति का जीव भी वहीं उत्पन्न हुआ। वहाँ से च्युत होकर विशाखभूति विजय तथा विश्वनन्दी त्रिपृष्ठ नामक अर्धचक्रवर्ती के रूप में जन्मे।
श्लोक 123 से 131 : त्रिपृष्ठ का वैभव और अश्वग्रीव का जन्म
त्रिपृष्ठ जन्म से ही असाधारण तेज, पराक्रम और ऐश्वर्य से सम्पन्न थे। उनका प्रभाव समस्त पृथ्वी पर फैल गया और वे अर्धचक्रवर्ती के रूप में प्रतिष्ठित हुए। दूसरी ओर, अनेक भवों में दुःख भोगने के बाद विशाखनन्द का जीव विद्याधर राजा मयूरग्रीव के पुत्र अश्वग्रीव के रूप में उत्पन्न हुआ। दोनों अपने-अपने राज्य में वैभवपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।
श्लोक 132 से 143 : स्वयंप्रभा के विवाह का प्रस्ताव
दक्षिण विजयार्ध पर्वत के रथनूपुर नगर के राजा ज्वलनजटी अपनी शक्ति, विद्या और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी पुत्री स्वयंप्रभा अनुपम सौन्दर्य और शुभ लक्षणों से सम्पन्न थी। निमित्तज्ञ पुरोहित ने भविष्यवाणी की कि वह भविष्य में नारायण त्रिपृष्ठ की महादेवी बनेगी। इस भविष्यवाणी के आधार पर ज्वलनजटी ने अपने मन्त्री को विवाह-प्रस्ताव एवं उपहारों सहित पोदनपुर के राजा प्रजापति के पास भेजा।
श्लोक 144 से 151 : वैवाहिक सम्बन्ध का प्रस्ताव
राजा ज्वलनजटी ने अपने पत्र में दोनों राजवंशों की प्राचीन मैत्री और उच्च कुल-परम्परा का उल्लेख करते हुए अपनी पुत्री स्वयंप्रभा का विवाह त्रिपृष्ठ से करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों कुल समान रूप से प्रतिष्ठित हैं, अतः यह सम्बन्ध दोनों वंशों के लिए गौरव का विषय होगा।
श्लोक 152 से 161 : विवाह और अश्वग्रीव पर विजय
राजा प्रजापति ने प्रसन्नतापूर्वक इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। ज्वलनजटी ने स्वयंप्रभा का भव्य विवाह त्रिपृष्ठ के साथ सम्पन्न कराया तथा उन्हें सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी जैसी सिद्ध विद्याएँ भी प्रदान कीं। यह समाचार सुनकर अश्वग्रीव क्रोधित हो गया और विशाल सेना लेकर युद्ध के लिए आया। त्रिपृष्ठ ने भी अपनी सेना सहित उसका सामना किया और युद्ध में अपने अद्वितीय पराक्रम से उसे पराजित कर दिया।
श्लोक 162 से 171 : अश्वग्रीव का वध और त्रिपृष्ठ का अधःपतन
मायायुद्ध में पराजित होकर अश्वग्रीव ने चक्र चलाया, किन्तु वह त्रिपृष्ठ के पास लौट आया। त्रिपृष्ठ ने उसी चक्र से अश्वग्रीव का वध कर दिया और अर्धचक्रवर्ती पद प्राप्त किया। उन्होंने ज्वलनजटी को दोनों श्रेणियों का चक्रवर्ती भी बनाया। यद्यपि उन्होंने दीर्घकाल तक राज्य किया, तथापि भोगों की अतृप्त लालसा और अत्यधिक परिग्रह के कारण मृत्यु के बाद सातवें नरक में जन्म लिया। वहाँ से निकलकर वे सिंह बने, पुनः पाप के कारण नरक गए और फिर हिमवत् पर्वत पर सिंह के रूप में उत्पन्न हुए।
श्लोक 172 से 181 : मुनियों द्वारा पूर्व वैभव का स्मरण
हिमवत् पर्वत पर सिंह रूप में जन्मे त्रिपृष्ठ को देखकर अजितंजय चारण मुनि ने उसे उसके पूर्वजन्मों का स्मरण कराया। उन्होंने बताया कि त्रिपृष्ठ के रूप में उसने राज्य, ऐश्वर्य, सुन्दर स्त्रियाँ, दिव्य भोजन, सुगन्ध, संगीत, नृत्य और समस्त इन्द्रिय-विषयों का भरपूर उपभोग किया था। साथ ही उसने तीनों खण्डों के अधिपति होने का अभिमान भी किया था।
श्लोक 182 से 192 : नरक और सिंह योनि के दुःख
मुनि ने सिंह को समझाया कि विषयभोगों में आसक्ति और सम्यग्दर्शन के अभाव के कारण उसे सप्तम नरक में असहनीय यातनाएँ सहनी पड़ीं। वहाँ वैतरणी, अग्नि, तप्त शिलाएँ, शूल, हिंसक जीव और अनेक प्रकार के दारुण कष्ट भोगने पड़े। नरक से निकलने पर भी सिंहयोनि में भूख, प्यास, हिंसा और क्रूरता के कारण उसने पुनः पाप का संचय किया और दुःखों का चक्र चलता रहा।
श्लोक 193 से 202 : जातिस्मरण और आत्मजागरण
मुनि के उपदेश से सिंह को अपने पूर्वजन्मों का जातिस्मरण हो गया। संसार के अनन्त दुःखों का स्मरण कर वह पश्चात्ताप से भर उठा और उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। तब मुनि ने उसे पुरूरवा भील से लेकर मरीचि तथा अन्य अनेक भवों का इतिहास सुनाया और बताया कि सम्यक् मार्ग का अनादर तथा मिथ्यात्व के प्रचार के कारण वह अनन्त काल तक जन्म-मरण, इष्ट-वियोग, अनिष्ट-संयोग तथा अनेक योनियों के दुःख भोगता रहा। इस प्रकार उसके भीतर सम्यक्त्व की जागृति का आधार निर्मित हुआ।
श्लोक 203 से 211: सिंह का सम्यग्दर्शन और श्रावक व्रत ग्रहण
चारण मुनि ने सिंह को उसके पूर्वभवों का स्मरण कराते हुए बताया कि भविष्य में वह दसवें भव में अंतिम तीर्थंकर होगा। उन्होंने उसे मिथ्यामार्ग का त्याग कर आप्त, आगम और तत्त्वों में श्रद्धा रखने का उपदेश दिया। मुनियों के उपदेश से सिंह के भीतर सम्यग्दर्शन जागृत हुआ। उसने श्रद्धापूर्वक श्रावक व्रत धारण किए, क्रूरता का परित्याग कर दया को अपनाया और मांसाहार त्यागने के लिए निराहार रहने का कठिन व्रत स्वीकार किया।
श्लोक 212 से 222 : सिंहकेतु देव और कनकोज्ज्वल का जन्म
सिंह ने अपने व्रतों का अन्त तक दृढ़तापूर्वक पालन किया और शांतचित्त होकर शरीर त्याग दिया। इसके फलस्वरूप वह सौधर्म स्वर्ग में सिंहकेतु नामक देव बना। वहाँ दिव्य सुखों का उपभोग करने के बाद वह विदेह क्षेत्र के कनकप्रभ नगर में कनकोज्ज्वल नामक विद्याधर राजकुमार के रूप में जन्मा।
श्लोक 223 से 232 : धर्मोपदेश, दीक्षा और हरिषेण का जन्म
कनकोज्ज्वल ने प्रियमित्र अवधिज्ञानी मुनि से धर्म का स्वरूप पूछा। मुनि ने उसे दया, धर्म और आत्मकल्याण का उपदेश दिया। इस उपदेश से प्रभावित होकर उसने राज्य और भोगों का त्याग कर संयम धारण किया तथा समाधिपूर्वक देह त्यागकर सातवें स्वर्ग में देवत्व प्राप्त किया। वहाँ से च्युत होकर वह कोसल देश के साकेत नगर में राजा वज्रसेन के पुत्र हरिषेण के रूप में जन्मा।
श्लोक 233 से 241 : हरिषेण का वैराग्य और सूर्यप्रभ देव
हरिषेण ने राज्यलक्ष्मी का उपभोग करने के पश्चात् उसकी नश्वरता को समझा और श्रुतसागर गुरु के पास दीक्षा ग्रहण कर ली। उत्तम संयम और शास्त्रज्ञान से युक्त जीवन व्यतीत कर वे महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से पुनः जन्म लेकर प्रियमित्र चक्रवर्ती बने, जिन्होंने क्षेमंकर जिनेन्द्र के उपदेश से वैराग्य ग्रहण किया, पुत्र को राज्य सौंपकर दीक्षा ली और अंततः सहस्त्रार स्वर्ग में सूर्यप्रभ देव के रूप में उत्पन्न हुए।
श्लोक 242 से 252 : नन्द मुनि और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध
सूर्यप्रभ देव स्वर्ग से च्युत होकर नन्द नामक राजकुमार के रूप में उत्पन्न हुए। उन्होंने प्रोष्ठिल गुरु से धर्म सुनकर सम्यग्दर्शन प्राप्त किया, संयम धारण किया और ग्यारह अंगों का ज्ञान अर्जित किया। दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारणभावनाओं का चिंतन कर उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। मृत्यु के पश्चात् वे अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में इन्द्र बने। जब उनके स्वर्गजीवन के अंतिम छह माह शेष रहे, तब राजा सिद्धार्थ के भवन में प्रतिदिन रत्नों की वर्षा होने लगी, जो तीर्थंकर के अवतरण का शुभ संकेत था।
श्लोक 253 से 261 : गर्भकल्याणक और शुभ स्वप्न
आषाढ़ शुक्ल षष्ठी की रात्रि में रानी प्रियकारिणी ने सोलह मंगलमय स्वप्न तथा एक अतिरिक्त हाथी का स्वप्न देखा। प्रातः उन्होंने राजा सिद्धार्थ को अपने स्वप्न सुनाए और राजा ने उनके शुभ फल का वर्णन किया। इसके बाद देवों ने अत्यन्त वैभव के साथ गर्भकल्याणक का अभिषेक सम्पन्न किया तथा आवश्यक दिव्य व्यवस्थाएँ कर अपने-अपने लोक लौट गए।
श्लोक 262 से 270 : भगवान महावीर का जन्मोत्सव
नौ माह पूर्ण होने पर चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के शुभ अवसर पर रानी प्रियकारिणी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर भगवान महावीर बने। उनके जन्म से देव, मनुष्य और तिर्यंच सभी आनंदित हो उठे। आकाश से पुष्पवृष्टि हुई, मंगलध्वनियाँ गूँज उठीं, स्त्रियों ने नृत्य किया और समस्त वातावरण उत्सवमय हो गया।
श्लोक 271 से 281 : जन्माभिषेक और श्रीवर्धमान नामकरण
सौधर्मेन्द्र ने नवजात बालक का सुमेरु पर्वत पर ले जाकर पाण्डुकशिला पर दिव्य अभिषेक किया। उन्होंने स्तुति करते हुए कहा कि यह अभिषेक बालक की शुद्धि के लिए नहीं, बल्कि तीर्थंकर परम्परा की पवित्र परिपाटी है। तत्पश्चात् उन्होंने बालक का वीर तथा श्रीवर्धमान नाम रखा। देवों ने उत्सव मनाकर बालक को माता की गोद में पुनः स्थापित किया। ग्रंथ में भगवान महावीर के दिव्य लक्षणों, आयु, कद और जन्मजात विशेष गुणों का भी वर्णन किया गया है।
श्लोक 282 से 293 : सन्मति और महावीर नाम की प्रतिष्ठा
भगवान महावीर के जन्म के बाद सञ्जय और विजय नामक चारण मुनियों का संदेह केवल उनके दर्शन मात्र से दूर हो गया। उन्होंने बालक को भावी सन्मति तीर्थंकर घोषित किया। भगवान के अनुपम गुणों के कारण सभी विशेषण उन्हीं पर सार्थक प्रतीत होते थे। इसी समय देवराज इन्द्र की सभा में उनकी वीरता की चर्चा हुई, जिसे परखने के लिए संगम देव विशाल सर्प का रूप धारण कर बालकों के खेलस्थल पर पहुँचा। अन्य सभी बालक भयभीत होकर भाग गए, किन्तु कुमार महावीर निर्भय बने रहे।
श्लोक 294 से 301 : महावीर की निर्भीकता और दीक्षा की तैयारी
कुमार महावीर उस विशाल सर्प पर भी निर्भय होकर खेलते रहे। उनकी अद्भुत निर्भीकता से प्रभावित होकर संगम देव ने उनकी स्तुति की और उन्हें महावीर नाम प्रदान किया। तीस वर्ष की आयु पूर्ण होने पर भगवान को पूर्वभवों का स्मरण हुआ। लौकान्तिक देवों ने उनकी स्तुति की, देवसमूह ने निष्क्रमण कल्याणक सम्पन्न किया और भगवान महावीर बन्धुजनों से विदा लेकर चन्द्रप्रभा पालकी में आरूढ़ होकर षण्ड वन की ओर दीक्षा ग्रहण करने के लिए प्रस्थान कर गए।
श्लोक 302 से 311 : भगवान् महावीर की दीक्षा और परिग्रह-त्याग की पूर्णता
भगवान् महावीर षण्डवन पहुँचकर पालकी से उतरे और उत्तराभिमुख होकर रत्नमयी शिला पर बैठ गए। मङ्गसिर कृष्ण दशमी की संध्या में उन्होंने सभी बाह्य एवं आन्तरिक परिग्रहों का त्याग कर दिगम्बर संयम धारण किया। इन्द्र ने भगवान् द्वारा त्यागे गए वस्त्र, आभूषण और केशों का अत्यन्त श्रद्धा से संग्रह एवं पूजन किया। तपलक्ष्मी ने मानो उनका आलिंगन किया और उनके पूर्ण निर्मन्थ (निःपरिग्रह) स्वरूप की महिमा प्रकट हुई। इस प्रकार भगवान् का संयम केवल बाह्य त्याग नहीं, बल्कि आन्तरिक कषायों के पूर्ण परित्याग का आदर्श बन गया।
श्लोक 312 से 322 : मनःपर्ययज्ञान, प्रथम आहार और दान का महात्म्य
संयम ग्रहण करते ही भगवान् महावीर को चौथा ज्ञान अर्थात् मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ और वे अप्रमत्त गुणस्थान में स्थित होकर सामायिक चरित्र से विभूषित हुए। देवगण उनकी स्तुति कर अपने-अपने लोक लौट गए। पारणा के दिन भगवान् कूलग्राम पहुँचे, जहाँ राजा कूल ने अत्यन्त श्रद्धा से उनका स्वागत किया और विधिपूर्वक खीर का आहार समर्पित किया। इस महान दान के प्रभाव से उसके घर पंचाश्चर्यों की वर्षा हुई, जिससे दान, श्रद्धा और संयम के महत्त्व का प्रतिपादन हुआ।
श्लोक 323 से 330 : तपोवन में प्रवेश और धर्मध्यान
आहार ग्रहण करने के बाद भगवान् महावीर एकान्त स्थानों में तप करने के उद्देश्य से निकल पड़े। उन्होंने विषय-विकारों, कषायों, उपसर्गों और मोह से भरे संसाररूपी वन का त्याग कर महाव्रत, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र से युक्त तपोवन में प्रवेश किया। वहाँ वे निःशंक भाव से विविध योगों का अभ्यास करते हुए बार-बार धर्म्यध्यान का चिन्तन करते रहे। इस प्रकार उनका सम्पूर्ण जीवन आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग की साधना का आदर्श बन गया।
श्लोक 331 से 342 : महादेव का उपसर्ग और चन्दना की विपत्ति
उज्जयिनी के अतिमुक्तक श्मशान में ध्यानस्थ भगवान् महावीर की परीक्षा लेने के लिए महादेव रुद्र ने वेताल, सर्प, सिंह, हाथी, अग्नि, वायु और भीलों की सेना जैसे अनेक भयंकर उपसर्ग उत्पन्न किए, किन्तु भगवान् की समाधि तनिक भी विचलित नहीं हुई। अन्ततः रुद्र ने उनकी वीरता स्वीकार कर उनकी स्तुति की। इसके पश्चात् चेटक की पुत्री चन्दना का विद्याधर द्वारा अपहरण हुआ और अंततः वह एक सेठ के घर दासी के रूप में अत्यन्त कष्टमय जीवन व्यतीत करने लगी।
श्लोक 343 से 352 : चन्दना द्वारा आहारदान और केवलज्ञान की प्राप्ति
कौशाम्बी में भगवान् महावीर आहार के लिए पहुँचे। भगवान् के दर्शन से चन्दना के बन्धन स्वतः टूट गए, उसका पात्र स्वर्णमय हो गया और साधारण कोदो का भात उत्तम शालि-भात में परिवर्तित हो गया। उसने परम श्रद्धा से भगवान् को आहार अर्पित किया, जिसके फलस्वरूप पंचाश्चर्य प्रकट हुए और उसका परिवार से पुनर्मिलन हुआ। इसके पश्चात् बारह वर्षों की कठोर साधना पूर्ण कर भगवान् ऋजुकूला नदी के तट पर शुक्लध्यान द्वारा चारों घातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान एवं अनन्त चतुष्टय को प्राप्त हुए।
श्लोक 353 से 362 : समवसरण, इन्द्रभूति गौतम का संशय-निवारण
केवलज्ञान प्राप्त होने पर भगवान् सयोगकेवली बने और इन्द्र ने ज्ञानकल्याणक की पूजा तथा समवसरण की रचना सम्पन्न की। दिव्यध्वनि के निमित्त इन्द्र विद्वान् ब्राह्मण इन्द्रभूति गौतम को भगवान् के समक्ष लाए। गौतम ने जीव के अस्तित्व और स्वरूप के विषय में प्रश्न किया। भगवान् ने स्पष्ट किया कि जीव चेतन द्रव्य है, वह कर्ता और भोक्ता है, द्रव्यरूप से नित्य तथा पर्यायरूप से निरन्तर परिवर्तनशील है।
श्लोक 363 से 372 : गौतम का दीक्षित होना और प्रथम गणधर बनना
भगवान् ने जीव के संसारी और मुक्त दोनों स्वरूपों का युक्तिपूर्वक निरूपण किया तथा अनन्त जीवों और मोक्ष के सिद्धान्त को स्पष्ट किया। भगवान् के उपदेश से इन्द्रभूति गौतम का संशय दूर हो गया और उन्होंने पाँच सौ ब्राह्मण शिष्यों सहित संयम ग्रहण किया। शीघ्र ही उन्हें सात ऋद्धियाँ तथा समस्त अंगों और पूर्वों का ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने आगम की रचना की और भगवान् महावीर के प्रथम गणधर के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
श्लोक 373 से 385 : तीर्थ की स्थापना और धर्मदेशना
भगवान् महावीर के अन्य दस गणधर भी क्रमशः दीक्षित हुए और ग्यारह गणधरों सहित विशाल जिनसंघ की स्थापना हुई। संघ में हजारों मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित हुए। भगवान् ने अर्धमागधी भाषा में छह द्रव्य, सात तत्त्व, संसार, मोक्ष तथा प्रमाण, नय और निक्षेप का विस्तृत उपदेश दिया। उनके उपदेश से अनेक लोगों ने संयम, देशसंयम अथवा सम्यग्दर्शन धारण किया। तत्पश्चात् वे राजगृह के विपुलाचल पर्वत पर विराजमान हुए, जहाँ राजा श्रेणिक उनके दर्शनार्थ पहुँचे।
श्लोक 386 से 396 : खदिरसार भील का व्रत और धर्मनिष्ठा
राजा श्रेणिक के पूर्वभव का वर्णन करते हुए गणधर गौतम ने बताया कि पूर्वजन्म में वे खदिरसार नामक भील थे। समाधिगुप्त मुनि के उपदेश से उन्होंने धर्म का स्वरूप जाना और कौए के मांस का त्याग करने का व्रत स्वीकार किया। असाध्य रोग होने पर वैद्यों ने कौए का मांस औषधि के रूप में खाने की सलाह दी, किन्तु खदिरसार ने प्राणों की अपेक्षा व्रत की रक्षा को अधिक महत्त्व दिया और किसी भी परिस्थिति में अपना व्रत भंग नहीं किया।
श्लोक 397 से 413 : व्रत की दृढ़ता और देवगति की प्राप्ति
खदिरसार के साले शूरवीर ने भी उसे व्रत त्यागने के लिए समझाया, परन्तु वह अपने निर्णय पर अडिग रहा। बाद में शूरवीर ने वनदेवी (यक्षी) से ज्ञात किया कि यदि खदिरसार व्रत भंग करता तो वह व्यन्तर योनि में जन्म लेकर उसका पति बनता, किन्तु व्रत की दृढ़ता के कारण वह इस अधोगति से बच गया। यह सुनकर खदिरसार ने पाँचों श्रावक व्रत धारण किए और मृत्यु के उपरान्त सौधर्म स्वर्ग में देव के रूप में उत्पन्न हुआ। यक्षी ने भी स्वीकार किया कि पूर्ण व्रतधारी जीव उसका पति नहीं बन सकता। इस प्रसंग से यह सिद्ध होता है कि दृढ़ धर्मपालन जीव को उच्च गति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
श्लोक 414 से 422 : शूरवीर का धर्मग्रहण और श्रेणिक का पूर्वजन्म
यक्षी के वचनों से शूरवीर ने व्रतों का महान् प्रभाव समझा और समाधिगुप्त मुनिराज के पास जाकर श्रावकधर्म के व्रत धारण कर लिए। दूसरी ओर खदिरसार का जीव स्वर्ग में दिव्य सुख भोगकर राजा कुणिक की रानी श्रीमती के गर्भ से श्रेणिक के रूप में उत्पन्न हुआ। राजा कुणिक ने शुभ निमित्तों से श्रेणिक को राज्य का अधिकारी जाना और उसकी रक्षा के लिए उसे दिखावटी क्रोध से राज्य से दूर भेज दिया। नन्दिग्राम में लोग राजाज्ञा के भय से उसका उचित सम्मान नहीं कर सके।
श्लोक 423 से 431 : विवाह, राज्यप्राप्ति और अभयकुमार की बुद्धिमत्ता
श्रेणिक एक ब्राह्मण के साथ रहने लगा और अपने तर्कपूर्ण उपदेशों से उसे प्रभावित किया। ब्राह्मण ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का विवाह श्रेणिक से कर दिया। बाद में राजा कुणिक ने अपना राज्य त्यागकर श्रेणिक को राजा बनाया। नन्दिग्राम के लोगों द्वारा पूर्व में किए गए अनादर की स्मृति से श्रेणिक उन पर कठोर कर लगाना चाहता था, किन्तु उसके पुत्र अभयकुमार ने अपनी बुद्धिमत्ता से उसका क्रोध शान्त कर दिया। इसी कारण वह ‘पण्डित’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 432 से 440 : श्रेणिक का सम्यग्दर्शन और उसके कारण
राजा श्रेणिक ने प्रश्न किया कि जैनधर्म में गहन श्रद्धा होने पर भी वह व्रत क्यों धारण नहीं कर पाता। गणधर ने बताया कि उसने पूर्व में नरकायु का बन्ध कर लिया है, इसलिए इस जन्म में व्रत ग्रहण संभव नहीं, केवल सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो सकती है। तत्पश्चात् उसके मोहनीय कर्मों का उपशम हुआ और वह क्रमशः उपशम, क्षायोपशमिक तथा क्षायिक सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुआ। सम्यग्दर्शन के दस प्रकारों का भी संक्षिप्त परिचय दिया गया।
श्लोक 441 से 453 : सम्यग्दर्शन के प्रकार और श्रेणिक का भविष्य
गणधर ने आज्ञा, मार्ग, उपदेश, सूत्र, बीज, संक्षेप, विस्तार, अर्थ, अवगाढ़ और परमावगाढ़—इन दस प्रकार के सम्यग्दर्शन का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि श्रेणिक अनेक शुभ भावनाओं के कारण तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध करेगा। यद्यपि वर्तमान कर्मों के कारण वह पहले रत्नप्रभा नरक में जाएगा, किन्तु वहाँ से निकलकर आगामी उत्सर्पिणी काल में भरत क्षेत्र का प्रथम तीर्थंकर महापद्म बनेगा। इस प्रकार उसके उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष किया गया।
श्लोक 454 से 463 : कालसौकरिक और शुभा के नरकगमन का कारण
श्रेणिक के प्रश्न पर गणधर ने बताया कि कालसौकरिक और ब्राह्मणकन्या शुभा भी नरकगामी होंगे। कालसौकरिक ने पुण्य-पाप का निषेध मानकर हिंसा, मांसभक्षण और अनेक पापों में प्रवृत्ति की तथा सातवीं नरक की आयु का बन्ध किया। शुभा भी तीव्र राग, द्वेष, पैशुन्य और सद्गुणों से घृणा करने के कारण नरकायु का बन्ध कर चुकी थी। इस प्रकार मिथ्यात्व और कषायों के दुष्परिणाम स्पष्ट किए गए।
श्लोक 464 से 475 : अभयकुमार के पूर्वभव और देवमूढ़ता का निवारण
अभयकुमार के पूर्वजन्म का वर्णन करते हुए गणधर ने बताया कि वह एक ब्राह्मणपुत्र था, जो विभिन्न प्रकार की मूढ़ताओं से ग्रस्त था। मार्ग में एक जैन श्रावक के साथ यात्रा करते समय उसने वृक्ष को देवता मानकर उसकी पूजा की। श्रावक ने युक्तिपूर्वक उसकी देवमूढ़ता का खण्डन किया। बाद में करेंच की लता के कारण हुई असह्य खुजली से ब्राह्मण भयभीत हुआ, तब श्रावक ने उसे समझाया कि सुख-दुःख का कारण देवता नहीं, अपितु अपने कर्म हैं।
श्लोक 476 से 485 : तीर्थमूढ़ता का खण्डन
श्रावक ने ब्राह्मण को समझाया कि पुण्य और पाप का कारण कर्म हैं, बाहरी देवता नहीं। गंगा स्नान से पाप नष्ट होने की धारणा का युक्तिपूर्वक खण्डन करते हुए उसने बताया कि यदि जल से पाप धुल सकते, तो तप और दान का कोई प्रयोजन न रहता। वास्तविक पाप मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद और कषाय से बँधते हैं तथा सम्यक्त्व, ज्ञान, चारित्र और तप से उनका क्षय होकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
श्लोक 486 से 502 : पाषण्ड, जाति और लोकमूढ़ता का निराकरण
श्रावक ने तप के नाम पर हिंसा करने वाले पाखण्ड का खण्डन किया तथा जन्माधारित जातिभेद को तर्कपूर्वक अस्वीकार किया। उसने स्पष्ट किया कि आत्मा की शुद्धि कर्मों से होती है, जन्म से नहीं। लोकपरम्पराओं और अन्धविश्वासों को भी उसने आगम-विरुद्ध बताकर त्याज्य सिद्ध किया। जब ब्राह्मण ने सर्वज्ञ की सत्ता पर प्रश्न उठाया, तब श्रावक ने राग-द्वेष के पूर्ण क्षय की सम्भावना सिद्ध करते हुए सर्वज्ञ वीतराग की स्थापना का आधार प्रस्तुत किया।
श्लोक 503 से 513 : सर्वज्ञ की सिद्धि और युक्तिवाद
श्रावक ने सिद्ध किया कि राग-द्वेष में तारतम्य दिखाई देता है, इसलिए उनका पूर्ण क्षय भी सम्भव है। इसी से सर्वज्ञ वीतराग की सिद्धि होती है। यदि तर्क और अनुमान को अस्वीकार किया जाए, तो किसी भी मत की प्रमाणिकता सिद्ध नहीं हो सकती। इसलिए युक्तिवाद स्वीकार करने पर सर्वज्ञ भगवान् और उनके उपदेश की प्रमाणिकता स्वतः सिद्ध हो जाती है। विद्वानों को सर्वज्ञ के वचनों के विरुद्ध मत ग्रहण नहीं करना चाहिए।
श्लोक 514 से 521: ब्राह्मण का धर्मग्रहण और वन में समाधि
श्रावक ने अनुमान प्रमाण की युक्तिसंगतता स्पष्ट कर ब्राह्मण के सभी संशय दूर कर दिए। इससे प्रभावित होकर ब्राह्मण ने जैनधर्म स्वीकार कर लिया। आगे दोनों वन में मार्ग भूल गए। वहाँ उन्होंने समझ लिया कि अब कोई सांसारिक उपाय शेष नहीं है। अतः दोनों ने संलेखना (समाधिमरण) का संकल्प लेकर ध्यान में स्थित होकर शरीर का परित्याग करने का निश्चय किया।
श्लोक 522 से 531 : अभयकुमार का पूर्वभव और पाण्डित्य
समाधिमरण के फलस्वरूप वह ब्राह्मण सौधर्म स्वर्ग में देव बना और वहाँ से च्युत होकर राजा श्रेणिक का पुत्र अभयकुमार हुआ। भविष्य में वह बारह प्रकार के तप द्वारा मोक्ष प्राप्त करेगा। यह सुनकर अभयकुमार अत्यन्त प्रसन्न हुआ। बाद में राजसभा में राजा श्रेणिक ने अभयकुमार से तत्त्वज्ञान का निरूपण करने का अनुरोध किया। आचार्य ने कहा कि वास्तविक पण्डित वही है जिसे जीव आदि तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान हो।
श्लोक 532 से 542 : षड्द्रव्य और अनेकान्त का सिद्धान्त
अभयकुमार ने बताया कि जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल—ये छह द्रव्य हैं। ये द्रव्य द्रव्यार्थिक नय से नित्य तथा पर्यायार्थिक नय से अनित्य हैं। यदि इन्हें केवल नित्य या केवल अनित्य माना जाए तो न परिवर्तन सिद्ध होगा और न व्यवहार सम्भव रहेगा। इसलिए अनेकान्त ही सत्य है। इसी आधार पर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र—ये तीनों मोक्ष के अनिवार्य कारण बताए गए।
श्लोक 543 से 549 : सम्यक्त्रय का माहात्म्य और सत्संग का प्रभाव
अभयकुमार ने स्पष्ट किया कि सम्यक्चारित्र सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान से संयुक्त होकर ही पूर्ण होता है तथा यही त्रिरत्न मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। सभा में उपस्थित सभी लोगों ने उसके गहन तत्त्वज्ञान और वाग्मिता की प्रशंसा की। आचार्य ने निष्कर्ष रूप में बताया कि एक साधारण श्रावक के सत्संग से अज्ञानी ब्राह्मण भी देवगति को प्राप्त हुआ और आगे चलकर अभयकुमार जैसा महाज्ञानी बना। इसलिए विवेकयुक्त श्रद्धा, तत्त्वचिन्तन, सत्संग और सम्यग्दर्शन से युक्त जीवन ही कर्मनिर्जरा कर अन्ततः मोक्ष का कारण बनता है।
पर्व 73 – श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 170
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
‘वर्धमानो जिनः श्रीमान्नामान्वर्थ समुद्वहन् । देयान्मे वृद्धिमुद्धतघातिकर्मविनिर्मिताम् ॥ १ ॥
अथानन्तर – सार्थक नामको धारण करनेवाले श्रीमान् वर्धमान जिनेन्द्र, घातिया कर्मोंके नाशसे प्राप्त हुई वृद्धि मुझे दें ॥ १ ॥
“Thereafter, may the glorious Vardhamāna Jinendra—who truly embodies the profound meaning of His name—grant me the spiritual growth that arises from the destruction of the Ghatiya (destructive) karmas. (1)”
श्लोक ( Shlok ) 2
तत्त्वार्थनिर्णयात्प्राप्य सन्मतित्वं सुबोधवाक् । पूज्यो देवागमाद्भूत्वात्राकलङ्को बभूविथ ॥ २ ॥
जिनके वचनोंसे सम्यग्ज्ञान उत्पन्न होता है ऐसे आप तत्त्वार्थ का निर्णय करनेसे सन्मति नामको प्राप्त हुए और देवोंके आगमनसे पूज्य होकर आप अकलङ्क हुए हैं ॥ २ ॥
“You, through whose divine words right knowledge (Samyagjnana) is born, attained the name Sanmati by ascertaining the true nature of reality (Tattvartha); and by becoming worthy of worship through the arrival of the celestial gods, You became Akalanka (stainless/spotless). (2)”
श्लोक ( Shlok ) 3
वीरसेनो महावीरो वीरसेनेन्द्रतां गतः । वीरसेनेन्द्रवन्द्याप्रिंवीरसेनेन भावितः ॥ ३ ॥
आपका नाम वीरसेन है, रुद्रके द्वारा आप महावीर कहलाये हैं, ऋद्धिधारी मुनियोंकी सेनाके नायक हैं। गणधरदेव आपके चरण-कमलोंकी पूजा करते हैं, तथा अनेक मुनिराज आपका ध्यान करते हैं ।॥ ३ ॥
“Your name is Veersen; You were called Mahavira by Rudra (the king of gods/Indra); You are the leader of the army of ascetics who possess extraordinary spiritual powers (Riddhis). The Ganadharas (chief disciples) worship Your lotus-feet, and countless great sages meditate upon You. (3)”
श्लोक ( Shlok ) 4
देवालोकस्तवैवैको लोकालोकावलोकने । किमस्ति व्यस्तमप्यस्मिन्ननेनानवलोकितम् ॥ ४ ॥
हे देव ! लोक और अलोकके देखनेमें आपका ही केवलज्ञानरूपी प्रकाश मुख्य गिना जाता है जिसे आपका केवलज्ञान नहीं देख सका ऐसा क्या कोई फुटकर पदार्थ भी इस संसारमें है ? ॥ ४ ॥
“O Divine Lord! Your omniscience (Kevalajnana) alone is regarded as the supreme light capable of perceiving both the cosmic universe (Loka) and the infinite space beyond (Aloka). Is there any stray, hidden object left in this entire universe that Your omniscience has not perceived? [Indeed, there is none.] (4)”
श्लोक ( Shlok ) 5
रूपमेव तव ब्रूते नाथ कोपाद्यपोहनम् । मणेर्मलस्य वैकल्यं महतः केन कथ्यते ॥ ५ ॥
हे नाथ! आपका रूप ही आपके क्रोधादिकके अभावको सूचित करता है सो ठीक ही है क्योंकि बहुमूल्य मणियोंकी कालिमाके अभावको कौन कहता है ? भावार्थ – जिस प्रकार मणियोंकी निर्मलता स्वयं प्रकट हो जाती है उसी प्रकार आपका शान्ति भाव भी स्वयं प्रकट हो रहा है ।। ५ ।।
“O Lord! Your very countenance and form testify to the complete absence of anger and other passions within You. And this is only natural—for who needs to explicitly point out the absence of darkness or flaws in highly precious gems? (5)”
Explanatory Note (Bhavartha): Just as the brilliant clarity and purity of a flawless gem are self-evident and need no explanation, Your profound, absolute state of inner peace and serenity shines forth and manifests itself naturally through Your divine presence.
श्लोक ( Shlok ) 6
अतिक्रम्य कुतीर्थानि तव तीर्थ प्रवर्तते । सम्प्रत्यपीति नुत्वानु पुराणं तत्प्रवक्ष्यते ॥ ६ ॥
हे प्रभो ! अन्य अनेक कुतीर्थोका उल्लङ्घनकर आपका तीर्थ अब भी चल रहा है इसलिए स्तुतिके अनन्तर आपका पुराण कहा जाता है ॥ ६ ॥
“O Lord! Having outlasted and crossed over numerous other false paths and spiritual traditions (Kuteerthas), Your true path (Teertha) continues to flourish even today. Therefore, following this hymn of praise, Your sacred history (Purana) is narrated. (6)”
श्लोक ( Shlok ) 7
महापुराणवाराशिपारावारप्रतिष्ठया । जिनसेनानुगामित्वमस्माभिनिविवक्षुभिः ॥ ७ ॥
यह महापुराण एक महासागरके समान है इसके पार जानेके लिए कुछ कहनेकी इच्छा करनेवाले हम लोगोंको श्रीजिनसेन स्वामी-का अनुगामी होना चाहिये ॥ ७ ॥
“This Mahapurana is like a vast, unfathomable ocean. We, who desire to say something in order to cross to its other shore, must faithfully follow in the footsteps of the great master, Shri Jinasena Swami. (7)”
श्लोक ( Shlok ) 8
अगाधोऽयं पुराणाब्धिरपारश्च मतिर्भम । पश्योत्ताना सपारा च तं तितीर्षुः किलैतया ॥ ८ ॥
यह पुराण रूपी महासागर अगाध और अपार है तथा मेरी बुद्धि थोड़ी और पारसहित है फिर भी मैं इस बुद्धिके द्वारा इस पुराणरूपी महासागरको पार करना चाहता हूँ ।। ८ ।।
“This ocean-like Purana is fathomless and boundless, whereas my intellect is extremely limited and finite. Even so, through this very intellect of mine, I desire to cross this vast ocean of sacred history. (8)”
श्लोक ( Shlok ) 9
मतिरस्तु ममैषाल्पा पुराणं महदस्त्विदम् । नावेवाम्भोनिधेरस्य प्राप्तोहं पारमेतया ॥ ९ ॥
यद्यपि मेरी बुद्धि छोटी है और यह पुराण बहुत बड़ा है तो भी जिस प्रकार छोटी-सी नावसे समुद्रके पार हो जाते हैं उसी प्रकार मैं भी इस छोटी-सी बुद्धिसे इसके पार हो जाऊँगा ।। ९ ।।
“Even though my intellect is small and this Purana is immensely vast, just as one can successfully cross the great ocean using a tiny boat, I too will cross to the other shore of this sacred scripture with the help of this modest intellect of mine. (9)”
श्लोक ( Shlok ) 10
कथाकथकयोस्तावद्वर्णना प्राग्विधीयते । दोषं ताभ्यामदोषाभ्यां पुराणं नोपढौकते ॥ १० ॥
सबसे पहले कथा और कथाके कहनेवाले वक्ताका वर्णन किया जाता है क्योंकि यदि ये दोनों ही निर्दोष हों तो उनसे पुराणमें कोई दोष नहीं आता है ॥ १० ॥
“First of all, the nature of the scripture (Katha) and the qualifications of the speaker (Vakta) who narrates it are described. For if both of these are flawless and pure, no defect can ever creep into the sacred history (Purana). (10)”
श्लोक ( Shlok ) 11
सा कथा यां समाकर्ण्य हेयोपादेयनिर्णयः । कर्णकट्वीभिरन्याभिः किं कथाभिहिंताथिनाम् ॥ ११ ॥
कथा वही कहलाती है कि जिसके सुननेसे हेय और उपादेयका निर्णय हो जाता है। हित चाहनेवाले पुरुषोंके कानोंको कड़वी लगनेवाली अन्य कथाओंसे क्या प्रयोजन है ? ॥ ११ ॥
“That alone is truly called a sacred narrative (Katha) by the hearing of which one can discern what is to be abandoned (Heya) and what is to be adopted (Upadeya). What purpose is served by other worldly stories that sound bitter to the ears of those who seek their own true well-being? (11)”
श्लोक 12 से 22
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288
पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92 | श्लोक 93 से 105 | श्लोक 106 से 114 | श्लोक 115 से 124 | श्लोक 125 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 170
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